मध्य प्रदेश: कहीं 5 तो कहीं 33,500 रुपये प्रति लीटर में ख़रीदा फ़िनाइल, सरकारी ख़रीद में इतना फ़र्क क्यों?

    • Author, विष्णुकांत तिवारी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, भोपाल
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

फ़िनाइल की एक लीटर की बोतल मध्य प्रदेश के एक नगरीय निकाय ने 33 हज़ार 500 रुपये में ख़रीदी, जबकि इतनी ही मात्रा का फ़िनाइल मध्य प्रदेश के एक दूसरे नगरीय निकाय ने महज़ पांच रुपये की दर से ख़रीदा.

इन नगरीय निकायों या सिविक बॉडीज़ ने कचरा उठाने के लिए जो गाड़ियां ख़रीदीं, उनकी कीमतों में भी भारी अंतर सामने आया. एक नगरीय निकाय ने दो लाख रुपये में कचरा वाहन ख़रीदा, जबकि दूसरे ने चार डस्टबिन के साथ ऐसी ही गाड़ी के लिए छह लाख रुपये ख़र्च किए.

सरकारी ख़रीद में इस बड़े अंतर का मामला तब सामने आया, जब इन निकायों से जुड़े अफ़सरों को फटकार लगाने वाली एक बैठक का वीडियो वायरल हो गया.

राज्य मंत्री बोलीं- उच्चस्तरीय जांच होगी

मध्य प्रदेश के 374 नगरीय निकायों में बीते तीन साल में की गई ख़रीद का विश्लेषण करने पर ये तथ्य सामने आए हैं. इन सरकारी ख़रीदों में अनियमितताओं से जुड़े आंकड़े दर्शाने वाला एक प्रेज़ेंटेशन भोपाल में हुई बैठक में पेश किया गया.

बीबीसी न्यूज़ हिन्दी ने इन डॉक्यूमेंट्स को तैयार करने वाले अधिकारी से बात की, जिन्होंने आंकड़ों की तस्दीक की है.

यह अधिकारी मध्य प्रदेश स्टेट इलेक्ट्रॉनिक्स डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन के अतिरिक्त प्रबंध निदेशक अंशुमन राज हैं. उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बातचीत में यह भी बताया कि यह एनालिसिस करने के लिए एआई की भी मदद ली गई.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "यह पहल किसी शिकायत पर नहीं, बल्कि विभाग ने ख़ुद शुरू की थी."

वहीं, नगरीय प्रशासन विभाग की राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी ने मामले की उच्चस्तरीय जांच कराने की बात कही है.

क्या है पूरा मामला और यह कैसे उजागर हुआ?

यह मामला मध्य प्रदेश के नगरीय प्रशासन विभाग के तहत आने वाले नगरीय निकायों की सरकारी ख़रीद से जुड़ा है. नगर निगम, नगर पालिका और नगर परिषद जैसे निकाय शहरों में सफ़ाई से लेकर कचरा प्रबंधन और स्ट्रीट लाइट जैसी ज़रूरी सुविधाओं के लिए सामान ख़रीदते हैं.

एमपी स्टेट इलेक्ट्रॉनिक्स डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन के एडिशनल मैनेजिंग डायरेक्टर अंशुमन राज ने पिछले तीन साल में हुई ख़रीद का एनालिसिस किया. इसमें यह देखा गया कि अलग-अलग नगरीय निकाय एक जैसे सामान को किस क़ीमत पर ख़रीद रहे हैं. इस तुलना में कई सामानों की ख़रीद क़ीमतों में बड़ा अंतर सामने आया.

इसके बाद इस साल अप्रैल में नगरीय प्रशासन विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय दुबे ने भोपाल में अधिकारियों की एक बैठक की थी. इसमें उन्होंने ख़रीद के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए अधिकारियों को चेतावनी दी थी, "अब तक मैं इस पर ज़्यादा ध्यान नहीं दे पाया था, लेकिन अब अनियमितताओं पर कार्रवाई की जाएगी."

बैठक का वीडियो अब अक्तूबर में वायरल हुआ है. इसमें दुबे अधिकारियों से कहते दिखते हैं, "विभाग को जानकारी है कि किस निकाय ने क्या ख़रीदा और किस क़ीमत पर ख़रीदा."

60 वॉट की एलईडी लाइट 11,800 रुपये में ख़रीदी

बैठक में पेश किए गए प्रेज़ेंटेशन के मुताबिक़, 374 नगरीय निकायों ने तीन साल में गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस यानी जेम पोर्टल के ज़रिए क़रीब 1,134 करोड़ रुपये की ख़रीदारी की.

जेम केंद्र सरकार का ऑनलाइन पोर्टल है, जहां सरकारी विभाग सामान और सेवाएं ख़रीद सकते हैं. विभाग ने इस पोर्टल पर दर्ज ख़रीद के आंकड़ों का विश्लेषण किया और एक जैसे सामान की क़ीमतों की तुलना की.

प्रेज़ेंटेशन में बताया गया कि सरदारपुर नगरीय निकाय ने 2,500 लीटर फ़िनॉलिक डिसइन्फ़ेक्टेंट पांच रुपये प्रति लीटर की दर से ख़रीदा. वहीं, राजगढ़ ज़िले के एक नगरीय निकाय ने इसी तरह के केमिकल को 33,500 रुपये प्रति लीटर की दर से ख़रीदा.

एलईडी लाइट की ख़रीद में भी ऐसा ही अंतर सामने आया. प्रेज़ेंटेशन के मुताबिक़, 60 वॉट की एलईडी लाइट एक जगह 306 रुपये में ख़रीदी गई, जबकि भोपाल नगर निगम में इसकी क़ीमत 11,800 रुपये दर्ज की गई.

बैठक के वायरल वीडियो में नगरीय प्रशासन विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय दुबे इन ख़रीदों में हुई अनियमितताओं के उदाहरण देते हुए कचरा वाहनों की ख़रीद का ज़िक्र करते हैं. इस दौरान उन्होंने कहा, "एक नगरीय निकाय ने दो लाख रुपये में कचरा वाहन ख़रीदा, जबकि दूसरे ने चार डस्टबिन के साथ ऐसे ही वाहन के लिए छह लाख रुपये ख़र्च किए."

विभाग ने ख़रीद की पड़ताल कैसे की?

अंशुमन राज ने इसी प्रेज़ेंटेशन के दौरान बताया कि जब वे 2023 में एसडीएम थे, तब एक नगर पालिका में 200 एलईडी बल्ब 60 लाख रुपये में ख़रीदे जाने की शिकायत सामने आई थी. इसके बाद उन्होंने अपने क्षेत्र की नगर पालिकाओं में हुई ख़रीद की जांच की.

आगे चलकर उन्होंने पूरे मध्य प्रदेश में पिछले कई वर्षों के दौरान नगरीय निकायों द्वारा ख़रीदे गए सामानों का डेटा इकट्ठा किया और उसका एनालिसिस तैयार किया.

इस प्रेज़ेंटेशन में विभाग ने सप्लायर्स और ख़रीद के आंकड़ों का भी विश्लेषण किया. इससे पता चला कि एक ही विक्रेता ने कई जगह अलग-अलग नामों से कारोबार किया. कई नगर पालिकाओं में एक ही विक्रेता द्वारा सामान की सप्लाई किए जाने के उदाहरण भी सामने आए. अंशुमन राज ने बैठक के दौरान अधिकारियों को इसकी जानकारी दी.

अंशुमन राज के मुताबिक़, विभाग ने आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद से एक ऐसी व्यवस्था तैयार की है, जो अलग-अलग नामों से दर्ज समान उत्पादों की पहचान कर सकती है और उनकी ख़रीद क़ीमतों में असामान्य अंतर का पता लगा सकती है.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "ऐसा नहीं है कि पहले किसी मामले में कार्रवाई नहीं हुई, लेकिन निगरानी बढ़ने से अब ऐसी गड़बड़ियों की पहचान करना और उन पर कार्रवाई करना आसान होगा."

प्रेज़ेंटेशन में यह भी अनुमान लगाया गया कि 1,134 करोड़ रुपये की ख़रीद में अगर सामान औसत क़ीमतों पर ख़रीदा जाता, तो क़रीब 250 करोड़ रुपये की संभावित बचत हो सकती थी.

सरकारी ख़रीद की निगरानी में कहां दिक़्क़त है?

इस वीडियो के वायरल होने के बाद यह सवाल भी उठता है कि आख़िर अधिकारी अपने ही विभाग द्वारा ख़रीदे जा रहे सामान और उनकी क़ीमतों की निगरानी क्यों नहीं कर पा रहे?

इस मामले में राज्य के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बीबीसी से बात की. उन्होंने बताया कि सरकारी ख़रीद में ऐसी अनियमितताएं पहले भी सामने आती रही हैं, लेकिन उनकी निगरानी करना मुश्किल है.

अधिकारी के मुताबिक़, "अलग-अलग पोर्टल के ज़रिए होने वाली ख़रीद का पूरा डेटा राज्य सरकार को उपलब्ध नहीं होता. अगर ख़रीदे गए सामान की क़ीमत, उसकी मात्रा और विक्रेता से जुड़ी जानकारी राज्य सरकार और संबंधित विभागों के साथ साझा की जाए, तो निगरानी आसान हो सकती है."

इस वरिष्ठ अधिकारी ने यह भी कहा, "अभी जेम पोर्टल या अन्य ख़रीदारी के पोर्टल ख़रीदे गए सामान, उनकी क़ीमत आदि का डेटा राज्य सरकार या विभागों के साथ शेयर नहीं करते हैं. जबकि ख़रीदारी पोर्टल में ही ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जो असामान्य क़ीमतों को चिह्नित करे और ख़रीद का डेटा संबंधित विभागों के साथ साझा करे."

इससे अधिकारियों को पता चल सकता है कि किस जगह सामान की क़ीमत सामान्य से काफ़ी ज़्यादा है और किन मामलों की जांच की ज़रूरत है.

जिन ख़रीद में अंतर मिला, उनमें अब तक क्या कार्रवाई हुई?

अपर मुख्य सचिव संजय दुबे ने अप्रैल की बैठक में चेतावनी दी थी कि इस साल से ख़रीद में अनियमितताओं पर कार्रवाई की जाएगी.

हालांकि, उपलब्ध जानकारी से यह स्पष्ट नहीं है कि प्रेज़ेंटेशन में बताए गए सभी मामलों की अलग-अलग जांच हुई है या कितने मामलों में अनियमितता की पुष्टि हुई है.

बीबीसी ने इस मामले से जुड़े अधिकारियों से यह जानने की कोशिश की कि अब तक किन मामलों में कार्रवाई हुई है और आगे क्या क़दम उठाए जाएंगे.

वायरल वीडियो में अधिकारियों को चेतावनी दे रहे अपर मुख्य सचिव संजय दुबे ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, "हालांकि यह पुराना वीडियो है, लेकिन इसका आशय यह था कि हम देख रहे हैं. नगरीय निकायों के हर ख़र्च पर निगरानी है और अब इसका असर भी दिख रहा है."

उन्होंने आगे कहा, "हमने लगभग 146 ऐसे प्रकरणों में कार्रवाई की है, कई मामलों में लोगों को हटाया भी गया है और कई मामलों में हमने पैसे भी रिकवर किए हैं."

बीजेपी नेता और नगरीय प्रशासन विभाग की राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी ने कहा कि वीडियो उनके संज्ञान में आया है और मामले की उच्चस्तरीय जांच करवाई जाएगी.

उन्होंने कहा, "समय-समय पर पहले भी हम लोग ख़रीद और उसके मूल्य की जांच करवाते रहे हैं और गड़बड़ी पाई जाने पर कार्रवाई भी की गई है. अभी एक वीडियो सामने आया है और जो भी सामने आएगा, उसकी उच्चस्तरीय जांच करवाई जाएगी."

विपक्ष ने सरकार पर साधा निशाना

मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने इस मामले को लेकर राज्य सरकार पर निशाना साधा है. उन्होंने कहा, "भ्रष्टाचार मध्य प्रदेश की जड़ों में कैंसर की तरह फैल गया है."

पटवारी ने कहा, "नगरीय प्रशासन विभाग के अपर मुख्य सचिव ने ख़ुद सरकारी ख़रीद में क़ीमतों के बड़े अंतर का ख़ुलासा किया है."

पटवारी ने अधिकारी को इसके लिए धन्यवाद देते हुए कहा कि अब उन्हें अपने विभाग में कार्रवाई करनी चाहिए.

वहीं, मध्य प्रदेश के पूर्व राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने सरकारी ख़रीद में पारदर्शिता और अधिकारियों की जवाबदेही पर सवाल उठाए हैं. सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में उन्होंने कहा, "केवल प्रेज़ेंटेशन में अनियमितताएं सामने रखना पर्याप्त नहीं है." उनके मुताबिक़, मामलों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और साक्ष्य मिलने पर ज़िम्मेदार लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जानी चाहिए.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें

BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह

कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.