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ट्रंप की होर्मुज़ स्ट्रेट को बंद करने की धमकी से क्या भारत की मुश्किलें बढ़ेंगी?
- Author, संदीप राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 11 मिनट
जंग ख़त्म करने को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता फ़ेल होने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने होर्मुज़ स्ट्रेट को बंद करने की बात कही है.
अमेरिकी सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) ने भी घोषणा की है कि राष्ट्रपति के आदेश के अनुसार, अमेरिकी सेनाएं सोमवार सुबह 10 बजे ईएसटी (और भारतीय समयानुसार शाम 7.30 बजे) से ईरानी बंदरगाहों की नौसैनिक नाकाबंदी लागू करना शुरू कर देंगी.
हालांकि सेंटकॉम का कहना है कि अमेरिकी सेनाएं होर्मुज़ स्ट्रेट से ग़ैर-ईरानी बंदरगाहों की ओर आने जाने वाले जहाज़ों की आवाजाही को नहीं रोकेंगी.
लेकिन इस बहुप्रतीक्षित वार्ता के नाकाम होने के बाद कच्चे तेल की क़ीमतें फिर से 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं.
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सोमवार को जब एनर्जी मार्केट खुले तो ब्रेंट क्रूड ऑयल 7.5 प्रतिशत बढ़कर 102.37 डॉलर हो गया, जबकि वेस्ट टेक्सस इंटरमीडिएट क्रूड ऑयल 8.3 प्रतिशत बढ़कर 104.56 डॉलर हो गया.
तेल की बढ़ती क़ीमतों को लेकर पहले से ही मुश्किलों की सामना कर रही दुनिया में और अनिश्चितता फैल गई है. आयरलैंड में राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शनों के बाद एक इमर्जेंसी कैबिनेट मीटिंग में पेट्रोल और डीज़ल से टैक्स घटाने की घोषणा की गई है.
ऑस्ट्रेलिया में क़ीमतों में भारी बढ़ोतरी के चलते ट्रकिंग उद्योग को भारी झटका लगने की आशंका जताई जा रही है. तेल की क़ीमतें कम करने के लिए जर्मनी ने भी टैक्स में कटौती की है.
मौजूदा संकट से भारत पर भी चौतरफ़ा असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है क्योंकि एनर्जी आयात पर बहुत अधिक निर्भर भारत का बहुत बड़ा पेट्रोलियम उत्पाद खाड़ी देशों से आता है.
होर्मुज़ स्ट्रेट पर भारत की 'तेल निर्भरता'
होर्मुज़ स्ट्रेट दुनिया के सबसे अहम समुद्री तेल मार्गों में से एक है. दुनिया के लगभग 20 फ़ीसदी तेल और एलएनजी का परिवहन इसी जलमार्ग से होता है.
भारत अपनी खपत का लगभग 90 प्रतिशत पेट्रोलियम पदार्थ आयात करता है और इसमें भी एक बड़ा हिस्सा होर्मुज़ स्ट्रेट से होकर गुज़रता है. भारत कच्चे तेल का दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है.
हालांकि भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, बीते सालों में भारत अपने पेट्रोलियम पदार्थों के आयात में ख़ासी विविधता ले आया है और अब वह 41 देशों से आयात करता है.
लेकिन विश्लेषक इस बात की आशंका जता रहे हैं कि भारत लिक्विड नेचुरल गैस का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है जो होर्मुज़ से होकर गुज़रता है.
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हर्ष पंत ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बात करते हुए कहा, "भारत अपनी ज़रूरत का क़रीब 90 प्रतिशत तेल आयात करता है जिसमें 50 प्रतिशत होर्मुज़ से होकर आता है. अभी जो भी ख़रीद हो रही है, वो ऊंचे दामों पर हो रही है. ब्लॉकेड इस समस्या को बढ़ाएगा ही."
भारतीय वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2025 में भारत के कच्चे तेल के आयात का 50% से ज़्यादा हिस्सा मध्य पूर्व से आया था, ख़ासकर इराक़, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात से.
लेकिन 2019 से 2022 के बीच भारत की मध्य पूर्व पर यह निर्भरता 60% से भी ऊपर चली गई थी.
इस भारी निर्भरता को देखते हुए, क्षेत्र में किसी भी तरह की रुकावट आपूर्ति को प्रभावित कर सकती है.
हालांकि पीआईबी के अनुसार, बीती 11 मार्च को भारत सरकार के अंतर मंत्रालयी ब्रीफ़िंग के दौरान कहा गया कि भारत का 70 प्रतिशत कच्चा तेल आयात अब होर्मुज़ स्ट्रेट से बाहर से आता है और एनर्जी सप्लाई सुरक्षित बनी हुई है.
एलपीजी, एलएनजी सप्लाई पर असर
समाचार एजेंसी एएफ़पी के अनुसार, भारत लिक्विफ़ाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) का दुनिया में चौथा सबसे बड़ा और एलपीजी का दूसरा सबसे बड़ा आयातक देश है.
ये आयात मुख्य रूप से मध्य पूर्व से किए जाते हैं. हर्ष पंत के अनुसार, "भारत अपनी ज़रूरत का 60 प्रतिशत एलपीजी आयात करता है जिसका 90 प्रतिशत हिस्सा होर्मुज़ से होकर आता है."
अल जज़ीरा की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि, क़तर एलएनजी का सबसे बड़ा उत्पादक देश है और उसने इसका उत्पादन रोक दिया है.
ब्लूमबर्ग के मुताबिक़, भारत मध्य पूर्व से अपनी ज़रूरत का अधिकांश एलपीजी और दो तिहाई एलएनजी ख़रीदता है. क़तर भारत का सबसे बड़ा एलएनजी सप्लायर है. क़तर, दुनिया में एलएनजी का सबसे प्रमुख उत्पादक देश है.
कुछ रिपोर्टों के मुताबिक़ क़तर ने अपना उत्पादन रोक दिया है.
दरअसल, क़तर दुनिया के लगभग पांचवें हिस्से की एलएनजी का आपूर्तिकर्ता है और इसमें रास लाफ़ान गैस फ़ील्ड का बहुत बड़ा योगदान है. इसे क़तर का 'क्राउन ज्वेल' भी कहा जाता है, जिस पर ईरान ने पिछले दिनों बड़ा हमला किया था और जिसकी वजह से इसे भारी नुक़सान पहुंचा है.
इन सब हालात में, भारत में कंपनियों के लिए लिक्विफ़ाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) की औद्योगिक आपूर्ति में 20 प्रतिशत की कटौती की पहले ही घोषणा कर दी है.
भारत सरकार के पेट्रोलियम मंत्रालय ने पहले कहा था कि घरों, परिवहन क्षेत्र और एलपीजी उत्पादन के लिए प्राथमिकता दी जाए.
हर्ष पंत का कहना है कि पहले ईरान और अब अमेरिका के ब्लॉकेड से हॉर्मुज़ से एनर्जी परिवहन का मुद्दा और जटिल हो गया है और इससे चीन, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया पर सबसे अधिक असर पड़ने वाला है.
हालांकि जिस समय ट्रंप ने घोषणा की कि अमेरिकी सेना होर्मुज़ की नाकाबंदी करेंगी, ये ख़बर भी आई कि 20 लाख बैरल कच्चा तेल लेकर ईरानी टैंकर भारत की ओर रवाना हुए हैं.
ऐसा बीते सात साल में पहली बार हुआ है. इस तेल का आयातक रिलायंस इंडस्ट्रीज़ को बताया गया है. रिपोर्ट्स के अनुसार, आने वाले दिनों में ईरान से कई मिलियन बैरल और तेल भारत आएगा.
बीबीसी फ़ारसी ने मरीन ट्रैफ़िक इंस्टीट्यूट के आंकड़ों के हवाले से कहा कि बीते रविवार को ईरानी झंडे वाले तीन जहाज़ होर्मुज़ स्ट्रेट को पार कर अरब सागर में पहुंचे हैं.
फ़र्टिलाइज़र पर असर
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, दुनिया का लगभग एक-तिहाई फ़र्टिलाइज़र- जैसे कि यूरिया, पोटाश, अमोनिया और फ़ॉस्फ़ेट- आमतौर पर होर्मुज़ स्ट्रेट से होकर जाता है.
विश्व व्यापार संगठन के आंकड़ों के अनुसार, जंग शुरू होने के बाद से इस मार्ग से फ़र्टिलाइज़र-संबंधी उत्पादों की शिपमेंट लगभग ठप पड़ गई है.
बीते मार्च के अंत में प्रकाशित बीबीसी की एक स्टोरी के मुताबिक़, भारत, चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा फ़र्टिलाइज़र उपभोक्ता है, और कच्चे माल के साथ ही तैयार उत्पादों के लिए काफ़ी हद तक आयात पर निर्भर है.
इनका बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है और होर्मुज़ स्ट्रेट से होकर गुज़रता है.
भारत हर साल लगभग 4 करोड़ टन यूरिया इस्तेमाल करता है, जिस पर सरकार सब्सिडी देती है.
हर्ष पंत का कहना है कि आपूर्ति बाधित होने से किसानों के बुवाई के फ़ैसले प्रभावित हो सकते हैं.
उनके अनुसार, "भारत में मुख्य बुवाई सीज़न जून-जुलाई में आने वाला है. प्राकृतिक गैस यूरिया बनाने का मुख्य कच्चा माल है और भारत इसका लगभग 85% आयात करता है, जो ज्यादातर खाड़ी देशों से आता है."
कई विश्लेषकों की तरह ही हर्ष पंत का कहना है कि अगर होर्मुज़ खुल भी जाता है तो जंग से पहले वाली स्थिति में लौटने में छह महीने से एक साल तक लग जाएंगे.
उनका कहना है कि एनर्जी सेक्टर को हुए नुक़सान को ठीक करने में, होर्मुज़ में जो बारूदी सुरंगें बिछाई गई हैं उन्हें हटाने में और परिवहन बीमा में जो भारी बढ़ोतरी हुई है उससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर लंबे समय तक के लिए प्रभाव बना रहेगा.
जेनेरिक दवाओं के बाज़ार पर असर
पेट्रोकेमिकल्स से निकलने वाले पदार्थ, जैसे मेथनॉल और एथिलीन, वैश्विक स्तर पर दवाइयों के उत्पादन में अहम सामग्री हैं, जिनमें दर्दनिवारक, एंटीबायोटिक्स और वैक्सीन शामिल हैं.
बीबीसी वेरिफ़ाई की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, गल्फ़ को-ऑपरेशन काउंसिल के देशों- सऊदी अरब, क़तर, ओमान, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और बहरीन- के पास वैश्विक पेट्रोकेमिकल उत्पादन क्षमता का लगभग 6% हिस्सा है.
फ़ोर्ब्स के मुताबिक़, वैश्विक फ़ार्मा सप्लाई चेन में भारत की हिस्सेदारी 20 प्रतिशत से ज़्यादा है, जिनमें से कई अमेरिका और यूरोप भेजी जाती हैं.
इनमें से कई फ़ार्मास्यूटिकल उत्पाद खाड़ी क्षेत्र के हवाई अड्डों, ख़ासकर दुबई से वैश्विक बाज़ारों तक पहुंचाए जाते हैं. जंग की वजह से यह मार्ग लगभग बंद पड़ा है.
अमेरिका भारत में निर्मित जेनेरिक दवाइयों का सबसे बड़ा निर्यात बाज़ार है और साल 2024 में भारत ने 9 अरब डॉलर के फ़ार्मा उत्पाद का अमेरिका में निर्यात किया था.
हर्ष पंत का कहना है कि जंग की अनिश्चितता ने वैश्विक फ़ार्मा सप्लाई चेन को काफ़ी हद तक प्रभावित किया है, भारत इससे अछूता नहीं रहेगा.
उनके मुताबिक़, "होर्मुज़ पूरी तरह से शटडाउन नहीं भी है तो भी, परिवहन की लागत बढ़ गई है. इसके अलावा आपूर्ति का समय भी खिंच रहा है. इससे महंगाई बढ़ेगी."
भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर
इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, ईरान जंग की वजह से रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने वित्त वर्ष 2027 के जीडीपी ग्रोथ रेट के अपने अनुमान को घटाकर 6.9 प्रतिशत कर दिया है. पिछले वित्त वर्ष में जीडीपी ग्रोथ रेट का उसका अनुमान 7.6 प्रतिशत था.
इससे ज़ाहिर है कि एनर्जी सप्लाई चेन में बाधा की वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर की आशंकाएं गहराने लगी हैं.
हर्ष पंत ने कहा, "कच्चे तेल के अलावा, एलएनजी, फ़र्टीलाइज़र्स, केमिकल्स की दिक्कतें उद्योगों के लिए चुनौती है. इससे आम आदमी के लिए रोज़मर्रे की दिक्कतें बढ़ेंगी लेकिन सरकार के लिए भी मुश्किलों भरा समय होगा."
उनके अनुसार, आयात के महंगे होने से राजकोषीय घाटा भी बढ़ेगा और इसका असर व्यापार संतुलन पर पड़ेगा. दूसरी तरफ़ भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने चुनौतियां बढ़ रही हैं.
बीते कुछ महीनों में डॉलर के मुक़ाबले रुपया निम्नतम स्तर पर पहुंच गया है. इससे भारतीय निर्यात को सपोर्ट तो मिलता है लेकिन आयात महंगा होगा. ये भी सरकार के लिए एक बड़ी चिंता का विषय है.
हालांकि आरबीआई ने अपने अनुमान में कहा है कि अगर जंग जल्द समाप्त होती है तो भारतीय अर्थव्यवस्था को स्थिर होने में कम से कम दो तिमाही लग जाएगी.
हर्ष पंत का कहना है कि अभी सरकार के सामने तत्काल चुनौती व्यापार घाटे की है. इसके बाद चालू खाता घाटे की भी चुनौती होगी.
कई रिपोर्ट्स में कहा गया है कि इस जंग से खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी. और ऐसा होता है तो भारत को खाड़ी देशों से आने वाले रेमिटेंस (भारतीय जो विदेशी मुद्रा भेजते हैं) पर भी असर पड़ेगा.
कुछ अनुमानों में कहा गया है कि खाड़ी देशों में 90 लाख से अधिक भारतीय रहते हैं, जिनमें अधिकांश आजीविका के लिए गए हैं.
अमेरिका क्यों चाहता है होर्मुज़ स्ट्रेट की नाकाबंदी
बीती 28 फ़रवरी को जब अमेरिका और इसराइल ने ईरान पर हमला बोला था तो आईआरजीसी (ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर) ने होर्मुज़ को बंद कर दिया और उसकी ओर से कहा गया कि बिना उसकी अनुमति के कोई टैंकर लदे जहाज़ नहीं गुजर सकेंगे.
बाद में ईरान की संसद में टोल लगाने को लेकर एक क़ानून बनाने का प्रस्ताव पेश किया गया है.
विश्लेषकों का कहना है कि ईरान होर्मुज़ स्ट्रेट को एक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है, ताकि दुनिया के बाक़ी देश ट्रंप पर जंग ख़त्म करने का दबाव डालें.
हर्ष पंत का कहना है कि अब यही काम अमेरिका करना चाहता है.
उनके अनुसार, "होर्मुज़ की नाकाबंदी करके अमेरिका चीन, भारत, जापान समेत उन देशों पर दबाव डालना चाहता है जिनकी इस समुद्री रास्ते पर निर्भरता अधिक है."
हालांकि बीबीसी फ़ारसी से एक शिपिंग विशेषज्ञ वेस्पुच्ची मरीन के सीईओ लार्स जेनसेन ने कहा कि होर्मुज़ बंद करने की ट्रंप की धमकी का असर बहुत सीमित संख्या में जहाज़ों पर पड़ेगा.
उन्होंने कहा, "अगर अमेरिकी वास्तव में ऐसा करते हैं, तो बहुत कम संख्या में जहाज़ रुकेंगे. बड़े पैमाने पर इसका ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ेगा."
ट्रंप की यह धमकी की कि जो जहाज़ ईरान को टोल देंगे उन्हें सुरक्षित रास्ता नहीं मिलेगा, उसका असर भी सीमित होगा, क्योंकि ऐसा करने वाली कंपनियां पहले से ही अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करती हैं.
जेनसेन के अनुसार, ज़्यादातर शिपिंग कंपनियां इंतज़ार करेंगी कि क्या कोई अस्थायी शांति समझौता होता है और क्या वह टिकाऊ रहता है.
हर्ष पंत का कहना है कि ईरान और अमेरिका दोनों ही होर्मुज़ को हथियार की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं. हालांकि अभी हालात काफ़ी अस्पष्ट हैं और देखना होगा कि आगे क्या होता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.