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मणिपुर: एक फुटबॉलर जो बन गए मुख्यमंत्री
- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, गुवाहाटी से बीबीसी हिंदी के लिए
- प्रकाशित
किसी जमाने में मणिपुर राज्य से फुटबाल खिलाड़ी के तौर पर राष्ट्रीय स्तर पर नाम कमाने वाले नोंगथोम्बम बिरेन सिंह मणिपुर में भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई में बनने वाली सरकार के पहले मुख्यमंत्री बन गए हैं.
राज्यपाल नजमा हेप्तुल्ला ने बुधवार को राजभवन में दोपहर 1 बजे बिरेन सिंह को मणिपुर के मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई. शपथ ग्रहण समारोह में केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल, प्रकाश जावडेकर, जितेंद्र सिंह समेत कई राज्यों के मुख्यमंत्री मौजूद थे.
देश से बाहर खेलने वाले मणिपुर के पहले खिलाड़ी
इनके बारे में कहा जाता है कि फुटबाल और पत्रकारिता के क्षेत्र में उनका जो प्रदर्शन रहा वही उन्हें आज मुख्यमंत्री की कुर्सी तक ले गया. मैतेई समुदाय से आने वाले बिरेन सिंह ग्रेजुएट होने के साथ ही पत्रकारिता में डिप्लोमा कर रखा हैं.
ईस्ट जिले के लुवांगसांगबाम ममांग लइकै गांव में 1 जनवरी 1961 में जन्में बिरेन सिंह राजनीति में आने से पहले देश से बाहर खेलने वाले मणिपुर के एकमात्र चर्चित फुटबाल खिलाड़ी थे.
लेफ्ट बैक पोजीशन में खेलने वाले बिरेन सिंह का डिफेन्स कमाल का था. यही कारण रहा कि साल 1981 में डूरंड कप जीतने वाली सीमा सुरक्षा बल टीम के वे सदस्य थे.
बाद में उन्होंने बतौर संपादक नाहोरोलगी थुआदंग नामक एक अख़बार में काम करना शुरू किया. उस समय मणिपुर में सरकार और चरमपंथी संगठनों के दबाव के बीच युवाओं की भूमिका पर बतौर पत्रकार काम करना आसान नहीं हुआ करता था.
मणिपुर के लोगों के बीच एक फुटबाल खिलाड़ी और बाद में एक पत्रकार के तौर पर वो काफी चर्चित रहे जिसका फायदा उन्हें राजनीति में प्रवेश करते समय मिला.
2002 में शुरू की राजनीतिक पारी
2002 में बिरेन सिंह ने पहली बार क्षेत्रीय दल डेमोक्रेटिक रिवॉल्यूशनरी पीपल्स पार्टी से चुनाव लड़ा और हेइंगांग क्षेत्र से विधायक बने.
यह वही बिरेन सिंह है जिन्हें कांग्रेस के निवर्तमान मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह का सबसे ख़ास माना जाता था.
साल 2002 में प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद इबोबी सिंह के सामने एक स्थिर सरकार चलाने की चुनौतियां थी. मणिपुर को 1972 में राज्य का दर्जा मिलने के बाद से ही राजनीतिक उथल-पुथल के कारण यहां 18 बार सरकारें बदली जा चुकी थी.
ऐसे दौर में इबोबी को एक ऐसी टीम की जरूरत थी जो उनकी गठबंधन वाली सरकार का कार्यकाल पूरा करा सके और उनकी यह तलाश 2003 में बिरेन सिंह के रूप में ख़त्म हुई.
इबोबी ने बिरेन सिंह को कांग्रेस में शामिल कर लिया और उन्हें अपने मंत्रिमंडल में जगह दी. इस तरह वे इबोबी सरकार के दो कार्यकाल में लगातार मंत्री रहे.
मुख्यमंत्री के ख़ास थे बिरेन
पहली बार सतर्कता विभाग में राज्य मंत्री बने बिरेन सिंह का राजनीतिक कैरियर ठीक वैसा ही रहा जैसा असम में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी सरकार में मंत्री बने हिमंत विश्व शर्मा का रहा हैं.
राजनीति में कई लोग बिरेन सिंह को मणिपुर का हिमंत विश्व शर्मा कहते है. दोनों ही अपने मुख्यमंत्री के सबसे ख़ास और संकट मोचक रहे और बाद में मतभेद इतना गहरा हुआ कि पार्टी छोड़ देनी पड़ी.
कई मौक़ो पर बिरेन सिंह कहते रहें हैं कि इबोबी सरकार को विकट परिस्थितियों से बाहर निकालने में उन्होंने मदद की वरना इबोबी लगातार एक के बाद एक तीन कार्यकाल पूरा करने का इतिहास नहीं बना पाते.
इबोबी सिंह से टकराव
लेकिन इबोबी ने अपने तीसरे कार्यकाल के समय बिरेन से दूरियां बना ली. बिरेन सिंह को कांग्रेस में एक ऐसे नेता के रूप में देखा जाने लगा जो किसी भी समय इबोबी से उनकी सत्ता छीन सकते हैं.
इबोबी के कामकाज पर सवाल उठाने वाले वह पहले नेता रहे. बाद में दोनों के बीच मतभेद बढ़ने लगा तो पार्टी ने बिरेन सिंह को शांत करने के लिए मणिपुर कांग्रेस का उपाध्यक्ष बना दिया लेकिन इबोबी सिंह के साथ उनका टकराव कम नहीं हुआ.
जब साल 2012 में इबोबी सिंह ने तीसरी बार प्रदेश में सरकार बनाई तो बिरेन सिंह को मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया गया. इसका एक कारण बिरेन सिंह के बेटे अजय मीतैई का नाम 2011 के एक हत्याकांड से जुड़ने को भी माना जाता हैं.
कैसे आए बीजेपी में
असम और अरुणाचल प्रदेश में सरकार बनाने के बाद बीजेपी की नज़र मणिपुर पर थी और पार्टी को यहां एक ऐसे नेता की तलाश थी जो इबोबी सिंह को मात दे सके.
बीजेपी की नज़र में मणिपुर में बिरेन सिंह ही ऐसे नेता थे जो इबोबी की सियासी चालों को बेहतर जानते थे और इस तरह अक्टूबर 2016 में बीजेपी बिरेन सिंह को अपनी पार्टी में शामिल करने में कामयाब हो गई.
बिरेन सिंह को बीजेपी में लाने का श्रेय हिमंत विश्व शर्मा को जाता है. क्योंकि दोनों के बीच कांग्रेस के जमाने से अच्छी दोस्ती है.
इम्फाल फ्री प्रेस के संपादक प्रदीप फनजौबम की माने तो आज के दिन बिरेन सिंह एक मंजे हुए राजनेता हैं.
वे किसी भी संकट से निपटना जानते हैं. मणिपुर की ज़मीनी समस्याओं की उलझनों को न केवल वे बेहतर समझते है बल्कि उनमें निगोसिएशन करने की ग़जब की क्षमता है.
कांग्रेस छोड़कर पिछले साल बीजेपी में शामिल हुए बिरेन सिंह के मुख्यमंत्री बनने की राह में किसी तरह की अड़चनें पैदा नही होने की एक वजह बीजेपी के पुराने और वरिष्ठ नेताओं का चुनाव में हारना भी रहा.
वह कहते है कि बिरेन सिंह पर गठबंधन का दबाव जरूर रहेगा लेकिन बीजेपी में जीतकर आए ज़्यादातर विधायक नए हैं, ऐसे में उन्हें ज्यादा दिक़्क़त नहीं होंगी.
हालांकि पढ़ने और घूमने का शौक़ रखने वाले बिरेन सिंह को हमेशा अपने बेटे की चिंता सताती है. इस साल जनवरी में इंफाल की एक अदालत ने बिरेन सिंह के 33 वर्षिय बेटे अजय को 2011 में एक युवा छात्र की हत्या में शामिल होने के लिए दोषी ठहराया था.
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