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नज़रिया: 'कभी दक्षिण भारत में हिंदी के ख़िलाफ़ थे वेंकैया'
- Author, कल्याणी शंकर
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
- प्रकाशित
मुप्पावाराप्पू वेंकैया नायडू 10 अगस्त को भारत के उपराष्ट्रपति बन जाएंगे, क्योंकि वे यूपीए उम्मीदवार गोपाल कृष्ण गांधी के ख़िलाफ़ चुनाव जीतने की स्थिति में हैं.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके नामांकन के तुरंत बाद ट्वीट किया, "उपराष्ट्रपति के पद के लिए एक उपयुक्त उम्मीदवार."
उन्होंने साथ ही यह भी लिखा "सार्वजनिक जीवन का बहुत लंबा अनुभव होने के साथ ही एक किसान के बेटे वेंकैया नायडू की सभी राजनीतिक मंचों पर प्रशंसा होती रही है."
बीजेपी ने दो कारणों से वेंकैया नायडू को चुना है- एक क्षेत्रीय संतुलन बनाना और दूसरा उनका दशकों का राजनीतिक और संसदीय अनुभव.
वेंकैया राज्यसभा का कामकाज चलाने में बेहद कारगर साबित हो सकते है जहां बीजेपी संख्या बल में पीछे है.
आरएसएस से जुड़ने की कहानी
सपने देखने वाले एक ग्रामीण नवयुवक से 6, मौलाना आज़ाद रोड (उपराष्ट्रपति का सरकारी आवास) तक पहुंचना वेंकैया नायडू के लिए बेहद लंबा सफ़र रहा है.
कबड्डी के लिए 14 बरस के एक लड़के की मोहब्बत उसे साठ के दशक में आरएसएस की शाखा की तरफ खींच लाई.
वेंकैया को आज भी जब समय मिलता है तो वो बैडमिंटन खेलते हैं.
वो अक्सर याद करते हैं कि पार्टी के नेता अटल बिहारी वाजपेयी के नेल्लोर आगमन की सूचना देने के लिए वो कैसे घोड़ा-गाड़ी में निकल पड़े थे.
2002 में पार्टी प्रमुख बनने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी से पहली मुलाकात को नायडू ने कुछ यूं याद किया था, "मैं विद्यार्थी था. मेरा काम उनके लिए सभा के दौरान घोषणा करने का था. मैंने कभी नहीं सोचा था कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में मैं कभी अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी के बगल में बैठूंगा."
वो वाजपेयी के करिश्माई व्यक्तित्व और आडवाणी के संगठनात्मक कौशल से प्रेरित थे.
हिंदी का विरोध
1949 में जुलाई की पहली तारीख को वेंकैया नायडू का जन्म आंध्र प्रदेश के नेल्लोर ज़िले में चावाटापल्लेम के किसान रंगैया नायडू और रामानम्मा के घर में हुआ था.
जब वेंकैया केवल 18 महीने के थे तो उनकी मां का निधन हो गया, उनकी मौत बैल की मार की चोट से हुई.
उपराष्ट्रपति के लिए नामांकित किए जाने के बाद नायडू ने बताया, "आख़िरकार पार्टी ही मेरी मां बन गई."
साठ के दशक की शुरुआत में वेंकैया दक्षिण भारत में हिंदी के ख़िलाफ़ थे, लेकिन आज वो हिंदी में भाषण देते हैं और वो भी पंच लाइन के साथ.
उन्होंने सत्तर के दशक की शुरुआत में छात्र राजनीति में कदम रखा और जनसंघ की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में शामिल हो गए.
वो नेल्लोर के वीआर कॉलेज में छात्र संघ के अध्यक्ष बने. 1973-74 में वो आंध्र विश्वविद्यालय के कॉलेजों के छात्र संघ के अध्यक्ष बने और कानून की पढ़ाई की.
आपातकाल के दौरान...
आंध्र राज्य बनाने का समर्थन करते हुए 1972 में नायडू जय आंध्र आंदोलन में शामिल हुए.
वो भूमिगत रह कर काम करते और अक्सर एक स्कूटर पर महिला कार्यकर्ता के पीछे बैठ कर आपातकाल का विरोध करती सामग्री बांटा करते थे.
वेंकैया याद करते हैं, "मौलिक अधिकारों और देशवासियों की स्वतंत्रता के संरक्षण के लिए संघर्ष करने की वज़ह से मैंने आपातकाल के दौरान कई महीने ज़ेल में बिताए."
बीजेपी में शामिल होने से पहले वो 1977 से 1980 तक जनता पार्टी की युवा शाखा के अध्यक्ष भी रहे.
वेंकैया के राजनीतिक जीवन में बड़ा मोड़ तब आया जब उन्होंने 1978 में नेल्लोर जिले के उदयगिरी विधानसभा सीट पर जीत दर्ज की.
उनके समकालीन दिवंगत वाईएस राजशेखर रेड्डी, एन चंद्रबाबू नायडू और एस जयपाल रेड्डी जैसे नेता सियासी अखाड़े में सफल रहे.
लोकसभा से नहीं जीते...
प्रतिपक्ष के नेता के रूप में भी नायडू बेहद प्रभावी रहे. 1983 में वो दूसरी बार विधानसभा के लिए चुने गए.
बहुमत के बावजूद इंदिरा गांधी के एनटीआर को हटाने के ख़िलाफ़ आंदोलन में वो सबसे आगे थे. 1985 में वो राष्ट्रीय राजनीति में पहुंच गए.
इसके बाद उनका उत्थान अभूतपूर्व रहा, वो पार्टी के प्रवक्ता, महासचिव, कार्यकारिणी के सदस्य और आखिर में पार्टी के प्रमुख बने.
हालांकि, नायडू कभी भी जनसमुदाय के नेता नहीं रहे, और तीन बार मैदान में उतरने के बावज़ूद उन्होंने कभी लोकसभा सीट नहीं जीती.
बहरहाल, भीड़ खींचने वाला नेता नहीं होने के बावज़ूद पार्टी उनके लगातार दौरा करने की क्षमता और लोगों तक पहुंचने के लिए उनकी कड़ी मेहनत की प्रशंसा करती है.
1998 से 2016 तक वो लगातार तीन बार कर्नाटक से और फिर चौथी बार राजस्थान से राज्यसभा के लिए चुने गए.
वेंकैया के बच्चे
हिंदी, अंग्रेजी और तेलुगू में अपने वन-लाइनर्स के लिए पहचान बना चुके नायडू जुलाई की पहली तारीख को 68 साल के हो गए.
वो अक्सर कहा करते हैं कि उन्हें नहीं पता कि ये उनका असली जन्मदिन है या नहीं क्योंकि वास्तविक जन्मदिन की तारीख़ की उन्हें जानकारी नहीं है.
नायडू को खुशी है कि उन्होंने अपने बेटे हर्षवर्धन और बेटी दीपा वेंकट को राजनीति से बाहर रखा. नायडू अपने पोते को बेहद प्यार करते हैं, जो उन्हें "टीवी दादा" पुकारता है.
उपराष्ट्रपति पद के लिए बीजेपी के नामांकन को स्वीकार करने से पहले उन्होंने अपने परिवार से सलाह ली जिसने अंतिम फ़ैसला उनपर ही छोड़ दिया.
वेंकैया मांसाहार के शौकीन हैं लेकिन वज़न घटाने के लिए की गई (बेरिएट्रिक) सर्जरी के बाद वो अल्पाहार लेते हैं.
वो चाय या कॉफी नहीं लेते और केवल नमकीन छाछ लेते हैं. वो चपाला पल्लुसु (आंध्र शैली में बनाई गई मछली), सूप, गरलु (दाल से तैयार सामग्री), बुथारेकु (एक मिठाई) बेहद पसंद करते हैं.
उनकी बेटी परिवार को एक ट्रस्ट चला रही है, जो युवाओं को उनके कौशल विकास में मदद करता है.
संवैधानिक पद
वेंकैया ने दो प्रधानमंत्रियों और चार पार्टी अध्यक्षों के साथ काम किया है और उनके भरोसे पर पूरी तरह खरे उतरे.
उनके मंत्रालय के नौकरशाह बतौर मंत्री उनके बेवज़ह हस्तक्षेप नहीं करने को पसंद करते हैं. उन्होंने निजी कर्मचारियों की एक वफादार टीम तैयार की है.
वो सुलभ हैं और मीडिया के साथ उनके अच्छे रिश्ते भी हैं जो हर बार उगादी (तेलुगू नववर्ष की शुरुआत) के दिन आंध्र भवन में उनकी मेहमाननवाज़ी के कायल हैं.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी वेंकैया के क़रीबी रिश्ते हैं. मोदी को वेंकैया 'भारत के लिए ईश्वर का वरदान', 'गरीबों का मसीहा' जैसी संज्ञा देते हुए तारीफ करते रहे हैं.
कुछ लोग इसे वेंकैया की चापलूसी कहते हैं.
अपने लिए उन्होंने कभी कहा था, "मैं चाहता हूं कि 2019 में मोदी की सत्ता में वापसी हो और उसके बाद मैं सक्रिय राजनीति से इस्तीफा देना चाहता था. लेकिन नियति की मेरे लिए कुछ और योजना है."
बेशक नियति वास्तव में उन्हें राजनीति से दूर कर एक संवैधानिक पद के क़रीब ले आई है.
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