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नज़रिया: 'डेरा से सौदा करती रही हैं तमाम पार्टियां'
- Author, योगेंद्र यादव
- पदनाम, राजनीतिक विश्लेषक और स्वराज इंडिया के प्रमुख
- प्रकाशित
यह कहना बिल्कुल मज़ाक होगा कि सरकार को अंदाज़ा नहीं था पंचकुला में क्या होने वाला है. अगर ऐसा था तो 18 तारीख़ को पंचकुला में 144 लगाने के ऑर्डर क्यों जारी किए गए?
पूरे मीडिया को पता था, पूरे देश में चर्चा हो रही थी, हाई कोर्ट तक में चर्चा हो रही थी. हाई कोर्ट पूछ रहा था कि क्या आप स्थिति से निपटने के लिए तैयार हैं. किसी भी घटना के बारे में पुलिस को दोष नहीं दे सकते. हर चीज़ कंट्रोल करना पुलिस के बस में नहीं होता.
लेकिन यह दुर्घटना थी जिसमें पुलिस और प्रशासन को पता था कि वह कब होगी, कहां होगी, कौन लोग करेंगे, क्यों करेंगे, किस परिस्थिति में करेंगे. इतनी जानकारी होने के बावजूद इतनी आगजनी, तोड़फोड़ और हिंसा होती है, 36 लोगों को जान गंवानी पड़ती है, तो यह किसी भी सरकार के लिए शर्म का विषय होना चाहिए.
पहली बार नहीं...
हरियाणा में यह पहली बार नहीं हो रहा है. हरियाणा में तीसरी बार ये हालात बने हैं. पंचकुला में हजारों लोगों को इकट्ठा होने ही क्यों दिया गया?
जबकि पता है कि जब भी ऐसा होता है, कोर्ट के बाहर लोगों को इकट्ठा करके हुड़दंग करवाया जाता है. यह नई बात नहीं है, सरकार को पता था. तो ऐसा क्यों होने दिया गया.
इस सारे प्रकरण से 10 दिन पहले अनिल विज और रामविलास शर्मा सिरसा गए थे और डेरे में चरण स्पर्श करके 51 लाख रुपये दिए थे. यब बिल्कुल मिलीभगत है. अगर यह मिलीभगत नहीं है तो और क्या हो सकती है?
डेरा से सौदा
तात्कालिक रूप से आप कह सकते हैं कि मुख्यमंत्री को अनुभव नहीं है. ये सब बातें आज से 2 साल पहले तक कही जा सकती थीं. लेकिन जब हरियाणा में जाट आरक्षण आंदोलन हुआ, उस दौरान इतनी हिंसा हुई. उसके बाद प्रकाश सिंह जी के कमिशन ने रिपोर्ट दी.
उसके बाद भी यदि खट्टर साहब को सीएम बनाकर रखा जाता है तो उनकी प्रशासनहीनता का बहाना तो नहीं चल सकता. कहीं न कहीं इसके पीछे एक राजनीतिक इच्छाशक्ति है.
आज की तारीख में बीजेपी की हरियाणा सरकार के बारे में बात करना आसान है और उसकी भूमिका अक्षम्य है. लेकिन हक़ीक़त यह है कि पंजाब और हरियाणा की तमाम बड़ी पार्टियां सीधे-सीधे डेरा सच्चा सौदा से सौदेबाजी करती रही हैं.
ये कोई गुपचुप नहीं है, ये गुपचुप लगाए गए आरोप नहीं हैं. खुल्लमखुल्ला डेरा की तरफ से ऐलान होता है कि इस चुनाव में हम इसका समर्थन करेंगे.
बाबा का समर्थन
जब यह कांड शुरू हुआ था 2002-2004 में, तब हरियाणा में चौटाला जी की इनलोद (इंडियन नेशनल लोकदल) सरकार थी जिसने खुलकर बाबा का समर्थन किया. पत्रकार छत्रपति का अंतिम बयान तक नहीं होने दिया गया.
सीबीआई जांच में रोड़े अटकाए गए. कांग्रेस की हुडा जी की सरकार ने इन्हें खुल्लमखुल्ला वीआईपी ट्रीटमेंट दिया. 2009 में उनके समर्थन से चुनाव जीता. 2014 में बीजेपी ने उनके समर्थन से चुनाव जीता. तो पूरा राजनीतिक तंत्र इससे जुड़ा हुआ है.
आज भी किसी पार्टी की हिम्मत नहीं है कि यह कह दे कि एक बलात्कारी को सजा हुई है और हम इसका स्वागत करते हैं. किसी विपक्षी पार्टी की हिम्मत नहीं है. क्योंकि पहले भी इन्होंने डील की है और आगे भी ये सौदेबाज़ी करना चाहते हैं.
राजनीति में कोई चीज़ बदलाव का आधार तब बनती है जब विकल्प खड़ा होता है. वरना लोगों का गुस्सा बाहर निकलता है और धुएं में उड़ जाता है.
दिक्कत यह नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार मिलीभगत में रही और उसने इतना बड़ा कांड होने दिया, संकट यह है कि कोई दूसरी पार्टी यह कहने को तैयार नहीं है कि डेरा में क्या कांड हुआ करते थे.
पूरा हरियाणा जानता है. मगर जब तक कोई बोलेगा नहीं, वैकल्पिक आवाज़ नहीं उठेगी तो लोग किसके साथ खड़े होंगे? साधारण नागरिक को तलाश है ऐसी शक्ति की जो राजनीति में उसकी आवाज़ को उठा सके.
(बीबीसी संवाददाता वात्सल्य राय से बातचीत पर आधारित) (ये योगेंद्र यादव के निजी विचार हैं.)
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