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'इस्लाम लिबरेट करता है, लेकिन ये क़ानून पाबंदी डाल रहा है'
- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
- प्रकाशित
गुलशन आऱा के दिल को कुछ सुकून आया है.
उनकी आंखें भरी हैं, लेकिन होंठ मुस्कराते हैं.
उनकी शादीशुदा ज़िंदगी में सुकून के मौके कम ही आए हैं.
10 साल पहले उनकी शादी बिहार के छपरा के फ़िरोज से हुई थी.
फ़िरोज ओमान में नौकरी करते थे इसलिए जिंदगी हंसी खुशी कट जाएगी, इसका भरोसा था.
मुझे परेशान किया गया...
लेकिन शादी के चार साल तक औलाद नहीं हुई. पांचवें साल जब औलाद हुई तो वो बेटी थी. इसके बाद उनकी तीन बेटियां हुई और कई मर्तबे गर्भ की जांच करके गर्भपात भी कराया गया.
गुलशन बताती हैं, "जब ससुरालवालों को लग गया कि मेरे बेटियां ही होंगी तो मुझे तरह-तरह से परेशान किया. ससुरालवालों ने कहा कि ये बच्चे किसी और के हैं, तो हमने डीएनए टेस्ट का हवाला दिया. लेकिन ससुरालवाले और पति नहीं माने."
सर्द रात में बच्चों समेत घर से निकाल दिया
वो 23 दिसंबर 2016 को याद करते हुए सिहर उठती हैं.
और कहती हैं, "यही वो दिन था जब मुझे और मेरी बच्चियों को सर्द रात में घर से बाहर निकाल दिया. पति ने तीन तलाक़ दे दिया और तब से हम मायके में हैं. पति किसी तरह का कोई गुजारा भत्ता नहीं देते और दूसरी शादी की फिराक में हैं."
ऐसे शौहर को कड़ी से कड़ी सज़ा मिले
लोकसभा में पारित बिल से खुश गुलशन कहती हैं, "ऐसे शौहर को तो कड़ी से कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए. सरकार का ये कदम एकदम ठीक है. धर्म में भी इंस्टैन्ट तलाक़ की इजाजत नहीं लेकिन शौहर अपनी मर्जी और सहूलियत से इसको अंज़ाम दे रहा है."
लेकिन गुलशन उन चंद मुस्लिम महिलाओं में से हैं जो सरकार के इस कदम से खुश हैं.
सरकार को किसने हक़ दिया
जैसा कि तब्बसुम कहती है, "सरकार को किसने हक़ दिया कि वो हमारे मसले पर क़ानून बनाएं. शौहर जब जेल चला जाएगा तो उसकी बीबी, बच्चे और मां बाप को कौन खिलाएगा. और तीन साल जेल में रहने के बाद शौहर के मन में अपनी उस बीबी के लिए कितना प्यार रह जाएगा?"
तब्बसुम जो कह रही हैं लगभग यही राय पटना में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की बिहार महिला विंग की 'शरीयत संरक्षण और समाज सुधार' विषय पर आयोजित कॉन्फ्रेंस में भी निकलकर आई.
"इंस्टैंट तलाक़ का मुद्दा हमारा समाज सुलझा लेगा"
बिहार महिला विंग की अध्यक्ष मजहबी नाज़ डॉक्टरी की पढ़ाई कर रही हैं.
वो कहती हैं, "ऐसा सरकार को जाने क्यूं लगता है कि औरत अकेले नहीं रह सकती और उसको जबरन मर्द पर थोपा जाए. अगर मर्द औरत के साथ नहीं रहना चाहता तो ना रहे. बाकी इंस्टैन्ट तलाक़ की बात है तो उस मसले को समाज कांउसलिंग आदि जरियों से खुद सुलझा लेगा."
हेल्पलाइन नंबर
गौरतलब है कि ये मामले मुस्लिम समाज आपस में ही सुलझा लें, इसके लिए दिसंबर 2016 में मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड ने महिलाओं की मदद के लिए एक हेल्पलाइन नंबर जारी किया था.
हेल्पलाइन नंबर 18001028426 सात अलग-अलग भाषाओं में मुस्लिम महिलाओं की मदद करता है.
हालांकि तलाक़ को लेकर चल रही तमाम बहस में ये बात भी बार-बार रेखांकित की जाती है कि मुस्लिम समाज की महिलाओं के सामने इंस्टैन्ट तीन तलाक़ से ज्यादा अशिक्षा, बेरोजगारी और स्वास्थ्य ज़रूरी मुद्दे हैं.
शिक्षा, रोजगार जैसे मसलों पर मदद करें
जैसा कि इस्लामिक स्कॉलर नरगिस जहां बारवी कहती हैं, "सरकार हमारी मदद करना चाहती है तो शिक्षा, रोजगार के मसलों पर हमें मदद करें. इसमें हम बढ़ गए तो कोई मसला ही नहीं रहेगा."
पर्सनल लॉ बोर्ड की राष्ट्रीय विंग की अध्यक्ष अस्मा जोहरा कहती हैं, "हमारे यहां आधा फ़ीसदी तलाक़ है जो दूसरी सारी कम्युनिटीज से कम है और इंस्टैंट तलाक़ इसका बहुत छोटा सा हिस्सा है. और आप देखें तो कुरान हमें तलाक़ और खुला का अधिकार देकर लिबरेट करता है लेकिन प्रस्तावित क़ानून पाबंदी लगा रहा है. बिना मुस्लिम महिलाओं के मशविरे से बन रहे इस क़ानून के नतीज ये होंगे कि अब शौहर तलाक़ लिए बिना ही बीवियों को छोड़कर भाग जाएंगे."
मुस्लिम समाज में इंस्टैंट तलाक़ बहुत कम?
हालांकि 'मैरिटल स्टेटस बाइ कम्युनिटी एंड सेक्स, जनगणना 2011' के हवाले से आई तमाम रिपोर्ट कहती हैं कि मुस्लिम समाज में प्रति 1000 शादीशुदा पर तलाक़ की दर 2.5 है और ईसाइयों में 3.7 है.
लेकिन साथ ही कई सर्वेक्षण ये भी कहते हैं कि मुस्लिम समाज में होने वाले तलाक़ में इंस्टैंट तलाक़ बहुत कम है.
नई दिल्ली स्थित 'सेंटर फार रिसर्च एंड डिबेट इन डेवलेपमेंट पॉलिसी' ने 331 तलाक़ पर सर्वे किया जिसमें पाया कि महज 0.3 फीसदी ही मौखिक या इंस्टैंट तलाक़ के मामले हैं.
"सरकारी क़ानून से मैं सहमत हूं"
इन तमाम आवाज़ों के बीच पटना स्थित काशी प्रसाद जायसवाल संस्थान की सहायक निदेशक अतिया बेगम कहती हैं, "इंस्टैंट तलाक़ को इस्लाम ही नहीं मानता. और ऐसे में सरकार अगर उस पर कोई क़ानून बना रही है तो मैं उससे सहमत हूं."