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महाराष्ट्र: वो गाँव जहां सरकारी योजनाएं और अफ़सर कोई नहीं पहुंच पाता: ग्राउंड रिपोर्ट
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, गढ़चिरौली (महाराष्ट्र) से
- प्रकाशित
ये सफ़र आसान नहीं है. खोबरामेंढा ग्राम पंचायत से नारेक्ल के लिए 12 किलोमीटर लंबी पैदल यात्रा है.
यहाँ के ज़्यादातर इलाक़ों में ऐसे ही जाया जा सकता है. इस सफ़र के बीच नदी, नाले और पहाड़ आते हैं जो गंतव्य तक पहुंचते-पहुंचते बेहाल कर देते हैं.
नदियों पर पुल नहीं होने के कारण लोग या तो भीगते हुए नदी पार करते हैं या कपड़े उतारकर.
हम जब उस पार पहुंचे तो फिर एक नई दुनिया से सामना हुआ. यहां लोगों की ज़िंदगी में विज्ञान का कोई योगदान नहीं है और लोग प्रकृति के भरोसे ही जी रहे हैं.
यहां बिजली के खंभों को गढ़े अरसा बीत गया है लेकिन आज भी बिजली नदारद है. एक ग्रामीण ने निराशाजनक लहजे में कहा, "अब बिजली क्या आएगी, हम तो उम्मीद ही छोड़ बैठे हैं."
आदि काल में जीते लोग
गढ़चिरौली महाराष्ट्र के सबसे पिछड़े इलाक़ों में से एक है और यहाँ घने जंगलों की श्रृंखला है. सैकड़ों गाँव ऐसे हैं जहाँ पहुंचना ही अपने-आप में बहुत मुश्किल काम है.
यहाँ रहने वाले आदिवासियों की ज़िंदगी बहुत मुश्किल है और इनके रास्ते बहुत दुर्गम. इन्हें ज़िंदा रहने के लिए रोज़ नया संघर्ष करना पड़ता है.
चाहे वो इस ज़िले का कोई भी छोर हो. यानी कुरखेड़ा, कोरची से लेकर एटापल्ली, भाम्रागढ़ तहसील ही क्यों ना हों.
आज भी यहाँ ऐसा लगता है कि सुदूर अंचल में रहने वाले आदिवासी आदि काल में ही रह रहे हैं.
सरकारी दफ़्तरों तक पहुंच मुश्किल?
मेरा सामना नारेक्ल के आदिवासियों से हुआ जो अपने भीगे हुए कपड़े उतार कर दूसरे कपड़े पहन रहे थे. इन्होंने गाँव वापस आने तक दो नदियों को पैदल पार किया था.
बातचीत में वो बताते हैं कि उन्होंने इस बार चुनाव के बहिष्कार का मन बना लिया है.
उनका गाँव खोबरामेंढा ग्राम पंचायत के अंतर्गत आता है जो 12 किलोमीटर दूर है. यह सफ़र पैदल ही तय किया जा सकता है.
उनकी तहसील कोरची है जो 40 किलोमीटर दूर है. पंचायत समिति भी 40 किलोमीटर दूर कुरखेड़ा में है जबकि पटवारी कोटगुल में बैठते हैं जो 35 किलोमीटर दूर है.
इसका मतलब ये हुआ कि अगर किसी योजना के लिए उन्हें आवेदन देना है तो उन्हें इन सब दफ़्तरों का चक्कर लगाते रहना पड़ेगा जो अलग-अलग दिशाओं में हैं और वहां तक जाना मुश्किल है.
गाँव में रहने वाले नवनु लच्छू पुनगाती कहते हैं, "हमारा गाँव ऐसा है कि हमारी ग्राम पंचायत कहीं है, तहसील कहीं है, पंचायत समिति कहीं और है. हमें एक काग़ज़ लेकर सौ किलोमीटर के चक्कर लगाने पड़ते हैं. यहाँ दूर-दूर तक न कोई ज़ेरॉक्स मशीन है न ही आने जाने का साधन. कई दिनों तक पैदल चलते रहना पड़ता है. क्या हम देश के नागरिक नहीं हैं? फिर हमें क्यों अलग-थलग कर दिया गया है?"
सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं?
सरकारी दफ़्तरों का पहुंच से दूर होना और सुविधाओं का अभाव एक बड़ा कारण है कि गाँव के लोग योजनाओं के लिए आवेदन ही नहीं कर पाते. चाहे उज्ज्वला योजना हो या फिर पेंशन योजना.
हमारी मुलाक़ात एक और आदिवासी ग्रामीण जगतपल टोप्पो से हुई जिनका कहना था कि योजनाएं सिर्फ़ शहरी लोगों के लिए हैं. इनका लाभ उन लोगों को ही मिलता है जो शहरों के पास रहते हैं.
वो कहते हैं, "हमारे पास ना नेता आता है न अधिकारी. क्योंकि वो यहाँ तक आ ही नहीं सकते. वहीं तक आते हैं जहाँ तक गाड़ी आती है. हमारे गाँव का सफ़र तो पैदल का है वो भी 15 किलोमीटर. कौन आएगा?"
यही वजह है कि इन इलाक़ों में सरकारी योजनाएं नहीं पहुँच पा रहीं हैं. सुदूर अंचलों में रहने वाले बेहाल हैं. आख़िर क्यों?
मैंने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता धर्मराव बाबा आत्राम से यह सवाल किया. वो दावा करते हैं कि उनकी पार्टी के शासनकाल में सबकुछ ठीक था. मगर अब हालात ख़राब हुए हैं.
आत्राम गढ़चिरौली के राज घराने से आते हैं जिनके सदस्यों ने तीस साल तक इस इलाक़े का लोक सभा और विधानसभा में प्रतिनिधित्व किया है. वो हर राजनीतिक दल में रहे हैं.
मगर इसके बावजूद गढ़चिरौली के जंगली इलाक़े उसी हालत में हैं जैसे वो 30 साल पहले हुआ करते थे.
धर्मराव बाबा आत्राम चुनावी भाषण की तरह हमसे बात करते हैं जबकी वो ख़ुद सरकार में मंत्री रह चुके हैं.
वो कहते हैं कि सिर्फ़ उनकी पार्टी के शासनकाल यानी एनसीपी और कांग्रेस के शासनकाल में ही विकास हुआ है जो अब ठप्प पड़ा हुआ है.
आत्राम कहते हैं, "इस इलाक़े में बडी तादात में ग़रीबों को ज़मीन देनी थी, जो यहाँ काश्तकारी कर रहे हैं 30 साल से उनको पट्टा मिल नहीं सका. आदिवासियों के लिए जो योजना शुरू हुई थी जैसे होर्टीकल्चर वो बंद हो गई. जो लोगों की शादी करते थे वो बंद हो गई. डॉक्टर है तो दवा नहीं, दवा है तो गाड़ी नहीं, गाड़ी है तो ड्राईवर नहीं, दोनों गाड़ी और डॉक्टर रहने के बाद भी डीज़ल नहीं..."
कभी हालात नहीं बदले
मगर ग्रामीण आदिवादियों का कहना है कि उनके हालात कभी भी बेहतर नहीं रहे. वो जैसे 40 साल पहले थे, आज भी वैसे ही हैं.
हालांकि महाराष्ट्र के सत्तारूढ़ गठबंधन के नेता एक-एक कर योजनाएं गिनवाते हैं और दावा करते हैं कि इसका लाभ सबको मिल रहा है. वो कहते हैं कि सामजिक सुरक्षा योजना से लेकर मुर्ग़ी पालन और दुधारू पशु योजनाएं सुदूर अंचलों में पहुँच रहीं हैं.
भारतीय जनता पार्टी के नेता कृष्ण गजभे बारिश पर ठीकरा फोड़ते हुए कहते हैं कि इस साल योजनाएं देर से पहुँच रहीं हैं क्यूंकि ज़रूरत से ज़्यादा बारिश हुई जिसने कई इलाक़ों को शहरों से काट दिया. वो दावा करते हैं कि उनकी सरकार योजनाओं को सुदूर अंचलों तक पहुँचाने का काम कर रही है.
उनका कहना था, "ऐसा नहीं है कि योजनाएं नहीं पहुँच रही हैं. इस साल इतनी बारिश हुई जिसकी वजह से थोड़ा सा काम लेट शुरू हो सका."
आदिवासी इलाक़ों के लिए सरकार ने कई योजनाएं बनायीं हैं जिससे यहाँ की जनजाति के लोगों की ज़िंदगी बेहतर हो सके, लेकिन सरकारी अफ़सरों के लिए यहाँ पर तैनाती ही एक सज़ा है.
यही वजह है कि योजनाओं का लाभ लेने को इच्छुक आदिवासी समुदाय के लोग सरकारी दफ़्तरों के चक्कर लगा-लगा कर थक जाते हैं लेकिन अधिकारी उन तक नहीं पहुँचते.
नसीर हाश्मी गढ़चिरौली के वरिष्ठ पत्रकार हैं. वो कहते हैं कि गढचिरौली में जब किसी अधिकारी की तैनाती होती है तो वो इसे एक सज़ा की पोस्टिंग मान कर चलते हैं.
नसीम हाश्मी कहते हैं, "अब आप बताइए जब कोई सज़ा काट रहा है तो वो लोगों के लिए क्या करेगा और उसे योजनाएं सुदूर इलाक़ों में पहुंचाने में कितनी दिलचस्पी होगी?"
अभाव और उदासीनता से जूझते आदिवासियों की विडम्बना है कि इन्हें ख़ुद को ज़िंदा रखने के लिए हर रोज़ एक नया संघर्ष करना पड़ता है. ऐसा संघर्ष जो उनके पूर्वज भी करते आए हैं.
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