बच्चों के सुरक्षित भविष्य के मामले में इराक़ से भी पिछड़ा भारत

जलवायु परिवर्तन
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जल संकट, बाढ़, तूफ़ान, आंधी, ओलावृष्टि और रेगिस्तानी टिड्डों का आतंक...ये कुछ ऐसी प्राकृतिक आपदाएं हैं जिन्होंने पिछले साल भारत के अलग-अलग हिस्सों में अपना कहर बरपाया है.

इन घटनाओं में तमाम बच्चों को बेघर करके उनकी ज़िंदगियों पर सीधे-सीधे असर डाला है.

लेकिन आने वाले समय में जलवायु परिवर्तन समेत व्यापारिक गतिविधियां बच्चों के भविष्य के लिए ख़तरा पैदा कर रही हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनिसेफ़ और मेडिकल जर्नल द लांसेट की ओर से जारी संयुक्त रिपोर्ट 'अ फ़्यूचर फॉर द वर्ल्ड्स चिल्ड्रन' में ये बात सामने आई है.

इस रिपोर्ट के मुताबिक़, "इस समय दुनिया में कोई ऐसा देश नहीं है जो अपने बच्चों की सेहत, उनके आसपास के वातावरण और भविष्य को सुरक्षित करने के लिए ज़रूरी कदम उठा रहा हो."

न्यूजीलैंड की पूर्व प्रधानमंत्री और इस रिपोर्ट को तैयार करने वाली समिति की उपाध्यक्ष हेलेन क्लार्क ने इन कारकों के बारे में विस्तार से बताया है.

वे कहती हैं, "बीते 20 सालों में बच्चों और किशोरों की सेहत को लेकर तमाम सुधार लाए गए हैं. अब ये सुधार रुक गया है, लेकिन अब ये सुधार नाकाफ़ी साबित होने वाले हैं."

"इस बात का आकलन किया गया है कि दुनिया भर में कम और मध्यम आय वर्ग वाले देशों में स्टंटिंग और ग़रीबी से जुड़े कारकों के चलते पांच साल से कम उम्र के 250 मिलियन बच्चों के विकास करने की क्षमता पर जोख़िम मंडरा रहा है. लेकिन इससे भी बड़ी चिंता की बात ये है कि इस समय दुनिया में हर बच्चे का अस्तित्व जलवायु परिवर्तन और व्यापारिक दबावों के चलते संकट में है."

इस रिपोर्ट में बच्चों के भविष्य के लिए मुफ़ीद स्थितियों के लिहाज़ से 180 देशों का आकलन किया गया है.

जलवायु परिवर्तन

भारत से पहले इराक़

इस रिपोर्ट में सबसे पहले नंबर पर नॉर्वे, दूसरे स्थान पर दक्षिण कोरिया, तीसरे स्थान पर फ्रांस, चौथे स्थान पर फ्रांस, पांचवे स्थान पर आयरलैंड और पहले दस देशों में ब्रिटेन का नंबर 10वां है.

वहीं, भारत की स्थिति 131 नंबर पर है और इससे पहले ईरान, लेबनान, लीबिया, श्रीलंका और इराक़ जैसे देश मौजूद हैं.

पाकिस्तान का नंबर 140 है. सबसे ख़राब देशों में चाड, सोमालिया, अफ़गानिस्तान और नाइजीरियां शामिल हैं.

इस रिपोर्ट में वे सभी कारक बताए गए हैं जो एक बच्चे के विकास में रोड़े खड़े करते हैं.

उदाहरण के लिए अगर किसी देश में जंक फूड काफी प्रचलित है तो ये बच्चों के भविष्य के लिए एक तरह का ख़तरा पैदा करता है.

वहीं, हिंसक माहौल और घटनाओं की वजह से होने वाली निर्वासन की घटनाएं भी बच्चों के भविष्य पर एक सवाल खड़ा करती हैं.

जलवायु परिवर्तन

लेकिन ये रिपोर्ट जलवायु परिवर्तन से पैदा होने वाले ख़तरों की ओर ध्यान आकर्षित करती है.

रिपोर्ट के मुताबिक़, जलवायु परिवर्तन समुद्र के जल स्तर में बढ़त, ख़तरनाक मौसमी बदलाव, जल और खाद्य संकट, भीषण गर्मी, उभरते संक्रामक रोग और बड़ी संख्या में लोगों का निर्वासन एक बड़े ख़तरे को जनम दे रहा है.

"बढ़ता हुई असमानता और पर्यावरणीय संकट राजनीतिक स्थिरता को चुनौती देकर संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर अंतरराष्ट्रीय संकट पैदा करते हैं, 2030 तक 2.3 अरब लोगों के संकट ग्रस्त इलाकों और जोख़िमभरी परिस्थितियों में रहने की आंशका है."

"लेकिन बच्चों का उनके भविष्य को तय करने वाली घटनाओं में किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं है. उनकी ज़िंदगियों को प्रभावित करने वाले फ़ैसले उनके घरवालों, स्थानीय नेताओं, सरकारों और वैश्विक आर्थिक नीति निर्माताओं की ओर से लिए जाते हैं. इसके साथ ही ये फ़ैसले उन बड़ी कंपनियों के मालिकों द्वारा लिए जाते हैं जिनके पास अपार संसाधन हैं और स्पष्ट रूप से व्यापारिक हित हैं."

"ऐसे में बच्चों के भविष्य के लिए पैदा होने वाले ख़तरों के लिए व्यापारिक गतिविधियां और आर्थिक ढांचे ज़िम्मेदार हैं."

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भारत के बच्चे और क्लाइमेट चेंज

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि जलवायु परिवर्तन किस तरह दुनिया भर में भविष्य के संघर्षों को जन्म दे रहा है.

ऐसे में सवाल ये उठता है कि जलवायु परिवर्तन भारत के बच्चों पर क्या असर डालता है.

बीबीसी ने ये समझने के लिए जलवायु परिवर्तन के जानकार डॉ. कपिल सुब्रमण्यन से बात की.

डॉ. कपिल सुब्रमण्यन बताते हैं, "यहां ये समझने की ज़रूरत है कि जलवायु परिवर्तन का असर सिर्फ बड़ी प्राकृतिक आपदाओं के रूप में ही सामने नहीं आता है. बल्कि इसके दूरगामी परिणाम काफ़ी भयावह हैं."

"सोचकर देखिए कि जब लगातार पानी और नमी की कमी रहेगी तो इसका कृषि पर कैसा असर पड़ेगा? ऐसा होने पर भूमि की उर्वरक क्षमता प्रभावित होगी. वहां वे फसलें नहीं लग पाएंगी जिन्हें ज़्यादा नमी की ज़रूरत होती है."

"बीते साल अंतरराष्ट्रीय श्रम संस्थान ने भी एक रिपोर्ट जारी करके ये बताया था कि क्लाइमेट चेंज आन वाले सालों में कई तरह के रोजगारों को प्रभावित करेगा. इस तरह रोजगारों के ख़त्म होने का सबसे ज़्यादा नकारात्मक असर बच्चों पर पड़ता है. क्योंकि काम की कमी से धनार्जन की क्षमता पर असर पड़ता है. इससे महिलाओं के स्वास्थ्य और बच्चों की पढ़ाई एवं खिलाई पिलाई सीधे प्रभावित होती है."

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क्या करे सरकार?

विश्व स्वास्थ्य संगठन की इस रिपोर्ट पर हेलेन क्लार्क ने स्पष्ट रूप से कहा है कि देशों को अपने बच्चों और किशोरों के स्वास्थ्य को लेकर सोच को पूरी तरह बदलने की ज़रूरत है.

उन्होंने कहा है कि इस समय देशों को अपने बच्चों के वर्तमान स्वास्थ्य के साथ-साथ उस दुनिया के बारे में भी सोचना चाहिए जिसमें वे उनको छोड़कर जाएंगे.

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