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राहुल नार्वेकर महाराष्ट्र विधानसभा के नए स्पीकर चुने गए
महाराष्ट्र में आज स्पीकर पद के लिए चुनाव हुआ जिसमें बीजेपी और शिंदे गुट के उम्मीदवार राहुल सुरेश नार्वेकर 164 वोटों के साथ जीत गए. हालांकि जीत के लिए उन्हें सिर्फ़ 145 वोट ही चाहिए थे.
वहीं शिवसेना नेता और महा विकास अघाड़ी के उम्मीदवार राजन साल्वी स्पीकर का चुनाव हार गए. साल्वी को 107 वोट मिले.
चुनाव प्रक्रिया के दौरान एक-एक विधायक से उसका मत पूछा गया.
महाराष्ट्र में नई सरकार के गठन के बाद विधानसभा का दो दिवसीय विशेष सत्र रविवार को शुरू हुआ. इस दौरान विधानसभा अध्यक्ष का चुनाव हुआ.
कांग्रेस नेता नाना पटोले के इस्तीफ़े के बाद फ़रवरी 2021 से ही महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष का पद खाली है.
इस बीच बीते 11 दिनों से सूरत, गुवाहाटी और गोवा पहुंचे शिवसेना के बाग़ी विधायक मुंबई रवाना हो गए थे. इन विधायकों के साथ किसी भी तरह कि अप्रिय घटना को रोकने के लिए कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की गई थी.
शिवसेना के राजन साल्वी प्रत्याशी
महाविकास अघाड़ी की ओर से शिवसेना विधायक राजन साल्वी को विधानसभा अध्यक्ष पद के लिए उम्मीदवार बनाया गया था.
महाविकास अघाड़ी के घटक दलों की बैठक शनिवार को मुंबई में हुई. इसमें राजापुर निर्वाचन क्षेत्र से शिवसेना विधायक राजन साल्वी के नाम पर सहमति बनी और उन्होंने इस चुनाव के लिए अपना पर्चा दाख़िल किया था.
महाविकास अघाड़ी में कांग्रेस पार्टी के पास विधानसभा अध्यक्ष का पद था. लेकिन मौजूदा सत्ता संघर्ष में यह शिवसेना को दिया गया है.
राहुल नार्वेकर बीजेपी उम्मीदवार
वहीं बीजेपी ने राहुल नार्वेकर को अपना उम्मीदवार घोषित किया था.. राहुल नार्वेकर कोलाबा से विधायक हैं.
नार्वेकर भी एक समय शिवसेना में थे. शिवसेना द्वारा लोकसभा के लिए उनकी उम्मीदवारी खारिज़ करने के बाद वह 2014 में एनसीपी में शामिल हुए थे. उन्होंने तब मावल निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा चुनाव लड़ा था, इसके बाद वे भाजपा में शामिल हो गए थे.
राज्यपाल की आलोचना
जब महाविकास अघाड़ी सरकार सत्ता में थी, तब राज्यपाल ने विधानसभा अध्यक्ष के चुनाव की अनुमति नहीं दी थी, इसलिए महाविकास अघाड़ी की ओर से उनकी आलोचना भी हुई है.
एनसीपी के प्रदेश अध्यक्ष जयंत पाटिल ने कहा, "जब हम सत्ता में थे, हम राज्यपाल को विधानसभा चुनाव कराने के लिए कह रहे थे लेकिन उन्होंने चुनाव नहीं कराया."
शिवसेना ने जारी किया व्हिप
शिवसेना की ओर से सुनील प्रभु ने तीन लाइन का व्हिप जारी किया है. यह व्हिप शिवसेना के 55 विधायकों पर लागू होगा. राजन साल्वी को वोट देने के लिए व्हिप जारी किया गया है. शिवसेना ने कहा है कि पार्टी के ख़िलाफ़ जाने वाले विधायकों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाएगी.
थ्री लाइन व्हिप को बेहद गंभीर माना जाता है, इसके जारी होने के बाद अवहेलना पर सीधे अयोग्यता की कार्रवाई की जा सकती है.
ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि शिवसेना के बाग़ी गुट के विधायक क्या रास्ता अपनाते हैं. अगर उन्होंने बीजेपी के उम्मीदवार को वोट दिया, जिसकी संभावना ज़्यादा है, ऐसी स्थिति में उद्धव ठाकरे का गुट क्या रास्ता चुनता है, इस पर भी लोगों की नज़रें टिकी होंगी.
एक ओर एकनाथ शिंदे इन बाग़ी विधायकों के बल पर अलग दल बनाने का प्रयास कर रहे हैं तो दूसरी तरफ़ शिवसेना ने बाग़ी विधायकों को अपात्र घोषित करने के लिए क़दम आगे बढ़ा दिए हैं. दोनों ही गुट अपने-अपने दावे कर रहे हैं. अब मामला सुप्रीम कोर्ट में है.
क्या कहता है दल-बदल क़ानून?
दल-बदल क़ानून एक मार्च 1985 में अस्तित्व में आया, ताकि अपनी सुविधा के हिसाब से पार्टी बदल लेने वाले विधायकों और सांसदों पर लगाम लगाई जा सके. 1985 से पहले दल-बदल के ख़िलाफ़ कोई क़ानून नहीं था. उस समय 'आया राम गया राम' मुहावरा ख़ूब प्रचलित था.
दरअसल 1967 में हरियाणा के एक विधायक गया लाल ने एक दिन में तीन बार पार्टी बदली, जिसके बाद 'आया राम गया राम' प्रचलित हो गया. लेकिन 1985 में राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार इसके ख़िलाफ़ विधेयक लेकर आई.
1985 में संविधान में 10वीं अनुसूची जोड़ी गई. ये संविधान में 52वां संशोधन था. इसमें विधायकों और सांसदों के पार्टी बदलने पर लगाम लगाई गई. इसमें ये भी बताया गया कि दल-बदल के कारण इनकी सदस्यता भी ख़त्म हो सकती है.
कब-कब लागू होगा दल-बदल क़ानून
1. अगर कोई विधायक या सांसद ख़ुद ही अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है.
2. अगर कोई निर्वाचित विधायक या सांसद पार्टी लाइन के ख़िलाफ़ जाता है.
3. अगर कोई सदस्य पार्टी ह्विप के बावजूद वोट नहीं करता.
4. अगर कोई सदस्य सदन में पार्टी के निर्देशों का उल्लंघन करता है.
विधायक या सांसद बनने के बाद ख़ुद से पार्टी सदस्यता छोड़ने, पार्टी व्हिप या पार्टी निर्देश का उल्लंघन दल-बदल क़ानून में आता है.
इसमें अपवाद भी है...
अगर किसी पार्टी के दो तिहाई विधायक या सांसद दूसरी पार्टी के साथ जाना चाहें, तो उनकी सदस्यता ख़त्म नहीं होगी.
वर्ष 2003 में इस क़ानून में संशोधन भी किया गया. जब ये क़ानून बना तो प्रावधान ये था कि अगर किसी मूल पार्टी में बँटवारा होता है और एक तिहाई विधायक एक नया ग्रुप बनाते हैं, तो उनकी सदस्यता नहीं जाएगी.
लेकिन इसके बाद बड़े पैमाने पर दल-बदल हुए और ऐसा महसूस किया कि पार्टी में टूट के प्रावधान का फ़ायदा उठाया जा रहा है. इसलिए ये प्रावधान ख़त्म कर दिया गया.
इसके बाद संविधान में 91वाँ संशोधन जोड़ा गया. जिसमें व्यक्तिगत ही नहीं, सामूहिक दल बदल को असंवैधानिक करार दिया गया.
विधायक कुछ परिस्थितियों में सदस्यता गँवाने से बच सकते हैं. अगर एक पार्टी के दो तिहाई सदस्य मूल पार्टी से अलग होकर दूसरी पार्टी में मिल जाते हैं, तो उनकी सदस्यता नहीं जाएगी.
ऐसी स्थिति में न तो दूसरी पार्टी में विलय करने वाले सदस्य और न ही मूल पार्टी में रहने वाले सदस्य अयोग्य ठहराए जा सकते हैं.
इन परिस्थितियों में नहीं लागू होगा दल बदल क़ानून
1. जब पूरी की पूरी राजनीतिक पार्टी अन्य राजनीति पार्टी के साथ मिल जाती है.
2. अगर किसी पार्टी के निर्वाचित सदस्य एक नई पार्टी बना लेते हैं.
3. अगर किसी पार्टी के सदस्य दो पार्टियों का विलय स्वीकार नहीं करते और विलय के समय अलग ग्रुप में रहना स्वीकार करते है.
4. जब किसी पार्टी के दो तिहाई सदस्य अलग होकर नई पार्टी में शामिल हो जाते हैं.
स्पीकर के फ़ैसले की हो सकती है समीक्षा
10वीं अनुसूची के पैराग्राफ़ 6 के मुताबिक़ स्पीकर या चेयरपर्सन का दल-बदल को लेकर फ़ैसला आख़िरी होगा.
पैराग्राफ़ 7 में कहा गया है कि कोई कोर्ट इसमें दख़ल नहीं दे सकता, लेकिन 1991 में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने 10वीं अनुसूची को वैध तो ठहराया लेकिन पैराग्राफ़ 7 को असंवैधानिक क़रार दे दिया
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