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रवांडा का वो नरसंहार जब 100 दिनों में हुआ था 8 लाख लोगों का क़त्लेआम
"जिस दिन मेरे बेटे की हत्या हुई, उस सुबह उसने अपने दोस्त से कहा था कि उसे लगता है कि कोई उसकी गर्दन काट देगा. जब-जब मुझे उसकी ये बात याद आती है तो मैं अंदर से टूट जाती हूं. उस दिन सेलिस्टिन दो हमलावरों के साथ मेरे घर में दाख़िल हुआ. उनके हाथों में लंबे-लंबे चाकू और तलवार नुमा हथियार थे. हमनें अपनी जान बचाकर घर से भागने की कोशिश की. लेकिन सेलिस्टिन ने अपने तलवार नुमा हथियार से मेरे दो बच्चों की गर्दनें काट दीं."
ये शब्द हैं रवांडा में तुत्सी और हूतू समुदायों के बीच हुए भयानक जनसंहार में ज़िंदा बचने वाली एक मां ऐन-मेरी उवीमाना के.
उवीमाना के बच्चों को मारने वाला शख़्स सेलिस्टन कोई और नहीं बल्कि उनका पड़ोसी था.
सेलिस्टिन की तरह ही हूतू समुदाय से जुड़े तमाम लोगों ने 7 अप्रैल 1994 से लेकर अगले सौ दिनों तक तुत्सी समुदाय से ताल्लुक रखने वाले अपने पड़ोसियों, अपनी पत्नियों और रिश्तेदारों को जान से मारना शुरू कर दिया.
इस तरह इस जनसंहार में लगभग आठ लाख लोगों की मौत हुई. तुत्सी समुदाय की तमाम महिलाओं को सेक्स स्लेव बनाकर रखा गया.
कैसे शुरू हुआ ये नरसंहार?
इस नरसंहार में हूतू जनजाति से जुड़े चरमपंथियों ने अल्पसंख्यक तुत्सी समुदाय के लोगों और अपने राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाया.
रवांडा की कुल आबादी में हूतू समुदाय का हिस्सा 85 प्रतिशत है लेकिन लंबे समय से तुत्सी अल्पसंख्यकों का देश पर दबदबा रहा था.
साल 1959 में हूतू ने तुत्सी राजतंत्र को उखाड़ फेंका.
इसके बाद हज़ारों तुत्सी लोग अपनी जान बचाकर युगांडा समेत दूसरे पड़ोसी मुल्कों में पलायन कर गए.
इसके बाद एक निष्कासित तुत्सी समूह ने विद्रोही संगठन रवांडा पैट्रिएक फ्रंट (आरपीएफ़) बनाया.
ये संगठन 1990 के दशक में रवांडा आया और संघर्ष शुरू हुआ. ये लड़ाई 1993 में शांति समझौते के साथ ख़त्म हुई.
लेकिन छह अप्रैल 1994 की रात तत्कालीन राष्ट्रपति जुवेनल हाबयारिमाना और बुरुंडी के राष्ट्रपति केपरियल नतारयामिरा को ले जा रहे विमान को किगाली, रवांडा में गिराया गया था. इसमें सवार सभी लोग मारे गए.
किसने ये जहाज गिराया था, इसका फ़ैसला अब तक नहीं हो पाया है. कुछ लोग इसके लिए हूतू चरमपंथियों को इसके लिए ज़िम्मेदार मानते हैं जबकि कुछ लोग रवांडा पैट्रिएक फ्रंट (आरपीएफ़) को.
चूंकि ये दोनों नेता हूतू जनजाति से आते थे और इसलिए इनकी हत्या के लिए हूतू चरमपंथियों ने आरपीएफ़ को ज़िम्मेदार ठहराया. इसके तुरंत बाद हत्याओं का दौर शुरू हो गया.
आरपीएफ़ ने आरोप लगाया कि विमान को हूतू चरमपंथियों ने ही मार गिराया ताकि नरसंहार का बहाना मिल सके.
नरसंहार को कैसे अंजाम दिया गया?
इस नरसंहार से पहले बेहद सावधानी पूर्व चरमपंथियों को सरकार की आलोचना करने वालों के नामों की सूची दी गई.
इसके बाद इन लड़ाकों ने सूची में शामिल लोगों को उनके परिवार के साथ मारना शुरू कर दिया.
हूतू समुदाय से जुड़े लोगों ने अपने तुत्सी समुदाय के पड़ोसियों को मार डाला. यही नहीं, कुछ हूतू युवकों ने अपनी पत्नियों को भी सिर्फ़ इसलिए ख़त्म कर दिया क्योंकि उनके मुताबिक़, अगर वो ऐसा न करते तो उन्हें जान से मार दिया जाता.
उस समय हर व्यक्ति के पास मौजूद पहचान पत्र में उसकी जनजाति का भी ज़िक्र होता था, इसलिए लड़ाकों ने सड़कों पर नाकेबंदी कर दी, जहां चुन-चुनकर तुत्सियों की धारदार हथियार से हत्या कर दी गई.
हज़ारों तुत्सी महिलाओं का अपहरण कर लिया गया और उन्हें सेक्स स्लेव की तरह रखा गया.
रेडियो से आवाज़ आई- 'तिलचट्टों को साफ़ करो'
रवांडा बहुत ही नियंत्रित समाज रहा है, ज़िले से लेकर सरकार तक. उस समय की पार्टी एमआरएनडी की युवा शाखा थी 'इंतेराहाम्वे' जो लड़ाकों में तब्दील हो गई थी उसने ही इन हत्याओं को अंजाम दिया.
स्थानीय ग्रुपों को हथियार और हिट लिस्ट सौंपी गई, जिन्हें पता था कि उनके शिकार कहां मिलेंगे.
हूतू चरमपंथियों ने एक रेडियो स्टेशन स्थापित किया, 'आरटीएलएम' और एक अख़बार शुरू किया जिसने नफ़रत का प्रोगैंडा फैलाया. इनमें लोगों से आह्वान किया गया, 'तिलचट्टों को साफ़ करो' मतलब तुत्सी लोगों को मारो.
जिन प्रमुख लोगों को मारा जाना था उनके नाम रेडियो पर प्रसारित किए गए.
यहां तक कि पादरी और ननों का भी उन लोगों की हत्याओं में नाम आया, जो चर्चों में शरण मांगने गए थे.
100 दिन के इस नरसंहार में लगभग 8 लाख तुत्सी और उदारवादी हूतू मारे गए.
क्या किसी ने रोकने की कोशिश की?
रवांडा में संयुक्त राष्ट्र और बेल्जियम की सेनाएं थीं लेकिन उन्हें हत्याएं रोकने की इजाज़त नहीं दी गई.
सोमालिया में अमरीकी सैनिकों की हत्या के एक साल बाद अमरीका ने तय किया था कि वो अफ़्रीकी विवादों में नहीं पड़ेगा.
बेल्जियम के 10 सैनिकों के मारे जाने के बाद बेल्जियम और संयुक्त राष्ट्र ने अपने शांति सैनिकों को वापस बुला लिया.
हूतू सरकार के सहयोगी फ़्रांस ने अपने नागरिकों को बाहर निकालने के लिए एक विशेष सैन्य दस्ता भेजा और एक सुरक्षित इलाका बनाया. लेकिन उन पर आरोप है कि उन्होंने इन हत्याओं को रोकने के लिए कुछ भी नहीं किया.
रवांडा के वर्तमान राष्ट्रपति पॉल कागामे ने फ़्रांस पर आरोप लगाया है कि उसने उन लोगों को समर्थन दिया जिन्होंने हत्याएं कीं. पेरिस ने इससे इनकार किया है.
कैसे ख़त्म हुआ नरसंहार?
युगांडा सेना समर्थित, सुव्यवस्थित आरपीएफ़ ने धीरे-धीरे अधिक से अधिक इलाक़ों पर कब्ज़ा कर लिया.
4 जुलाई 1994 को इसके लड़ाके राजधानी किगाली में प्रवेश कर गए.
बदले की कार्रवाई के डर से 20 लाख हूतू, जिनमें वहां की जनता और हत्याओं में शामिल लोग भी थे, पड़ोस के डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कांगो में पलायन कर गए.
कुछ लोग तंज़ानिया और बुरुंडी भी चले गए.
मानवाधिकार संस्थाओं का कहना है कि सत्ता पर क़ब्ज़ा करने के बाद आरपीएफ़ के लड़ाकों ने हज़ारों हूतू नागरिकों की हत्या की.
इससे भी ज़्यादा हत्याएं उन्होंने इंतराहाम्वे को खदेड़ते हुए कांगो में कीं. आरपीएफ़ इससे इनकार करता है.
कांगो में हज़ारों हैज़ा से मारे गए,जबकि सहायता समूहों पर आरोप लगे कि उन्होंने अधिकांश सहायता हूतू लड़ाकों को दे दिए.
डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कांगो में क्या हुआ?
रवांडा में इस समय आरपीएफ़ सत्ता में है. इनकी समर्थित सेनाओं की भिड़ंत कांगो की सेना और हूतू लड़ाकों से हुई.
विद्रोही ग्रुपों ने कांगो की राजधानी किन्शासा की ओर मार्च किया तो रवांडा ने समर्थन किया.
उन्होंने मोबुतु सेसे सेको की सरकार को पलट दिया और लॉरेंट कबीला को राष्ट्रपति बना दिया.
लेकिन नए राष्ट्रपति हूतू लड़ाकों को नियंत्रित करने के प्रति उदासीन रहे, और इसके कारण जो युद्ध शुरू हुआ जो छह देशों में फैल गया और ऐसे छोटे-छोटे लड़ाके समूह बन गए जो खनिज सम्पन्न देश के अलग-अलग हिस्से पर क़ब्ज़े के लिए लड़ रहे थे.
इस विवाद के कारण क़रीब 50 लाख लोग मारे गए और इसका अंत 2003 में हुआ. कुछ हथियारबंद समूह अभी भी रवांडा की सीमा के आसपास बने हुए हैं.
क्या किसी को सज़ा मिली?
रवांडा नरसंहार के बहुत सालों बाद 2002 में एक अंतरराष्ट्रीय अपराध अदालत का गठन हुआ लेकिन उसमें हत्या के ज़िम्मेदार लोगों को सज़ा नहीं मिल पाई.
इसकी जगह दोषियों को सज़ा देने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने तंज़ानिया में एक इंटरनेशनल क्रिमिलन ट्रिब्यूनल बनाया.
कुल 93 लोगों को दोषी ठहराया गया और पूर्व सरकारों के दर्जनों हूतू अधिकारियों को भी सज़ा दी गई.
रवांडा में सामाजिक अदालतें बनाई गईं ताकि नरसंहार के लिए ज़िम्मेदार हज़ारों संदिग्धों पर मुकदमा चलाया जा सके.
संवाददताओं का कहना है कि मुकदमा चलने से पहले ही 10 हज़ार लोगों की मौत जेलों में हो गई.
एक दशक तक ये अदालतें पूरे देश में हर हफ़्ते लगती थीं, अक्सर ये बाज़ारों या किसी पेड़ के नीचे लगती थीं.
इनके सामने हल करने को 12 लाख मामले थे.
इस समय रवांडा में हालात कैसे हैं?
आंतरिक संघर्ष से टूट चुके इस देश को पटरी पर लाने के लिए राष्ट्रपति पॉल कागामे को श्रेय दिया जाता है.
जिनकी नीतियों ने देश में तेज़ आर्थिक विकास की नींव रखी.
उन्होंने रवांडा को टेक्नोलॉजी हब बनाने की कोशिश की और वो ख़ुद ट्विटर पर बहुत सक्रिय रहते हैं.
लेकिन उनके आलोचक कहते हैं कि वो विरोधियों को बर्दाश्त नहीं करते और उनके कई विरोधियों की देश में और बाहर भी रहस्यमय तरीक़े से मौतें हो गई.
जनसंहार रवांडा में अभी भी एक संवेदनशील मुद्दा है और जनजातीयता (एथ्नीसिटी) के बारे में बोलना ग़ैर-क़ानूनी है.
सरकार का कहना है कि और अधिक ख़ून बहाने और नफ़रत फैलाने से रोकने के लिए ऐसा किया गया है.
लेकिन कुछ लोगों का कहना है कि इससे असल मेल मिलाप बाधित होता है.
कागामे तीन बार राष्ट्रपति चुने गए और 2007 के चुनाव में उन्हें 98.63 प्रतिशत वोट मिले थे.
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