आप इस वेबसाइट का टेक्स्ट-ओनली वर्शन देख रहे हैं जो कम डेटा खर्च करता है. सभी तस्वीरों और वीडियो के साथ वेबसाइट का मुख्य वर्शन देखें.
कोरोना वायरस: ‘मैंने कोविड-19 महामारी से बचने के लिए 20 साल तैयारी की’
पीटर गोफ़िन के लिए सारी ज़िंदगी कीटाणुओं से डर के साये में जीने का मतलब कोरोना वायरस महामारी के लिए तैयार रहना था.
वो जानते थे कि किस तरह से हाइजीन के नियमों को मानना है और उनके पास अपनी बेचैनी को बेलगाम होने से रोकने के लिए ज़रूरी स्किल भी था.
मैं अपनी किचेन के फ़्लोर पर बैठा था और डिसइनफ़ेक्टेंट से अनाज के पैकेट को पोंछ रहा था. तभी मुझे समझ आया- मैंने अपनी ज़िंदगी के तक़रीबन 20 साल कोरोना वायरस महामारी की तैयारियों में गुज़ार दिए थे.
ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर की चुनौतियां?
अपनी टीनेज के दौरान मैं ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर (ओसीडी) बीमारी से पीड़ित पाया गया था.
ज़िंदगी के क़रीब दो-तिहाई हिस्से में मैं जर्म्स से परेशान रहा. मैं सोचता था कि ये किस तरह से ट्रांसफ़र होते हैं और मैं इनसे किस तरह से बच सकता हूं. इसी वजह से आज पूरी दुनिया को जिस तरह की सावधानियां अपनाने के लिए कहा जा रहा है मैं उनमें सबसे आगे था.
मेरे घर के बाहर लोगों के संपर्क में आने से बचना, किसी भी ऐसी चीज़ को छूने के बाद हाथ धोना जिसे किसी और ने भी छुआ हो, सुपरमार्केट से लाने के बाद सामान को संक्रमण मुक्त करने जैसी चीज़ें मेरी ज़िंदगी का हिस्सा थीं. और मैं इन चीज़ों में दक्ष हो चुका था.
मैं कोरोना वायरस के चलते पैदा हुई एक नई वैश्विक संस्कृति में अपने कई रुझान समझ पा रहा हूं. लेकिन, मैं समझ पा रहा था कि इसमें से ज़्यादातर सतत, एक कभी न ख़त्म होने वाली बेचैनी है जो कि इस चीज़ से पैदा होती है कि आप लाख कोशिशें कर लें लेकिन आप संक्रमण से ख़ुद को बचा नहीं सकते हैं.
पूरी दुनिया के हज़ारों और शायद लाखों लोग अब ख़ुद से ये सवाल पूछ रहे हैः
'क्या दुकान पर मौजूद वह शख़्स मेरे ज़्यादा नज़दीक आ गया था?'
'क्या मैंने पर्याप्त वक़्त तक अपने हाथ धोए थे?'
'क्या इस साबुन से मेरे सभी जर्म्स मर जाएंगे?'
संदेह का चरम
19वीं सदी के मध्य में, फ़्रांसीसी डॉक्टरों ने ओसीडी पर शुरुआती अध्ययनों के बारे में लिखना शुरू किया. उन्होंने इसे ला फ़ोली डु डोउते यानी पागलपन की हद तक शक नाम दिया.
मेरे सबसे ख़राब लमहों के लिए मैं इसे सबसे बढ़िया परिभाषा मानता हूं. इस महामारी के दौर में हम में से कई ऐसे ही हालात का फ़िलहाल सामना कर रहे हैं.
हमें पता है कि अगर हम लोगों से दूरी क़ायम रखें और बार-बार अपने हाथ धोएं और लॉकडाउन के नियमों का पालन करें तो हम ख़ुद को बचा सकते हैं. लेकिन, मन में हमेशा अनिश्चितता और शक बना रहता है और इसी के साथ बेचैनी या एंग्ज़ाइटी आती है.
ये पूरी तरह से ख़राब फ़ीलिंग नहीं है. कुछ हद तक ये हमें सचेत भी बनाए रखती है.
समस्या यह है कि ये फ़ीलिंग्स नियंत्रण से बाहर चली जाती हैं. मैं यह सब अच्छे से जानता हूं. मुझे पता है कहां से शक पैदा होने लगता है. फिर मैं ख़ुद से पूछना शुरू करता हूं- 'क्या मैं अच्छी तरह से साफ़ हूं?'
फिर यह बढ़ने लगता है, 'क्या मैं कभी भी एक सामान्य ज़िंदगी जी पाउंगा?'
और आख़िर में यह इस बात पर पहुंच जाता है, 'इससे बचने की कोशिश भी क्यों करी जाए?'
कुछ भी छूने से डरना
मैं कनाडा में पला-बढ़ा. मुझे कम उम्र से ही चिंता और डर की समस्या होने लगी थी. जब तक मैं 12 साल का हुआ, ये चीज़ें सिमटकर मोटे तौर पर सफ़ाई और संक्रमण पर सीमित हो गईं.
बाद में मेरे परिवार ने नोटिस किया कि मैं दरवाज़ों के हैंडल, लाइट स्विच जैसी चीज़ें छूने से बचता हूं और मैं लाल हो जाने तक अपने हाथ धोता हूं.
मेरे पेरेंट्स मुझे सपोर्ट करते थे जो मेरी बात सुनते थे. उन्होंने मुझे मेरी आशंकाओं और डर से उबरने में मदद दी. मुझे थेरेपी से गुज़रना पड़ा और मुझे एंटी-डिप्रेसेंट दवाइयां दी गईं. ये दवाएं मैं आज भी लेता हूं.
ये इलाज और ओसीडी को ही मैं मेरी सामान्य ज़िंदगी का हिस्सा मानता हूं. लेकिन, इस बीमारी की वजह से मेरी शुरुआती ज़िंदगी में उथल-पुथल बनी रही. जब मैं हाईस्कूल और यूनिवर्सिटी के दिनों में वापस घर लौटता था तो मैं पढ़ाई के मुक़ाबले दिनभर के जर्म्स को धोने को लेकर ज़्यादा चिंतित रहता था.
पिछले क़रीब 5 साल से मेरी ज़्यादातर ओसीडी एंग्ज़ाइटी कंट्रोल में रही है. मैं अपने डर से लड़ने और इससे बाहर निकलने को लेकर ज़्यादा सतर्क हो गया हूं. मुझे अपने पार्टनर से भी बहुत मदद मिली है जो कि बेहद धैर्यवान है और मुझे समझती है.
ओसीडी वाले लोग कम परेशानी में
आश्चर्यजनक रूप से, पहले से एंग्ज़ाइटी का सामना कर रहे या जर्म इश्यू से जूझ रहे लोगों ने कहा है कि वे इस महामारी के दौरान कम परेशानी महसूस कर रहे हैं.
ऐसा शायद इस वजह से है क्योंकि दुनिया ने उनके नज़रिये को अपना लिया है. लोग अब उन्हीं की तरह सतर्कता बरत रहे हैं और रोज़ाना ज़्यादा तनाव का सामना कर रहे हैं.
यह मेरे लिए कुछ हद तक सत्य है. लेकिन, महामारी ने मेरे लिए कुछ अनोखी चुनौतियां भी खड़ी कर दी हैं. पब्लिक हेल्थ वॉर्निंग्स से यह चीज़ साबित हो रही है कि जर्म्स आसानी से एक शख़्स से दूसरे शख़्स में ट्रांसफ़र हो सकते हैं. यहां तक कि हमारी गलियों में एक दूसरे के पास से गुज़रने से भी ऐसा हो सकता है.
हाथ धोने के निर्देशों से मैं अब यह सोचता हूं कि कितनी बार ऐसा होता है कि मैं अच्छी तरह से साफ़ हुए बग़ैर ही बाहर निकल आता हूं. साथ ही ग्रोसरीज़ ने मेरे लिए एक बार फिर से बड़ी चुनौतियां पेश कर दी हैं.
मैं खुले आइटमों की बजाय हमेशा से पैकेज्ड फ़ूड लेना पसंद करता हूं. लेकिन, इससे आगे मैं अपने खाने को लेकर कम फ़िक्रमंद रहता हूं. हालांकि, कोरोना वायरस के दौर में मैं वापस से बेहद सतर्क हो गया हूं जैसा मैं एक दशक पहले अपनी मेंटल हेल्थ के चरम पर होने के वक़्त था.
अब जब भी मैं दुकान से ग्रोसरी घर लाता हूं तो मैं उन्हें अपने फ़्लैट के सबसे कम इस्तेमाल होने वाले कॉर्नर में डाल देता हूं. मैं अपने हाथ धोता हूं. इसके बाद मैं सारी चीज़ों को बेहद तरीक़े से डिसइनफेक्टेंट से अच्छी तरह से साफ़ करता हूं.
मैं फिर से हाथ धोता हूं और मेरी ख़रीदारी को अलमारी या फ्रिज में रखता हूं. ये मेरी नई आदतें नहीं हैं, लेकिन, मैं ये सोचता था कि मैंने इन्हें हमेशा के लिए दफ़ना दिया है.
और ऐसा महसूस करने वाला मैं अकेला शख़्स नहीं हूं.
मेंटल हेल्थकेयर के लिए पर्याप्त इंतज़ाम नहीं
महामारी के आने के बाद से पूरी दुनिया में क्राइसिस काउंसलिंग फ़ोन लाइनों पर कॉल्स की बाढ़ आ गई है.
यूएस में कुछ प्रोफ़ेशनल्स ने चेतावनी दी है कि मेंटल हेल्थ केयर सिस्टम के पास इस तरह की बढ़ती डिमांड को पूरा करने की कैपेसिटी नहीं है.
जैसे-जैसे कोरोना वायरस को लेकर होने वाली चर्चा में लोग अब लॉकडाउन में ढील देने की बात करने लगे हैं, ऐसे में शांत और ठंडा दिमाग रखना पहले के मुक़ाबले बहुत ज़्यादा चुनौतीभरा हो गया है.
स्कूल, दुकानें और दफ़्तर कब खुलना शुरू होंगे इससे इतर कोविड-19 से जुड़े हुए डर और एंग्ज़ाइटीज़ आने वाले कई महीनों तक पूरी दुनिया को सताते रहेंगे.
लेकिन, जैसे मैंने सेल्फ़-एग्ज़ामिनेशन और कई बार थेरेपी से सबक लिए हैं, मैं यह मानता हूं कि एंग्ज़ाइटी को कंट्रोल किया जा सकता है.
मेरा अनुभव है कि जिन लोगों पर मैं भरोसा करता हूं उनके साथ अपनी फ़ीलिंग्स को शांत और खुले दिमाग से साझा करना मददगार साबित होता है.
मैं ट्रीटमेंट के एक प्रकार कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी से गुज़र चुका हूं. पहली बार मैंने यह थेरेपी कनाडा में ली और फिर व्यस्क होने पर यूके में मैंने यह थेरेपी ली.
इस काउंसलिंग का मक़सद मरीज़ों को ऐसी स्किल देना है ताकि वे ऐसे विचारों या एक्शंस को पहचान सकें, चैलेंज कर सकें और इन्हें रिप्लेस कर सकें जो कि तार्किक या मददगार नहीं हैं.
किसी प्रोफ़ेशनल काउंसलर की मदद से सीबीटी को सीखना सबसे अच्छा होता है. लेकिन, इस तकनीक के कुछ ऐसे तत्व भी हैं जिन्हें आप ख़ुद से भी कर सकते हैं और ये किसी के लिए भी मददगार साबित हो सकता है.
अपनी प्रॉब्लम्स से निबटने के तरीक़े निकालें
लॉकडाउन में रह रहे लोगों के लिए एंग्ज़ाइटी स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं, इनकम या जॉब सिक्योरिटी ख़त्म होने, सोशल आइसोलेशन और जीवन के खुशनुमा पहलुओं के ख़त्म होने का जटिल मिला-जुला रूप हो सकता है.
इन सभी चिंताओं को व्यक्तिगत रूप से पहचानने के ज़रिए आप कुछ मसलों को कम करने का फ़ैसला कर सकते हैं. मसलन, आप आइसोलेशन से लड़ने के लिए परिवार या दोस्तों के साथ नियमित रूप से वीडियो कॉल्स कर सकते हैं. या आप दुनिया के फिर से खुलने के बाद एक बड़ी छुट्टी या पार्टी की योजना बना सकते हैं.
आप एक्सपर्ट्स से भी सलाह ले सकते हैं. आपको वैज्ञानिक तथ्यों से भी मदद मिल सकती है कि नियमित तौर पर साबुन से हाथ धोना आपकी स्किन को साफ़ करने के लिए पर्याप्त है. और अपने कपड़ों को पहले की तरह धोकर आप उनसे वायरस को ख़त्म कर सकते हैं.
इस सबके ऊपर आपको याद रखना होगा कि इस महामारी से हम में से कोई भी अकेला नहीं जूझ रहा है.
मेरे सबसे बुरे दिनों में मेरे संदेह और एंग्ज़ाइटी मेरे आत्म सम्मान को ख़त्म कर सकते हैं. मैं खुद को एक अजनबी और मूर्ख के तौर पर देखता हूं, जैसे कि मैं ही दुनिया का एकमात्र शख़्स हूं जो इस तरह से चीज़ें करता है. लेकिन, अब हम सब किसी न किसी तरह से कोरोना वायरस के तनाव का शिकार हैं.
हम शायद ख़ुद को आइसोलेट कर इस संकट से उबरना चाहते हैं. लेकिन, हम सब साथ मिलकर ऐसा कर रहे हैं.
- कोरोना वायरस के क्या हैं लक्षण और कैसे कर सकते हैं बचाव
- कोरोना महामारीः क्या है रोगियों में दिख रहे रैशेज़ का रहस्य
- कोरोना वायरसः वो शहर जिसने दुनिया को क्वारंटीन का रास्ता दिखाया
- कोरोना वायरस से संक्रमण की जांच इतनी मुश्किल क्यों है?
- कोरोना वायरस वैक्सीन: दुनिया भर की नज़र आख़िर भारत पर क्यों?
- कोरोना संकट: गूगल, फ़ेसबुक, ऐपल और एमेज़ॉन का धंधा कैसे चमका
- कोरोना वायरसः वो छह वैक्सीन जो दुनिया को कोविड-19 से बचा सकती हैं
- कोरोना वैक्सीन: दुनिया के टॉप नेताओं की अनोखी और मज़बूत पहल
- कोरोना वायरस महिलाओं और पुरुषों में भेद क्यों करता है
- कोरोना वायरस: संक्रमण से बचने के लिए इन बातों को गाँठ बांध लीजिए
- कोरोना वायरस: सरकार का आरोग्य सेतु ऐप कितना सुरक्षित
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)