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जूनागढ़ को 'राजनीतिक नक़्शे' में शामिल करने से पाकिस्तान को क्या हासिल होगा?
- Author, उमर दराज़ नंगियाना
- पदनाम, बीबीसी उर्दू संवाददाता, लाहौर
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
पाकिस्तान सरकार ने पिछले दिनों पाकिस्तान का नया 'राजनीतिक नक़्शा' जारी किया है जिसका अनावरण खुद प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने किया है.
राजनीतिक नक़्शे पर भारतीय प्रशासित कश्मीर को पाकिस्तान का क्षेत्र दिखाया गया है और इस पर ये लिखा है कि "इस (समस्या) का हल संयुक्त राष्ट्र की सिक्योरिटी काउंसिल की सिफ़ारिशें की रौशनी" में होना है.
इस नक़्शे में गिलगित बल्टिस्तान को भी साफ़ तौर पर पाकिस्तान का हिस्सा दिखाया गया है.
एक और क्षेत्र जिसके बंटवारे पर कई दशकों से विवाद चल रहा है वो सर क्रीक है.पाकिस्तान के सिंध प्रांत और भारत के गुजरात राज्य के बीच बहती ये एक ऐसी खाड़ी है जो अरब सागर में गिरती है.
बंटवारे के बाद से ही ये विवाद चला आ रहा है कि इस खाड़ी की कितनी सीमायें किस देश के अंदर हैं.
पाकिस्तान का कहना है कि सर क्रीक की खाड़ी पूरी उसकी सीमा के अंदर स्थित है हालांकि भारत इस दावे को नहीं मानता और यही वजह है यहां से दोनों देश एक दूसरे के मछवारों की नांव पकड़ते रहते है.
पाकिस्तान के नए राजनीतिक नक़्शे में इस विवादित क्षेत्र यानी सर क्रीक को पाकिस्तान का हिस्सा दिखाया गया है.
पाकिस्तान ने इस नए नक़्शे पर पूर्व रियासतों जूनागढ़ और मनावदर को भी अपना हिस्सा दिखाया है. ये क्षेत्र अब भारत के गुजरात राज्य का हिस्सा हैं और इनकी सीमाएं पाकिस्तान से नहीं मिलती.
क्या जूनागढ़ पाकिस्तान का नया क्षेत्र है?
सन 1948 के बाद से ये क्षेत्र भारत के पास है और यहां हिन्दू धर्म का एक पवित्र स्थान 'सोमनाथ का मंदिर' भी स्थित है.
पाकिस्तान का कहना है कि जूनागढ़ और मनावदर हमेशा से उसका हिस्सा थे क्योंकि जूनागढ़ के राजा ने भारत के बंटवारे के समय पाकिस्तान के साथ विलय किया था लेकिन भारत ने ताक़त के बूते पर इस रियासत पर अपना क़ब्ज़ा जमा लिया.
बीबीसी से बात करते हुए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मुईद यूसुफ़ का कहना था कि "जूनागढ़ हमेशा से पाकिस्तान का हिस्सा था और नए नक़्शे पर पाकिस्तान ने इसको अपना हिस्सा दिखाया है, जिसका उद्देश्य अपनी पोजीशन साफ़ करना है."
उनका कहना था नए नक़्शे में "पाकिस्तान ने कोई नया क्षेत्र अपने क्षेत्र में शामिल नहीं किया.इस क्षेत्र पर भारत ने गैर क़ानूनी क़ब्ज़ा जमाया था और इस पर कोई विवाद नहीं होना चाहिए,क्योंकि ये हमेशा से पाकिस्तान का हिस्सा है."
उनका कहना था कि पाकिस्तान पहले भी जूनागढ़ को नक़्शे में दिखाता रहा है हालांकि बाद में किसी वजह से पाकिस्तान के नक़्शे से इसे निकाल दिया गया."हम इसको दोबारा नक़्शे पर लाये हैं और इसका मक़सद अपने क्षेत्र को लेकर पाकिस्तान की पोजीशन साफ़ करना है."
क्या सिर्फ नक़्शा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दावे के लिए काफ़ी है?
नए राजनीतिक नक़्शे ने बहुत से लोगों के मन में सवाल पैदा कर दिए हैं.
क्या सिर्फ़ एक नक़्शे पर जूनागढ़ को अपना हिस्सा दिखाने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वो पाकिस्तान का हिस्सा माना जायेगा ? पाकिस्तान के अंदरूनी क्षेत्रों को पाकिस्तान के संविधान का आर्टिकल एक निर्धारित करता है.
अगर ये एक संवैधानिक मुद्दा है तो क्या नक़्शे पर मौजूद क्षेत्रों की सीमाओं में बदलाव संसद की तरफ से किया जाना चाहिए ताकि वो पाकिस्तान का सरकारी पक्ष समझा जाये?
अंतरराष्ट्रीय क़ानून के विशेषज्ञ अहमर बिलाल सूफ़ी के अनुसार ऐसा ज़रूरी नहीं है.
संविधान का आर्टिकल एक पाकिस्तान के स्थानीय क़ानूनों का हिस्सा है लेकिन जब कोई देश किसी क्षेत्र पर अपना अधिकार जताता है या दावा करता है तो वो अंतरराष्ट्रीय क़ानून के अंतर्गत आता है.
"ये दावा आप संसद में क़ानून बना कर या क़ानून में संशोधन के ज़रिये भी कर सकते हैं,किसी अदालती फैसले के ज़रिये भी कर सकते हैं और एग्जीक्यूटिव एक्शन के ज़रिये भी कर सकते हैं."क़ानून बना कर या क़ानून में संशोधन के ज़रिये किसी क्षेत्र पर अपना अधिकार साबित करने का उदाहरण वो भारत की तरफ से उस आदेश का देते हैं जिसके ज़रिये पिछले साल कश्मीर की अर्द्ध स्वायत्तता को ख़त्म करके उसे भारत में शामिल किया गया.
क़ब्ज़े के बिना नक़्शे का क्या महत्त्व है ?
अहमर बिलाल का कहना था कि नक़्शे का जारी करना एग्जीक्यूटिव एक्शन या प्रशासनिक कार्रवाई के अंतर्गत आता है और क़ानूनी हिसाब से इसकी अहमियत होती है.
उन्होंने कहा कि ये बताता है कि देश ने अपनी प्रशासनिक कार्रवाई के ज़रिये किसी क्षेत्र पर अपना अधिकार जताया है.
अहमर बिलाल सूफ़ी के अनुसार "ये नक़्शा पाकिस्तान के सर्वियर जनरल के सत्यापन और मोहर के साथ जारी किया जाता है इस लिए इसकी क़ानूनी मान्यता होती है."
जूनागढ़ पर दावे का क़ानूनी आधार क्या है?
अहमर बिलाल सूफ़ी के अनुसार पाकिस्तान के पास विलय का सबूत वो क़ानूनी दस्तावेज़ है जिस पर जूनागढ़ के नवाब ने पाकिस्तान के निर्माता मोहम्मद अली जिन्ना के साथ हस्ताक्षर किये थे.
उनका कहना था कि भारत की तरफ से जूनागढ़ पर गैर क़ानूनी क़ब्ज़े के बाद जूनागढ़ के नवाब अपने परिवार समेत कराची शिफ्ट हो गए थे.
अहमर बिलाल सूफ़ी के अनुसार नवाब साहब के नवासे अब भी जूनागढ़ के नवाब का पद रखते हैं और साथ ही उन्होंने जूनागढ़ का प्रधानमंत्री या वरिष्ठ मंत्री भी बनाया हुआ है.
"नवाब के परिवार को पाकिस्तान सरकार की तरफ से शाही भत्ता अब भी मिलता है और उनकी हैसियत पाकिस्तान में जूनागढ़ के जिलावतन शासक की तरह है"
अहमर बिलाल सूफ़ी के अनुसार जूनागढ़ दोबारा नक़्शे पर पाकिस्तान का हिस्सा दिखाने का मक़सद उस क्षेत्र पर अपने दावे को साफ़ करना है.
अंतरराष्ट्रीय कानून की नज़र में जूनागढ़ अब भी विवादास्पद है?
अहमर बिलाल सूफ़ी का कहना था कि जूनागढ़ अभी भी एक विवादित क्षेत्र है. कुछ समय पहले संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में इस मुद्दे को उठाया गया था, लेकिन चर्चा के बाद भी इसे हल नहीं किया जा सका.
"दूसरे शब्दों में जूनागढ़ पर भारत का कब्ज़ा अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ है. उस समय तक जब तक जूनागढ़ के नवाब की तरफ़ से पाकिस्तान में विलय के दस्तावेज़ में संशोधन ना किया जाये. "
अहमर बिलाल सूफ़ी के अनुसार, विलय का दस्तावेज़ एक अंतरराष्ट्रीय संधि है जिसे भारत ख़ारिज करता है. जूनागढ़ पर क़ब्ज़े को उसने ( भारत ने) जिस कानून के तहत अपने केंद्र शासित प्रदेशों में शामिल किया है, वो उसके आंतरिक या स्थानीय कानून है.
भारत का पक्ष क्या है?
पाकिस्तान की तरफ़ से नए राजनीतिक नक़्शे के सामने आने के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय की तरफ़ से एक बयान जारी किया गया है. उसमे कहा गया है कि "पाकिस्तान की तरफ़ से भारतीय राज्यों गुजरात और उसके केंद्र शासित प्रदेश कश्मीर और लद्दाख पर अपना दावा करना राजनीतिक रूप से एक निरर्थक प्रयास है."
उनका कहना था कि "इस तरह के हास्यास्पद दावों की न तो कोई कानूनी हैसियत है और न ही कोई अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता है."
पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नए नक़्शे से क्या फायदा हो सकता है?
अंतरराष्ट्रीय कानून के विशेषज्ञ अहमर बिलाल सूफ़ी के अनुसार, नक्शे को देश की आधिकारिक पोजीशन के रूप में देखा जाता है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, नक़्शा इसके दावे की सत्यता को सुनिश्चित करता है.
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मुईद यूसुफ के अनुसार "नया राजनीतिक नक़्शा पाकिस्तान के पक्ष को स्पष्ट करने के लिए पहला कदम है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसके लिए समर्थन प्राप्त करना दूसरा क़दम होगा जिसके लिए हम काम कर रहे हैं."
हालांकि वो क्या क़दम उठा रहे हैं इसके बारे में उनका कहना था कि वो अभी ये नहीं बता सकते. अहमर बिलाल सूफ़ी के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान के सर्वेयर जनरल की तरफ़ से जारी किया जाने वाला नक़्शा अपने आप में कानूनी महत्व रखता है.
"कोई और इससे सहमत है या नहीं, आप अपना दावा तो स्पष्ट कर देते हैं. जब तक आप किसी क्षेत्र पर अपनी स्थिति स्पष्ट ही नहीं करेंगे तो बात आगे कैसे चलेगी." उनका कहना था कि देशों के बीच क्षेत्रीय विवादों पर चर्चा के दौरान नक़्शों की ही अहमियत होती हैं.
"भारत के पास तब भी ताक़त थी और अब भी है"
लेखक और इतिहासकार डॉक्टर मुबारक अली का कहना है कि अगर दस्तावेज़ी लिहाज़ से, देखा जाये तो ये सच है कि जूनागढ़ पर भारत ने बल पूर्वक क़ब्ज़ा किया जो कि गैर क़ानूनी है. उनका कहना था कि औपनिवेशिक शासकों का यह कर्तव्य था कि वे जूनागढ़ जैसे रियासतों के मुद्दे को हल करके निकलते.
"सिद्धांत भी यही था कि नवाब जहां जायेगा, रियासत भी वहीं जाएगी, लेकिन भारत ने इसका उल्लंघन जूनागढ़, कश्मीर और हैदराबाद रियासतों पर कब्ज़ा करके किया ."
हालांकि, उनका कहना था कि व्यवहारिक तौर पर देखा जाये तो "समस्या यह है कि भारत के पास तब भी ताक़त थी और अब भी ताक़त है और जिसके पास ताक़त है वह विजेता होता है और उसे ही सही मान लिया जाता है."
उनके अनुसार, वर्तमान संदर्भ में, नक़्शे में जूनागढ़ को शामिल कर लेना पाकिस्तान की तरफ़ से "दिल को खुश करने जैसा है."
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