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वुसतुल्लाह की डायरी: ‘आईएमएफ़ के कर्ज़े से नहीं बना था ताजमहल’
आगरे में उसकी पत्नी का ताजमहल नामक मज़ार किसी आईएमएफ़ के कर्ज़े से नहीं बल्कि हिंदुस्तान के पैसे से बना. रही यह बात कि महाराष्ट्र की स्कूली किताबों से मुग़लों को निकाल दिया गया है तो मैं इस पर किस मुंह से आलोचना करूं कि जब मेरा बच्चा चंद्रगुप्त मौर्य और अशोक आज़म को नहीं जानता.
हालांकि, उसका बाप पाकिस्तान के जिस सरकारी स्कूल में पढ़ता था. उसमें मौर्या राज और अशोक-ए-आज़म के कारनामे पाकिस्तानी इतिहास का हिस्सा थे. अब सिर्फ़ पुस्तकों में सिकंदर-ए-आज़म बाकी है और 90 प्रतिशत बाल जगत सिकंदर-ए-आज़म को मुसलमान समझता है.
जैसे हम अपने पसंदीदा शायर और क्रिटिक फ़िराक़ गोरख़पुरी को मुसलमान समझते हैं. जब पता चला कि उनका नाम तो रघुपति सहाय है, तब भी दिल को तसल्ली देते रहे कि फ़िराक़ नाम का आदमी हिंदू कैसे हो सकता है. फ़िराक़ की वजह से तो आज भी उर्दू साहित्यिक रचना रची हुई है. सुनिए, वुसतुल्लाह खान की पूरी डायरी.
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