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ईरान और सऊदी अरब के बीच शिया-सुन्नी विभाजन का इसराइल हमास युद्ध पर क्या असर
दुनिया भर में मुसलमान समुदाय मोटे तौर पर दो हिस्सों में विभाजित है – शिया और सुन्नी.
इसराइल और हमास के बीच पिछले कई हफ़्तों से जारी जंग में ज़्यादातर मुस्लिम बहुल देशों ने फ़लस्तीन के प्रति समर्थन ज़ाहिर किया है.
हालांकि, मध्य पूर्व की राजनीति और इस क्षेत्र में व्याप्त रहने वाला धार्मिक तनाव अलग-अलग पक्षों के रुख को रेखांकित करता है.
कई विश्लेषकों के लिए, इस्लाम की दोनों शाखाओं के बीच मतभेद मध्य पूर्व के दो मुख्य प्रतिद्वंद्वियों: सऊदी अरब और ईरान के बीच रिश्तों की जटिलताओं की स्पष्ट रूप से याद दिलाते हैं.
हमास के हमले की एक वजह
सऊदी अरब और ईरान के बीच पिछले कई दशकों से क्षेत्रीय प्रभुत्व के लिए संघर्ष जारी है जो धार्मिक विभाजन के चलते गंभीर हुआ है.
ये दोनों ही मुल्क इस्लाम की अलग-अलग शाखाओं को मानते हैं.
ईरान एक शिया बहुसंख्यक देश है जबकि सऊदी अरब खुद को शीर्ष सुन्नी ताक़त के रूप में देखता है. इनके बीच टकराव की झलक ग़ज़ा पट्टी में जारी संघर्ष में भी दिखाई देती है.
कई विश्लेषक मानते हैं कि फ़लस्तीनी चरमपंथी संगठन हमास की ओर से सात अक्टूबर को किए गए चौंकाने वाले हमले का एक मकसद इसराइल और सऊदी अरब के बीच रिश्तों को सामान्य बनाने के लिए जारी बातचीत को पटरी से उतारना था.
लेकिन ऐसा क्यों?
इसकी वजह ये है कि अगर ऐसा हो जाता तो ईरान के तीन मुख्य दुश्मनों – इसराइल, सऊदी अरब और अमेरिका के बीच करार होने की संभावनाएं पैदा होतीं.
अमेरिका ने इस तरह के समझौतों के लिए माहौल तैयार करने की दिशा में एक भूमिका निभाई है.
सुन्नी और शिया समुदाय के बीच मौजूद इस विभाजन के बीच हमास एक ऐसा अनूठा संगठन है जो सुन्नी है लेकिन उसे दशकों से एक शिया बहुल मुल्क ईरान से वित्तीय और सैन्य सहायता मिल रही है.
यही नहीं, इस युद्ध की शुरुआत से मध्य पूर्व के जिन दूसरे पक्षों ने हमास का समर्थन करते हुए इसराइल के ख़िलाफ़ सशस्त्र हमले बोले हैं, वे लेबनानी गुट हिज़बुल्लाह और यमन के हूती विद्रोही हैं. ये दोनों ही शिया गुट हैं और ईरान के सहयोगी हैं.
लेकिन इसके उलट सऊदी अरब सरकार ने इसराइल के साथ करार को लेकर संभावनाओं से इनकार नहीं किया है.
सऊदी अरब के शाही घराने के एक अहम शख़्स प्रिंस तुर्की अल फैसल ने आम लोगों को नुकसान पहुंचाने के लिए इसराइल और हमास की आलोचना की है.
सुन्नी और शिया समुदाय के बीच विभाजन की शुरुआत पैग़ंबर मोहम्मद की मौत यानी साल 672 से बताई जाती है. क्योंकि इसके बाद मुसलमान समुदाय का नेतृत्व करने के लिए एक संघर्ष शुरू हुआ जो कुछ मायनों में आज तक जारी है.
दोनों शाखाएँ सदियों से कई मान्यताओं और प्रथाओं को साझा करती आ रही हैं. लेकिन सुन्नियों और शियाओं ने कानून, धर्मशास्त्र और संगठन जैसे मामलों में महत्वपूर्ण अंतर बरक़रार रखे हैं.
इन दोनों समुदायों के नेता प्रभाव के लिए एक दूसरे के साथ संघर्षरत रहे हैं.
और सीरिया से लेकर लेबनान और इराक से लेकर पाकिस्तान तक कई क्षेत्रीय संघर्षों ने इस विभाजन को बढ़ाने में अपनी भूमिका निभाई है. कहीं-कहीं, इन संघर्षों ने पूरे-पूरे समुदाय को ही तोड़ दिया.
हम इन दोनों शाखाओं में अंतर को समझाने की कोशिश कर रहे हैं.
सुन्नी कौन हैं?
दुनिया भर में जितने लोग इस्लाम को मानते हैं, उनमें से ज़्यादातर सुन्नी समुदाय से जुड़े हैं.
एक आकलन के मुताबिक़, दुनिया के लगभग 90 फीसद मुसलमान इस शाखा से जुड़े हैं. ये लोग सुन्नी को इस्लाम की सबसे ज़्यादा पारंपरिक और रूढ़िवादी धारा के रूप में देखते हैं.
सुन्नी शब्द ही अहल-अल-सुन्ना नामक शब्द से आया है जिसका अर्थ है...परंपरा को मानने वाले लोग.
इस मामले में परंपरा से आशय पैग़ंबर मोहम्मद और उनके सहयोगियों के कार्यों पर आधारित प्रथाओं से है.
ऐसे में सुन्नी क़ुरान में दर्ज सभी पैगंबरों की ओर से बताई गई बातों को मानते हैं. लेकिन सबसे ज़्यादा मान्यता पैग़ंबर मोहम्मद की है.
इसके बाद आए मुस्लिम नेताओं को तात्कालिक नेता माना जाता है.
इसके साथ ही शिया समुदाय से इतर सुन्नी धर्म गुरुओं और धार्मिक नेताओं को राज्य की ओर से नियंत्रित किया जाता रहा है.
सुन्नी परंपरा, जो सऊदी अरब में स्पष्ट रूप से नज़र आती है, एक कोडिफाइड इस्लामिक लीगल सिस्टम की पक्षधर है.
इसके साथ ही यह चार में से एक लीगल स्कूल की सदस्यता की भी पक्षधर है.
शिया कौन हैं?
शियाओं की शुरूआत एक राजनीतिक धड़े के तौर पर हुई. शिया का शाब्दिक अर्थ है - शियात अली यानी अली का दल.
अली पैग़ंबर मोहम्मद के दामाद थे और शिया दावा करते हैं कि अली और उसकी संतानों को ही मुसलमानों का नेतृत्व करने का अधिकार था.
अली की हत्या उनकी ख़िलाफ़त के दौरान हुई साज़िशों, हिंसा और गृह युद्धों के परिणामस्वरूप हुई थी.
शिया मानते हैं कि अली की मौत के बाद उनके बेटे हसन या हुसैन को ख़िलाफ़त मिलनी चाहिए थी. और ऐसा न करके उन्हें उत्तराधिकार से वंचित रखा गया था.
कहा जाता है कि हसन को उम्मेद वंश के पहले ख़लीफ़ा मुआवियाह ने ज़हर दे दिया था. हुसैन अपने परिवार वालों के साथ कर्बला की रणभूमि में मरे थे.
इन्हीं घटनाओं के कारण शियाओं में शहादत की अवधारणा और शोक प्रकट करने के अनुष्ठानों को जन्म दिया.
दरअसल, शिया आस्था की विशेषता एक विशिष्ट मसीहाई तत्व भी है.
शियाओं में मौलवियों का एक पदानुक्रम भी है. ये मौलवी इस्लामी ग्रंथों की व्याख्या का अभ्यास करते हैं.
ऐसा कहा जाता है कि मौजूदा वक़्त में दुनिया में 12 करोड़ से 17 करोड़ के बीच शिया है.
ये आबादी कुल मुसलमानों की आबादी का 10% है.
ईरान, इराक़, बहरीन, अज़ैरबाइजान और कुछ अनुमानों के मुताबिक यमन में शिया बहुसंख्यक हैं.
लेकिन अफ़ग़ानिस्तान, भारत, कुवैत, लेबनान, पाकिस्तान, क़तर, सीरिया, तुर्की, सऊदी अरब और संयुक्त राज्य अमीरात में शियाओं की ख़ासी आबादी है.
राजनीतिक संघर्ष में दोनों का क्या रोल
सुन्नी शासित देशों में शिया अक्सर सबसे ग़रीब तबक़ा होते हैं. वे ख़ुद को भेदभाव और दमन से पीड़ित के रूप में पेश करते हैं.
कुछ सुन्नी अतिवादी तो शियाओं के ख़िलाफ़ नफ़रत का प्रवचन तक करते हैं.
दोनों में ये विभाजन मध्य-पूर्व के गठबंधनों और दुश्मनों को तय करता है.
1979 में हुए ईरान की क्रांति ने क्षेत्र में एक शिया कट्टरपंथी इस्लामी एजेंडा को लांच किया. ये खाड़ी के देशों की सुन्नी सरकारों के लिए चुनौती थी.
ईरान ने इंकलाब के बाद जो नीति बनाई उसमें देश के बाहर भी शिया पार्टियों और मिलिशिया की मदद करना शुरू की. इससे निपटने के लिए क्षेत्र की सुन्नी सरकारों ने अपने देश के बाद कई आंदोलनों का समर्थन शुरू कर दिया.
मिसाल की तौर पर लेबनान के गृह युद्ध में ईरान समर्थित हिज़बुल्लाह प्रमुखता से सामने आया.
ऐसे हअफ़गानिस्तान और पाकिस्तान में सुन्नी चरमपंथी समूह तालिबान अस्तित्व में आया.
तालिबान अक़्सर शिया धर्मस्थलों पर हमले करते रहते हैं.
साझा दुश्मन
इराक़ और सीरिया में ताज़ा संघर्ष भी इसी सांप्रदायिक विभाजन से रंगा हुआ है.
कई युवा सुन्नियों ने इन देशों में हथियार उठाए. ये सभी सुन्नी गुट अल-क़ायदा की अतिवादी विचारधारा से प्रभावित हैं.
इराक़ और सीरिया में शिया सरकारी सेनाओं के साथ मिलकर लड़ते हैं.
हालांकि सुन्नी विचारधारा वाले इस्लामिक स्टेट को ईरान और सऊदी अरब दोनों ही अपना साझा दुश्मन मानते हैं.
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