'हम बच्चों के साथ न्याय नहीं कर पा रहे हैं', देश में एक लाख से ज़्यादा सिंगल टीचर स्कूल

- Author, पवन कांत दिगवल्ली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
आंध्र प्रदेश के एक दूर-दराज़ के आदिवासी गांव में रमेश (बदला हुआ नाम) पहली से पांचवीं कक्षा तक के 41 बच्चों को अकेले पढ़ाते हैं. लेकिन उनकी ज़िम्मेदारी सिर्फ़ बच्चों को पढ़ाने तक सीमित नहीं है.
रमेश ने बीबीसी तेलुगू को बताया कि उन्हें स्कूल के रखरखाव, ऑनलाइन ट्रेनिंग कोर्स और मिड-डे मील जैसे प्रशासनिक काम भी देखने पड़ते हैं.
रमेश ने कहा, "बच्चों को पढ़ाने के लिए मुश्किल से ही समय मिल पाता है. उनके लिए अच्छी शिक्षा सुनिश्चित करने के साथ न्याय कर पाना मुश्किल है."
इस रिपोर्ट में रमेश का नाम बदल दिया गया है, क्योंकि उन्होंने सरकार की ओर से अनुशासनात्मक कार्रवाई के डर से अपनी पहचान गुप्त रखने का अनुरोध किया था.
भारत में एक लाख से ज़्यादा सिंगल-टीचर स्कूल
भारत के 'सिंगल-टीचर स्कूलों' (एकल शिक्षक स्कूल) में कई शिक्षकों के बीच ठीक से न पढ़ा पाने की निराशा और अपनी चिंता जाहिर करने का डर आम बात है.
शिक्षा मंत्रालय की यूनिफ़ाइड डिस्ट्रिक्ट इन्फ़ॉर्मेशन सिस्टम फ़ॉर एजुकेशन प्लस ' (यूडीआईएसई+) रिपोर्ट 2025-26 के अनुसार, पूरे देश में एक लाख से ज़्यादा ऐसे स्कूल हैं, जहां सिर्फ़ एक शिक्षक है. इन स्कूलों में क़रीब 30 लाख बच्चे पढ़ते हैं.
राज्यवार बात करें तो, आंध्र प्रदेश इस सूची में सबसे ऊपर है, जहां 16,000 से अधिक 'सिंगल-टीचर स्कूल' हैं, जो भारत में सबसे ज्यादा हैं.
एक शिक्षक वाले स्कूलों की संख्या क्यों घटी?
यूडीआईएसई+ के आंकड़ों से पता चलता है कि 2022-23 के बाद से भारत में एक शिक्षक वाले स्कूलों की संख्या हर साल घटी है. इस अवधि में ऐसे स्कूलों की संख्या 1.18 लाख से ज़्यादा से घटकर क़रीब 1.01 लाख रह गई है.
लेकिन विशेषज्ञ इसे तरक्की के संकेत के रूप में नहीं देखते हैं.
शिक्षा के अधिकार को बढ़ावा देने के लिए काम करने वाले नागरिक संगठनों और जमीनी समूहों के गठबंधन 'राइट टू एजुकेशन फ़ोरम' के समन्वयक मित्रा रंजन कहते हैं, "यह गिरावट स्कूलों में बेहतर सुविधाएं या पर्याप्त शिक्षक होने जैसी तरक्की को नहीं दिखाती है. ऐसा मुख्य रूप से स्कूलों को पास के दूसरे स्कूलों में मिला देने या उन्हें पूरी तरह से बंद कर देने की वजह से हो रहा है."
'बीमार पड़ने पर भी छुट्टी नहीं ले सकते'
रमेश बताते हैं कि वे जिन पांच कक्षाओं को पढ़ाते हैं, उनमें हर दिन चार-चार पीरियड होने चाहिए. इसका मतलब है कि एक दिन में लगभग 20 पीरियड होने चाहिए. लेकिन हम कुल मिलाकर पांच या छह पीरियड ही ले पाते हैं.
हालांकि, कम पीरियड होने का मतलब यह नहीं है कि काम का बोझ कम हो गया है, क्योंकि प्रशासनिक कामों की वजह से रमेश जैसे शिक्षकों को हमेशा व्यस्त रहना पड़ता है.
वहीं, झारखंड के लातेहार ज़िले के एक सरकारी स्कूल में पढ़ाने वाले श्यामदेव उरांव की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. वह पहली से पांचवीं कक्षा तक के 111 बच्चों को अकेले पढ़ाते हैं.
श्यामदेव ने बीबीसी हिंदी को बताया, "स्कूल चलाने और उसकी ज़िम्मेदारी संभालने वाला मैं अकेला शिक्षक हूं. मैं बीमार पड़ने का जोखिम भी नहीं उठा सकता, क्योंकि छुट्टी नहीं ले सकता. बहुत से बच्चे मुझ पर निर्भर हैं. मैं छुट्टी कैसे ले सकता हूं?"
आंध्र प्रदेश के बाद, भारत में सबसे ज़्यादा 'एक शिक्षक वाले स्कूल' झारखंड में हैं. यहां ऐसे स्कूलों में चार लाख 40 हज़ार से ज़्यादा बच्चे पढ़ते हैं. यूडीआईएसई+ की रिपोर्ट के मुताबिक, झारखंड में पिछले साल के मुक़ाबले ऐसे स्कूलों की संख्या बढ़ी है.
पढ़ाई से लेकर चुनावी ड्यूटी तक, अकेले शिक्षक की कई ज़िम्मेदारियां

राजस्थान के झालावाड़ के एक शिक्षक भी कुछ ऐसी ही मुश्किल स्थिति के बारे में बताते हैं.
वह कहते हैं, "मैं कई साल से अकेले ही स्कूल संभाल रहा हूं. मुझे प्रशासनिक काम करने पड़ते हैं और कभी-कभी चुनाव से जुड़े काम भी करने होते हैं. इसका असर पढ़ाई और शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ता है."
यूडीआईएसई+ की रिपोर्ट के मुताबिक, राजस्थान के 7,200 एक शिक्षक वाले स्कूलों में 1.7 लाख से ज़्यादा बच्चे पढ़ते हैं.
आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी ज़िले के एक अन्य शिक्षक ने अकेलेपन की परेशानी भी बताई. उन्होंने कहा, "दूर-दराज़ के इलाक़ों में किसी के साथ बैठकर एक कप चाय पीने के लिए भी कोई नहीं मिलता. हमारे लिए इससे बड़ी सज़ा क्या होगी कि हम ऐसे स्कूल में काम कर रहे हैं, जहां हम अकेले शिक्षक हैं.
शिक्षकों पर काम का बोझ

बीबीसी से बातचीत में आंध्र प्रदेश की स्कूल शिक्षा आयुक्त थमीम अंसारिया ने माना कि एकल-शिक्षक स्कूलों में काम करने वाले शिक्षकों पर काम का भारी बोझ होता है.
जिन राज्यों में एकल-शिक्षक स्कूलों की संख्या सबसे ज़्यादा है, उस पर अंसारीया ने कहा कि सरकार शिक्षकों को उन स्कूलों में भी काम जारी रखने के लिए प्रोत्साहित करती है, जहां छात्रों की संख्या बहुत कम है.
उन्होंने कहा, "हमने शिक्षकों की संख्या में कमी की पहचान की है और ख़ाली पदों को चरणबद्ध तरीक़े से भरा जाएगा. हमने हाल ही में (अक्टूबर 2025 में) क़रीब 16 हज़ार शिक्षकों की भर्ती की है. इससे राज्य में शिक्षकों की कमी दूर करने में काफ़ी मदद मिलेगी."
लेकिन शिक्षकों पर काम का दबाव इस समस्या की पूरी तस्वीर नहीं दिखाता. एकल-शिक्षक वाले स्कूलों का एक और चिंताजनक पहलू यह है कि ये मुख्य रूप से उन जगहों पर हैं, जहां हाशिए पर रहने वाले समुदाय रहते हैं.
क्या वंचित समुदाय के बच्चों को बराबर शिक्षा मिल पा रही है?

यूनिसेफ़ इंडिया में शिक्षा प्रमुख साधना पांडे ने बीबीसी को बताया, "असमान रूप से एकल-शिक्षक वाले स्कूल ग्रामीण, दूर-दराज, आदिवासी और दुर्गम इलाकों में बहुत अधिक संख्या में हैं.
विकास अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज़ का कहना है कि यह पहलू सरकार की गंभीरता की कमी और उसकी ओर से "शासन के माध्यम से भेदभाव" को दर्शाता है.
'शिक्षक वंचित समुदाय के बच्चों पढ़ाने में आनाकानी करते हैं'

तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में काम करने वाले बाल अधिकार कार्यकर्ता सन्नाकी मुन्ना बताते हैं कि हाशिए पर रहने वाले समुदायों के बच्चों के पास विकल्प कितने सीमित हो सकते हैं.
सन्नाकी मुन्ना ने बीबीसी को बताया, "आंध्र प्रदेश के तटीय शहर मछलीपट्टनम में, मछुआरा समुदाय के बच्चे एक ऐसे स्कूल पर निर्भर हैं जिसे सिर्फ़ एक शिक्षक चलाते हैं. इसी तरह, राजमुंदरी के पास गोदावरी नदी के जलोढ़ द्वीपों और तिरुपति के पास श्रीकालाहस्ती में, दलित समुदायों के बच्चों के पास एकल-शिक्षक वाले स्कूलों के अलावा कोई और विकल्प नहीं है."
वे कहते हैं, "मैंने देखा है कि शिक्षक या तो स्कूल आने से बचते हैं, या फिर बच्चों को पढ़ाने में आनाकानी करते हैं क्योंकि वे हाशिए पर रहने वाले समुदायों से आते हैं. इसे स्पष्ट भेदभाव के रूप में देखा जाना चाहिए."
विशेषज्ञों ने बीबीसी को बताया कि दूर-दराज के आदिवासी इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए समस्या तब और बढ़ जाती है, जब उनके लिए स्कूल तक पहुंचना ही मुश्किल हो जाता है.
शिक्षकों के रवैये की शिकायतों पर सरकार क्या करेगी?
शहरी परिवारों के पास सरकारी और निजी स्कूलों में से चुनने का विकल्प हो सकता है. लेकिन दूर-दराज़ के आदिवासी इलाक़ों में अक्सर ऐसा कोई विकल्प नहीं होता. यह भी दिखाता है कि स्कूलों की भौगोलिक स्थिति के आधार पर बच्चों के साथ किस तरह का भेदभाव हो सकता है.
थमीम अंसारिया ने कहा कि सरकार के पास इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि शिक्षक हाशिए पर रहने वाले समुदायों के छात्रों को पढ़ाने के इच्छुक नहीं हैं.
उन्होंने कहा, "लेकिन अगर ज़मीनी स्तर पर ऐसी स्थिति है, तो हम निश्चित रूप से इसका आकलन करेंगे और इस समस्या को दूर करने के लिए शिक्षकों को दोबारा प्रशिक्षित करेंगे."
देश में शिक्षकों के क़रीब 9.83 लाख पद ख़ाली
ग़ौरतलब है कि भारत में एक लाख से ज़्यादा स्कूल ऐसे हैं जो केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं, जबकि शिक्षकों के बहुत सारे पद अभी भी खाली पड़े हैं.
संसद में बार-बार पूछे गए सवालों के जवाब में, केंद्र सरकार का यही कहना रहा है कि शिक्षकों की भर्ती और तैनाती राज्य का विषय है.
हालांकि, संसद की एक स्थायी समिति की रिपोर्ट के अनुसार, देश में शिक्षकों के लगभग 9.83 लाख पद खाली हैं. यह रिपोर्ट अगस्त 2025 में राज्यसभा और लोकसभा दोनों सदनों में पेश की गई थी.
मुश्किलों के बावजूद शिक्षक स्कूल आना क्यों नहीं छोड़ते?

'राइट टू एजुकेशन फ़ोरम' के मित्रा रंजन ने बताया कि पूरे भारत में शिक्षकों के लगभग दस लाख पद खाली हैं.
उन्होंने कहा, "संबंधित राज्य सरकारों को इन खाली पदों को भरना चाहिए और 'शिक्षा के अधिकार अधिनियम' का पालन करना चाहिए."
मौजूदा हालात यह हैं कि भारत के एक लाख से ज़्यादा सरकारी स्कूलों में शिक्षक अकेले ही पढ़ाने और अन्य ज़िम्मेदारियों को संभालने का काम कर रहे हैं.
रमेश बताते हैं कि मुश्किलों के बावजूद उन्हें काम जारी रखने की प्रेरणा कहां से मिलती है.
उन्होंने कहा, "बच्चे रोज़ाना चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान लिए कक्षा में आते हैं, और हर दिन कुछ नया सीखने के लिए उत्सुक रहते हैं. इन बच्चों के लिए, मैं स्कूल आने का एक भी दिन नहीं छोड़ना चाहता, यहां तक कि तब भी नहीं जब मैं बीमार पड़ जाता हूं."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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