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अमेरिका के साथ हुए समझौते को ईरान के लोग किसकी जीत मान रहे हैं?
- Author, आमिर अज़ीमी
- पदनाम, वरिष्ठ समाचार संपादक, फ़ारसी सेवा
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
अमेरिका के साथ मेमोरेंडम ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग (एमओयू) को ईरान का नेतृत्व, पीछे हटने के बजाय प्रतिरोध और जीत का नतीजा बताने की कोशिश कर रहा है.
लेकिन लोगों को दलील से सहमत करवाना आसान नहीं है.
देश अभी-अभी एक विनाशकारी युद्ध से गुज़रा है, अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव है और ईरान के अपने समर्थकों का एक हिस्सा महीनों से वॉशिंगटन के साथ किसी भी समझौते का विरोध करता रहा है.
इसके अलावा ईरान के भीतर और बाहर भी ऐसे लोग हैं जो इस संकट को कूटनीति का अवसर नहीं, बल्कि शासन परिवर्तन का मौक़ा मानते हैं.
इसी राजनीतिक विरोधाभास की ज़मीन पर ईरान अब इस समझौते को जीत के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है.
वरिष्ठ ईरानी अधिकारियों ने इस समझौते को जीत बताया. संसद अध्यक्ष और वार्ता में अहम भूमिका निभाने वाले मोहम्मद बग़र ग़ालिबाफ़ ने कहा कि ईरान ने 'अंतिम जीत की ओर एक लंबा क़दम बढ़ाया है'.
राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने एक बड़े परिवर्तन की संभावना के रूप में इस समझौते की व्याख्या की.
उन्होंने कहा कि अगर इसे पूरी तरह लागू किया गया तो यह ईरान की कई समस्याएँ हल कर सकता है और ईरान मध्य-पूर्व में 'एक अलग दुनिया' बना सकता है.
ग़ालिबाफ़ की भूमिका अहम है क्योंकि उन्हें पेज़ेश्कियान के उदारवादी खेमे से नहीं माना जाता.
उनका सार्वजनिक समर्थन यह दिखाता है कि इस समझौते को इस्लामी गणराज्य की अधिक ताक़तवर संस्थाओं, यहाँ तक कि रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स के भीतर भी समर्थन हासिल है.
बुधवार को ईरान और अमेरिका के बीच एमओयू पर इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर किए गए.
आधिकारिक बयान को चुनौती
ईरान का नेतृत्व इस समझौते को जीत के रूप में इसलिए भी पेश कर रहा है क्योंकि ईरान के तर्क के अनुसार, अमेरिका और इसराइल अपने मुख्य उद्देश्यों को हासिल करने में नाकाम रहे.
वे ईरान को आत्मसमर्पण कराने में असफल रहे, इस्लामी गणराज्य को सत्ता से हटाने में नाकाम रहे, सैन्य कार्रवाई से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को ख़त्म नहीं कर पाए और हिज़्बुल्लाह से ईरान के रिश्ते नहीं तोड़ पाए.
इसके बजाय, ईरान अब भी वार्ता की मेज़ पर है, लेबनान को शांति समझौते के दायरे में शामिल किया गया है और प्रतिबंधों में राहत पर चर्चा हो रही है.
इस आधिकारिक बयान को ईरान के अंदर चुनौती भी दी जा रही है.
संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के उपाध्यक्ष और कट्टरपंथी सांसद ने मसौदा समझौते को ऐसा दस्तावेज़ बताया है जो ईरान को अमेरिका का उपनिवेश बना देगा.
उन्होंने वार्ताकारों पर यह आरोप भी लगाया कि उन्होंने सर्वोच्च नेता के उस निर्देश की अनदेखी की, जिसमें कहा गया था कि होर्मुज़ स्ट्रेट को शिपिंग के लिए दोबारा न खोला जाए.
यह आलोचना इसलिए अहम है क्योंकि यह व्यवस्था के बाहर से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की निगरानी करने वाली संस्था के भीतर से आई है.
कई महीनों से संसद में कट्टरपंथियों, सरकार-समर्थित मीडिया और सरकार-समर्थक सभाओं में यह तर्क दिया जाता रहा है कि अमेरिका पर भरोसा नहीं किया जा सकता.
वे इस तथ्य की ओर इशारा करते हैं कि युद्ध शुरू होने से ठीक पहले भी कूटनीति जारी थी और कहते हैं कि ट्रंप प्रशासन ने वार्ता को ढाल बनाया जबकि अमेरिका और इसराइल सैन्य कार्रवाई की तैयारी कर रहे थे. उनके लिए वॉशिंगटन के साथ कोई भी समझौता तुष्टीकरण जैसा दिखता है.
फिर भी अब इनमें से कुछ आवाज़ें धीमी पड़ती दिख रही हैं. यह संकेत हो सकता है कि आगे बढ़ने का फ़ैसला सरकार के सर्वोच्च स्तर से मंज़ूरी पा चुका है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पूरी एकता है.
फ़िलहाल सत्ता के केंद्र ने आकलन किया है कि समझौते को ठुकराने की क़ीमत, कट्टरपंथी ग़ुस्से को झेलने की क़ीमत से ज़्यादा होगी.
आर्थिक दबाव
इस नतीजे पर पहुँचने के केंद्र में आर्थिक दबाव है.
ईरान का नेतृत्व समझौते को सैन्य दबाव का नतीजा बता सकता है, जिसमें होर्मुज़ स्ट्रेट के आसपास दबाव बनाना और अमेरिका के साथ खाड़ी के क्षेत्रीय ऊर्जा हितों पर हमले शामिल हैं. लेकिन असल में अर्थव्यवस्था ने भी ईरान को मजबूर किया है.
युद्ध, प्रतिबंध, शिपिंग पर रोक, तेल बाज़ारों और विदेशी मुद्रा तक सीमित पहुँच के अलावा बहुत ज़्यादा महँगाई ने देश और आम ईरानी जनता को निचोड़कर रख दिया है.
कई परिवारों के लिए सवाल यह नहीं है कि समझौता जीत जैसा लगता है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या इससे दाम घटेंगे और क्या इससे एक और युद्ध का डर कम होगा.
अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा है कि ईरान को टैक्सपेयर्स का पैसा नहीं मिलेगा, लेकिन अगर वह अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करता है और प्रतिबंधों में ढील दी जाती है तो उसे अरबों डॉलर तक पहुँच मिल सकती है.
इससे ईरान समझौते को अमेरिका पर निर्भरता नहीं, बल्कि निवेश और पुनर्निर्माण का रास्ता बताकर पेश कर सकता है.
फिर भी जोखिम साफ़ हैं. शुक्रवार को स्विट्ज़रलैंड में वार्ता शुरू होने की उम्मीद है.
सबसे कठिन मुद्दे, ईरान के संवर्धित यूरेनियम का भविष्य, संवर्धन के स्तर की अनुमति, वेरिफ़िकेशन, प्रतिबंधों में राहत, होर्मुज़ और लेबनान, अब भी बातचीत में तय होने बाकी हैं.
इसराइल को लेकर भी अनिश्चितता है. प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने दक्षिणी लेबनान से इसराइल के हटने की रिपोर्टों को ख़ारिज करते हुए कहा है कि इसराइली बल तब तक लेबनान में बने रहेंगे जब तक ज़रूरी होगा.
इस बीच, डोनाल्ड ट्रंप लेबनान में इसराइल की कार्रवाई की सार्वजनिक रूप से आलोचना कर चुके हैं. उन्होंने कहा कि बहुत ज़्यादा लोग मारे गए हैं.
उन्होंने यह भी कहा कि ईरान-अमेरिका समझौते पर पहुंचने के समय बेरूत पर इसराइली हमले से वह नाख़ुश थे, हालांकि उन्होंने इस पर ज़ोर दिया कि नेतन्याहू के साथ उनके रिश्ते अब भी बहुत अच्छे हैं.
'राहत और शांति की ज़रूरत थी'
ईरान के लिए वॉशिंगटन और इसराइल के बीच दिखती यह खटपट उपयोगी है. इसे इस सबूत के रूप में पेश किया जा सकता है कि ईरान के दबाव ने इसराइल की हमले करने की आज़ादी को मुश्किल बना दिया है. लेकिन यही बात समझौते को नाज़ुक भी बनाती है.
अगर इसराइल लेबनान में अभियान जारी रखता है तो ईरान पर प्रतिक्रिया देने का दबाव होगा.
अगर अमेरिका इसराइल को रोक नहीं पाता तो समझौते में लेबनान के शामिल होने के ईरान के दावे पर स्थिति साफ़ हो जाएगी.
बीबीसी फ़ारसी के पाठकों की प्रतिक्रिया बताती है कि जीत के आधिकारिक बयान को एक समान रूप से नहीं लिया जा रहा.
एक शख़्स ने कहा कि उन्हें एक और इसराइली हमले का बहुत डर था, लेकिन समझौते की ख़बर सुनने के बाद भी उन्हें 'कोई भरोसा' नहीं है और चिंता है कि अगर वार्ता चलती रही तो देश का ठीक से प्रबंधन होगा या नहीं.
शासन-विरोधी एक अन्य ईरानी, जो शुरू में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का समर्थन कर रहे थे, ने पूछा कि अगर अमेरिकी हमले से ईरान में राजनीतिक बदलाव नहीं हुआ तो उससे हासिल क्या हुआ है.
उन्होंने कहा, "हमें उम्मीद थी कि शासन बदल जाएगा. लेकिन तकलीफ़, महँगाई और अर्थव्यवस्था को और ज़्यादा नुक़सान के अलावा लोगों को क्या मिला?"
दूसरे कुछ लोगों को सरकार के दृष्टिकोण के प्रति अधिक सहानुभूति थी. एक दर्शक ने ईरान को विजेता बताया और कहा कि युद्ध ने दिखा दिया कि प्रतिबंध 'भीख माँगने' से नहीं, बल्कि ताक़त के इस्तेमाल से हटते हैं.
एक दूसरे ने समझौते का स्वागत सतर्कता के साथ करते हुए कहा कि इससे लोगों को काम और जीवन में ज़्यादा सुकून मिला है.
उन्होंने कहा, "मुझे लगता है यह अस्थायी है, लेकिन हमें कुछ महीनों की राहत और शांति की ज़रूरत थी."
शायद यही सबसे यथार्थवादी निष्कर्ष है. इस्लामी गणराज्य समझौते को जीत के रूप में पेश कर रहा है क्योंकि इसे ज़रूरत के रूप में बताना आसान नहीं है.
लेकिन कई ईरानियों के लिए इसकी सफलता नारों से नहीं मापी जाएगी. यह मापी जाएगी कि युद्ध रुकता है या नहीं, दाम घटते हैं या नहीं, प्रतिबंधों में राहत मिलती है या नहीं, और क्या नेतृत्व अगले दौर को बिना किसी अप्रत्याशित तनाव के संभाल सकेगा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.