रणबीर कपूर-साई पल्लवी की 'रामायण' देश-विदेश के क्रिटिक्स को कैसी लग रही है?

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- Author, ज़ोया मतीन
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, दिल्ली
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
भारत की सबसे महंगी फ़िल्म कही जा रही 'रामायण' दुनिया भर के सिनेमाघरों में रिलीज़ हो गई है.
रामायण की इस भव्य कहानी को दो हिस्सों में बनाया गया है. इसे भारतीय फ़िल्मी इतिहास की सबसे महंगी फ़िल्मों में से एक बताया जा रहा है.
फ़िल्म से उम्मीदें बहुत बड़ी हैं, लेकिन शुरुआती समीक्षाओं में इसे मिली-जुली प्रतिक्रिया मिली है.
नितेश तिवारी के निर्देशन में बनी 'रामायण: राइज़ ऑफ़ ए लीजेंड' दो फ़िल्मों की सिरीज़ का पहला हिस्सा है. इस बड़े प्रोजेक्ट में बॉलीवुड के कुछ बहुत बड़े नाम शामिल हैं.
फ़िल्म में हॉलीवुड के विज़ुअल इफ़ेक्ट्स विशेषज्ञों ने काम किया है. इसके संगीत की ज़िम्मेदारी दो ऑस्कर विजेता संगीतकारों ने संभाली है.
इस फ़िल्म का मक़सद भारत की सबसे सम्मानित कहानियों में से एक को दुनिया भर के दर्शकों तक पहुंचाना है.
हिंदू धर्म के प्रमुख महाकाव्यों में शामिल रामायण की कहानी सदियों से और कई देशों में सुनाई जाती रही है.
इसकी झलक कविता, मंदिरों की मूर्तियों, कठपुतली कला और लोक रंगमंच में मिलती है. पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह कहानी सुनाई जाती रही है.
रामायण ने कई राजवंशों और साम्राज्यों का उतार-चढ़ाव देखा है. इसने धार्मिक आस्था और राजनीतिक आंदोलनों को भी प्रेरित किया है.
समय-समय पर टीवी और सिनेमा ने भी इस कहानी को नए रूप में पेश किया है.
ऑस्कर विजेता संगीतकारों का संगीत

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नितेश तिवारी की फ़िल्म प्रेम, कर्तव्य, वनवास और युद्ध की जानी-पहचानी कहानी को फिर से सामने लाती है.
इस फ़िल्म की दुनिया में देवता और राक्षस हैं. दिव्य अस्त्र हैं और शक्तिशाली साम्राज्य भी.
रणबीर कपूर ने अयोध्या के आदर्श राजकुमार भगवान राम की भूमिका निभाई है.
उन्हें 14 साल के लिए अपने राज्य से वनवास भेज दिया जाता है. वह अपनी पत्नी सीता के साथ जंगल चले जाते हैं.
सीता की भूमिका साई पल्लवी ने निभाई है. रावण उनका अपहरण कर लेता है.
राम-रावण का महायुद्ध फ़िल्म के दूसरे भाग में दिखाया जाएगा. इसे अगले साल रिलीज़ करने की योजना है.
फ़िल्म के निर्माता नमित मल्होत्रा विज़ुअल इफ़ेक्ट्स कंपनी डीएनईजी के प्रमुख हैं.
डीएनईजी ने 'ड्यून' और 'इंटरस्टेलर' जैसी हॉलीवुड की बड़ी फ़िल्मों पर काम किया है.
फ़िल्म का संगीत एआर रहमान और हैंस ज़िमर ने मिलकर तैयार किया है.
एआर रहमान 'स्लमडॉग मिलियनेयर' के लिए ऑस्कर जीत चुके हैं.
वहीं, हैंस ज़िमर ने 'ग्लैडिएटर', 'द डार्क नाइट' और 'ड्यून' जैसी फ़िल्मों के लिए संगीत दिया है. उनके संगीत ने आधुनिक हॉलीवुड की एक ख़ास पहचान बनाई है.
फ़िल्म दिवाली से कुछ दिन पहले रिलीज़ हुई है.
दिवाली रोशनी का त्योहार है. यह भगवान राम के वनवास के बाद अयोध्या लौटने का उत्सव भी है.
लेकिन अब तक फ़िल्म को मिली प्रतिक्रिया मिली-जुली रही है.
समीक्षकों की प्रतिक्रिया

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एनडीटीवी के सैबल चटर्जी ने फ़िल्म को पांच में से तीन स्टार दिए.
उनका कहना है कि फ़िल्म की विज़ुअल चकाचौंध कई बार कहानी पर भारी पड़ जाती है.
उन्होंने लिखा कि ज़्यादातर समय फ़िल्म का विशाल पैमाना ही सबसे ज़्यादा ध्यान खींचता है.
उनके मुताबिक़, कलाकारों का अभिनय भी काफ़ी असमान है.
'हिंदुस्तान टाइम्स' के ऋषभ सूरी फ़िल्म को लेकर ज़्यादा उत्साहित दिखे. उन्होंने इसे चार स्टार दिए.
उन्होंने लिखा, "यह देखकर खुशी हुई कि इतना पैसा पर्दे पर दिखता है."
उन्होंने कलाकारों के अभिनय और विज़ुअल इफेक्ट्स की तारीफ़ की.
हालांकि, उन्हें फ़िल्म का पहला हिस्सा धीमा लगा. संगीत भी उन्हें उम्मीद के मुताबिक़ प्रभावशाली नहीं लगा.
'इंडियन एक्सप्रेस' की शुभ्रा गुप्ता ने फ़िल्म को तीन स्टार दिए.
उन्होंने माना कि शुरुआत में फ़िल्म के इतने बड़े पैमाने को लेकर उन्हें संदेह था.
लेकिन धीरे-धीरे वह फ़िल्म से प्रभावित होती गईं.
उन्होंने इसे "बढ़िया महाकाव्य" कहा.
उनके मुताबिक़, फ़िल्म में जादू, रोमांच और साहसिक घटनाओं की भरमार है.
उन्होंने लिखा कि फ़िल्म निर्माता इतनी विशाल कहानी को संभालने में सफल रहे हैं और वे कहानी के बोझ तले दबे नहीं हैं.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी फ़िल्म को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आईं.
'द गार्जियन' में पीटर ब्रैडशॉ ने इसे "बेहद दिलचस्प, जोश से भरपूर और शानदार भारतीय महाकाव्यात्मक मेलोड्रामा" कहा.
उन्हें राम के वनवास की वजह बनने वाले राजपरिवार के षड्यंत्र में शेक्सपियर की झलक दिखी.
सीता को बचाने के लिए राम की यात्रा ने उन्हें होमर के महाकाव्यों की याद दिलाई.
फ़िल्म के विशाल दृश्य और काल्पनिक दुनिया ने उन्हें 'द लॉर्ड ऑफ़ द रिंग्स' और 'द लायन किंग' की भी याद दिलाई.
उन्होंने लिखा, "यह एक बेहद अद्भुत रोमांचक सफ़र है."
ब्रैडशॉ ने फ़िल्म को चार स्टार दिए.

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हालांकि, कुछ समीक्षक इससे कम प्रभावित हुए.
आईजीएन के सिद्धांत अदलखा ने फ़िल्म को 10 में से चार अंक दिए.
उन्होंने एक्शन दृश्यों को ख़राब बताया. कंप्यूटर से बनाए गए दृश्यों को भी उन्होंने आंखों को खटकने वाला कहा.
'नेक्स्ट बेस्ट पिक्चर' के जियोवानी लागो ने फ़िल्म को 10 में से पांच अंक दिए.
उन्होंने रावण के रूप में यश की दमदार मौजूदगी की तारीफ़ की.
एआर रहमान और हैंस ज़िमर के संगीत को भी सराहा.
लेकिन उनका मानना था कि इतनी विशाल कहानी को 'गेम ऑफ़ थ्रोन्स' जैसी टीवी सीरीज़ के रूप में कहीं बेहतर तरीके से पेश किया जा सकता था.
अंग्रेज़ी संस्करण में कलाकारों के होंठों की हरकत बदलने के लिए एआई के इस्तेमाल की भी आलोचना हुई.
नितेश तिवारी ने कहा कि इसका मक़सद अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के लिए फ़िल्म को ज़्यादा आसानी से समझने लायक़ बनाना था.
लेकिन सिद्धांत अदलखा ने इसकी तुलना कॉमेडी स्केच के लिए स्थिर तस्वीरों पर मुंह के हाव-भाव को ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने से की.
भारत में इस फ़िल्म की तुलना रामायण की पुरानी प्रस्तुतियों से भी हो रही है.
ख़ास तौर पर रामानंद सागर की 'रामायण' से.
'जब सड़कें खाली और दुकानें बंद हो जाती थीं'

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करीब चार दशक पहले इस टीवी सिरीज़ ने पूरे देश को अपने प्रभाव में ले लिया था.
उसके सेट और स्पेशल इफेक्ट्स आज भले ही साधारण लगते हों, लेकिन उस समय उसका असर बहुत बड़ा था.
1987 में जब यह सीरीज़ पहली बार प्रसारित हुई, तो रविवार की सुबह भारत में लगभग भक्तिमय सन्नाटा छा जाता था.
सड़कें खाली हो जाती थीं. दुकानों के शटर बंद हो जाते थे.
पड़ोसी एक साथ टीवी के सामने जमा हो जाते थे.
कुछ दर्शक प्रसारण से पहले नहाते थे, अगरबत्ती जलाते थे और टीवी स्क्रीन पर माला चढ़ाते थे.
वे कार्यक्रम देखने की तैयारी लगभग उसी तरह करते थे, जैसे पूजा की तैयारी की जाती है.
न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के मीडिया विशेषज्ञ अरविंद राजगोपाल ने 2019 में बीबीसी को बताया था कि कई बार ट्रेनें और बसें तक रुक जाती थीं.
यात्री उतरकर सड़क किनारे लगे टीवी पर यह कार्यक्रम देखते थे.
सरकारी दूरदर्शन नेटवर्क पर प्रसारित इस सीरीज़ के 78 एपिसोड थे. इसके सबसे लोकप्रिय हिस्सों को करीब आठ से 10 करोड़ दर्शकों ने देखा था.
उस दौर में इतने दर्शकों का होना बहुत बड़ी बात थी.
तब भारत में टीवी होना भी एक तरह की विलासिता माना जाता था.
इस सीरीज़ के कलाकार भी लोगों के लिए श्रद्धा का विषय बन गए थे.
राम की भूमिका निभाने वाले अरुण गोविल ने बताया है कि उन्हें देखकर कई लोग रोने लगते थे और उनके पैर छूते थे.
अब नितेश तिवारी की फ़िल्म में अरुण गोविल भी नज़र आए हैं.
उन्होंने राम के पिता दशरथ की भूमिका निभाई है.
इस कास्टिंग में पुरानी यादों की झलक भी मिलती है.
रामायण के दूसरे रूपांतरणों ने भी इस महाकाव्य को अपने-अपने तरीक़े से पेश किया.
1992 की भारत-जापान की एनिमेटेड फ़िल्म 'रामायण: द लीजेंड ऑफ़ प्रिंस रामा' ने हाथ से बनाए गए बारीक एनिमेशन के ज़रिए इस कहानी को जीवंत किया था.
नितेश तिवारी की 'रामायण' के पास ऐसी तकनीकी सुविधाएं हैं, जिनकी कल्पना इसके पुराने रूपांतरणों में शायद ही की जा सकती थी.
लेकिन इस फ़िल्म पर उन पीढ़ियों की उम्मीदों का भी बड़ा दबाव है, जो रामायण और उसके पात्रों के साथ बड़ी हुई हैं.
यह फ़िल्म भारत के ऐसे दौर में भी आई है, जब राम हिंदू पहचान के एक शक्तिशाली प्रतीक बन गए हैं.
पिछले डेढ़ दशक में रामायण की लोकप्रिय व्याख्याएं और नए रूपांतरण भी विवादों में घिरते रहे हैं.
2023 में आई बड़े बजट की फ़िल्म 'आदिपुरुष' भी रामायण की कहानी पर आधारित थी.
इसे कई मोर्चों पर विरोध का सामना करना पड़ा.
हिंदू संगठनों ने धार्मिक पात्रों के अपमान का आरोप लगाते हुए फ़िल्म पर प्रतिबंध लगाने की मांग की.
रावण के किरदार में कौन?

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कुछ आलोचकों ने उस फ़िल्म में रावण के चित्रण पर भी सवाल उठाए.
उनका कहना था कि इसमें मुग़लकालीन छवियों का इस्तेमाल किया गया और मुसलमानों को लेकर बनी रूढ़ धारणाओं को मज़बूती दी गई.
फ़िल्म के संवादों और विज़ुअल इफेक्ट्स की भी आलोचना हुई.
नई फ़िल्म में इन किरदारों को निभाने वाले कलाकारों ने इस ज़िम्मेदारी के दबाव को गहराई से महसूस किया.
रणबीर कपूर ने बीबीसी एशियन नेटवर्क के हारून रशीद से कहा, "मैं डर से भरा हुआ था."
उन्होंने कहा, "मुझे लगा कि शायद मैं इस भूमिका के लिए ज़्यादा उम्र का हूं. मैं इसके साथ न्याय नहीं कर पाऊंगा."
रणबीर कपूर ने इस भूमिका को अपने जीवन का एक बड़ा अवसर बताया.
लेकिन उन्होंने कहा कि करोड़ों लोगों के पूजनीय किरदार को निभाने में वैसी रचनात्मक आज़ादी नहीं मिलती, जैसी उन्हें दूसरी फ़िल्मों में मिली है.
सीता की भूमिका निभाने वाली साई पल्लवी ने कहा कि यह अनुभव कलात्मक होने के साथ-साथ आध्यात्मिक भी था.
वह एक धार्मिक परिवार में पली-बढ़ी हैं.
उन्होंने कहा कि उन्होंने इस भूमिका को सिर्फ़ अभिनय के तौर पर नहीं देखा.
उनके लिए यह व्यक्तिगत विकास का भी एक अवसर था.
दर्शक इस फ़िल्म को कितना पसंद करते हैं, यह जल्द ही साफ़ हो जाएगा.
जैसे-जैसे ज़्यादा दर्शक सिनेमाघरों में पहुंचेंगे, इसकी लोकप्रियता की तस्वीर भी स्पष्ट होती जाएगी.
लेकिन नतीजा चाहे जो भी हो, यह फ़िल्म भारत के लिए एक बड़ा सांस्कृतिक क्षण है.
यह पीढ़ियों से लोकप्रिय रही कहानी को अभूतपूर्व पैमाने पर बड़े पर्दे पर लेकर आई है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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