कुवैत पर कब्ज़ा कर सद्दाम हुसैन ने बनाया था नया 'देश', जो सिर्फ़ चार दिन चला

    • Author, वलीद बदरान
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़ अरबी
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2 अगस्त 1990 को इराक़ी सेना अचानक कुवैत में घुस गई.

इस सैन्य कार्रवाई का आदेश इराक़ के तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने दिया था. इसके साथ खाड़ी क्षेत्र का एक बड़ा संकट शुरू हुआ, जिसने बाद में दूसरे खाड़ी युद्ध का रास्ता तैयार किया.

लेकिन इराक़ और कुवैत के रिश्ते अचानक नहीं बिगड़े थे. इसके पीछे राजनीतिक और आर्थिक, दोनों तरह की कई वजहें थीं.

1988 में ईरान और इराक़ के बीच युद्ध ख़त्म होने के बाद इराक़ भारी कर्ज़ में डूब गया था.

युद्ध के दौरान खाड़ी देशों ने इराक़ की आर्थिक मदद की थी. इनमें कुवैत और सऊदी अरब सबसे आगे थे. युद्ध ख़त्म होने के बाद कुवैत ने इराक़ से अपना कर्ज़ लौटाने को कहा.

इसके बाद दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ गया.

इराक़ ने कुवैत पर आरोप लगाया कि वह तेल बेचने वाले देशों के संगठन ओपेक में तय सीमा से ज़्यादा तेल निकाल रहा है.

इराक़ का कहना था कि इससे दुनिया में तेल की क़ीमतें गिर गईं और उसकी कमाई कम हो गई.

इराक़ ने कुवैत पर दोनों देशों के बीच मौजूद रुमैला तेल क्षेत्र से तेल चुराने का आरोप भी लगाया.

इसी तनाव के बीच सद्दाम हुसैन ने 2 अगस्त 1990 को कुवैत पर हमला करने का फ़ैसला किया.

कुवैत पर इराक़ी सेना का कब्ज़ा होने के बाद सद्दाम हुसैन के चचेरे भाई अली हसन अल-मजीद को वहां का सैन्य शासक बनाया गया.

कब्ज़े को सही दिखाने की कोशिश

कुवैत पर कब्ज़े के बाद इराक़ी अधिकारियों ने अपने क़दम को सही और कानूनी दिखाने की कोशिश शुरू कर दी.

इसी कोशिश के तहत स्वतंत्र देश कुवैत की जगह एक नया देश बनाने की घोषणा की गई. इसे "कुवैत गणराज्य" नाम दिया गया.

कुवैत पर कब्ज़े के दो दिन बाद, 4 अगस्त 1990 को सद्दाम हुसैन ने "कुवैत गणराज्य" बनाने का एलान किया.

उन्होंने दावा किया कि यह एक स्वतंत्र देश है और यहां हुई "जनता की क्रांति" के बाद इसे बनाया गया है.

इसका ज़िक्र रजा हसन मिनावी की किताब "कुवैत, हमला और आज़ादी" में मिलता है.

जानकारों और इतिहासकारों के मुताबिक़, इस घोषणा के पीछे सद्दाम हुसैन का मक़सद कुछ समय हासिल करना और दुनिया का ध्यान असली स्थिति से हटाना था.

सद्दाम हुसैन ने पहले ही दिन कुवैत को सीधे इराक़ में मिलाने की घोषणा नहीं की.

इसके बजाय इराक़ी सरकार ने यह दिखाने की कोशिश की कि कुवैत के लोगों ने ख़ुद अपनी सरकार के ख़िलाफ़ विद्रोह किया है.

इराक़ी सरकार ने दावा किया कि कुवैत के लोगों ने उस सरकार के ख़िलाफ़ "अंदरूनी क्रांति" की है, जो विदेशी ताक़तों के इशारे पर चल रही थी.

उस समय इराक़ी मीडिया ने अरब देशों और दुनिया के सामने हमले को सही ठहराने के लिए इसी तरह की बातें कहीं.

नौ लोगों की अस्थायी सरकार

इसकी शुरुआत "स्वतंत्र कुवैत की अस्थायी सरकार" बनाने से हुई.

इस सरकार में कुवैत के नौ पूर्व सैन्य अधिकारी शामिल थे. कहा गया कि उन्होंने इराक़ी सरकार का साथ दिया था. बाद में भी उन्हें इसी तरह देखा गया.

कर्नल अला हुसैन अली अल-ख़फ़ाजी अल-जबर को प्रधानमंत्री और सेना का प्रमुख बनाया गया.

उन्हें रक्षा और गृह मंत्रालय की ज़िम्मेदारी भी दी गई.

लेफ़्टिनेंट कर्नल वलीद सऊद मोहम्मद अब्दुल्लाह को विदेश मंत्री बनाया गया.

लेफ़्टिनेंट कर्नल फ़ुआद हुसैन अहमद को वित्त और तेल मंत्री बनाया गया.

मेजर फ़ादिल हैदर अल-वाफ़िकी को सूचना और परिवहन मंत्री बनाया गया.

लेफ़्टिनेंट कर्नल हुसैन दहैमान अल-शम्मरी को सामाजिक मामलों का मंत्री बनाया गया.

रजा हसन मिनावी की किताब "कुवैत, हमला और आज़ादी" के मुताबिक़, अला हुसैन का जन्म 1948 में कुवैत में हुआ था.

बग़दाद यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान वह इराक़ की बाथ पार्टी में शामिल हो गए थे. वह कुवैत की सेना में अधिकारी भी रह चुके थे.

इराक़ी सेना ने कुवैत के सरकारी टेलीविज़न पर भी कब्ज़ा कर लिया था.

इसी टेलीविज़न पर अला हुसैन का एक वीडियो बयान दिखाया गया. इसमें उन्होंने नई सरकार बनाने की घोषणा की और कुवैत के लोगों से उसका साथ देने की अपील की.

नई सरकार ने क्या घोषणाएं कीं?

नई सरकार ने कई ऐसे फ़ैसलों की घोषणा की, जिन्हें उसने "क्रांतिकारी फ़ैसले" बताया.

इनमें पश्चिमी देशों की कंपनियों को सरकार के नियंत्रण में लेना और कुवैत के शासक परिवार की संपत्ति ज़ब्त करना शामिल था.

कुवैत की संसद को भंग करने और कुवैत की अमीरशाही को गणराज्य में बदलने की घोषणा भी की गई.

उस समय कुवैत में रह रहे सभी अरब नागरिकों को वहां की नागरिकता देने का एलान भी किया गया.

लेकिन इस सरकार के पास असल में कोई अधिकार नहीं था.

यह केवल दिखावे की सरकार थी. कुछ लोगों का मानना है कि इराक़ी सरकार ने कुवैत को अपने देश में मिलाने के फ़ैसले को सही ठहराने के लिए इसे बनाया था.

कुवैत के लोगों ने इस सरकार को स्वीकार नहीं किया. कुवैत के विपक्ष ने भी इसका साथ देने से इनकार कर दिया.

चार दिन में ख़त्म हो गया 'कुवैत गणराज्य'

यह अस्थायी सरकार केवल चार दिन ही चली.

8 अगस्त 1990 को सद्दाम हुसैन ने कुवैत को आधिकारिक तौर पर इराक़ में मिलाने का फ़ैसला कर लिया.

उन्होंने दावा किया कि कुवैत की अस्थायी सरकार ने उनसे ऐसा करने का अनुरोध किया था.

इसके बाद इस अस्थायी सरकार का कोई कानूनी या कामकाजी मतलब नहीं रह गया.

28 अगस्त 1990 को एक आदेश जारी कर "कुवैत प्रांत" बनाया गया.

इसे इराक़ का 19वां प्रांत घोषित किया गया और तीन इलाक़ों में बांटा गया.

इनमें काज़िमा, यानी कुवैत की राजधानी, अल-जहरा और अल-निदा, यानी अल-अहमदी शामिल थे.

इराक़ी अधिकारी अज़ीज़ सालेह अल-नुमान को कुवैत का गवर्नर बनाया गया.

अस्थायी सरकार को भंग करने के बाद सद्दाम हुसैन ने अला हुसैन अली को इराक़ का उपप्रधानमंत्री बना दिया.

अस्थायी सरकार के बाकी मंत्रियों को राष्ट्रपति कार्यालय में मंत्री के दर्जे वाले सलाहकार बना दिया गया.

इराक़ी प्रांत बना कुवैत

इस तरह कुवैत को इराक़ का एक प्रांत बना दिया गया.

इराक़ी सेना ने पूरे कुवैत में अपने देश के क़ानून लागू करने शुरू कर दिए.

स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली किताबें और पाठ्यक्रम बदल दिए गए. कुवैत की मुद्रा की जगह दूसरी मुद्रा लागू की गई और वहां के अख़बारों पर रोक लगा दी गई.

कुवैत में मौजूद विदेशी दूतावास बंद कर दिए गए और कई राजनयिकों को देश से निकाल दिया गया.

स्थानीय लोगों पर कड़ी पाबंदियां लगाई गईं.

लोगों को डराने के लिए मारपीट, गिरफ़्तारियों और मौत की सज़ा जैसे तरीक़े अपनाए गए.

देश की रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर इराक़ी सेना का नियंत्रण हो गया.

सद्दाम हुसैन ने कहा कि "कुवैत अपनी मातृभूमि में वापस लौट आया है."

कई इतिहासकारों और राजनीतिक जानकारों का मानना है कि "कुवैत गणराज्य" की घोषणा केवल एक "राजनीतिक नाटक और इराक़ की सोची-समझी चाल" थी.

इसका मक़सद दुनिया भर से बढ़ते दबाव के बीच कुछ समय हासिल करना था.

इराक़ी नेतृत्व जानता था कि अगर पहले ही दिन कुवैत को सीधे इराक़ में मिलाने की घोषणा की गई, तो दुनिया भर में तीखी प्रतिक्रिया होगी.

इसीलिए पहले यह दिखाया गया कि कुवैत में "जनता की अंदरूनी क्रांति" हुई है. इसके बाद दावा किया गया कि उसी सरकार ने इराक़ में शामिल होने की "मांग" की है.

संयुक्त राष्ट्र ने लगाया प्रतिबंध

संयुक्त राष्ट्र ने कुवैत पर इराक़ी हमले की निंदा की.

6 अगस्त 1990 से इराक़ पर प्रतिबंध लगाने शुरू कर दिए गए.

इसके बाद 29 नवंबर को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव संख्या 678 पर मतदान हुआ.

इस प्रस्ताव ने इराक़ के ख़िलाफ़ सैन्य ताक़त के इस्तेमाल की मंज़ूरी दी.

इराक़ को कुवैत से बाहर निकलने के लिए 15 जनवरी 1991 की आधी रात तक का समय दिया गया.

जनवरी 1991 की शुरुआत में संकट को बिना युद्ध के ख़त्म करने की कोशिशें तेज़ हो गईं.

लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गए, युद्ध होने की आशंका बढ़ती गई.

अरब देशों की ओर से संकट का हल निकालने की सभी कोशिशें नाकाम रहीं.

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव ख़ावियर पेरेज़ डी कुएयार ने सद्दाम हुसैन से मुलाक़ात की.

लेकिन वह सद्दाम हुसैन को कुवैत से सेना हटाने या सेना की वापसी पर बातचीत के लिए भी तैयार नहीं कर सके.

9 जनवरी 1991 को अमेरिकी विदेश मंत्री जेम्स बेकर और इराक़ी विदेश मंत्री तारिक़ अज़ीज़ के बीच बातचीत हुई.

यह बातचीत भी नाकाम रही.

इसके बाद अमेरिका ने कहा कि समस्या का हल निकालने के लिए बातचीत के सभी रास्ते आज़माए जा चुके हैं.

12 जनवरी को अमेरिकी संसद ने इराक़ के ख़िलाफ़ युद्ध शुरू करने के प्रस्ताव को मंज़ूरी दे दी.

34 देशों के गठबंधन ने शुरू किया हमला

कुवैत पर इराक़ का कब्ज़ा कई महीने तक रहा.

इसके बाद अमेरिका के नेतृत्व में 34 देशों के गठबंधन ने कुवैत को इराक़ी कब्ज़े से छुड़ाने के लिए सैन्य कार्रवाई करने का फ़ैसला किया.

16 जनवरी 1991 को "ऑपरेशन डेज़र्ट स्टॉर्म" यानी "रेगिस्तानी तूफ़ान" नाम से यह अभियान शुरू हुआ.

फ़रवरी 1991 में कुवैत को पूरी तरह इराक़ी कब्ज़े से छुड़ा लिया गया.

भारी सैन्य दबाव के बाद इराक़ी सेना कुवैत से निकल गई.

लेकिन जाते समय उसने वहां बड़े पैमाने पर तबाही मचाई. तेल के कुओं में आग लगा दी गई और देश की ज़रूरी सुविधाओं को नुक़सान पहुंचाया गया.

14 मार्च 1991 को कुवैत के अमीर शेख़ जाबिर अल-अहमद अल-सबा अपने देश लौट आए.

उनकी सरकार कई महीनों से सऊदी अरब से अस्थायी रूप से काम कर रही थी.

अस्थायी सरकार के सदस्यों का क्या हुआ?

कुवैत के आज़ाद होने के बाद इराक़ का साथ देने वाली अस्थायी सरकार के सदस्य भी वापस लौटे.

अला हुसैन को छोड़कर बाकी सदस्य 27 अप्रैल 1991 को कुवैत लौट आए.

लौटते ही उन्होंने कुवैत के अधिकारियों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया.

उन्हें पूछताछ के लिए कुवैत की सरकारी सुरक्षा एजेंसी के पास भेजा गया.

एजेंसी ने 15 मई 1991 को पूछताछ पूरी की.

इसके बाद 22 जुलाई को उनका मामला सरकारी सुरक्षा मामलों की जांच करने वाले सरकारी वकील के पास भेजा गया.

पूछताछ के दौरान इन लोगों ने कहा कि वे कुवैत और वहां के अमीर के प्रति वफ़ादार हैं. उन्होंने अला हुसैन के ख़िलाफ़ गवाही भी दी.

9 सितंबर 1991 को कुवैत के तत्कालीन न्याय मंत्री ग़ाज़ी उबैद अल-समर ने अस्थायी सरकार से जुड़ा मामला बंद करने की घोषणा की.

उन्होंने कहा कि मामले की जांच पूरी हो गई है.

न्याय मंत्री के मुताबिक़, उस सरकार के सदस्यों की अपनी इच्छा नहीं चल रही थी. उन्हें पीटा गया था और धमकियां दी गई थीं. उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से परेशान भी किया गया था.

उन्होंने कहा कि जांच में सेना की ख़ुफ़िया एजेंसी और सरकारी सुरक्षा विभाग से मिली रिपोर्टों को आधार बनाया गया.

इसके बाद ये लोग कुवैत के रक्षा मंत्रालय में दोबारा काम करने लगे.

रजा हसन मिनावी की किताब के मुताबिक़, कुवैत के लोगों ने धीरे-धीरे उनके मामले को भुला दिया.

अला हुसैन को क्यों सुनाई गई मौत की सज़ा?

अस्थायी सरकार का नेतृत्व करने वाले अला हुसैन अली 1998 में इराक़ से निकलकर तुर्की चले गए.

इसके बाद वह नॉर्वे पहुंचे.

साल 2000 में वह कुवैत लौटे और अधिकारियों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया.

उन्होंने कहा कि वह इराक़ का साथ देने के आरोप से ख़ुद को बेगुनाह साबित करना चाहते हैं.

उन पर देश के साथ गद्दारी करने का मुक़दमा चला और मौत की सज़ा सुनाई गई.

हालांकि बाद में उनकी सज़ा घटाकर उम्र क़ैद कर दी गई.

अला हुसैन ने अदालत में कहा कि इराक़ी अधिकारियों ने उन्हें "दूसरे देश के इशारे पर चलने वाली सरकार" का प्रमुख बनने के लिए मजबूर किया था.

उनका कहना था कि इराक़ी अधिकारियों ने धमकी दी थी कि अगर उन्होंने दी गई ज़िम्मेदारी पूरी नहीं की, तो उनके परिवार को हिरासत में ले लिया जाएगा और उन्हें मार दिया जाएगा.

उन्होंने कहा कि उन्हें आज तक नहीं पता कि इराक़ी अधिकारियों ने सैकड़ों युद्धबंदियों में से उन्हें ही कुवैत की उस सरकार का प्रमुख बनाने के लिए क्यों चुना था.

उनका यह भी कहना था कि युद्ध के बाद इराक़ी अधिकारियों ने उन्हें 1998 तक इराक़ में रहने के लिए मजबूर किया.

क्या 'कुवैत गणराज्य' असल में एक देश था?

क़ानून के हिसाब से "कुवैत गणराज्य" ने एक देश माने जाने की कोई शर्त पूरी नहीं की थी.

न तो उसके पास अपने फ़ैसले लेने का कोई अधिकार था और न ही किसी दूसरे देश ने उसे मान्यता दी थी.

इसलिए क़ानून की नज़र में उसका कोई अस्तित्व नहीं था.

जिस तेज़ी से इसे बनाया गया और फिर ख़त्म कर दिया गया, उससे भी पता चलता है कि यह कोई असली देश नहीं था.

यह केवल कुवैत पर हमले को सही ठहराने के लिए थोड़े समय के लिए बनाया गया एक ज़रिया था.

"स्वतंत्र कुवैत की अस्थायी सरकार" ने कोई क़ानून नहीं बनाया.

उसने सरकार चलाने या दूसरे देशों से संबंध बनाने का कोई काम भी नहीं किया. उसका दुनिया के दूसरे देशों या अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से कोई संपर्क नहीं था.

हालांकि यह सरकार केवल चार दिन चली, लेकिन इससे जुड़ी बुरी यादें कुवैत के लोगों के मन में बनी रहीं.

इन यादों ने कुवैत के लोगों को एक-दूसरे के और क़रीब किया. साथ ही उन्हें अपने देश की आज़ादी और अपने फ़ैसले ख़ुद लेने के अधिकार की अहमियत का दोबारा एहसास कराया.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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