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उमर अब्दुल्लाह सांसद के इस्तीफ़े और अपने ही विधायकों की नाराज़गी के बीच बड़े सियासी संकट में घिरे
- Author, जहांगीर अली
- पदनाम, श्रीनगर से बीबीसी न्यूज़ के लिए
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
श्रीनगर से नेशनल कॉन्फ्रेंस के सांसद आगा सैयद रुहुल्लाह ने पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया है. वह लंबे समय से पार्टी ने नाराज़ चल रहे थे.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ आगा सैयद रुहुल्लाह ने संकेत दिया है कि वह अपनी नई राजनीतिक पार्टी बना सकते हैं.
उन्होंने कहा, "मैं सत्ता के लिए अपने सम्मान से समझौता नहीं कर सकता." रुहुल्लाह ने पहले ही घोषणा कर दी थी कि वे 3 नवंबर को पार्टी से इस्तीफ़ा दे देंगे.
उनके इस्तीफ़े के साथ ही जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है.
उमर अब्दुल्लाह की सरकार ने पिछले महीने ही अपने मौजूदा कार्यकाल के दो साल पूरे किए हैं.
27 अक्तूबर को कश्मीर के चार विधायकों को उनके मंत्रिमंडल में शामिल किया गया. इनमें अली मोहम्मद सागर, मीर सैफ़ुल्लाह, शमीमा फ़िरदौस और अल्ताफ़ अहमद वानी शामिल हैं.
इसके बाद उमर अब्दुल्लाह को अपनी ही पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस के कुछ नेताओं की आलोचना का सामना करना पड़ा. पार्टी के भीतर इस तरह खुलकर नाराज़गी सामने आना आम बात नहीं है.
तीन दिन बाद 30 अक्तूबर को पार्टी के 17 नाराज़ विधायकों ने श्रीनगर में चार घंटे तक बैठक की.
बैठक के बाद उन्होंने पार्टी को अपनी शिकायतें दूर करने के लिए 15 दिन का समय दिया. ये विधायक पार्टी में "एकतरफ़ा फैसले" लिए जाने और "कुछ चुनिंदा लोगों के हिसाब से पार्टी चलाने" से नाराज़ हैं.
विधायकों ने पार्टी के काम करने के तरीक़े पर नाख़ुशी जताई.
श्रीनगर की ईदगाह सीट से छह बार विधायक रहे मुबारक गुल और अनंतनाग पश्चिम से विधायक अब्दुल मजीद लारनी ने उमर अब्दुल्लाह के मंत्रिमंडल में जगह न मिलने पर खुलकर नाराज़गी ज़ाहिर की.
नए मंत्रिमंडल में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह समेत सात मंत्री कश्मीर घाटी से हैं.
जम्मू क्षेत्र से दो मंत्री बनाए गए हैं. इनमें उपमुख्यमंत्री सुरिंदर कुमार चौधरी भी शामिल हैं.
पार्टी ने अपने विधायकों की ओर से सार्वजनिक तौर पर नाराज़गी जताए जाने को अपने यहां मौजूद "अंदरूनी लोकतंत्र" की निशानी बताया है.
क्या उमर सरकार को कोई ख़तरा है?
जम्मू यूनिवर्सिटी के राजनीति विज्ञान विभाग की पूर्व प्रोफ़ेसर रेखा चौधरी का कहना है कि उमर अब्दुल्लाह की सरकार पर फ़िलहाल कोई ख़तरा नहीं है.
उनके मुताबिक़, इस बात की संभावना कम है कि नाराज़ विधायक पार्टी से इस्तीफ़ा देंगे.
वह कहती हैं, "नेशनल कॉन्फ्रेंस के इतिहास में यह बहुत कम देखने को मिला है कि उसके नेताओं ने पार्टी के ख़िलाफ़ सार्वजनिक तौर पर नाराज़गी जताई हो."
"सभी राजनीतिक पार्टियों के पास ऐसी शिकायतें दूर करने के अपने तरीक़े होते हैं. मुझे नहीं पता कि यह संकट कितना बड़ा है, लेकिन नेशनल कॉन्फ्रेंस ने पहले कभी ऐसी स्थिति का सामना नहीं किया."
इस बीच पार्टी के वरिष्ठ नेता और श्रीनगर से लोकसभा सांसद सैयद आगा रुहुल्लाह के मंगलवार को इस्तीफ़े से पार्टी पर संकट गहरा गया है.
रुहुल्लाह के पिता सैयद आगा मेहदी मुस्तफ़ा की 3 नवंबर 2000 को चरमपंथियों ने हत्या कर दी थी. उस समय वो कांग्रेस के नेता थे.
अब 26 साल बाद रुहुल्लाह ने नेशनल कॉन्फ्रेंस से अलग होने के लिए वही तारीख़ चुनी है.
रुहुल्लाह ने उमर अब्दुल्लाह पर क्या आरोप लगाया?
श्रीनगर के सांसद रुहुल्लाह ने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह पर साल 2024 के जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव में मिले जनादेश से धोखा करने का आरोप लगाया है.
इस चुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस ने 42 सीटें जीती थीं. इनमें से ज़्यादातर सीटें कश्मीर में थीं.
भारतीय जनता पार्टी 29 सीटें जीतकर दूसरे स्थान पर रही थी. बीजेपी की सभी सीटें जम्मू क्षेत्र से थीं.
नेशनल कॉन्फ्रेंस ने अपने चुनावी घोषणापत्र में अनुच्छेद 370 और जम्मू-कश्मीर को मिले ख़ास संवैधानिक अधिकार वापस दिलाने के लिए लड़ने का वादा किया था.
पार्टी ने बिजली परियोजनाओं को जम्मू-कश्मीर को सौंपे जाने, हर घर को 200 यूनिट मुफ़्त बिजली देने और जम्मू-कश्मीर के एक लाख युवाओं को रोज़गार देने का भी वादा किया था.
लेकिन इनमें से ज़्यादातर वादे अब तक पूरे नहीं हुए हैं.
उमर अब्दुल्लाह ने अपनी सरकार के कथित ख़राब प्रदर्शन पर सफ़ाई देते हुए कहा है कि केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री के तौर पर उनके पास सीमित अधिकार हैं.
नाम न बताने की शर्त पर नेशनल कॉन्फ्रेंस के एक विधायक ने कहा, "अब हालात ऐसे हो गए हैं कि हमारे अपने मतदाता हमारा मज़ाक़ उड़ाते हैं."
"अगर हम मुफ़्त बिजली जैसे बुनियादी मुद्दे पर कुछ नहीं कर पा रहे हैं, तो फिर बड़े वादे कैसे पूरे करेंगे?"
सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ़ कश्मीर में सामाजिक विज्ञान विभाग के पूर्व डीन प्रोफ़ेसर नूर अहमद बाबा का कहना है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस को कश्मीर में बीजेपी के ख़िलाफ़ लोगों की नाराज़गी का फ़ायदा मिला और वह सत्ता में आई.
महबूबा मुफ़्ती की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी यानी पीडीपी समेत कश्मीर की क्षेत्रीय पार्टियों ने बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधान हटाने और जम्मू-कश्मीर का दर्जा घटाने के फ़ैसले का विरोध किया था.
सुप्रीम कोर्ट ने इन फ़ैसलों को सही ठहराया था.
प्रोफ़ेसर बाबा कहते हैं, "सत्ता में आने के केवल दो साल बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस ऐसी स्थिति में पहुंच गई है, जहां पिछले विधानसभा चुनाव के घोषणापत्र में किए गए वादों को एक नेता, रुहुल्लाह, बख़ूबी उठा रहे हैं और पार्टी नेतृत्व उसी नेता से दूरी बना रही है."
यहां तक कि उमर अब्दुल्लाह और नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष और उनके पिता फ़ारूक़ अब्दुल्लाह ने रुहुल्लाह को अपना फ़ैसला बदलने के लिए मनाने के सुझाव को ठुकरा दिया है.
फ़ारूक़ अब्दुल्लाह ने इससे भी आगे बढ़कर रुहुल्लाह को अपने दम पर चुनाव लड़ने की चुनौती दी है.
क्या मुख्यमंत्री के आसपास कुछ लोगों का घेरा है?
जम्मू-कश्मीर के एक अन्य विधायक ने नाम न बताने की शर्त पर बीबीसी से कहा कि मुख्यमंत्री के आसपास "दोस्तों और नेताओं की एक मंडली" है. इसकी वजह से पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को किनारे किया जा रहा है.
उन्होंने किसी का नाम लिए बिना कहा, "इनमें से ज़्यादातर लोगों ने चुनाव तक नहीं जीता है. इसके बावजूद पार्टी के मामलों में उनकी बात सुनी जाती है."
"वहीं, वर्षों से पार्टी के लिए काम करने वाले लोगों को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है."
प्रोफ़ेसर बाबा का मानना है कि पार्टी नेतृत्व रुहुल्लाह के मामले को बेहतर तरीक़े से संभाल सकता था.
वह कहते हैं, "रुहुल्लाह के साथ जिस तरह का व्यवहार किया गया, उससे पार्टी घमंडी और लापरवाह दिखाई दी."
"अब पार्टी के भीतर आई नई नाराज़गी बताती है कि कई नेता उसके काम करने के तरीक़े से ख़ुश नहीं हैं. यह नेतृत्व की पूरी तरह नाकामी दिखाता है."
प्रोफ़ेसर बाबा के मुताबिक़, नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर चल रही खींचतान से कश्मीर की क्षेत्रीय पार्टियों में और टूट हो सकती है.
वह मानते हैं, "इसका फ़ायदा बीजेपी को मिलने की संभावना है."
प्रोफ़ेसर रेखा चौधरी कहती हैं, "सिर्फ़ बीजेपी ही नहीं, इस स्थिति का फ़ायदा पीडीपी को भी होगा."
उनका कहना है कि नाराज़ विधायकों में पार्टी के कुछ पुराने नेता भी शामिल हैं. इनमें मुबारक गुल और वरिष्ठ नेता और विधायक नज़ीर गुरेज़ी शामिल हैं.
प्रोफ़ेसर चौधरी के मुताबिक़, इन नेताओं की खुली नाराज़गी से नेशनल कॉन्फ्रेंस और उमर अब्दुल्लाह की सरकार, दोनों कमज़ोर स्थिति में दिखाई दे रहे हैं.
मुबारक गुल और नज़ीर गुरेज़ी समेत दूसरे नेताओं ने 4 नवंबर को प्रेस कॉन्फ्रेंस करने का एलान किया है.
प्रोफ़ेसर चौधरी का कहना है कि रुहुल्लाह के इस्तीफ़े से पहले नेशनल कॉन्फ्रेंस का नेतृत्व शायद इंतज़ार करके हालात को समझने की कोशिश कर रहा है.
क्या पार्टी के टूटने का ख़तरा है?
सत्ता में आने के बाद उमर अब्दुल्लाह पर आरोप लगते रहे हैं कि वह बीजेपी के क़रीब जाने के लिए कश्मीर में लोगों की भावनाओं को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं.
अब कुछ लोगों का कहना है कि आने वाले महीनों और वर्षों में उनके नेतृत्व में पार्टी के टूटने का ख़तरा पैदा हो सकता है.
प्रोफ़ेसर बाबा कहते हैं, "बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि देश की राजनीति किस दिशा में जाती है."
"राजनीति में हालात बदलते रहते हैं और लोग अलग-अलग बातों को ध्यान में रखकर फ़ैसले करते हैं."
"क्या जम्मू-कश्मीर में लोगों के सामने भरोसेमंद विकल्प मौजूद हैं? इसके लिए हमें इंतज़ार करना होगा."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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