विपक्ष की रैलियों और एसआईआर विवाद के बीच क्या है बीजेपी की चुनौती और पलटवार की रणनीति

    • Author, शिवांगी जायसवाल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
    • ........से, नई दिल्ली
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 12 मिनट

दिल्ली में इंडिया गठबंधन के नेताओं और समर्थकों की बिना किसी पुलिस टकराहट के रामलीला मैदान में महारैली हुई.

दूसरी ओर, बीजेपी के सभी वरिष्ठ नेताओं ने एक नवंबर को यह रैली निकालने के लिए इंडिया गठबंधन विशेषकर कांग्रेस पर निशाना साधा.

साथ ही, इस दिन दिल्ली, पंजाब, हरियाणा में अलग-अलग कार्यक्रम करके बीजेपी ने इस तारीख़ के इतिहास को 1984 के सिख विरोधी दंगों की शुरूआत से जोड़ा.

चार दशक से पत्रकारिता कर रहीं राजनीतिक टिप्पणीकार नीरजा चौधरी के अनुसार, बीजेपी ने विपक्ष की रैली को रोकने की कोशिश नहीं की, जबकि ऐसी आशंका थी कि प्रदर्शनकारियों को सीमाओं पर रोका जा सकता था.

वे इसे संकेत मानती हैं कि केंद्र सरकार ने टकराव से बचते हुए अब राजनीतिक स्तर पर जवाब देने का रास्ता चुना है.

पहले सरकार इन प्रदर्शनों को लॉ एंड ऑर्डर की रणनीति से संभालने की कोशिश कर रही थी, जिसके चलते उसे अक्तूबर में हुईं पुलिस कार्रवाइयों के लिए काफ़ी आलोचना भी झेलनी पड़ी थी.

वरिष्ठ पत्रकार स्मिता गुप्ता का मानना है कि एक नवंबर को सिख दंगों से जोड़कर इंडिया गठबंधन की रैली की आलोचना करना बीजेपी का पूरी तरह से राजनीतिक आरोप है.

उन्होंने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "बीजेपी चुनावों को लेकर फोकस्ड पार्टी रही है, पंजाब में चुनाव हैं इसलिए उन्होंने एक नवंबर को उस घटना से जोड़ दिया. इस आधार पर रैली की आचोलना करने का कोई मतलब नहीं निकलता है."

उधर नीरजा चौधरी, विपक्ष के मूमेंटम के ख़िलाफ़ बीजेपी के जवाब को तीन स्तरों पर देखती हैं:

पहला- विपक्ष की रैली के समानांतर अपनी काउंटर रैलियां करना.

दूसरा- पार्टी प्रवक्ताओं के जरिए विपक्ष पर लगातार राजनीतिक हमला करना.

और तीसरा जो सबसे महत्वपूर्ण दांव हैं कि अमित शाह की ओर से एसआईआर पर चर्चा के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाने की पेशकश करना.

दरअसल, बीती 30 अक्तूबर को अमित शाह ने राहुल गांधी को संसद में वोट चोरी पर चर्चा की चुनौती दी.

शाह ने कहा, "मैं वोट चोरी के आरोपों पर चर्चा करने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाने को तैयार हूँ,"

उन्होंने विपक्ष पर चुनाव आयोग के ख़िलाफ़ बेबुनियाद आरोप लगाने और संसद में बहस से बचते हुए विरोध प्रदर्शन करने का आरोप लगाया.

उनका यह बयान विपक्षी दल के सांसदों की ओर से बुलाई गई मॉक संसद में मुख्य चुनाव आयुक्त के ख़िलाफ़ सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किए जाने से एक दिन पहले आई. हालांकि सांकेतिक संसद से सीईसी को नहीं हटाया जा सकता है.

ग़ौरतलब है कि इंडियन एक्सप्रेस की खोजी रिपोर्ट से बताया गया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने एसआईआर से जुड़े फ़ैसलों पर दो चुनाव आयुक्तों ने लिखित में असहमति दर्ज करायी थी.

इस रिपोर्ट के बाद विपक्ष और कॉकरोच जनता पार्टी ने सीईसी ज्ञानेश कुमार की मांग उठाई और ताज़ा प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू हुआ.

अमित शाह का एसआईआर पर राहुल गांधी को चर्चा का प्रस्ताव क्यों महत्वपूर्ण है

नीरजा चौधरी ने कहा कि विपक्ष पहले आरोप लगा रहा था कि संसद के भीतर उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया.

अब अगर बीजेपी के प्रमुख और बीजेपी नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के गृह मंत्री अमित शाह बयान देते हैं कि वे एसआईआर पर विशेष सत्र बुलाने को तैयार हैं तो विपक्ष के लिए उसे ठुकराना भी आसान नहीं होगा.

वे इस रणनीति के पीछे मानती हैं कि संसद में विस्तृत चर्चा होने के बाद राजनीतिक रूप से मामला कुछ हद तक शांत पड़ सकता है, जबकि विपक्ष फिलहाल इस मुद्दे की राजनीतिक गति बनाए रखना चाहता है.

उन्होंने कहा, "राहुल गांधी ने एक दिन पहले भी यह साफ़ कर दिया कि अब उनका लक्ष्य सिर्फ़ सीईसी ज्ञानेश कुमार को हटाना नहीं है. उनका लक्ष्य रिजीम चेंज है. इसलिए वे इस मूमेंटम को मरने नहीं देना चाहेंगे. अभी वे एक के बाद दूसरी और तीसरी रैली कर सकते हैं. मगर एक बार मुद्दा संसद में डिस्कस हो गया तो फिर मामला थामना पड़ जाएगा."

दूसरी ओर, वरिष्ठ पत्रकार स्मिता गुप्ता का कहना है कि एसआईआर को लेकर संसद में चर्चा कराए जाने की बात अब दूर निकल आई है.

उन्होंने तर्क दिया कि विपक्षी गठबंधन तो ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ रिमूवल मोशन के लिए दो बार मार्च और अप्रैल में लोकसभा अध्यक्ष के पास गए थे, मगर उसे रिजेक्ट कर दिया गया. वे कहती हैं कि तब ही संसद में इस पूरे मुद्दे पर चर्चा हो सकती थी.

उधर, वरिष्ठ पत्रकार मुकेश रंजन का मानना है कि सत्ता में बनी सरकार के प्रति ऊब और बेरोजगारी-भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को लेकर परेशान युवाओं के लिए एसआईआर पर आई खोजी रिपोर्ट ने ट्रिगर का काम किया.

रामलीला मैदान में जुटी विपक्षी समर्थकों की भीड़ से बीजेपी के लिए कितनी चिंता

साल 1979 में अपने पत्रकारिता करियर को शुरू करने वाली वरिष्ठ पत्रकार स्मिता गुप्ता द हिन्दू समूह की एसोसिएट एडिटर रही हैं. एक नवंबर को रामलीला रैली के दौरान के अपने अनुभव के बारे में उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बात की.

उन्होंने कहा, "अपने पत्रकारिता के करियर में मैंने बहुत कम ऐसी रैलियां देखी हैं जिसमें इन स्तर की भीड़ जुटी. इस लिहाज से मुझे लगता है कि यह इतिहास में दर्ज ऐसी कम रैलियों में से एक होगी."

उनके शब्दों में रैली में "राजनीतिक झंडों का मेला सा दिखा."

दोनों वरिष्ठ पत्रकार स्मिता गुप्ता और नीरजा चौधरी ने रामलीला रैली में जुटी भीड़ को लेकर कहा कि इसमें सबसे बड़े पैमाने पर कांग्रेस के कार्यकर्ता जुटे.

नीरजा चौधरी कहती हैं कि यही बात बीजेपी के लिए चिंता का सबब हो सकती है. लंबे समय से कांग्रेस के बारे में माना जाता है कि जमीन पर उसका कैडर बिखर चुका है, ये रैली इस लिहाज से कुछ संकेत देती है.

वह कहती हैं कि यह भीड़ दर्शाती है कि कांग्रेस का जमीनी कार्यकर्ता अब "सत्ता की संभावना" महसूस करने लगा है.

उनके शब्दों में, "कांग्रेस का वर्कर तब एक्टिव हो जाता है जब वह जमीन पर सत्ता की महक सूंधने लगता है."

राहुल का इंडिया गठबंधन में उभरता नेतृत्व क्या चुनौती बनेगा

एक समय नरेंद्र मोदी सरकार की रणनीतियों का खुलेतौर पर समर्थन कर चुकीं वरिष्ठ पत्रकार तवलीन सिंह ने रामलीला मैदान पर हुई रैली और उसको लेकर बीजेपी की ओर संख्या को लेकर उठाए जा रहे सवालों पर टिप्पणी की.

उन्होंने एक्स पर लिखा, "जब बीजेपी के प्रवक्ता टीवी पर आकर यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि कल रामलीला मैदान में भीड़ कम थी, तो क्या उन्हें एहसास है कि वे कितने हास्यास्पद लगते हैं? विपक्ष की रैली के बाद मोदी सरकार में वास्तविक बेचैनी और घबराहट के संकेत दिख रहे हैं."

बीजेपी नेताओं की ओर से रैली को लेकर की गई आलोचनाओं पर वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी ने बीबीसी से बात करते हुए टिप्पणी की, "मैं समझता हूं कि बीजेपी के नेता परेशान तो हैं, ये तो राहुल गांधी की कामयाबी है कि उनकी रैली के जवाब में बीजेपी कारपेट बॉम्बिंग पर उतर आई."

उधर, वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी ने ख़ासतौर पर रामलीला की महारैली की तस्वीरों और मंच की राजनीतिक प्रतीकात्मकता (ऑप्टिक्स) पर जोर दिया.

उन्होंने कहा कि जिस खुली गाड़ी में बैठकर इंडिया ब्लॉक के नेता रैली करते हुए रामलीला ग्राउंड तक पहुंचे, उस गाड़ी में राहुल गांधी सबसे आगे नज़र आए.

इंडिया ब्लॉक के अन्य नेता उनके पीछे दिखाई दिए. उनके मुताबिक़ इससे यह संदेश गया कि राहुल गांधी को इंडिया गठबंधन के स्वीकार्य नेता बनते जा रहे हैं.

उनके मुताबिक पहले बीजेपी के लिए राहुल गांधी को विपक्ष का चेहरा बने रहना फायदेमंद माना जाता था, लेकिन अब स्थिति बदल रही है.

नीरजा चौधरी ने कहा कि युवा पीढ़ी, विशेषकर ज़ेन ज़ी के बीच राहुल गांधी को लेकर धारणा बदली है. उनके अनुसार: "युवा तबके का राहुल गांधी के प्रति एक सकारात्मक रिस्पॉन्स है."

उन्होंने कहा कि यही युवा वर्ग राजनीतिक माहौल में नई ऊर्जा लेकर आया है इसलिए अगर राहुल गांधी पूरे इंडिया ब्लॉक का चेहरा बनते हैं, तो यह बीजेपी के लिए पहले की तुलना में बड़ी चुनौती हो सकती है.

वे इस बात पर ज़ोर देती हैं कि ये रैली तब हुई, जबकि कॉकरोच जनता पार्टी, जिसकी युवाओं के बीच पैठ बढ़ती जा रही है, ने भले समर्थन दिया हो मगर उसके नेता रैली में सीधे शामिल नहीं हुए.

चुनाव आयोग और एसआईआर पर बीजेपी की क्या चुनौती

नीरजा चौधरी के अनुसार, बीजेपी को लगता है कि धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफ़े की तरह अब अगर विपक्ष की ताज़ा मांग मान लेती है तो उन तो विपक्ष इसके बाद दूसरी और तीसरी मांगें भी उठाता जाएगा.

उन्होंने इसके लिए यूपीए-2 का उदाहरण दिया, जहां एक के बाद एक राजनीतिक विवादों और इस्तीफ़ों ने अंततः सरकार को भारी नुकसान पहुंचाया था.

साथ ही उनका कहना है कि चुनावी सूची (इलेक्टोरल रोल) की विश्वसनीयता केंद्रीय प्रश्न है.

उन्होंने कहा कि "मुख्य सवाल यह है कि क्या अगले लोकसभा चुनाव से पहले वोटर सूची की विश्वसनीयता बहाल हो पाएगी?"

उनका तर्क था कि अगर चुनावी सूची की प्रमाणिकता पर सवाल बने रहते हैं, तो भविष्य के चुनाव परिणामों की वैधता पर भी राजनीतिक विवाद खड़े हो सकते हैं. ऐसे में बीजेपी को इस पर अपना रुख़ नरम करना होगा.

उन्होंने यह भी कहा कि हाल में सुप्रीम कोर्ट में एसआईआर पर चुनाव आयोग से मांगे गए स्पष्टीकरण के बाद कई ऐसे बदलाव देखने को मिले हैं, जिसके लिए आयोग पहले तैयार नहीं था.

जब उनसे पूछा गया कि आयोग के कदमों को क्या सरकार की सोच से जोड़कर देखा जाना चाहिए, तो उन्होंने कहा कि "ऐसा मानने के कारण मौजूद हैं क्योंकि सरकार शुरू से ही चुनाव आयोग के बचाव में मजबूती से खड़ी दिखाई दी है."

दूसरी ओर, विजय त्रिवेदी का मानना है कि नरेंद्र मोदी नेतृत्व वाली केंद्र सरकार एसआईआर मामले पर अपनी हालिया रणनीति को सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आने तक बनाए रखेगी.

बीजेपी की जवाबी रणनीति- विकास और विपक्ष को अराजकतावादी साबित करना

वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार मुकेश रंजन ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा कि बीजेपी की जवाबी राजनीति मुख्य रूप से दो स्तंभों पर खड़ी होगी:

जनकल्याण और विकास का नैरेटिव और विपक्ष को एंटी डेमोक्रेटिक साबित करना.

उन्होंने कहा कि बीती 31 अक्तूबर को गुजरात में भाषण देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विकास, गरीबी उन्मूलन और "कंस्ट्रक्टिव पॉलिटिक्स" पर जोर दिया. इसी दिन विपक्षी दलों ने मॉक संसद आयोजित की थी.

वे कहते हैं कि बीजेपी यही संदेश देगी कि विपक्ष आरोप लगा रहा है, जबकि सरकार विकास और कल्याण पर काम कर रही है.

रंजन का कहना है बीजेपी विपक्ष के आरोपों को सिर्फ खारिज नहीं करेगी, बल्कि पलटकर यह नैरेटिव बनाने की कोशिश करेगी कि विपक्ष लोकतांत्रिक संस्थाओं को बदनाम कर रहा है.

उनके शब्दों में, बीजेपी "रेजीम चेंज", बांग्लादेश जैसी तुलना और चुनाव आयोग पर हमलों को मुद्दा बनाकर यह प्रचार करेगी कि विपक्ष संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं का सम्मान नहीं करता.

साथ ही वह कहते हैं कि हाल में जारी बीजेपी की "लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ" पदयात्राएं और रैलियां इसी रणनीति का हिस्सा है.

उन्होंने कहा, "मोदी ने 2024 में अबकी बार 400 पार का नारा दिया, जिससे विपक्ष ने आरोप लगाए कि अगर इतनी सीटें आ गईं तो ये संविधान बदल देंगे, आरक्षण खत्म कर देंगे. ये बहुत बड़ा डैमेज हुआ. उसको काउंटर करने के लिए अब बीजेपी पहले के मुकाबले काफी ज़्यादा प्रो- रिजर्वेशन और प्रो-ओबीसी दिखती है. वो संविधान की सुरक्षा से जुड़े दावे करती है."

बीजेपी के इतिहास से क्या सीख?

रंजन ने बीजेपी और जनसंघ के इतिहास का हवाला देते हुए कहा कि यह पार्टी चुनावी सफलता और संगठनात्मक क्षमता को सबसे अधिक महत्व देती है.

उन्होंने कहा कि हर दौर में ये अलग तरह की पार्टी रही, वाजपेयी के दौर की बीजेपी अलग थी और मोदी-शाह के दौर की बीजेपी एकदम अलग है. मगर वे कहते हैं कि बीजेपी में नेतृत्व भले स्थायी दिख रहा हो मगर स्थायी होता नहीं है.

उन्होंने इसके लिए बलराज मधोक, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और बाद में नरेंद्र मोदी के उभार का उदाहरण दिया.

वे बोले, "बलराज मधोक कभी जनसंघ के सर्वाधिक प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते थे. 1975 से पहले वे एक तरह से पार्टी के सबसे बड़े नेता थे."

"लेकिन बलराज मधोक जनसंघ के जनता पार्टी में विलय के फैसले के खिलाफ थे, जबकि अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी इसके पक्ष में थे. अंततः उन्हें किनारे कर दिया गया और जनसंघ का जनता पार्टी में विलय हो गया."

"बाद में जब बीजेपी बनी तो अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी उसके मुख्य स्तंभ बनकर उभरे और लंबे समय तक पार्टी का नेतृत्व करते रहे."

"फिर 2012-13 के आसपास राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी का उभार हुआ. उस दौर में आडवाणी ने अपनी असहमति जताने की कोशिश की, चिट्ठियाँ लिखीं और व्यंग्य भी किए, लेकिन वे उस बदलाव को रोक नहीं सके. अंततः पार्टी का नेतृत्व नए केंद्र के इर्द-गिर्द संगठित हो गया. मतलब यह है कि समय के साथ परिस्थितियाँ बदलती हैं और बीजेपी में नए नेतृत्व का उभार भी होता है."

उनका तर्क था कि बीजेपी का इतिहास बताता है कि पार्टी वैचारिक होने के साथ-साथ बेहद व्यावहारिक भी है और चुनावी नतीजों के आधार पर नेतृत्व और रणनीति में बड़े बदलाव करने से नहीं हिचकती.

मुकेश रंजन के अनुसार, बीजेपी के लिए सबसे बड़ा "लिटमस टेस्ट" 2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव होगा.

उनका मानना है कि फ़िलहाल बीजेपी अपेक्षाकृत सहज स्थिति में है, लेकिन अगर विपक्ष एसआईआर और उससे जुड़े असंतोष को बेरोज़गारी, महंगाई और शासन-विरोधी भावना से जोड़ने में सफल हो जाता है, तो यूपी चुनाव से पार्टी के सामने गंभीर राजनीतिक चुनौती खड़ी हो सकती है.

इन चुनौतियों से निपटने के लिए क्या दखल देगा संघ

बीजेपी को विपक्षी दलों की ओर से मिल रही चुनौती को मोदी नेतृत्व के 12 साल के दौरान की सबसे प्रमुख चुनौतियों में से एक माना जा रहा है. ऐसे में क्या इस स्थिति से बीजेपी को उबारने के लिए संघ क्या दखल देगा?

संघ की राजनीति पर करीबी से नज़र रखने वाले वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक विजय त्रिवेदी ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "दो से चार नवंबर तक इंदौर में संघ अपनी अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक कर रहा है. इसमें ज़रूर इस मुद्दे पर भी चर्चा हो सकती है."

वहीं, नीरजा चौधरी का आरएसएस के बारे में कहना है कि आने वाले समय में यह देखने वाली बात होगी कि संगठन कोई मध्यस्थ या संवादकारी भूमिका निभाता है या नहीं.

उन्होंने कहा कि आरएसएस पहले भी युवाओं से संवाद की बात करता रहा है. युवा आंदोलन के बाद एक जे़न ज़ी संवाद के दौरान संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था कि ये सवाल पूछने वाली पीढ़ी है और इससे संवाद होना चाहिए.

वे कहती हैं कि मौजूदा स्थिति में टकराव कम करने और माहौल को शांत करने की कोशिश हो सकती है.

दूसरी ओर, मुकेश रंजन का कहना है कि संघ यूपी चुनाव के रिजल्ट के आधार पर अपने कदम आगे बढ़ाएगा. उनका कहना है कि "अगर वहां कुछ विपरीत परिस्थितियां बनीं तो आरएसएस 2029 के चुनाव के लिए अपने स्तर पर सक्रिय हो जाएगा और उसके शुरूआती प्रयोग यूपी में देखने को मिल सकते हैं. "

विपक्ष की रैलियों के जवाब में सड़क पर उतरी बीजेपी

इंडिया गठबंधन की रैलियों और चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्ष के हमलों के जवाब में बीजेपी ने "लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ" अभियान शुरू किया है.

एक नवंबर को दिल्ली में 1984 के सिख विरोधी दंगों की बरसी पर हरि नगर से तिलक नगर तक बीजेपी ने पदयात्रा निकाली. इसी दिन रोहतक और फ़रीदाबाद में भी आउटरीच कार्यक्रम किए.

2 नवंबर को गृहमंत्री अमित शाह हैदराबाद में लोकतंत्र बचाओ महापदयात्रा कर रहे हैं.

बीजेपी ने इस अभियान की शुरुआत 28 अक्तूबर को दिल्ली के चांदनी चौक से की थी.

बीजेपी ने आने वाले दिनों के कार्यक्रमों का भी ऐलान कर दिया है.

इसके बाद 4 नवंबर को चंडीगढ़ में "जख्म 84 दे" नाम से विशेष सिख सम्मेलन आयोजित किया जाएगा.

बीजेपी इस कार्यक्रम के जरिए 1984 के दंगों के मुद्दे को राजनीतिक और सामाजिक विमर्श में बनाए रखना चाहती है.

बीजेपी की रणनीति से साफ़ है कि वह विशेष रूप से उत्तर प्रदेश और पंजाब पर ध्यान केंद्रित कर रही है.

वहीं, उत्तर प्रदेश में बीजेपी ने 3 से 5 नवंबर के बीच छह बड़ी पदयात्राओं का कार्यक्रम बनाया है.

लखनऊ, बरेली, गोरखपुर, प्रयागराज, कानपुर और गाजियाबाद में होने वाली इन यात्राओं का नेतृत्व जेपी नड्डा, शिवराज सिंह चौहान, नितिन नवीन, केशव प्रसाद मौर्य, ब्रजेश पाठक और योगी आदित्यनाथ जैसे वरिष्ठ नेता करेंगे.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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