आप इस वेबसाइट का टेक्स्ट-ओनली वर्शन देख रहे हैं जो कम डेटा खर्च करता है. सभी तस्वीरों और वीडियो के साथ वेबसाइट का मुख्य वर्शन देखें.
रामलीला मैदान: कांग्रेस को क्या मिला, विपक्षी एकता की राह में क्या हैं चुनौतियां?
सुबह दस बजे मिंटो ब्रिज के पास ट्रैफ़िक सामान्य चल रहा था. कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों के कार्यकर्ता जुटना शुरू हो रहे थे.
उस वक़्त ये अंदाज़ा लगाना मुश्किल था कि दोपहर होते-होते ये संख्या इतनी बढ़ जाएगी.
हालांकि, एक बात स्पष्ट थी, पिछले प्रदर्शनों की तुलना में इस बार समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता अधिक संख्या में दिख रहे थे. ये सिर्फ़ दिल्ली के पास के पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ज़िलों से ही नहीं बल्कि पूर्वी यूपी के दूर-दूर के ज़िलों से आए थे.
कांग्रेस के नेतृत्व में हुई विपक्ष की इस महारैली में देश के कोने-कोने से कांग्रेस के कार्यकर्ता भी पहुंचे.
गुजरात से आए कांग्रेस कार्यकर्ता शहज़ाद ख़ान ने बीबीसी से कहा, "सिर्फ़ कांग्रेस कार्यकर्ता ही नहीं, बल्कि आम लोग भी बड़ी तादाद में इस महारैली में शामिल हो रहे हैं."
हालांकि, मिंटो रोड के पास बढ़ता हुआ हुजूम राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं का ही था.
भीड़ के बीच रामलीला मैदान पहुंचना मुश्किल हुआ
दोपहर क़रीब एक-डेढ़ बजे राहुल गांधी खुली बस में सवार हो मिंटो ब्रिज के नीचे से गुज़रे. अखिलेश यादव भी उनके साथ इसी बस में थे.
कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता बस के क़रीब पहुंच अपने नेताओं को चेहरा दिखाने की जद्दोजहद कर रहे थे.
कई हाथों में पोस्टर थे जिन पर भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का चेहरा था.
कार्यकर्ता ज्ञानेश कुमार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा हमला करते हुए नारेबाज़ी कर रहे थे.
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में कथित अनियमितताओं के विरोध में आयोजित इस रैली में देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग पहुंचे थे.
रामलीला मैदान के आसपास की सड़कों पर भीड़ थी. मैदान के भीतर जाने के रास्तों पर भी लोगों की आवाजाही लगातार बनी हुई थी.
भीड़ इतनी ज़्यादा थी कि हमें मैदान के भीतर पहुंचने के लिए काफ़ी मशक्कत करनी पड़ी.
इस रैली में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल और इंडिया गठबंधन के दूसरे सहयोगी दलों के कार्यकर्ता शामिल थे.
लेकिन यहां मौजूद लोगों की चिंता सिर्फ़ राजनीतिक दलों के समर्थन तक सीमित नहीं थी.
कई लोग चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और अपने वोट के अधिकार को लेकर सवाल उठा रहे थे.
रैली में शामिल एक सॉफ़्टवेयर इंजीनियर ने कहा कि वह किसी राजनीतिक दल से जुड़ी नहीं हैं, लेकिन उनके लिए यह मुद्दा बेहद गंभीर है.
उन्होंने कहा, "मैं एक सॉफ़्टवेयर इंजीनियर हूं, मैं किसी भी पार्टी से नहीं जुड़ी हूं. लेकिन मुझे पता है यह मुद्दा बहुत ही ज़्यादा गंभीर है. वोट चोरी अगर हुई है तो इससे बड़ा कोई मुद्दा नहीं हो सकता."
बिहार से आए एक प्रदर्शनकारी ने कहा कि वह यहां ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग और संविधान की रक्षा के लिए पहुंचे हैं.
रैली में मौजूद अधिकतर लोग एक ही सुर में बात कर रहे थे. हर किसी की जुबान पर कथित वोट चोरी का मुद्दा था.
भीड़ से इंडिया गठबंधन को क्या हासिल हुआ?
इस जुटान के साथ कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग पर अपना विरोध दर्ज कराया. लेकिन रैली से पार्टी को मिले राजनीतिक बल और उसके आगे के चुनावी असर को लेकर दो वरिष्ठ पत्रकारों की राय अलग है. उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी के सहयोगी संवाददाता दुष्यंत कुमार से बात की.
वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता का आकलन है कि सड़कें और मैदान भरे दिखाई दिए और विपक्ष सरकार के ख़िलाफ़ संदेश देने में सफल रहा.
कांग्रेस ने अपने कार्यकर्ताओं के साथ स्टूडेंट्स और सामाजिक संगठनों से भी रैली में शामिल होने की अपील की थी. वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता इसी संदर्भ में आयोजन को अहम मानते हैं.
उनके मुताबिक़, विपक्ष ने सरकार को यह संदेश दिया है कि वह अपनी शिकायतों को लेकर सार्वजनिक विरोध जारी रखेगा.
उनका कहना है कि जो विपक्ष सदन के भीतर अपनी मांग आगे नहीं बढ़ा पा रहा था, उसने इस आयोजन के ज़रिए उसे लोगों के बीच रखा. वह इसे विपक्षी राजनीति को मिले बल के तौर पर देखते हैं.
लेकिन इस जुटान को लेकर वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह का सवाल अलग है.
उनके मुताबिक़, विपक्ष की रैलियों में पहले भी भीड़ आती रही है. असली परीक्षा यह है कि उस भीड़ के बाद दलों का तालमेल कैसे आगे बढ़ता है और कांग्रेस अपनी स्थिति कितनी मज़बूत कर पाती है?
रैली में मिला समर्थन क्या राजनीतिक विकल्प बन सकेगा?
वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह के मुताबिक़, सत्ता से नाराज़ होना और किसी दूसरी पार्टी को उसका विकल्प स्वीकार करना अलग बातें हैं. मतदाता यह भी देखता है कि जिस काम को लेकर उसे शिकायत है, क्या दूसरा दल वह काम कर सकता है.
उन्होंने कहा, "नाराज़ मतदाता के सामने यह सवाल रहता है कि वह जिस सरकार से असंतुष्ट है, उसकी जगह किस पर भरोसा करे? रैली उस नाराज़गी को आवाज़ दे सकती है, लेकिन विकल्प का भरोसा भी बनाना उतना ही अहम है."
उनकी राय में सरकार के ख़िलाफ़ गुस्सा कांग्रेस के लिए तभी उपयोगी होगा, जब लोग उसे विकल्प के तौर पर देखने लगें. इसके लिए कांग्रेस को अपनी राजनीतिक और संगठनात्मक ताक़त बढ़ानी होगी. केवल रैली होने या नेताओं के साथ आ जाने से यह काम पूरा नहीं होता.
हालांकि वह यह भी कहते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी का विकल्प देने में कांग्रेस की भूमिका महत्वपूर्ण है.
उनके मुताबिक़, अलग-अलग दलों को साथ लेकर पांच साल की स्थिर सरकार देने के लिए बीजेपी या कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दल की छतरी ज़रूरी है.
इसीलिए वह उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल का ज़िक्र करते हैं. उनकी राय में इन राज्यों में कांग्रेस की मज़बूत स्थिति के बिना बीजेपी के सामने राष्ट्रीय चुनौती खड़ी करना मुश्किल होगा.
उनका मानना है कि कांग्रेस सहयोगियों पर निर्भर रहने के बजाय गठबंधन को दिशा देने की ताक़त हासिल करे. उनके तर्क में कांग्रेस की राष्ट्रीय भूमिका और राज्यों में उसकी अपनी स्थिति एक-दूसरे से जुड़ी हैं.
उन्होंने कहा, "कांग्रेस के सामने सवाल दोहरा है. उसे सरकार के ख़िलाफ़ असंतोष को आवाज़ देनी है और साथ ही यह भरोसा भी बनाना है कि वह सरकार का विकल्प बन सकती है."
मंच की एकता चुनाव में कितनी टिकेगी?
रामलीला मैदान की रैली पर इंडिया गठबंधन के बैनर तले कई छोटे-बड़े घटक दल एकसाथ आए. इसमें सिर्फ़ आम आदमी पार्टी मौजूद नहीं थी जो पंजाब में अपनी सत्ता बचाने के लिए जल्द ही चुनाव में होगी.
ऐसे में मंच पर इन घटक दलों के बीच दिखी एकता क्या चुनाव में टिक सकेगी? ऐसा तब जबकि यूपी में चुनाव के बीच सपा और कांग्रेस के बीच सीटों के बंटबारे को लेकर सहमति न बन पाने की ख़बरें आती रही हैं?
इस पर वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह कहते हैं कि क्षेत्रीय दल मंच से उतरने के बाद अपने राज्य और राजनीतिक हितों का हिसाब देखते हैं.
किसी साझा मुद्दे पर साथ आना उनके लिए चुनाव में सीटें छोड़ने या दूसरे दल का नेतृत्व स्वीकार करने जितना मुश्किल नहीं होता.
वह इस बात पर ज़ोर देते हैं कि नेताओं के आपस में मिलने से उनके वोटर अपने आप नहीं मिल जाते. इसलिए विपक्ष की एकता को केवल मंच पर मौजूद चेहरों से नहीं, राज्यों में समझौतों और चुनावी तालमेल से भी परखना होगा.
वे कहते हैं कि चुनावी तालमेल का एक उदाहरण उत्तर प्रदेश में मिल चुका है. उन्होंने कहा, "कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए सीटों का समझौता किया था. उसके तहत कांग्रेस के हिस्से 17 सीटें आई थीं. लेकिन लोकसभा चुनाव का यह समझौता आने वाले यूपी विधानसभा चुनाव में सीटों का बंटवारा तय नहीं करता."
वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह को आगे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच सीटों पर आसान सहमति की उम्मीद नहीं दिखती. उनका मुख्य सवाल है कि अपने राज्य में मज़बूत दल कांग्रेस के लिए कितनी जगह छोड़ेंगे.
इसके उलट वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता कहते हैं कि जिन राज्यों में क्षेत्रीय दल मज़बूत हैं, वहां राष्ट्रीय दल को उनके साथ तालमेल करना पड़ेगा.
उनकी राय में किसी राज्य में छोटी भूमिका स्वीकार करने का अर्थ यह नहीं कि राष्ट्रीय दल आगे कभी अपनी स्थिति मज़बूत नहीं कर सकता.
वह बीजेपी का उदाहरण देते हैं, जो कुछ राज्यों में सहयोगियों से छोटी भूमिका में रही और बाद में बड़ी पार्टी बनी.
वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता 2004 में केंद्र से बीजेपी की सरकार जाने और 2014 में उसके सत्ता में लौटने का संदर्भ भी देते हैं.
उनके तर्क में किसी दल का एक समय कमज़ोर दिखाई देना उसकी राजनीतिक संभावनाएं हमेशा के लिए समाप्त नहीं करता.
महाराष्ट्र में बीजेपी और शिवसेना के रिश्तों में भी ताक़त का संतुलन बदला था. लंबे समय तक शिवसेना की बड़ी भूमिका रही, जबकि 2014 के विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी.
वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता का तर्क है कि राजनीति में दलों की ताक़त और उनके रिश्ते बदलते हैं. इसलिए आज कांग्रेस के किसी राज्य में कमज़ोर होने को उसके भविष्य की स्थायी स्थिति नहीं मानना चाहिए.
सीईसी ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की साझा मांग से साझा कार्यक्रम तक
रामलीला मैदान में विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त के ख़िलाफ़ साझा मांग पर एक साथ दिखाई दिए. लेकिन क्या ऐसी किसी साझा मांग और इन दलों के बीच एक कॉमन मिनिमम प्रोग्राम पर सहमति एक ही बात है?
वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता राजनीतिक मतभेदों को गठबंधन की संभावना समाप्त होने का प्रमाण नहीं मानते.
उनके मुताबिक़, राज्य में प्रतिस्पर्धा रखने वाले दल राष्ट्रीय मुद्दों पर साथ आ सकते हैं. वह आज के आयोजन में ऐसे मुद्दों पर सहमति की संभावना देखते हैं.
उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र के दो चुनाव इन रिश्तों के अलग रूप दिखाते हैं.
"बीजेपी और शिवसेना 2014 का विधानसभा चुनाव अलग लड़े थे. 2019 में दोनों साथ लड़े, लेकिन मुख्यमंत्री पद को लेकर चुनाव के बाद उनका गठबंधन टूट गया."
चुनाव से पहले की साझेदारी भी सरकार बनने तक अलग मोड़ ले सकती है. कांग्रेस और उसके सहयोगियों के सामने अपने साझा विरोध को आगे के राजनीतिक तालमेल से जोड़ने का सवाल है.
वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता के मुताबिक़, इसके लिए राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मुद्दों के बीच सहमति बनानी होगी. जबकि वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह के आकलन में ऐसी सहमति में कांग्रेस की भूमिका तभी बढ़ेगी, जब उसकी अपनी ताक़त बढ़े.
मंच से क्या कहा गया?
रैली में दिखी एकता के बीच विपक्षी नेताओं के भाषणों में चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और मतदाता सूची के पुनरीक्षण का मुद्दा प्रमुखता से उठा.
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने मंच से कहा, "हम लोकतंत्र को हिंदुस्तान में ख़त्म नहीं होने देंगे."
राहुल गांधी ने चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए इसे वोट चोरी का मुद्दा बताया. विपक्ष का कहना है कि मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं की वजह से चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है.
उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधा.
उन्होंने कहा, "भारतीय जनता पार्टी अब देश के सामने झूठ नहीं बोल पाएगी. देश की जनता दोनों को समझ गई है. अब भारतीय जनता पार्टी हारने वाली पार्टी है."
बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बात करते हुए अखिलेश यादव ने कहा, "भाजपा उत्तर प्रदेश के रास्ते ही देश की सत्ता में आई थी अब यूपी के रास्ते ही बाहर होगी."
मंच से राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी को चुनौती देने की बात कही जा रही थी. वहीं, अखिलेश यादव के बयान में उत्तर प्रदेश की भूमिका पर ज़ोर था. कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के रिश्ते को लेकर दोनों वरिष्ठ पत्रकारों के अलग आकलन इसी सवाल से जुड़ते हैं कि राष्ट्रीय चुनौती में राज्यों का राजनीतिक तालमेल क्या होगा.
वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता के मुताबिक़, गठबंधन को अपना एजेंडा बनाना होगा. उसमें क्षेत्रीय पार्टियों के अपने मुद्दे भी होंगे और राष्ट्रीय विषयों पर साझा सहमति भी.
वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह की नज़र में कांग्रेस की भूमिका तभी मज़बूत होगी, जब वह राज्यों में अपनी ताक़त बढ़ाएगी.
एसआईआर की मांग से आगे का सवाल
इंडिया गठबंधन की इस रैली का मुख्य मुद्दा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन था.
विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान अनियमितताएं हुई हैं और इससे चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं.
यह विरोध प्रदर्शन दो अक्टूबर को शुरू हुआ था. इसके बाद 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट तक रैली निकाली गई. एक नवंबर को रामलीला मैदान में हुई महारैली के साथ यह आंदोलन एक बड़े राजनीतिक प्रदर्शन के रूप में सामने आया.
विपक्षी दल इसे लोकतंत्र और संविधान की रक्षा की लड़ाई बता रहे हैं. कुछ नेताओं ने इसे "दूसरी आज़ादी का आंदोलन" भी कहा है.
इससे एक दिन पहले कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर सांकेतिक संसद में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग वाला प्रस्ताव पारित किया था. रविवार को उसी मांग को लेकर नेता और कार्यकर्ता रामलीला मैदान में जुटे.
वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता का आकलन है कि विपक्ष एसआईआर को लेकर अपनी शिकायतों का संदेश लोगों तक पहुंचाने में कामयाब रहा है. वह बीजेपी नेताओं की प्रतिक्रियाओं को इस अभियान को लेकर उनकी चिंता से जोड़कर देखते हैं.
शरद गुप्ता के मुताबिक़, कांग्रेस और राहुल गांधी इस मुद्दे पर लगातार सक्रिय हैं और इससे विपक्षी राजनीति को बल मिला है. हालांकि, आगे का राजनीतिक असर चुनावी नतीजों से भी परखा जाएगा.
इसी सवाल में वह एक उलझन भी बताते हैं.
गुप्ता कहते हैं कि विपक्ष चुनाव निष्पक्ष नहीं होने का आरोप लगा रहा है. ऐसे में वह उन्हीं चुनावों के नतीजों को अपने समर्थन की कसौटी मानने पर भी सवाल उठाता है.
दूसरी ओर, वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह का ज़ोर कांग्रेस का एक विकल्प बनने पर है.
उनके मुताबिक़, सरकार से नाराज़ लोगों को यह भरोसा होना चाहिए कि कांग्रेस और उसके सहयोगी उनकी शिकायतों का जवाब दे सकते हैं. इसलिए उनके लिए रैली के बाद की राजनीतिक और संगठनात्मक तैयारी महत्वपूर्ण है.
आरोपों पर चुनाव आयोग और बीजेपी का रुख़
वोटर लिस्ट और चुनावी प्रक्रिया पर विपक्ष के आरोपों को चुनाव आयोग और बीजेपी लगातार ख़ारिज करते रहे हैं.
चुनाव आयोग ने 26 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में दिए जवाब में कहा था कि एसआईआर से जुड़े तीनों आदेश सभी तीन सदस्यों की सहमति से जारी हुए थे. आयोग का कहना था कि किसी आयुक्त का सवाल या सुझाव अपने आप में अंतिम फ़ैसला नहीं होता.
आयोग ने फ़ॉर्म 6 में बदलाव का आरोप भी ख़ारिज किया था. उसके मुताबिक़, एसआईआर के लिए अतिरिक्त घोषणा अलग दस्तावेज़ है. संबंधित निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी के आदेश के बिना किसी नाम को जोड़ा, हटाया या बदला नहीं जाता.
बीजेपी विपक्ष के अभियान पर सवाल उठा रही है. गृह मंत्री अमित शाह ने रविवार को चंडीगढ़ में राहुल गांधी पर एक नवंबर की तारीख़ चुनकर 1984 के सिख विरोधी दंगों के पीड़ितों के घावों पर नमक छिड़कने का आरोप लगाया. उन्होंने विपक्ष पर अराजकता पैदा करने, ग़लत जानकारी फैलाने और संसद की कार्यवाही बाधित करने के आरोप भी लगाए.
रैली के बाद क्या सवाल रह गया?
gरामलीला मैदान में जुटे लोगों के लिए यह रैली अपने वोट के अधिकार और लोकतंत्र की रक्षा की चिंता ज़ाहिर करने का एक मौका थी. विपक्ष इसे एक बड़े आंदोलन का रूप देने की कोशिश कर रहा है.
वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता इसे विपक्ष की मौजूदगी और सक्रियता के लिहाज से महत्वपूर्ण मानते हैं.
वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह की कसौटी पर कांग्रेस का अगला काम अपनी ताक़त बढ़ाना और गठबंधन को चुनावी विकल्प बनाना है.
रामलीला मैदान के आसपास लोग इस रैली में आई भीड़ का अंदाज़ा लगाने की कोशिश कर रहे थे. कई पत्रकार भी इसी पर चर्चा कर रहे थे.
अधिकतर का यह मानना था कि उन्होंने हाल के सालों में राजनीतिक रैली में इतनी भीड़ नहीं देखी है.
राहुल गांधी का भाषण ख़त्म होते ही रैली समाप्त हो गई और रामलीला मैदान अगले कुछ मिनटों में खाली हो गया.
पीछे ये सवाल रह गया कि क्या विपक्ष वोट चोरी को चुनावी जीत तक पहुंचाने वाला मुद्दा बनाने में कामयाब रहेगा?
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें
BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह
कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.