ब्रिटेन के महंगे स्कूलों को भारत में क्यों दिख रहा है बड़ा मौक़ा?

    • Author, निखिल इनामदार
    • पदनाम, मुंबई
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 9 मिनट

इस साल की शुरुआत में पंजाब में, चंडीगढ़ के पास लड़कियों के लिए एक नया इंटरनेशनल स्कूल खुला.

ये कैंपस ब्रिटेन के 473 साल पुराने एक नामी स्कूल ने खोला है. लड़कियों के लिए यह उसका पहला इंटरनेशनल कैंपस है.

इंग्लैंड के बेडफ़र्डशर में मौजूद इस स्कूल की मुख्य इमारत गोथिक शैली में बनी है और दूर से ही लोगों का ध्यान खींचती है.

भारत में बना इसका कैंपस इससे अलग और आधुनिक है. यहां पढ़ाई की ज़रूरतों को ध्यान में रखकर अलग-अलग इमारतें बनाई गई हैं.

हालांकि, लाल ईंटों से बना ऊंचा क्लॉक टावर यहां भी साफ़ दिखाई देता है. यह स्कूल की ब्रिटिश विरासत की पहचान है.

भारत आने वाले ब्रिटिश स्कूल

बेडफ़र्ड स्कूल, मोहाली उन कम से कम छह ब्रिटिश पब्लिक स्कूलों में सबसे नया है, जिन्होंने भारत के अलग-अलग हिस्सों में अपने कैंपस खोले हैं.

ब्रिटेन में 'पब्लिक स्कूल' का मतलब लंबे इतिहास वाले ऐसे नामी निजी स्कूलों से है, जहां पढ़ाई के लिए फ़ीस ली जाती है.

भारत आने वाले इन स्कूलों में ब्रिटेन के तीन सबसे पुराने स्कूल भी शामिल हैं.

इन स्कूलों का भारत में विस्तार ऐसे समय हो रहा है, जब चीन में बाज़ार के हालात पहले से मुश्किल हो गए हैं.

इसके साथ ही ब्रिटेन में एक जनवरी 2025 से निजी स्कूलों की फ़ीस पर वैट भी लगा दिया गया है.

ब्रिटेन के मशहूर हैरो स्कूल ने साल 2023 में बेंगलुरु में अपना कैंपस खोला. बेंगलुरु, भारत की सिलिकॉन वैली है. भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ब्रिटेन में मौजूद इसी स्कूल में पढ़ाई की थी.

दूसरे ब्रिटिश स्कूल भी भारत के अलग-अलग शहरों में पहुंच रहे हैं.

क्वीन एलिज़ाबेथ्स स्कूल ने इस साल अगस्त में दिल्ली के पास गुरुग्राम में अपना कैंपस खोला. वहीं, श्रूज़बरी स्कूल ने भोपाल में अपना कैंपस बनाया है.

वेलिंगटन कॉलेज ने पुणे को चुना है. अपने जाने-माने विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के कारण पुणे ख़ुद को 'पूरब का ऑक्सफ़र्ड' कहता है.

ख़बरों के मुताबिक़, मिलफ़ील्ड और कुछ दूसरे ब्रिटिश स्कूल भी आने वाले सालों में भारत में अपने कैंपस खोलने की तैयारी कर रहे हैं.

भारत में पहले से चल रहे ब्रिटिश शैली के बोर्डिंग स्कूल

भारत में कई दशकों से ऐसे जाने-माने स्थानीय बोर्डिंग स्कूल मौजूद हैं, जिन्हें अंग्रेज़ों के शासन के समय के ब्रिटिश पब्लिक स्कूलों की तर्ज़ पर बनाया गया था.

इन स्कूलों में आम तौर पर अमीर और पुराने रईस परिवारों के बच्चे पढ़ते रहे हैं.

लेकिन भारत में नए अमीर परिवारों की संख्या बढ़ने के साथ यह बाज़ार भी तेज़ी से फैला है.

ये परिवार चाहते हैं कि उनके बच्चों को दुनिया से जुड़ने और उसे समझने का ज़्यादा मौक़ा मिले.

बेंगलुरु के हैरो स्कूल की प्रमुख कैरोलिन पास्को ने बीबीसी से कहा, "हमारा अंतरराष्ट्रीय पाठ्यक्रम बहुत से परिवारों को हमारी ओर खींचता है."

भारत में हैरो और बेडफ़र्ड उन गिने-चुने स्कूलों में शामिल हैं, जहां प्राइमरी कक्षाओं से लेकर ए-लेवल तक पूरा कैंब्रिज पाठ्यक्रम पढ़ाया जाता है.

यह दुनिया भर में मान्यता प्राप्त शिक्षा व्यवस्था है. क़रीब 10 हज़ार स्कूलों में इसे अपनाया गया है.

'बच्चों के चरित्र और आत्मविश्वास पर भी ध्यान'

हरसिमरन सिंह कोचर के परिवार के लोग ख़ुद भारत में स्कूलों की एक शृंखला चलाते हैं.

इसके बावजूद उन्होंने अपनी पांच साल की बेटी परिणीत को बेडफ़र्ड मोहाली में भेजने का फ़ैसला किया.

उनका कहना है कि इस स्कूल में केवल पढ़ाई पर ध्यान नहीं दिया जाता.

यहां बच्चों के चरित्र, आत्मविश्वास और पूरे व्यक्तित्व को बेहतर बनाने पर भी ज़ोर दिया जाता है. यही बात उन्हें सबसे ज़्यादा पसंद आई.

उन्हें यह भी अच्छा लगा कि कई भारतीय स्कूलों के उलट यहां 'वीआईपी संस्कृति' नहीं है.

सिंह कहते हैं, "सभी बच्चों के साथ एक जैसा व्यवहार किया जाता है. मंत्रियों और नौकरशाहों के बच्चों को ज़्यादा सुविधाएं नहीं मिलतीं."

विदेश में रहने वाले भारतीय भी बड़ा बाज़ार

पास्को का कहना है कि भारत के अमीर परिवारों के अलावा विदेशों में रहने वाले भारतीय भी इन स्कूलों के लिए एक बड़ा बाज़ार हैं.

इनमें ऐसे भारतीय शामिल हैं, जो लंबे समय तक विदेश में रहने के बाद भारत लौट आए हैं.

ब्रिटेन या मध्य पूर्व में रहने वाले ऐसे भारतीय भी हैं, जो चाहते हैं कि उनके बच्चे अपनी जड़ों से जुड़े रहें.

बेंगलुरु के हैरो स्कूल में 60 फ़ीसदी कर्मचारी विदेश से आए हैं.

दूसरे ब्रिटिश स्कूलों की तरह हैरो भी अपनी ख़ास परंपराओं को बेंगलुरु के कैंपस में लेकर आया है.

यहां शिक्षकों को 'बीक्स' कहा जाता है.

विद्यार्थी हैरो की पारंपरिक टोपी और यूनिफ़ॉर्म पहनते हैं.

वे 'द लॉन्ग डकर' नाम की लंबी दूरी की दौड़ में भी हिस्सा लेते हैं. दुनिया भर में मौजूद हैरो के स्कूलों में यह दौड़ आयोजित की जाती है.

यहां 'हाउस सिस्टम' भी है. यह ब्रिटेन की पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था की एक ख़ास पहचान है.

ब्रिटेन के किसी ख़ास इलाक़े से जुड़ी लगने वाली इन परंपराओं को भारत के स्थानीय रीति-रिवाजों के साथ मिलाया गया है.

मिसाल के लिए, यहां हर सुबह भारत का राष्ट्रगान गाया जाता है. हिंदुओं का प्रमुख त्योहार गणेश चतुर्थी भी मनाया जाता है.

चीन में मुश्किलें बढ़ीं तो भारत पर नज़र

भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था और नए करोड़पतियों की बढ़ती संख्या इन स्कूलों के विस्तार में मदद कर रही है.

लेकिन इसके पीछे चीन में आई सुस्ती भी एक वजह है.

पिछले एक दशक में ब्रिटेन के पब्लिक स्कूलों ने विदेशों में जो विस्तार किया, उसका बड़ा हिस्सा चीन और हांगकांग में हुआ था.

ब्रिटेन के 50 स्कूल विदेश में कुल 151 कैंपस चलाते हैं. इनमें से आधे चीन और हांगकांग में हैं.

लेकिन नियमों में बदलाव के बाद वहां इन स्कूलों का विस्तार धीमा पड़ गया है.

ब्रिटेन के थिंक टैंक प्राइवेट एजुकेशन पॉलिसी फ़ोरम यानी पीईपीएफ़ ने 2025 में इस बारे में एक अध्ययन किया था.

इसके मुताबिक़, अलग-अलग देशों की सरकारों ने इन स्कूलों पर निगरानी बढ़ा दी है. कुछ जगहों पर इनका विरोध भी हुआ है.

चीन में 2024 में एक नया क़ानून लागू हुआ था. इसके तहत स्कूलों के लिए हर विषय में देशभक्ति की शिक्षा को शामिल करना ज़रूरी कर दिया गया.

पीईपीएफ़ के मुताबिक़, इससे इन स्कूलों के लिए चीन में विस्तार करना और मुश्किल हो गया.

यहां तक कि कुछ नए कैंपस खोलने की योजनाएं भी रद्द करनी पड़ीं.

इसके बाद इन स्कूलों ने भारत और वियतनाम जैसी दूसरी जगहों के बारे में सोचना शुरू किया.

ब्रिटेन में निजी स्कूलों की फ़ीस पर 20 फ़ीसदी वैट

ब्रिटेन ने 2024 के अपने ऑटम बजट में निजी स्कूलों की फ़ीस पर 20 फ़ीसदी वैट लगाने का फ़ैसला किया था.

बेडफ़र्ड स्कूल मोहाली की संस्थापक प्रिंसिपल नाओमी एटकिंस कहती हैं कि इसकी वजह से कई निजी स्कूलों को विदेशों में मौक़े तलाशने पड़े हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "वे बहुत मुश्किल हालात में हैं. जिन स्कूलों ने पहले कभी विदेश में विस्तार के बारे में नहीं सोचा था, वे भी अब अचानक भारत में सक्रिय हो गए हैं."

हालांकि, एटकिंस मानती हैं कि भारत में इन स्कूलों के लिए अपनी जगह बनाना आसान नहीं है.

इनमें से अधिकतर ब्रिटिश स्कूलों ने भारत में स्थानीय निवेशकों या स्कूल चलाने वाली संस्थाओं के साथ साझेदारी की है.

एटकिंस के मुताबिक़, दूसरे देशों में ये स्कूल अपने स्थानीय साझेदार या निवेशक से कुल कमाई का लगभग 10 फ़ीसदी हिस्सा फ़ीस के रूप में ले सकते थे.

लेकिन भारत में कुछ मामलों में यह फ़ीस घटकर केवल एक फ़ीसदी रह गई है.

उनका यह भी कहना है कि भारत में इस बाज़ार के आकार का अनुमान कुछ ज़्यादा लगा लिया गया था.

भारत में स्थानीय स्कूलों से कड़ा मुक़ाबला

भारत के स्कूलों में क़रीब 25 करोड़ बच्चे पढ़ते हैं. इस आंकड़े को देखकर यहां शिक्षा का बाज़ार बहुत बड़ा लग सकता है.

लेकिन भारत में अंग्रेज़ी माध्यम की शिक्षा पहले से काफ़ी मज़बूत है और बड़ी संख्या में स्थानीय स्कूल भी मौजूद हैं.

इसलिए ब्रिटिश स्कूलों को भारत में स्थानीय स्कूलों से कड़े मुक़ाबले का सामना करना पड़ता है.

चीन, कोरिया और वियतनाम जैसे देशों में यह मुक़ाबला अपेक्षाकृत कम है, क्योंकि वहां अंग्रेज़ी आम भाषा नहीं है.

भारत में इन स्कूलों के सामने एक और चुनौती लोगों की आमदनी और उनकी फ़ीस के बीच का बड़ा अंतर है.

भारत में प्रति व्यक्ति आमदनी काफ़ी कम है, जबकि ब्रिटिश स्कूलों की फ़ीस बहुत ज़्यादा है. पूरी तरह बोर्डिंग की सुविधा देने वाले ये स्कूल 15 हज़ार पाउंड या इससे भी अधिक फ़ीस ले सकते हैं.

इतनी अधिक फ़ीस के कारण भारत में इन स्कूलों के विस्तार की रफ़्तार सीमित हो सकती है.

एटकिंस कहती हैं, "मैंने इंडोनेशिया, मलेशिया और चीन में काम किया है. लेकिन भारतीय क़ीमतों को लेकर कहीं ज़्यादा सावधान रहते हैं. उन्हें कम क़ीमत में अच्छा सौदा पसंद है."

इसी बात को ध्यान में रखते हुए बेडफ़र्ड मोहाली ने अपनी फ़ीस दूसरे ब्रिटिश स्कूलों की तुलना में लगभग आधी रखी है.

भारत में धीरे-धीरे बढ़ेगा कारोबार

विदेशों में ब्रिटिश स्कूलों के कैंपस ने पिछले कुछ वर्षों में अच्छा मुनाफ़ा कमाया है.

पीईपीएफ़ के मुताबिक़, 2011-12 से 2022-23 के बीच इन कैंपस ने 15 करोड़ 24 लाख पाउंड का मुनाफ़ा कमाया. पिछले कुछ वर्षों में उनका मुनाफ़ा काफ़ी बढ़ा है.

लेकिन भारत में तस्वीर कुछ अलग हो सकती है. यहां इन स्कूलों का कारोबार बहुत तेज़ी से बढ़ने के बजाय धीरे-धीरे और लगातार आगे बढ़ने की संभावना है.

भारत के पुराने औपनिवेशिक रिश्ते और नए अमीर लोगों की बढ़ती संख्या इन पुराने और नामी ब्रिटिश स्कूलों को कारोबार का बड़ा मौक़ा देते हैं.

लेकिन कम से कम अभी यह बाज़ार इतना बड़ा नहीं लगता कि चीन में हुए नुक़सान की भरपाई कर सके.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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