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प्रचंड जीत के बाद बदलाव ला पाएंगे बांग्लादेश के नए नेता?
- Author, योगिता लिमये
- पदनाम, दक्षिण एशिया और अफ़ग़ानिस्तान संवाददाता
- ........से, ढाका
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
करीब दो साल पहले, जब शेख हसीना ने चुनाव जीता था तब ज़्यादातर लोगों का कहना था कि उसमें धांधली हुई है.
उस समय यह सोचना भी मुश्किल था कि सत्ता पर उनकी 15 साल पुरानी पकड़ एक झटके में छूट जाएगी या यह कि वह पार्टी (बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी), जिसे लगभग ख़त्म मान लिया गया था, इतनी ज़ोरदार वापसी करेगी.
लेकिन बांग्लादेशी राजनीति के उतार चढ़ाव में, यह हसीना की अवामी लीग और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के बीच बस एक और अदला-बदली है, जो दशकों से बारी-बारी से सत्ता में आती रही हैं.
फ़र्क़ बस इतना है कि इस बार कमान नए बीएनपी नेता तारिक़ रहमान के हाथ में है, और यह पहला मौका है जब उन्होंने चुनाव लड़ा है.
उनकी मां, ख़ालिदा ज़िया का पिछले साल के अंत में बीमारी से निधन हो गया था. चार दशक तक पार्टी की प्रमुख रहीं ख़ालिदा ज़िया ने पार्टी की कमान, बीएनपी के संस्थापक और बांग्लादेश की आज़ादी की जंग के अहम नेता रहे अपने पति ज़ियाउर रहमान की हत्या के बाद संभाली थी.
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अपनी मां के कार्यकाल में परिवारवाद का फ़ायदा उठाने का आरोप झेलने वाले तारिक़ रहमान पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे. अपनी मां की मौत से पांच दिन पहले ही वह लंदन के 17 साल के स्वैच्छिक निर्वासन के बाद बांग्लादेश लौटे.
भले ही 60 साल के रहमान कभी‑कभी बीएनपी के असली मुखिया की तरह काम करते रहे हों- ख़ासकर तब, जब पार्टी बहुत कमज़ोर थी, उनकी मां जेल में थीं या पिछले कुछ सालों से बीमार थीं- फिर भी उन्हें आम तौर पर एक अनुभवहीन नेता ही माना जाता है.
राजनीति विज्ञानी नाविन मुर्शिद कहती हैं. "शायद उनका अनुभवी न होना ही उनके लिए फ़ायदेमंद है, क्योंकि लोग बदलाव को मौका देने के लिए तैयार हैं."
"लोग यह मानना चाहते हैं कि नई और अच्छी चीज़ें सच में मुमकिन हैं. इसलिए उम्मीद बहुत ज़्यादा है."
'पहली प्राथमिकता लोकतंत्र वापस लाना'
पार्टी का कहना है कि उसकी पहली प्राथमिकता बांग्लादेश में लोकतंत्र वापस लाना है. वरिष्ठ बीएनपी नेता अमीर ख़स्रू महमूद चौधरी ने चुनाव घोषित होने के तुरंत बाद बीबीसी से कहा था, "सारी लोकतांत्रिक संस्थाएं और वित्तीय संस्थाएं, जो पिछले दस सालों में बर्बाद हो गई हैं, सबसे पहले हमें उन्हें ठीक करना होगा."
बांग्लादेश में ऐसे वादे किए जाने और फिर टूट जाने का लंबा इतिहास रहा है- पार्टियां सत्ता में आते ही धीरे- धीरे ज़्यादा अधिकारवादी बनती गई हैं.
लेकिन इस बार देश की नई पीढ़ी, जिसने 2024 के 'जुलाई आंदोलन' में हिस्सा लेकर हसीना को हटाने में भूमिका निभाई थी, पहले की तरह सब कुछ दोबारा सहने को तैयार नहीं दिखती.
उस आंदोलन में हिस्सा लेने वाली 19 साल के ताज़िन अहमद कहती हैं, "हम फिर से लड़ना नहीं चाहते."
"पिछली प्रधानमंत्री का पद छोड़ना असली जीत नहीं थी. जब हमारा देश बिना भ्रष्टाचार के ठीक से चले और अर्थव्यवस्था मजबूत हो, तभी हमारी असली जीत होगी."
21 साल की उनकी कज़िन तहमीना तस्नीम कहती हैं, "जो सबसे पहली चीज़ हम चाहते हैं वह है लोगों में एकता. हमें एक स्थिर देश और स्थिर अर्थव्यवस्था का हक है. हम एक आंदोलन का हिस्सा रहे हैं और हमें पता है कि कैसे लड़कर वापस खड़े होना है. तो अगर वही सब फिर से शुरू हुआ, तो हमारे पास फिर से लड़ने का अधिकार होगा."
हसीना के हटाए जाने के बाद आए अंतरिम नेता मोहम्मद यूनुस के दौर में हिंसा बढ़ी है.
क़ानून-व्यवस्था को संभालना नई सरकार की मुख्य प्राथमिकता होगी. अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना, खाद्य पदार्थों की कीमतें कम करना और बड़ी युवा आबादी के लिए नौकरियां पैदा करना, दूसरी बड़ी चुनौतियां हैं.
अनुभव की कमी सभी में
समाजशास्त्री समीना लुथ्फ़ा का कहना है कि सरकार चलाने के अनुभव की कमी सभी पार्टियों में दिखती है.
इस्लामवादी जमात ए इस्लामी के लिए, जिसे एक बार हसीना के शासन समेत बांग्लादेश के इतिहास में दो बार बैन किया गया है, को पहली बार अच्छी खासी सीटें मिली हैं.
आंदोलन का नेतृत्व करने वाले कुछ छात्रों की बनाई नेशनल सिटिज़न्स पार्टी (एनसीपी), ने जमात के साथ गठबंधन में उतरकर पहली ही बार में छह सीटें जीती हैं.
लुथ्फ़ा कहती हैं, "हम संसद में ऐसे नेताओं को देखेंगे जो पहले कभी संसद में नहीं पहुंचे."
"एनसीपी के युवा नेताओं को बहुत कुछ सीखना होगा. बाकी लोग अनुभवी राजनेता तो हैं, लेकिन देश चलाने का अनुभव उनके पास भी नहीं है. इसलिए यह सफ़र आसान नहीं होगा."
जमात का घोषणापत्र सेक्युलर और विकास पर केंद्रित था, उसमें कहीं भी इस्लामी क़ानून का ज़िक्र नहीं था.
लेकिन उनकी वेबसाइट पर लिखा है, "जमात राजनीति इसलिए करती है क्योंकि राजनीतिक ताकत के बिना इस्लामी क़ानून लागू नहीं किया जा सकता."
और यही बात हमेशा यह सवाल खड़ा करती रही है कि अगर पार्टी कभी सत्ता में आई तो वह क्या करेगी.
मुर्शीद कहती हैं कि इस चुनाव में जमात का प्रदर्शन चौंकाने वाला नहीं है.
वह कहती हैं, "जमात बहुत संगठित राजनीतिक पार्टी है. कई दशकों से वह ज़मीनी स्तर पर लगातार काम करती आई है."
"मुझे लगता है, इसे स्वीकार करना ही पड़ेगा. लेकिन बेशक, समस्या यह है कि पार्टी मूल रूप से ही गैर‑लोकतांत्रिक, महिला‑विरोधी और पितृसत्तात्मक है."
लुथ्फ़ा का कहना है कि सभी पार्टियों ने बांग्लादेश की महिलाओं को निराश किया है. कुल उम्मीदवारों में से सिर्फ़ 4 फ़ीसदी से थोड़ा ज़्यादा ही महिलाएं थीं.
वह कहती हैं, "हम महिलाएं जुलाई आंदोलन का हिस्सा थीं- सभी राजनीतिक पार्टियां हमारी सामूहिक ताकत को औपचारिक राजनीतिक और चुनावी मैदान में बदलने में नाकाम रहीं."
"अब संसद सदस्यों को जल्दी काम करना चाहिए, ताकि वे महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों पर काबिल, ईमानदार और योग्य उम्मीदवार ला सकें."
बांग्लादेश की संसद में कुल 350 सीटें हैं, इनमें से 300 पर चुनाव होता है और बाकी 50 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं, जिन्हें पार्टियां अपनी चुनावी ताकत के अनुपात में नामित करती हैं.
अवामी लीग की वापसी होगी?
हालांकि यह चुनाव हसीना के दौर के पिछले कुछ चुनावों से बिल्कुल अलग था- यह सचमुच प्रतिस्पर्धी था और मतदान शुरू होने से पहले इसका नतीजा तय नहीं था. लेकिन उनकी पार्टी को चुनाव से बाहर रखने की वजह से इसकी विश्वसनीयता पर सवालिया निशान तो लग ही गए हैं.
जब बीएनपी से पूछा गया कि क्या लोकतंत्र बहाल करने के अपने दावे के अनुसार वे अवामी लीग को फिर से राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल करने का समर्थन करेंगे, तो वरिष्ठ नेता महमूद चौधरी ने कहा, "यह फ़ैसला हमारा नहीं है."
"अवामी लीग को बांग्लादेश की चुनावी प्रक्रिया में वापस आने में समय लगेगा, क्योंकि उनकी विश्वसनीयता सवालों के घेरे में है. जब आप पर अपने ही लोगों को मारने, अत्याचार और उत्पीड़न के आरोप हों, तो लोगों को ही तय करना होगा कि भविष्य की बांग्लादेशी राजनीति में उनकी जगह कहां है."
भारत में अपने निर्वासन से, हसीना ने गुरुवार के चुनाव को 'धोखे और ढोंग का चुनाव' कहा है और नए सिरे से चुनाव करवाने की मांग की है जिसमें अवामी लीग को भी शामिल किया जाए.
इस समय उनके दल के प्रति जनता का गुस्सा बहुत ज़्यादा है, लेकिन बांग्लादेश के राजनीतिक इतिहास को देखते हुए, अवामी लीग को हमेशा के लिए ख़त्म मान लेना जल्दबाज़ी होगी.
अतिरिक्त रिपोर्टिंग- आकृति थापर
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.