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कोरोना लॉकडाउनः नौकरों, ड्राइवरों की ज़िंदगी कैसे चलेगी?
- Author, प्रोफ़ेसर संजय कुमार
- पदनाम, सेंटर फ़ॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसायटीज़
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
भारत में तीन मई तक कुछ राहतों के साथ लॉकडाउन बढ़ाने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फ़ैसले का दोहरा असर हो सकता है.
इसमें कोई शक नहीं कि ये फ़ैसला देशवासियों को हालात की गंभीरता को लेकर बेहद मजबूत संदेश देता है कि कोरोना वायरस की महामारी को हल्के में नहीं लिया जा सकता है.
कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ जारी लड़ाई अभी ख़त्म नहीं हुई है. ये संदेश स्पष्ट रूप से दिए जाने की ज़रूरत है और इस बात पर शायद ही कोई असहमत हो.
लोग अपनी क्षमता के अनुसार लॉकडाउन के दूसरे चरण में भी इसका और सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन करेंगे.
लोगों ने 24 मार्च से 14 अप्रैल के दरमियां लॉकडाउन के पहले चरण में भी इन नियमों का पालन किया था.
प्रधानमंत्री की अपील
लॉकडाउन के पहले चरण की घोषणा के वक़्त भी प्रधानमंत्री मोदी ने लोगों से ग़रीबों के प्रति दयालुता का भाव रखने की अपील की थी.
उन्होंने कहा था कि हमारे घरेलू काम में मदद करने वाले लोगों, ड्राइवरों का वेतन लॉकडाउन की अवधि के दौरान नहीं काटा जाना चाहिए.
शहरी मध्य वर्ग और उच्च वर्ग के लोगों ने इस अपील पर काफी ध्यान दिया था.
पर लॉकडाउन के दूसरे चरण की घोषणा के वक्त प्रधानमंत्री ने जब यही अपील दोहराई तो शहरी मध्य वर्ग और उच्च वर्ग के लोगों पर शायद पहले जितना असर नहीं हुआ होगा.
भले ही सरकार को कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ जारी लड़ाई में तैयारियों के लिए थोड़ी और मोहलत मिल गई हो लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि लॉकडाउन के पहले चरण की घोषणा के वक़्त ज़्यादातर भारतीयों ने घरेलू काम करने वाले लोगों के प्रति हमदर्दी की जो भावना दिखलाई थी, उसके कमज़ोर पड़ने का ख़तरा मंडराने लगा है.
लॉकडाउन का पहला चरण
लॉकडाउन के दूसरे चरण में न केवल कम आमदनी वाले एक बड़े तबके की आजीविका पर ख़राब असर पड़ेगा बल्कि ग़रीब लोग भी इससे प्रभावित होंगे.
क्योंकि मुमकिन है कि मध्य वर्ग और उच्च वर्ग के बहुत से लोग अपने घरेलू स्टाफ़ को बिना एक दिन की भी हाजिरी के उनकी सैलरी देने के लिए आगे न आएं.
एक तरफ़ जब प्रधानमंत्री ने पहली बार अपील की थी तो बहुत से लोगों पर इसका असर पड़ा था लेकिन लॉकडाउन के दूसरे चरण में इस बात का डर है कि शायद पहले जैसा असर न पड़े.
मार्च की 24 तारीख़ को जब लॉकडाउन के पहले चरण की घोषणा की गई थी तब महीने लगभग ख़त्म होने ही वाला था.
और घरेलू स्टाफ़ रखने वाले शहरी मध्य वर्ग और उच्च वर्ग के परिवारों ने राज़ी-खुशी से उन्हें मार्च के महीने का पूरा वेतन दिया था.
मध्य वर्ग और उच्च वर्ग
लेकिन अब उनमें से बहुत से लोग मुमकिन है कि अपने घरेलू स्टाफ़ को अप्रैल का पूरा वेतन देने के लिए तैयार नहीं होंगे.
क्योंकि लॉकडाउन की वजह से ये घरेलू स्टाफ़ अप्रैल के महीने में एक भी दिन काम पर नहीं जा सके होंगे.
शहरी मध्य वर्ग और उच्च वर्ग के एक तबके पास इसकी वाजिब वजह भी हो सकती है.
और वो ये है कि वे प्राइवेट सेक्टर में काम कर रहे हों और शायद उनका वेतन भी इस लॉकडाउन से प्रभावित हुआ.
प्राइवेट सेक्टर की कई कंपनियों का काम लॉकडाउन से प्रभावित हुआ है.
'न्यू नॉर्मल' स्थिति
इसकी दूसरी वजहें भी हो सकती हैं. इस बात का डर है कि घरेलू स्टाफ़ को आने वाले दिनों में अप्रैल का वेतन मिलने में परेशान होगी.
क्योंकि लोगों की आदतें आसानी से नहीं जाती हैं. लोग एक दूसरे के प्रति ख़ासकर समाज के निचले तबके लिए ज़्यादा हमदर्दी रखते हैं, लेकिन ये तभी होता है जब संकट का समय हो.
जब किसी परिस्थिति को संकट काल के तौर पर देखा जाता है तो ये उम्मीद की जाती है कि थोड़े समय में ये दौर ख़त्म हो जाएगा.
जब संकट काल ख़त्म होता है तो लोग अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में वापस लौट जाते हैं लेकिन बुरा वक़्त लंबा खिंच जाए तो लोगों को इसकी आदत पड़ जाती है.
बुरा वक़्त 'न्यू नॉर्मल' (नई सामान्य) स्थिति में बदल जाता है.
रोज़मर्रा की ज़िंदगी
एक असामान्य परिस्थिति जो किसी जीवित भारतीय ने शायद ही देखा हो, 21 दिनों का ये लॉकडाउन मेरी नज़र में संकट काल की शर्तों को पूरा करता है.
लेकिन 40 दिनों का लॉकडाउन शहरी मध्य वर्ग के लिए 'न्यू नॉर्मल' स्थिति जैसा ही है.
भले ही ये संकल्पना हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर लागू न होती है, हम लॉकडाउन के हालात में ही जीते रहें, पर शहरी मध्य वर्ग और उच्च वर्ग के एक बड़े तबके की जीवनशैली ख़ासकर उसकी आदतें 'न्यू नॉर्मल' की स्थिति में आ जाएंगी.
शहरी मध्य वर्ग और उच्च वर्ग के लोग जिस तरह से अपनी क्षमता के अनुसार ग़रीबों के समर्थन में आएं हैं, भले ही ये ग़रीब लोग उनके घरले स्टाफ़ हों या न हों, इसकी तारीफ़ की जानी चाहिए.
लेकिन ग़रीब लोगों के प्रति समाज के खाते-पीते तबके का ये रुख उनका सामान्य बर्ताव नहीं है. ये ग़रीब लोग ज़्यादातर दूसरे शहरों से, राज्यों से आए प्रवासी हैं.
मजबूत पूर्वाग्रह
सेंटर फ़ॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसायटीज़ (सीएसडीएस) और अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की साझा स्टडी में ऐसे साक्ष्य मिले हैं जिनसे ये संकेत मिलते हैं कि भारत में अलग-अलग जाति, समुदाय, धर्म और वर्ग के लोगों के बीच एक दूसके के प्रति मजबूत पूर्वाग्रह हैं.
ज़रूरी नहीं है कि लोग हमेशा एक दूसरे पर भरोसा करें, एक दूसरे के लिए हमदर्दी रखें. इसके उलट लोग एक दूसरे के प्रति संदेह और मनमुटाव की भावना रखते हैं, एक दूसरे को प्रतिस्पर्धी समझते हैं, ऐसे व्यक्ति के तौर पर देखते हैं जो उनकी तरक्की की राह में बाधा हो.
पर ये भी सच है कि संकट के समय लोग अपनी भावनाएं नज़रअंदाज़ कर देते हैं. ऐसे ज़्यादातर मौकों पर लोग बड़ी तादाद में एक दूसरे की मदद के लिए सामने आते हैं. लेकिन अफसोस की बात ये है कि ऐसी सद्भावना लंबे समय के लिए देखने को नहीं मिलती.
तरक्की की राह में बाधा
संदेह और पूर्वाग्रह की भावना किसी ख़ास तबके तक सीमित नहीं है. समाज के सभी तबकों में एक दूसरे के ख़िलाफ़ ये देखने को मिलता है.
स्टडी में ये पाया गया था कि 48 फ़ीसदी भारतीय ये मानते हैं कि प्रभावशाली लोग दूसरों की तरक्की की राह में बाधा पहुंचाते हैं. ज़्यादातर दलित और मुसलमान इस राय से सहमत थे.
दूसरी तरफ़ 21 फ़ीसदी भारतीयों का ये मानना था कि दूसरे राज्यों और शहरों से आए प्रवासी उनके विकास में अड़चन हैं. इन प्रवासियों में ज़्यादातर घरेलू स्टाफ़ के तौर पर काम करते हैं.
11 फ़ीसदी लोग पिछड़ी जातियों के लोगों को अपनी तरक्की की राह में बाधा के तौर पर देखते हैं.
ये 11 फ़ीसदी लोग भले ही संख्या के लिहाज से छोटी आबादी हो लेकिन इनकी अपनी अहमियत है. ऐसी राय रखने वाले ज़्यादा लोग प्रमुख अगड़ी जातियों, मध्य और उच्च वर्ग के थे.
गांववालों की तुलना में शहरी भारतीयों के मन में ये भावना ज़्यादा थी.
क्या सोचता है दलित समाज
हमें ये बात नहीं भूलनी चाहिए कि घरेलू स्टाफ़ के तौर पर काम करने वाले ज़्यादातर लोग पिछड़ी जातियों से आते हैं.
अगड़ी जातियों के लोगों के प्रति भी आम भारतीयों में मनमुटाव की भावना है.
स्टडी में भाग लेने वाले 22 फ़ीसदी भारतीयों ने माना कि अगड़ी जाति के लोग उनकी आर्थिक खुशहाली में एक बाधा हैं.
दलित समाज के लोगों में अगड़ी जातियों के प्रति ये भावना ज़्यादा देखी गई. शहरी भारत में घरेलू स्टाफ़ के तौर पर काम करने वाला एक बड़ा तबका दलित समाज से आता है.
कोरोना संकट के मुश्किल दौर में
कुछ लोग ये दलील देते हैं कि कोरोना संकट के समय एक दूसरे के प्रति अविश्वास की ये भावना भले ही ग़ायब न हो पर कमज़ोर ज़रूर पड़ गई है.
लेकिन मुझे नहीं लगता कि लोगों की आदतें इतनी आसानी से चली जाती हैं.
ख़ासकर समाज का खाता-पीता विशेषाधिकार संपन्न तबका अन्य जाति-समुदाय के लोगों के प्रति अपना रुख इतनी तेज़ी से नहीं बदलता है.
दुर्भाग्य से घरेलू स्टाफ़ को इस बात का दंश कोरोना संकट के मुश्किल दौर में झेलना होगा.
(राजनीतिक विश्लेषक संजय कुमार सेंटर फ़ॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसायटीज़ में प्रोफ़ेसर हैं. ये लेख उनके निजी विचार हैं.)
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