मालगुडी के जादूगर का बसेरा कहां था?

आरके नारायण
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कर्नाटक सरकार ने अंग्रेज़ी भाषा के मशहूर लेखक आरके नारायण के पुराने और टूटे घर को नया रूप देने के लिए उसे ख़रीद लिया है.

हिमांशु भगत ने मैसूर स्थित उनके घर का दौरा किया जहां आरके नारायण रहते और लिखते थे.

रासीपुरम् कृष्णास्वामी अय्यर नारायणस्वामी या आरके नारायण के प्रशंसकों के लिए मैसूर में उनका घर ढूंढना अब आसान नहीं रहा क्योंकि अधिकांश स्थानीय लोगों को अंदाज़ा नहीं कि नारायण कौन थे और कहां रहते थे.

आरके नारायण का घर, इलाका

आज तकनीकी तरक्की की वजह से आपको रास्ते पूछने की ज़रूरत नहीं रह गई है. एक क्लिक में ही आपको पता मिल जाता है और स्ट्रीट मैप के साथ रास्ता भी.

हालांकि अगर आप नारायण के उपन्यासों और कहानियों के काल्पनिक स्थान दक्षिण भारतीय कस्बे, मालगुडी की झलक पाने की उम्मीद में गए हैं, तो वहां पहुंचने पर आपको निराशा ही हाथ लगेगी.

उच्च-मध्य वर्ग की बस्ती यादवगिरी में उनके घर के पास की छायादार सड़क तक तो यात्रा अच्छी रहती है. लेकिन जब आप वहां पहुंचते हैं तो आपको दिखता है आधा गिराया गया एक घर.

आरके नारायण

इस दोमंज़िला इमारत में देखरेख करने वाली एक दंपत्ति के अलावा उदास चेहरे वाला एक बड़ा कुत्ता रहता है. यह नारायण के ग्रेट डैन नस्ल के पालतू कुत्ते शेबा का भूत लगता है.

नारायण ने इसका ज़िक्र अपनी आत्मकथा, 'माई डेज़', में किया है.

आत्मकथा में यह भी बताया गया है कि जिस घर में वह बरसों से रह रहे थे उसे खाली करने के लिए जब मकान मालिक परेशान करने लगा तो उन्होंने यह घर बनाने का फ़ैसला किया था.

(उस समय नारायण एक 'इंडियन थॉट' नाम की साहित्यिक पत्रिका भी निकालते थे और वह स्वीकार करते हैं कि उन्होंने अपनी लिखी एक कहानी छापने के लिए युवा मकान मालिक से कुछ समय मांगा था.)

आर के नारायण

इस घर पर काम 1948 में शुरू हुआ. एक धूर्त ठेकेदार (जिसे बाद में नारायण को अदालत में घसीटना पड़ा) के कारण बहुत परेशानी झेलने के बाद अंततः पांच साल बाद यह मकान तैयार हुआ.

लेकिन वे तुरंत इसमें रहने नहीं आ पाए. 'माई डेज़' में वे बताते हैं, "मैंने यादवगिरी के घर को लिखने के ठिकाने के रूप में रखा."

वे बताते हैं, "मैंने अपना समय लक्ष्मीपुरम और यादवगिरी के बीच बांट दिया. एक में मैं परिवार के साथ का आनंद लेता और दूसरे में किताबों और अख़बारों का."

नारायण के पढ़ने का स्थान ऊपरी तल पर था. नारायण के अनुसार यह 'एक कोने का कमरा था, जिसकी आठ खिड़कियों से उन्हें हर दिशा में दिखाई देता था'. इसका अर्ध-वृत्त उभार और कोने वाली खिड़कियों पर हथौड़ों की चोट का असर साफ़ नज़र आता है.

आरके नारायण, स्टडी

बाकी घर की तरह दरवाज़ों और अन्य स्थायी फ़िटिंग को उखाड़ लिया गया था जिसकी वजह से पीछे की लाल दीवार नज़र आ रही थी.

यह मकान विरासत में नारायण की पोती भुवनेश्वरी और उनके भाई को मिला है. भुवनेश्वरी ने बीबीसी को बताया, "उन्होंने इस जगह की चाहत में घर बनाया था."

"वो इस घर में अपने बड़े भाई आरके पट्टाभी और उनके परिवार के साथ रहते थे. उनकी मां- मेरी परदादी- भी 1970 में अपनी मृत्यु तक इसी घर में रहीं."

बचपन में भुवनेश्वरी गर्मियों की छुट्टी के दौरान इस घर में आया करती थीं, जिसकी उनके पास सुखद यादें हैं.

आरके नारायण का मैसूर में स्थित घर

वो कहती हैं, "हमारे लिए वह दादा थे, वह एक साधारण आदमी थे. कभी-कभी लोग आया करते थे, कभी बहुत ज़्यादा, वरना वह शांत जीवन बिताते थे."

नारायण इस घर में 1990 की शुरुआत तक रहे. उसके बाद ख़राब सेहत की वजह से उन्हें अपनी बेटी के पास चेन्नई जाना पड़ा.

उनकी मृत्यु के कुछ साल बाद उनके पोते-पोतियों (जिनमें से कोई भी मैसूर में नहीं रहता था) ने इस घर को तोड़कर फिर से बनाने का फ़ैसला किया.

आरके नारायण का मैसूर में स्थित घर

साल 2011 में उन्होंने एक डेवलपर से बात की जिसने इसे तोड़ना शुरू किया और तभी एक दैनिक अख़बार ने इसे बचाने का अभियान शुरू किया.

उसी साल सितंबर में मैसूर शहरी विकास अथॉरिटी ने इस जायदाद को एक धरोहर घोषित कर दिया और इसे ढहाने का काम रोक दिया.

आगामी सालों में इस कहानी में बहुत घुमाव और मोड़ आए. स्थानीय लेखकों ने विरोध प्रदर्शन किया और पूछा कि कर्नाटक सरकार एक ऐसे लेखक पर इतना अधिक धन क्यों ख़र्च कर रही है जिसने कन्नड़ में नहीं लिखा.

आखिरकार सरकार ने इस जायदाद को 2.4 करोड़ रुपए में ख़रीद लिया और 34.50 लाख रुपए इसके पुनरुद्धार के लिए तय किए.

आरके नारायण का मैसूर में स्थित घर

भुवनेश्वरी कहती हैं, "हम ख़ुश हैं कि इस घर को उसी तरह रखा जा रहा है, जैसा यह है. आखिर कुछ किया जा रहा है."

वो कहती हैं कि उन्हें बताया गया है कि यहां काम मार्च या अप्रैल में शुरू होगा.

मैसूर नगर निगम के आयुक्त सीजी बेटसुरमथ ने बीबीसी को बताया कि इंग्लैंड में शेक्सपियर के घर की तर्ज पर पुनरुद्धार के बाद इस घर को भी संग्रहालय में बदला जाएगा.

संरक्षण वास्तुकार और खुद को नारायण का प्रशंसक बताने वाले रजनीश वटास कहते हैं कि वह नारायण के घर का 'नवीनीकरण' नहीं करेंगे 'पहले जैसा' करेंगे.

आरके नारायण का मैसूर में स्थित घर

वो कहते हैं कि अब ज़रूरत इस बात की है कि घर और इसके आस-पास की चीज़ें, जैसे फ़र्नीचर ठीक वैसी ही हों जैसे कि तब थे जब नारायण यहां रहते थे.

बेटसुरमथ कहते हैं, "हमने मीडिया के माध्यम से लोगों का आह्वान किया है कि वो नारायण के काम या उस सामान को दान करें जो उनके पास हैं."

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