धर्म परिवर्तन के बाद पुराने सामाजिक दर्जे पर आरक्षण नहीं: सुप्रीम कोर्ट

इमेज स्रोत, Sanchit Khanna/Hindustan Times via Getty Image
सुप्रीम कोर्ट ने आज मद्रास हाईकोर्ट के उस फ़ैसले को बरकरार रखा, जिसमें कहा गया था कि इस्लाम धर्म अपनाने वाला व्यक्ति धर्म परिवर्तन से पहले की सामाजिक स्थिति के आधार पर पिछड़ा वर्ग आरक्षण का लाभ पाने का हक़दार नहीं है.
बार एंड बेंच के अनुसार, अदालत ने गुरुवार को कहा कि हिंदू धर्म छोड़कर किसी गैर-हिंदू धर्म को अपनाने वाला व्यक्ति अपने पहले धर्म में सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण का लाभ पाने का दावा नहीं कर सकता.
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने स्पष्ट किया कि धर्म परिवर्तन के बाद व्यक्ति को उसके पहले के धर्म में प्राप्त सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर किसी अन्य धर्म के अधिसूचित पिछड़े वर्ग में शामिल नहीं किया जा सकता.
पीठ ने कहा, "संविधान के अनुच्छेद 16(4) के तहत आरक्षण का लाभ पाने के लिए संबंधित पिछड़े वर्ग की सदस्यता आवश्यक है. केवल धर्म परिवर्तन से पहले की सामाजिक स्थिति के आधार पर किसी व्यक्ति को नए धर्म में पिछड़े वर्ग का सदस्य नहीं माना जा सकता."
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 का उल्लेख करते हुए कहा, "इसके पैराग्राफ 3 के तहत हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को मानने वाले व्यक्ति को अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता."
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन के बाद दोबारा हिंदू धर्म अपना लेता है, तो उसे अपने पुराने पिछड़े वर्ग के दर्जे और आरक्षण के लाभ स्वतः नहीं मिल जाएंगे.

















