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जंगली हाथी दक्षिण भारत में कैसे बने शहरी लोगों के साथी
- Author, स्वामीनाथन नटराजन
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
कुछ साल पहले दक्षिण भारत के एक पहाड़ी रास्ते पर तार्श तिकेकारा ने एक जंगली हाथी को अपनी ओर आते देखा.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "यू-टर्न लेने की जगह नहीं थी. मैंने कार रोक दी और बाहर निकल कर पीछे भागने लगा. अगर आप हाथी के बहुत नज़दीक जाते हैं तो वह हमला कर देता और अगर आप गाड़ी में हों तो हमला तेज़ हो सकता है."
लेकिन सड़क के किनारे खेल रहे स्थानीय बच्चों ने तार्श को भागते देखकर हंसना शुरू कर दिया. बच्चों ने उनसे कहा, "डरने की ज़रूरत नहीं है. यह हाथी गाय की तरह ही है. यह पानी पीने आ रहा है और कोई नुकसान नहीं पहुंचाएंगा."
बच्चे बिलकुल सही कह रहे थे. तार्श को बहुत अचरज हुआ जब हाथी उनकी उपेक्षा करते हुए पानी पीने के लिए जल स्रोत की ओर बढ़ गया.
तार्श तिकेकारा दक्षिण भारत के गुदालुर वन्य क्षेत्र में हाथियों का अध्ययन करने वाले रिसर्चर हैं, उन्हें हाथी का यह व्यवहार असामान्य लगा और वे इस पर जानकारी जुटाने लगे.
शहरों में जंगली हाथी
तार्श को यह भी पता चला कि स्थानीय लोगों ने इस जंगली हाथी का नाम गणेशन रखा हुआ है.
दुनिया के कई हिस्सों में खाने-पीने की तलाश में हाथी मानव बस्तियों तक पहुंच जाते हैं. आमतौर पर वे कुछ दिनों बाद फिर से वन्य क्षेत्र में चले जाते हैं. लेकिन, दक्षिण भारत में गणेशन की तरह कुछ और हाथियों ने मानव बस्तियों के पास ही रहना शुरू कर दिया है. यानी वे साल के अधिकांश समय वन्य क्षेत्र से सटे शहर में रहने लगे हैं.
गुदालुर वन्य क्षेत्र के आसपास के गांवों और शहरों में करीब ढाई लाख लोग रहते हैं. 500 वर्ग किलोमीटर में फैले इस वन्य क्षेत्र में चाय और कॉफ़ी के बगान हैं. इस इलाक़े में करीब 150 जंगली हाथी भी रहते हैं.
इनमें से कुछ हाथी शहरी जीवन के इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि आतिशबाजी और तेज़ आवाज़ में ड्रम बजाए जाने पर भी ये कोई हमला नहीं करते हैं.
तिकेकारा ने बताया, "हाथियों के बारे में मैं जो भी जानता था, यह सब उसके बिलकुल उलट था. इनमें आमतौर पर हमले वाला गुण नहीं दिख रहा था."
हाथियों को पालतू बनाने का प्रशिक्षण काफी यातना भरा होता है. वन्य जीव संरक्षण को लेकर काम करने वाली संस्थाओं के विरोध के बावजूद दुनिया के कई देशों में आज भी यह होता है. इस प्रक्रिया में महीनों लगते हैं और हाथियों को कैद में तब तक यातनाएं दी जाती हैं जब तक वे ट्रेनर के निर्देश को मानने नहीं लग जाते.
बहरहाल तार्श तिकेकारा ने देखा कि ये जंगली हाथी अपने आप इंसानों के साथ रहने के गुण सीख रहे हैं.
नए तरीके सीखते हाथी
गुदालुर वन्य क्षेत्र में हाथियों की निगरानी वाले प्रोजेक्ट के लीड रिसर्चर के तौर पर तिकेकारा ने इलाक़े के सभी हाथियों का अध्ययन शुरू किया.
इस अध्ययन में उन्होंने 90 जंगली हाथियों पर अध्ययन किया और इनमें पांच वैसे हाथी थे जो इंसानी बस्तियों के आसपास रहने लगे थे. अध्ययन में यह भी पता चला के शहरी बस्तियों के आसपास रहने वाले हाथी अधिक उम्र के हाथी हैं और वे खाने-पीने के नए तौर-तरीके भी सीखते हैं.
तार्श तिकेकारा ने बताया, "हम लोगों ने तीन साल तक गणेशन पर नज़र रखी. वह इस दौरान कभी जंगल के अंदर नहीं गया. वह हमेशा लोगों के बीच में रहा. वह सड़क किनारे सो जाता था. उसे अपनी सूंड से बसों को धकेलते देखा गया, सूंड से बसों के शीशे भी उसने तोड़े और कुछ स्थानीय तौर पर इस्तेमाल होने वाले टुकटुक वाहनों पर हमला भी किया."
इसके अलावा गणेशन घरों में लगे नलों से पानी पीने लगा था. कई बार गणेशन की वजह से चाय बगानों में काम रुक गया, ट्रैफिक ठहर गया. गणेशन वहां काम करने वाले मज़दूरों से फल-सब्जी भी लेने लगा लेकिन इस दौरान उसने किसी को नुक़सान नहीं पहुंचाया.
गुदालुर वन्य क्षेत्र नीलगिरी जैविक अभ्यारण्य का हिस्सा है. यह अभ्यारण्य तीन राज्यों में फैला है. इन जंगलों में करीब छह हज़ार एशियाई हाथी रहते हैं. यहां बाघों की संख्या भी बढ़ रही है और इसे भारत का सबसे संरक्षित वन्य क्षेत्र माना जाता है.
तार्श तिकेकारा का अनुमान है कि दक्षिण भारत में 20 से ज़्यादा जंगली हाथी अब शहरों में रहने लगे हैं. इनमें से एक रिवाल्डो भी है, जो मशहूर हिल स्टेशन ऊटी के शहरी इलाक़े में रहने लगा है.
रिवाल्डो का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल भी हुआ है जिसमें वह एक आदमी से चिकन बिरयानी छीन रहा है और इस वीडियो को देखकर कई लोग हैरान भी हुए. हाथियों के रिसर्चर के तौर पर तिकेकारा के लिए यह समझना मुश्किल नहीं था.
उन्होंने बताया, "सामान्य तौर पर हाथियों को चावल और नमक पसंद होता है. चिकन बिरयानी को इसी धोखे में छीना गया. हाथी शाकाहारी होते हैं."
जंगली हाथियों को अपना अधिकांश समय खाने और पानी की तलाश में बिताना होता है. तिकेकारा बताते हैं कि शहरी इलाक़ों में उन्हें जिस चीज़ की ज़रूरत होती है वो दो घंटे से भी कम समय में उन्हें मिल जाती है.
तिकेकारा ने बताया, "जब उन्हें फसल या पका हुआ भोजन मिलता है, तो उसमें कैलोरी की मात्रा बहुत ज़्यादा होती है, यही वजह है कि उन्हें बहुत खाने की ज़रूरत नहीं होती है."
हालांकि, इसका दूसरा पहलू यह है कि ऐसे भोजन में पोषक तत्व कम होते हैं और इसके लिए हाथियों को काफी भटकने की ज़रूरत भी नहीं होती है. तिकेकारा कहते हैं, "इसके चलते ही हाथी दिन भर शांति से बैठे रहते हैं, उनका शारीरिक अभ्यास नहीं हो पाता है और वे भारी भरकम नज़र आते हैं."
पालतू जानवरों जैसा व्यवहार
पिछले कुछ सालों में स्थानीय लोगों को भी एहसास हुआ है कि हाथियों के साथ रहने के लिए उन्हें भी थोड़ा तालमेल बनाना होगा.
बरदान एक भारी भरकम हाथी है जो शहरी क्षेत्र में ही रहने लगा है. वह गुदालुर के छोटे से इलाक़े थोरापल्ली के रेस्टोरेंट के पास नियमित तौर पर पहुंचने लगा है. ऐसे में अब रेस्टोरेंट के मालिक ने उसके लिए दिन भर का बचा हुआ खाना रखना शुरू कर दिया है.
तिकेकारा बताते हैं, "रेस्टोरेंट मालिक बरदान के लिए सब्जियां और केले के पत्ते रखने लगे हैं, दक्षिण भारत के ज़्यादातर रेस्टोरेंट में केले के पत्ते पर खाना परोसा जाता है."
इस रेस्टोरेंट में तिकेकारा एक दिन अपना खाना खा रहे थे, उस वक़्त के वाक़ये को याद करते हुए उन्होंने बताया, "जब हाथी ने अपना खाना शुरू किया तो आसपास लोग जमा हो गए. कुछ उसकी तस्वीर लेने लगे. एक युवा ने तो उसकी पूंछ पकड़ कर खींची ताकि बेहतर फोटो आ सके. युवा चाहता था कि हाथी अपना चेहरा कैमरे की तरफ घुमाए."
"मैं यह सब देखकर सदमे में था. देश के दूसरे हिस्सों में लोगों को इतने नजदीक से हाथी देखने का मौका भी नहीं मिलता. बरदान ने एक दो बार अपने पैर पीछे ज़रूर किए लेकिन फिर आराम से खाने लगा. उसने किसी पर कोई हमला नहीं किया. लोग उसे अच्छे बच्चे के तौर पर देखने लगे हैं. स्थानीय लोग उसके साथ पालतू जानवरों जैसा व्यवहार करने लगे थे."
जंगल से ज़्यादा बस्ती पसंद
लेकिन जल्दी ही बरदान के साथ दो और हाथी रहने आ गए और उसके बाद स्थिति बदल गयी. सब्जी और फलों के लिए ये दुकानों के शीशे तोड़ने लगे. बरदान से उलट ये दोनों हाथी लोगों का पीछा करने लगे जिससे लोगों में डर और भय उत्पन्न होने लगा.
इलाक़े के वन विभाग को आशंका हुई कि अगर इन हाथियों ने हमला कर दिया तो किसी दिन किसी इंसान की जान जा सकती है, इसी वजह से रिवाल्डो सहित दूसरे हाथियों को जंगल भेजने की कई बार कोशिशें हुईं.
तिकेकारा ने बताया, "रिवाल्डो ने ऊटी शहर की तरफ तब आना तब शुरू किया जब कोई शख़्स इन हाथियों को कटहल का फल खाने के लिए देने लगा."
रिवाल्डो फल खाने के बाद भी कहीं नहीं जाता था. रेस्टोरेंट मालिकों ने इन जानवरों को ग्राहकों के आकर्षण के लिए खाना देना शुरू किया और कुछ सालों के बाद स्थानीय लोगों से ये हाथी इतने घुलमिल गए कि एक दूसरे का डर मिट गया.
लेकिन वन विभाग को यह आशंका बनी रहती है कि ये हाथी किसी दिन किसी पर भी हमला कर सकते हैं. इसलिए उन्होंने हाथियों को जंगल भेजने की कोशिश जारी रखी है. इसी सिलसिले में रिवाल्डो को पकड़कर जंगल के अंदर छोड़ा गया था.
लेकिन 24 घंटे के अंदर रिवाल्डो 40 किलोमीटर की दूरी तय करके लौट आया. तिकेकारा के मुताबिक रिवाल्डो बीते 15 सालों से शहर में ही रह रहा है और वह इंसान के साथ तालमेल बैठाने वाला पहला हाथी है.
75 की मौत, एक के लिए हाथी ज़िम्मेदार
बीते आठ साल में गुदालुर वन्य क्षेत्र में जंगली हाथियों की वजह से 75 लोगों की मौत हुई है. इनमें से महज एक मौत के लिए शहर में रह रहे हाथी को ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है.
तिकेकारा बताते हैं कि जेम्स लॉरीस्टन नामक हाथी अभी भी लोगों के साथ ही रहता है क्योंकि स्थानीय लोगों के मुताबिक वह हादसा था.
उन्होंने बताया, "जब जंगली हाथियों से स्थानीय लोगों की मौत होती है तो भी लोग इन हाथियों को कुछ नहीं कहते क्योंकि उन्हें मालूम है कि ये शांति से रहने वाले हाथी हैं."
बस्तियों केपास बसेरा
भारत के जंगलों में क़रीब 27 हज़ार हाथी रहते हैं. तार्श तिकेकारा के मुताबिक इंसान और हाथियों में आपसी तालमेल जिस तरह से बढ़ा है उसे हाथियों का अस्तित्व बचाने में मदद मिलेगी.
तिकेकारा ने बताया, "जंतु विज्ञान के अनुसार किसी भी प्रजाति के जीव ख़ास तरह से पेश आते हैं. लेकिन अब हमें एक-एक हाथी के व्यवहार का अध्ययन करना होगा और इसकी शुरुआत हो चुकी है."
ऑक्सफ़र्ड यूनिवर्सिटी से पढ़ाई कर चुके तिकेकारा कहते हैं कि उनके शोध से से समस्या पैदा करने वाले हाथियों की पहचान और उनके संरक्षण में मदद मिलेगी.
उनके मुताबिक ज़्यादा से ज़्यादा हाथी अब जंगली इलाक़ों से निकलकर लोगों के बीच रहने आ रहे हैं और यह चलन बना रहेगा.
तिकेकारा ने बताया, "अब हमारे पास दो हथिनी और एक बछड़े हाथी का झुंड भी शहरी इलाक़े में है. अपने बच्चे की देखरेख करने के लिए वैसे तो हथिनी शांत नहीं रहती लेकिन हम उन्हें शांतिपूर्वक रहते देख रहे हैं
शहरी इलाक़े में रहने वाले हाथी स्थानीय लोगों की पसंद बनते जा रहे हैं. बहरहाल, तार्श तिकेकारा जिस गणेशन से सबसे पहले मिले थे, उसकी कुछ साल पहले मौत हो चुकी है.
गणेशन को वन विभाग ने दफ़नाया लेकिन आठ साल तक साथ रहने वाले स्थानीय लोगों ने उसका अंतिम संस्कार कर अपना प्रेम प्रदर्शित किया."
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