ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति वाला क़ानून विवादों में, क्या हैं बड़े सवाल?

साल 2023 में बनाया गया मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 भी विवादों के घेरे में है.
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    • Author, राघवेंद्र राव, विनीत भल्ला और जान्हवी मुले
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 15 मिनट

मतदाता सूचियों के स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न या एसआईआर की प्रक्रिया में गड़बड़ी के आरोपों के चलते मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग को लेकर पिछले कई हफ़्तों से लगातार विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं.

शनिवार को विपक्ष के सांसदों ने उनके ख़िलाफ़ एक अनौपचारिक 'जन महाभियोग' का प्रस्ताव भी पारित किया था.

रविवार को विपक्षी दलों ने ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग को लेकर दिल्ली के रामलीला मैदान में बड़ी रैली का आयोजन किया था.

साथ ही, साल 2023 में बनाया गया मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 भी विवादों के घेरे में है.

दिसंबर 2023 में बने इसी क़ानून के तहत ज्ञानेश कुमार को मार्च 2024 में चुनाव आयुक्त या इलेक्शन कमिश्नर नियुक्त किया गया था. उनके साथ मौजूदा चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधु को भी चुनाव आयुक्त बनाया गया था.

इस क़ानून में ऐसा क्या है, जिस पर लगातार सवाल उठ रहे हैं? क़ानून के जानकार इसकी समीक्षा की ज़रूरत की बात क्यों कर रहे हैं?

अगर इस क़ानून को असंवैधानिक क़रार देते हुए रद्द कर दिया जाए, तो पिछले तीन सालों में लिए गए फ़ैसलों पर क्या कोई असर पड़ेगा? आइए समझते हैं.

अनूप बरनवाल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?

अदालत के मुताबिक़, नियुक्ति की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए, जिससे चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता और निष्पक्षता बनी रहे.
इमेज कैप्शन, शीर्ष अदालत के मुताबिक़, नियुक्ति की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए, जिससे चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता और निष्पक्षता बनी रहे

मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने अनूप बरनवाल बनाम भारत सरकार मामले में अपने एक फ़ैसले में मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए एक चयन समिति बनाने का निर्देश दिया था.

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इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा था कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया को कार्यपालिका के एकाधिकार से मुक्त रखना ज़रूरी है.

अदालत के मुताबिक़, नियुक्ति की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए, जिससे चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता और निष्पक्षता बनी रहे.

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि जब तक संसद इस बारे में कोई क़ानून नहीं बना लेती, तब तक मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के चीफ़ जस्टिस की एक समिति की सिफ़ारिश पर की जाएगी.

अदालत ने यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 324(2) के तहत नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर क़ानून न होने की स्थिति में की थी.

यह एक अंतरिम व्यवस्था थी, जो संसद के क़ानून बनाने तक लागू रहनी थी.

यही बदलाव इस पूरे विवाद की बुनियाद है.

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि 2023 के क़ानून के तहत बनाई गई चयन समिति में सरकार का बहुमत होने की वजह से चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में कार्यपालिका का प्रभाव बना रहता है.

उनका तर्क है कि यह सुप्रीम कोर्ट के अनूप बरनवाल मामले में दिए गए फ़ैसले की भावना और उसमें स्थापित संवैधानिक सिद्धांतों के विपरीत है.

ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति

साल 2024 में ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधु को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली एक चयन समिति ने चुना था.
इमेज कैप्शन, साल 2024 में ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली एक चयन समिति ने चुना था

साल 2024 में ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधु को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली एक चयन समिति ने चुना था.

इस समिति में प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री अमित शाह और लोकसभा में विपक्ष के नेता अधीर रंजन चौधरी शामिल थे.

इन नियुक्तियों के बाद अधीर रंजन चौधरी ने कहा था कि उन्होंने इन पर अपनी असहमति दर्ज की थी.

साल 2023 में बने क़ानून के तहत ही 19 फ़रवरी 2025 को चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने मुख्य चुनाव आयुक्त यानी चीफ़ इलेक्शन कमिश्नर का पदभार संभाला.

उसी दिन मौजूदा चुनाव आयुक्त विवेक जोशी की भी चुनाव आयुक्त के तौर पर नियुक्ति की गई.

ज्ञानेश कुमार साल 2023 के क़ानून के तहत नियुक्त होने वाले पहले मुख्य चुनाव आयुक्त हैं.

2023 के क़ानून पर विवाद क्यों?

पीडीटी आचारी लोकसभा के पूर्व महासचिव हैं और संवैधानिक मामलों के एक जाने-माने विशेषज्ञ हैं.

बीबीसी ने उनसे समझना चाहा कि साल 2023 में बने क़ानून में ऐसा क्या है, जो विवादास्पद है.

पीडीटी आचारी कहते हैं कि साल 2023 में बने क़ानून में दो बड़ी दिक़्क़तें हैं.

पहली यह कि सीईसी और चुनाव आयुक्तों को चुनने के लिए बनाया गया पैनल पहले से ही सरकार के पक्ष में झुका हुआ है.

दूसरी यह कि इसमें इन अधिकारियों को किसी भी दीवानी या आपराधिक मामले से आजीवन छूट दे दी गई है.

वह कहते हैं, "भारत के राष्ट्रपति को भी ऐसी आजीवन प्रतिरक्षा यानी लाइफ़टाइम इम्यूनिटी हासिल नहीं है. राष्ट्रपति को आपराधिक और दीवानी मामलों से केवल तब तक प्रतिरक्षा मिलती है, जब तक वे अपने पद पर रहते हैं."

"पद छोड़ने के बाद कोई भी व्यक्ति उनके ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई कर सकता है. अब सवाल यह है कि क्या राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त कोई अधिकारी आजीवन प्रतिरक्षा का लाभ उठा सकता है, जबकि ख़ुद राष्ट्रपति, जो नियुक्ति करने वाले प्राधिकारी हैं, उन्हें ऐसी इम्यूनिटी हासिल नहीं है?"

आचारी के मुताबिक़, यह एक ऐसा सवाल है, जिस पर सर्वोच्च न्यायालय को विचार करना चाहिए.

वह कहते हैं, "अगर इस प्रावधान को स्वीकार कर लिया जाए, तो इसका मतलब यह होगा कि निर्वाचन आयोग मनमाने ढंग से काम कर सकता है और उसके ख़िलाफ़ कोई कुछ नहीं कर सकता."

अपनी बात जारी रखते हुए पीडीटी आचारी कहते हैं कि सिर्फ़ सुप्रीम कोर्ट ही 2023 के क़ानून को असंवैधानिक घोषित करते हुए रद्द कर सकता है.

वह कहते हैं, "न्यायालय यह कह सकता है कि यह क़ानून संविधान और क़ानून के सिद्धांतों के ख़िलाफ़ है, ख़ास तौर पर उस प्रावधान के संबंध में, जो इम्यूनिटी प्रदान करता है."

"साथ ही, निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया भी अधिक निष्पक्ष और पारदर्शी होनी चाहिए. मेरी राय में इस क़ानून को रद्द किया जाना चाहिए, ख़ास तौर पर इन दो प्रावधानों को."

क्या सीईसी ज्ञानेश कुमार को पद से हटाया जा सकता है?

बीबीसी ने पीडीटी आचारी से पूछा कि क्या सीईसी ज्ञानेश कुमार को इम्पीचमेंट या महाभियोग के ज़रिए उनके पद से हटाया जा सकता है?

उन्होंने कहा, "देखिए, फ़िलहाल मुझे ऐसा नहीं लगता. हां, अगर वे ख़ुद इस्तीफ़ा दे दें, तो बात अलग है."

"लेकिन जहां तक महाभियोग का सवाल है, समस्या जजेज़ इन्क्वायरी एक्ट में है. यह मुख्य निर्वाचन आयुक्त पर भी लागू होता है, क्योंकि मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसी प्रक्रिया से हटाया जा सकता है, जिस प्रक्रिया से किसी जज को हटाया जाता है."

महाभियोग की प्रक्रिया क्या है?

विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की कार्रवाई शुरू करने के लिए दो बार कोशिश की है.
इमेज कैप्शन, विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की कार्रवाई शुरू करने के लिए दो बार कोशिश की है

आचारी कहते हैं कि जजेज़ इन्क्वायरी एक्ट के तहत महाभियोग की प्रक्रिया कई चरणों से होकर गुज़रती है.

सबसे पहले मुख्य निर्वाचन आयुक्त के ख़िलाफ़ एक प्रस्ताव लाया जाता है, जिसमें उनके कदाचार को साबित करने के लिए उन पर लगे आरोपों का विवरण दिया जाता है.

इस प्रस्ताव में संबंधित घटनाएं, उदाहरण और सबूत पेश करने होते हैं.

वह कहते हैं, "इसके बाद मामला लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति के पास जाता है. वे इस पर विचार करते हैं. वे चाहें तो क़ानूनी राय भी ले सकते हैं और यह फ़ैसला कर सकते हैं कि प्रस्ताव को स्वीकार करें या ख़ारिज."

"लोकसभा के कम से कम 100 सदस्य या राज्यसभा के कम से कम 50 सदस्य हस्ताक्षर करके नोटिस देते हैं. इस प्रस्ताव को लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति शुरुआती चरण में ही ख़ारिज कर सकते हैं."

अपनी बात जारी रखते हुए आचारी कहते हैं, "अब यह अध्यक्ष पर निर्भर करता है कि वह इस मामले पर स्वयं विचार करे या किसी क़ानूनी विशेषज्ञ की राय ले."

"अगर अध्यक्ष यह मान ले कि उसने मामले पर पर्याप्त विचार कर लिया है या क़ानूनी राय ले ली है, तो वहीं पर मामला ख़त्म हो जाता है."

विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की कार्रवाई शुरू करने के लिए दो बार कोशिश की है.

पहली कोशिश के दौरान महाभियोग के लिए दिए गए नोटिसों को लोकसभा और राज्यसभा दोनों ने अप्रैल में ख़ारिज कर दिया था.

दूसरे प्रयास में दिए गए नोटिस राज्यसभा में अभी भी लंबित हैं. विपक्ष ने कुमार पर पक्षपाती रवैया अपनाने का आरोप लगाया था.

पीडीटी आचारी के मुताबिक़, अगर महाभियोग के प्रस्ताव को लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति स्वीकार न करें, तो प्रस्ताव देने वाले सांसद इस फ़ैसले को अदालत में चुनौती दे सकते हैं.

वह कहते हैं, "वे इस फ़ैसले को अदालत में चुनौती दे सकते हैं, क्योंकि इसे स्पीकर के एक कार्यपालिका संबंधी आदेश या प्रशासनिक कार्रवाई के रूप में माना गया है."

"यहां स्पीकर सदन के अध्यक्ष के रूप में काम नहीं कर रहे होते, बल्कि एक तरह के ट्रिब्यूनल की भूमिका निभा रहे होते हैं. इसलिए उनके इस फ़ैसले को अदालत में चुनौती दी जा सकती है."

"यही एकमात्र राहत है. मुझे नहीं पता कि पिछली बार इस प्रस्ताव का नोटिस देने वाले सांसदों ने स्पीकर के निर्णय को अदालत में चुनौती दी थी या नहीं. जहां तक मेरी जानकारी है, उन्होंने ऐसा नहीं किया था."

2023 के क़ानून को चुनौती पर अब तक फ़ैसला नहीं

2023 के क़ानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका क़रीब ढाई साल से अधिक समय से सर्वोच्च न्यायालय के सामने लंबित है.

निर्वाचन आयोग की संरचना और स्वतंत्रता से जुड़े इतने महत्वपूर्ण मामले के निपटारे में हुई इस देरी को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं.

जस्टिस संजय किशन कौल फ़रवरी 2017 से दिसंबर 2023 तक सुप्रीम कोर्ट में जज थे.

वह कहते हैं, "ये याचिकाएं जनवरी 2024 में क़ानून लागू होने के कुछ ही दिनों के भीतर दायर की गई थीं."

"21 मार्च 2024 को इस आधार पर स्टे देने से इनकार कर दिया गया कि आम चुनावों की पूर्व संध्या पर ऐसा करना अव्यवस्था पैदा कर सकता है."

"इसके बाद यह मामला सूचीबद्ध होता रहा और 2025 के दौरान कई बार स्थगित किया गया. इनमें 19 फ़रवरी 2025 भी शामिल थी, जिस दिन मौजूदा मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने पदभार संभाला था."

"मामले की सुनवाई छह मई 2026 से 30 जुलाई 2026 तक चली."

सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की अलग-अलग राय

23 सितंबर 2026 को इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की दो न्यायाधीशों की पीठ ने अलग अलग राय दी.

जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा कि अनूप बरनवाल मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर संवैधानिक सिद्धांत तय कर चुका है.

इसलिए मौजूदा मामले में सिर्फ़ यह देखना है कि 2023 का क़ानून उस फ़ैसले के अनुरूप है या नहीं. इसके लिए बड़ी पीठ की ज़रूरत नहीं है.

वहीं, जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने इसे महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल मानते हुए पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के पास भेजने का समर्थन किया.

दोनों न्यायाधीशों के बीच मतभेद के बाद मामला भारत के मुख्य न्यायाधीश के पास भेज दिया गया, ताकि वे उचित संविधान पीठ के गठन पर फ़ैसला कर सकें.

इससे मामले के अंतिम निपटारे में और देरी होने की संभावना है.

जस्टिस कौल कहते हैं कि विवादित अधिनियम के तहत तीन निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की गई है और उनमें से एक को मुख्य निर्वाचन आयुक्त यानी सीईसी बनाया गया है.

वह कहते हैं, "इस प्रकार गठित निर्वाचन आयोग ने 2024 के लोकसभा चुनाव, उसके बाद हुए अलग अलग विधानसभा चुनावों और देशव्यापी स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न की प्रक्रिया का संचालन किया है."

"हर बीतते महीने के साथ नियुक्तियों को अवैध ठहराने की लागत बढ़ती जाती है और अदालत के लिए उपलब्ध व्यावहारिक राहत का दायरा सिमटता जाता है."

"इससे यह जोख़िम पैदा होता है कि जब तक फ़ैसला आए, तब तक ऐसी स्थिति बन चुकी हो, जिसे पलटना लगभग असंभव हो."

जस्टिस कौल के मुताबिक़, जब तक यह विवाद अनसुलझा रहता है, निर्वाचन आयोग के हर फ़ैसले पर किसी न किसी स्तर पर प्रश्नचिह्न बना रहता है.

उनके मुताबिक़, निष्पक्षता की दृष्टि से यह स्थिति मौजूदा मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य आयुक्तों के लिए भी उचित नहीं है.

वह कहते हैं, "चूंकि मौजूदा सीईसी जनवरी 2029 तक पद पर रहेंगे और 2027 की शुरुआत में कई राज्यों में चुनाव होने हैं, इसलिए मेरी राय में संविधान पीठ को इस मामले की लगातार सुनवाई कर अगले बड़े चुनावी दौर से पहले फ़ैसला सुना देना चाहिए."

2023 के क़ानून की किस बात को चुनौती दी गई है?

वीडियो कैप्शन, जस्टिस एसके कौल ने पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ से असहमतियों के बारे में क्या बताया?

जस्टिस अभय श्रीनिवास ओक अगस्त 2021 से मई 2025 तक सुप्रीम कोर्ट में जज थे.

वह कहते हैं, "इसकी पृष्ठभूमि को समझना ज़रूरी है. कुछ साल पहले सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने अनूप बरनवाल की याचिका पर फ़ैसला सुनाया था."

"अदालत ने कहा था कि मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया को कार्यपालिका, यानी सरकार या प्रशासन के प्रभाव से यथासंभव अलग और सुरक्षित रखा जाना चाहिए."

अपनी बात जारी रखते हुए जस्टिस ओक कहते हैं, "उस वक़्त इस विषय पर कोई क़ानून मौजूद नहीं था."

"संविधान का अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को यह अधिकार देता है कि जहां क़ानून में किसी विषय पर कोई व्यवस्था न हो, वहां वह तब तक आवश्यक निर्देश जारी कर सकता है, जब तक संसद इस बारे में क़ानून न बना दे."

"इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए एक समिति बनाई जाए, जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल हों."

"लेकिन 2023 में बनाए गए क़ानून में अलग व्यवस्था की गई. इसके तहत नियुक्ति समिति में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री को शामिल किया गया. यही वजह है कि इस क़ानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है."

जस्टिस ओक कहते हैं कि अनूप बरनवाल मामले में अपने पहले के फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया को सत्ता में बैठे लोगों के प्रभाव से मुक्त रखा जाना चाहिए.

वह कहते हैं कि अदालत का मानना था कि नियुक्ति प्रक्रिया पर सरकार या कार्यपालिका का पूरा नियंत्रण नहीं होना चाहिए.

अगर ऐसा होता है, तो सिर्फ़ वही लोग चुनाव आयुक्त बन पाएंगे, जिन्हें सत्तारूढ़ पक्ष चुनना चाहता है.

जस्टिस ओक कहते हैं, "लेकिन 2023 के क़ानून के तहत प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री कभी भी प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ नहीं जाएगा. इसलिए कार्यपालिका का प्रभाव बना रहता है."

"याचिका में दलील दी गई है कि यह क़ानून असंवैधानिक है, क्योंकि यह सर्वोच्च न्यायालय के पहले दिए गए फ़ैसले के विपरीत है."

क्या 2023 के क़ानून की समीक्षा की ज़रूरत है?

ऐसे में सवाल है कि क्या इस क़ानून की दोबारा समीक्षा होनी चाहिए, चाहे वह अदालत करे या संसद?
इमेज कैप्शन, ऐसे में सवाल है कि क्या इस क़ानून की दोबारा समीक्षा होनी चाहिए, चाहे वह अदालत करे या संसद?

निर्वाचन आयोग और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़े हाल के विवादों के बाद 2023 के क़ानून पर फिर से सवाल उठने लगे हैं.

ऐसे में सवाल है कि क्या इस क़ानून की दोबारा समीक्षा होनी चाहिए, चाहे वह अदालत करे या संसद?

जस्टिस संजय किशन कौल कहते हैं, "जस्टिस दत्ता ने अपने मत में सही कहा है कि कई दशकों तक सत्ता में रही किसी भी पार्टी ने अपनी चुनावी किस्मत को वास्तव में स्वतंत्र और निष्पक्ष संस्था के हाथों में सौंपने की इच्छा नहीं दिखाई."

"मेरे विचार से 2023 का क़ानून भी उसी स्थिति को बनाए रखता है."

उनके मुताबिक़, संसद ने अनूप बरनवाल मामले में सुझाए गए उन महत्वपूर्ण सुधारों को भी शामिल नहीं किया, जिनमें निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त के समान सुरक्षा देना और निर्वाचन आयोग के लिए एक स्वतंत्र सचिवालय स्थापित करना था.

वह कहते हैं, "ऐसी विधायिका, जिसके बहुमत को इस क़ानून की संरचना से फ़ायदा होता हो, क़ानून की भाषा में मानो अपने ही मामले की न्यायाधीश बन जाती है."

सवाल यह भी है कि अगर इस क़ानून की समीक्षा की जाए, तो इसके किन प्रावधानों की सबसे ज़्यादा जांच होनी चाहिए.

जस्टिस कौल कहते हैं कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़ी क़ानून की धारा 7, धारा 6 और धारा 8(2) की अदालत को गहराई से जांच करनी चाहिए.

वह कहते हैं, "इन प्रावधानों को संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 324 की कसौटी पर परखा जाना चाहिए."

"इसमें कोई संदेह नहीं है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान की मूल विशेषताओं में से एक हैं, जैसा कि जस्टिस दत्ता और जस्टिस शर्मा दोनों ने माना है."

"मेरी राय में इसका समाधान यह हो सकता है कि चयन समिति में एक निष्पक्ष तीसरा सदस्य शामिल किया जाए या फिर समिति के फ़ैसले के लिए सभी सदस्यों की सर्वसम्मति को अनिवार्य बनाया जाए."

धारा 16 में क्या प्रावधान है?

साल 2023 के क़ानून की धारा 16 मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों को व्यापक क़ानूनी सुरक्षा प्रदान करती है.

इस धारा के मुताबिक़, उनके आधिकारिक कर्तव्यों के दौरान किए गए किसी काम, फ़ैसले या बयान के लिए उनके ख़िलाफ़ अदालत में न तो नया दीवानी या आपराधिक मामला दायर किया जा सकता है और न ही पहले से चल रही कार्रवाई जारी रखी जा सकती है.

जस्टिस कौल कहते हैं कि धारा 16 भी एक समस्या पेश करती है.

वह कहते हैं, "इसकी ऐसी व्याख्या की जानी चाहिए कि यह केवल उन कार्यों पर लागू हो, जो नेक नीयत यानी गुड फेथ में किए गए हों."

"साथ ही, न्यायाधीश (संरक्षण) अधिनियम, 1985 की धारा 3(2) की तर्ज़ पर एक सुरक्षा प्रावधान जोड़ा जाना चाहिए."

"मुख्य निर्वाचन आयुक्त यानी सीईसी के ख़िलाफ़ कार्रवाई पर पूरी तरह रोक लगाने के बजाय मुक़दमा चलाने से पहले पूर्व स्वीकृति की व्यवस्था होनी चाहिए."

"इससे निर्वाचन आयुक्तों को निराधार मुक़दमों से सुरक्षा मिलेगी, लेकिन दुर्भावनापूर्ण आचरण के लिए उनकी जवाबदेही पूरी तरह ख़त्म नहीं होगी."

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अगर 2023 का क़ानून रद्द कर दिया जाए तो क्या होगा?

अगर सुप्रीम कोर्ट आख़िर में यह तय करता है कि 2023 में बना यह क़ानून असंवैधानिक है, तो इसके तहत नियुक्त किए गए चुनाव आयुक्तों की नियुक्तियों और उनके द्वारा लिए गए फ़ैसलों का क्या होगा?

जस्टिस संजय किशन कौल के मुताबिक़, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि क़ानून का कौन सा हिस्सा असंवैधानिक घोषित किया जाता है.

वह कहते हैं, "प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश वाली अनूप बरनवाल समिति को तब तक काम करते रहने का निर्देश दिया गया था, जब तक संसद इस विषय पर कोई क़ानून नहीं बना देती."

"अदालत अनुच्छेद 142 के तहत उस समिति को फिर से बहाल कर सकती है."

जस्टिस ओक कहते हैं कि क़ानूनी सिद्धांत के मुताबिक़, विधायिका द्वारा बनाया गया कोई भी क़ानून तब तक वैध माना जाता है, जब तक कोई अदालत उसे रद्द न कर दे या उस पर रोक न लगा दे.

वह कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट ने 2023 के इस क़ानून पर कोई अंतरिम रोक नहीं लगाई है."

"यह क़ानून दो न्यायाधीशों की पीठ के सामने आया था, जहां अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल ने यह तर्क दिया कि संविधान के अनुच्छेद 145(3) के लागू होने के कारण इस मामले को संविधान पीठ को भेजा जाना चाहिए."

"दोनों न्यायाधीशों के विचार अलग अलग थे. वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस दीपांकर दत्ता का मानना था कि मामले को पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के पास भेजने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि पांच न्यायाधीशों की पीठ इस विषय पर पहले ही फ़ैसला दे चुकी है."

"अब सिर्फ़ यह देखना बाक़ी है कि नया क़ानून उस फ़ैसले के अनुरूप है या नहीं."

लेकिन 2023 का क़ानून बनने के बाद से चुनाव आयोग के अब तक लिए गए फ़ैसलों का क्या होगा?

जस्टिस कौल कहते हैं, "पहले से लिए जा चुके फ़ैसले सुरक्षित रहेंगे."

"यह विधि का स्थापित सिद्धांत है कि किसी अधिकारी ने अपने पद के स्पष्ट अधिकार का इस्तेमाल करते हुए जो काम किए हैं, उन्हें वैध माना जाता है. बाद में यह पता चलने पर भी कि उसकी नियुक्ति में कोई त्रुटि थी, वे काम अपने आप अवैध नहीं हो जाते."

"इसलिए सिर्फ़ नियुक्ति में दोष पाए जाने के कारण अधिसूचनाएं, चुनाव कार्यक्रम, चुनाव चिह्न संबंधी आदेश और संशोधित मतदाता सूचियां अपने आप अमान्य नहीं हो जाएंगी."

अपनी बात जारी रखते हुए जस्टिस कौल कहते हैं, "इसी तरह संपन्न हो चुके चुनावों को दोबारा नहीं खोला जाएगा."

"लेकिन ऐसे काम, जो अपने आप में ही अवैध हैं, केवल इस कारण वैध नहीं हो जाएंगे."

"अनुच्छेद 329(बी) के मुताबिक़, किसी चुनाव को केवल जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 100 में तय आधारों पर चुनाव याचिका के ज़रिए ही चुनौती दी जा सकती है."

"निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति में कोई त्रुटि होना ज़रूरी नहीं है कि ऐसा आधार हो."

"हालांकि, जिन फ़ैसलों को स्वतंत्र आधारों पर चुनौती दी गई है, जैसे यह आरोप कि वे धारा 18 के तहत निर्वाचन आयोग की स्वीकृति के बिना लिए गए थे, उनकी स्थिति अलग होगी."

जस्टिस ओक कहते हैं, "जब किसी क़ानून को अदालत रद्द करती है, तो न्यायालय अक्सर यह व्यवस्था करता है कि उस क़ानून के प्रभावी रहने की अवधि के दौरान संबंधित अधिकारी द्वारा किए गए काम, दिए गए आदेश और लिए गए फ़ैसले वैध बने रहें, ताकि किसी के साथ अन्याय न हो."

"इसलिए अगर भविष्य में अदालत यह फ़ैसला भी दे कि ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति वैध नहीं थी, तब भी उनके द्वारा लिए गए फ़ैसले, किए गए प्रशासनिक काम और जारी किए गए आदेश अवैध नहीं हो जाएंगे."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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