प्रधानमंत्री मोदी का कांग्रेस पर तंज़ और बैलट बनाम ईवीएम की बहस

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चार राज्यों की 28 विधान परिषद सीटों पर हुए चुनावों में बीजेपी नेतृत्व वाले एनडीए के अधिकतर सीटें जीतने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को एक्स पर पोस्ट करते हुए विपक्षी कांग्रेस पार्टी पर चुटकी ली.
नरेंद्र मोदी ने एक्स पर लिखा, "चुनाव बैलट पेपर से हुए, अंदाज़ा लगाइए कांग्रेस ने कितनी सीटें जीती होंगी."
बुधवार शाम जिस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ये पोस्ट किया था तब तक कांग्रेस को एमएलसी चुनाव में एक भी सीट नहीं मिली थी.
हालांकि, बाद में कांग्रेस ने महाराष्ट्र की नागपुर सीट जीत ली.
उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और बिहार में हुए एमएलसी चुनावों में बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन ने 28 में से 16 सीटों पर जीत हासिल की है.
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने पांच सीटें जीती हैं जिनमें वाराणसी भी शामिल है.
वहीं महाराष्ट्र की कुल पांच सीटों में से दो बीजेपी के नेतृत्व वाले गठबंधन ने जीती हैं जबकि तीन इंडिया गठबंधन ने जीती हैं.
कांग्रेस ने इस बार नागपुर सीट बीजेपी से जीत ली है. नागपुर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय भी है.
हालांकि कांग्रेस को कर्नाटक में झटका लगा है जहां सभी चार सीटें बीजेपी के नेतृत्व वाले गठबंधन ने जीत ली हैं.
एमएलसी (विधान परिषद) के लिए चुनाव मतपत्रों (बैलट पेपर) के ज़रिए हुए हैं. कांग्रेस और उसके नेतृत्व वाला इंडिया गठबंधन मतपत्रों के ज़रिए आम चुनाव कराने की मांग उठा रहा है.
राजनीतिक बयानबाज़ी

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चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर बहस और चुनाव आयोग पर उठ रहे सवालों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक्स पर किए गए पोस्ट को कांग्रेस पर सीधे हमले के रूप में देखा गया है.
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बुधवार रात क़रीब नौ बजे किए एक पोस्ट में लिखा, ''कांग्रेस ने 28 में से कितनी सीटें जीती… "0"
अमित शाह ने लिखा, "बैलट बॉक्स इस्तीफ़ा दो"
अमित शाह ने अपनी पोस्ट के साथ एक तस्वीर भी पोस्ट की जिसमें एक व्यक्ति हाथ में पोस्टर लिए है जिस पर लिखा है, "बैलट बॉक्स इस्तीफ़ा दो."
वहीं बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष जेपी नड्डा ने लिखा, "जो लोग बैलट पेपर की मांग कर रहे थे उन्हें बैलट पेपर ने ही जवाब दे दिया है."
जबकि मौजूदा बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन ने लिखा, "समस्या कभी ईवीएम में थी ही नहीं, समस्या लोगों के कांग्रेस को नकार देने में है. हर हार के बाद एक नया बहाना आ जाता है लेकिन कोई भी प्रोपेगेंडा लोगों के फ़ैसले को नहीं बदल सकता."
प्रधानमंत्री के पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर 'ज़ीरो चेक कर लो' लिखकर व्यंग्यात्मक पोस्ट किए जाने लगे.
हालांकि कांग्रेस ने बीजेपी के व्यंग्य और सवालों पर जवाब दिया.
कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा, "अगर नरेंद्र मोदी को विश्वास है कि चुनाव नतीजों में ईवीएम की कोई भूमिका नहीं है तो वे बयानबाज़ी से नहीं बल्कि काम से बीजेपी की चुनावी ताक़त को साबित करें. वे वादा करें कि आगे सभी लोकसभा और विधानसभा चुनाव बैलट पेपर से होंगे और एसआईआर की प्रक्रिया को रद्द करके जो 13.3 करोड़ वोट काटे गए हैं उन्हें बहाल करें.''
''ज्ञानेश कुमार का इस्तीफ़ा लें और उस क़ानून को वापस लें जो ज्ञानेश कुमार को आजीवन सुरक्षा देता है. जब तक मोदी ऐसा नहीं करते हैं, तब तक उनके शब्दों को कोई गंभीरता से नहीं लेगा."

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वहीं कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने एक बयान में कहा, "बनारस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लोकसभा क्षेत्र, पटना बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन का गृह क्षेत्र है, नागपुर आरएसएस का मुख्यालय और देवेंद्र फडणनवीस का गढ़ है. जब बैलट पेपर से चुनाव हो गया तो बीजेपी के सभी गढ़ ध्वस्त हो गए, सारी हवाबाज़ी निकल गई."
सुप्रिया श्रीनेत ने कहा, "बहुत ट्वीट-ट्वीट खेल रहे हैं, चुनौती है आपको, करवाइये बैलट से चुनाव. अभी गढ़ हारे हैं, देश में आप लोगों का निबटना अभी बाक़ी है."
सोशल मीडिया पर बहस
प्रधानमंत्री के पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर भी बहस हो रही है.
कंटेंट क्रिएटर ध्रुव राठी ने प्रधानमंत्री के पोस्ट पर जवाब देते हुए लिखा, "फ़र्ज़ीवाड़ा मतदाता सूची में हो रहा है, और आप तो फ़र्ज़ीवाड़े के बावजूद अपने ही क्षेत्र वाराणसी में हार गए हैं."
राठी ने लिखा, "इसे बैलट पेपर बनाम ईवीएम मुद्दा बनाकर आप लोगों को बेवकूफ़ बनाने की कोशिश कर रहे हैं. अच्छा जुमला है."
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी से लोकसभा सांसद हैं. बीजेपी इसी क्षेत्र में एमएलसी चुनाव में हार गई है.
वहीं वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने लिखा, "कांग्रेस ने नागपुर स्नातक एमएलसी सीट जीत ली है. महा विकास अघाड़ी ने महाराष्ट्र में पांच में से तीन सीटें जीत ली हैं. यह बड़ी बात है क्योंकि नागपुर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का गढ़ है और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी इसी सीट से चौबीस साल तक एमएलसी थे."
बीजेपी ने भी उठाए हैं ईवीएम पर सवाल

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भारत में 2004 के बाद से आम चुनाव ईवीएम के ज़रिए हो रहे हैं. हालांकि इससे पहले प्रयोग के रूप में ईवीएम का इस्तेमाल होता रहा था.
किसी क़ानून के तहत भारत के आम चुनावों में मतपत्रों का इस्तेमाल प्रतिबंधित नहीं है, हालांकि क़ानून में बदलाव कर ईवीएम के इस्तेमाल को ज़रूर मंज़ूरी दी गई थी.
जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 61ए निर्वाचन आयोग को निर्धारित निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान के लिए मशीनों के इस्तेमाल की अनुमति देती है.
ईवीएम का विरोध कोई नई बात नहीं है. हालांकि साल 2009 से पहले यह विरोध सीमित ही था.
जब ईवीएम को प्रायोगिक तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा था तब 1989 में पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह और अन्य नेताओं ने सार्वजनिक तौर पर इनके इस्तेमाल को चुनौती दी थी.
1980 के दशक में ईवीएम का मुद्दा अदालतों में भी उठा था. हालांकि, ईवीएम के विरोध में कोई सतत राजनीतिक अभियान नहीं था.
वहीं, साल 2009 के आम चुनावों में कांग्रेस की जीत के बाद बीजेपी नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने ईवीएम पर सवाल उठाते हुए पूछा था कि क्या यह 'फुलप्रूफ़' हैं.
उन्होंने मतपत्रों से चुनाव कराने पर लौटने की मांग भी की थी. कई अन्य राजनीतिक दलों ने भी तब ईवीएम को लेकर सवालों पर सहमति ज़ाहिर की थी.
बीजेपी ने इस मुद्दे पर चर्चा के लिए सर्वदलीय बैठक की मांग भी की थी.
2010 में बीजेपी नेता जीवीएल नरसिम्हा राव ने एक किताब लिखी थी जिसका शीर्षक था, 'डेमोक्रेसी एट रिस्क! कैन वी ट्रस्ट ईवीएम' यानी लोकतंत्र ख़तरे में है, क्या हम ईवीएम पर भरोसा कर सकते हैं.
साल 2013 में बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने वीवीपीएटी (वोटर वेरिफ़ायबल पेपर ऑडिट ट्रेल) का निर्णय दिया.
ईवीएम को लेकर शुरुआती विरोध बीजेपी की तरफ़ से था लेकिन 2014 में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद से कांग्रेस और उसके नेतृत्व के गठबंधन की तरफ़ से ईवीएम की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर सवाल उठाए जाते रहे हैं.
पिछले साल चुनाव आयोग के मतदाता सूची में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया शुरू करने के बाद से चुनावों की विश्वसनीयता को लेकर विपक्ष के सवाल और गंभीर हो गए हैं.
कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफ़ा मांग रहे हैं. मतपत्रों से चुनाव कराए जाने की मांग भी उठ रही है.
क्या कहते हैं विश्लेषक

हालांकि, विश्लेषक इस मांग की व्यवहारिकता पर भी सवाल उठा रहे हैं.
वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता कहते हैं, "ईवीएम को लेकर सवाल हो सकते हैं लेकिन एमएलसी चुनाव और आम चुनावों की तुलना व्यावहारिक नहीं है. एक स्नातक चुनाव या शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव की तुलना संसदीय निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव से नहीं की जा सकती. दोनों के पैमाने में बहुत बड़ा अंतर है."
शरद गुप्ता कहते हैं, "शिक्षक या स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या बहुत कम होती है. कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में यह हजारों में, तो कुछ में कुछ लाख तक हो सकती है. इसके मुकाबले एक संसदीय निर्वाचन क्षेत्र में 15 से 18 लाख तक मतदाता होते हैं. अगर 18 लाख मतदाताओं के वोट बैलट पेपर से गिने जाएं, तो मतगणना में कितना समय लगेगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है. बैलट पेपर से चुनाव कराने में समय अधिक लगता है."
शरद गुप्ता बैलट पेपर से चुनाव कराने की चुनौतियों पर ज़ोर देते हुए कहते हैं, "जब बैलट पेपर से चुनाव होते थे, तो मतगणना में दो से तीन दिन लग जाते थे. बैलट पेपर छीनने, फाड़ने, मतपेटियों में पानी भरने और मतपेटियां लेकर भागने जैसी घटनाएं भी होती थीं. हिंसा की घटनाएं भी होती थीं."
हालांकि वो ये भी मानते हैं कि चुनाव प्रक्रिया में भरोसा बहाल करना इन चुनौतियों से ज़्यादा अहम है.
शरद गुप्ता कहते हैं, "अगर लोगों की मांग है, तो एक बार बैलट पेपर से चुनाव कराने में कोई हर्ज नहीं है. यह भी करके देख लीजिए, ताकि इस मुद्दे पर हमेशा के लिए बहस खत्म हो सके."
वहीं वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री कहते हैं कि यह पहली बार नहीं है जब ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं.
अत्री कहते हैं, "दुनिया के अनुभव को देखते हुए बैलट पेपर से चुनाव कराने की मांग को पूरी तरह अव्यावहारिक नहीं कहा जा सकता. जिस मशीन को इंसान ने बनाया है, उसमें गड़बड़ी या हेरफेर की आशंका क्यों नहीं हो सकती? सवाल यह है कि मशीन बनाने वाला इंसान क्या उसमें बदलाव नहीं कर सकता?"
हेमंत अत्री कहते हैं कि वर्तमान समय में सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि चुनावों की प्रक्रिया और चुनाव आयोग में लोगों का विश्वास बहाल हो.
वो कहते हैं, "जब देश की चुनावी लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं, चाहे वे ईवीएम को लेकर हों या मतदाता सूची को लेकर, तो इन चिंताओं का एक साथ समाधान क्यों नहीं होना चाहिए?"
दुनिया में इस समय 30 से अधिक देशों मतदान के लिए मशीनों का इस्तेमाल होता है. भारत और ब्राज़ील इस प्रक्रिया का इस्तेमाल करने वाले सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश हैं.
हालांकि, जर्मनी, नीदरलैंड और आयरलैंड जैसे देश ईवीएम जैसी मतदान मशीनों का इस्तेमाल बंद करके फिर से बैलट पेपर की तरफ़ लौट चुके हैं.
हालांकि भारत की ईवीएम और इन देशों में इस्तेमाल की गई मशीनों की तकनीक एक जैसी नहीं थी.
भारत का चुनाव ईवीएम में गड़बड़ी के दावों को खारिज करता रहा है. निर्वाचन आयोग ज़ोर देकर कहता रहा है कि ईवीएम सुरक्षित है और उसके साथ छेड़छाड़ नहीं की जा सकती है.
चुनाव आयोग के मुताबिक़, ये मशीनें इंटरनेट या किसी अन्य नेटवर्क से नहीं जुड़ी होती है और इन्हें हैक नहीं किया जा सकता है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एमएलसी चुनावों के बाद आए सोशल मीडिया पर पोस्ट ने एक बार फिर से बैलट पेपर की तरफ़ लौटने की बहस को तेज़ कर दिया है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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