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'सतलुज' दुनियाभर में ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म से हटाई गई, पंजाब में कई जगह फ़िल्म की स्क्रीनिंग जारी
मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित फ़िल्म 'सतलुज' को अब ओटीटी प्लेटफॉर्म से दुनियाभर से हटा लिया गया है.
इसका मतलब है कि अब यह फ़िल्म ओटीटी प्लेटफॉर्म Zee5 पर किसी भी देश में उपलब्ध नहीं होगी.
इस मामले में बीबीसी पंजाबी की अर्शदीप अर्शी ने फ़िल्म के निर्देशक हनी त्रेहन से संपर्क किया, उन्होंने इसकी पुष्टि की है.
तीन जुलाई को ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज़ होने के दो दिन बाद ही फ़िल्म को भारत में ज़ी5 प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया था.
इस बीच, समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, सरकारी सूत्रों ने शनिवार को बताया कि दिलजीत दोसांझ की फ़िल्म 'सतलुज' की सामग्री की जांच के लिए गठित समिति ने सिफारिश की है कि ऑनलाइन स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर इस फ़िल्म के प्रदर्शन पर रोक जारी रखी जाए, क्योंकि समिति का मानना है कि यह फ़िल्म कथित रूप से भारत की संप्रभुता और अखंडता के ख़िलाफ़ है.
इस फ़िल्म का मूल नाम 'पंजाब 95' था. अलग-अलग कारणों से इसकी रिलीज़ लंबे समय से अटकी हुई थी.
इस फ़िल्म को 7 फ़रवरी 2025 को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रिलीज़ किए जाने की घोषणा की गई थी और इसका टीज़र भी जारी कर दिया गया था.
हालांकि बाद में इसकी रिलीज़ एक बार फिर टाल दी गई.
फ़िल्म में दिलजीत दोसांझ, अर्जुन रामपाल, सुविंदर विक्की, जगजीत संधू और गीतिका विद्या ओहल्यान ने अलग-अलग भूमिकाएं निभाई हैं.
पंजाब के गांवों में लगातार हो रही स्क्रीनिंग
ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटाए जाने के बाद भी पंजाब के कई गांवों और शहरों में लोग इस फ़िल्म को डाउनलोड कर बड़ी एलईडी स्क्रीन पर देख रहे हैं.
पंजाब के कई गांवों में लोग अपने स्तर पर बड़ी एलईडी स्क्रीन किराये पर लेकर गुरुद्वारों और खुले स्थानों पर एकत्र होकर इस फ़िल्म का प्रदर्शन कर रहे हैं.
पिछले कुछ दिनों में गुरदासपुर, संगरूर, जालंधर, रूपनगर (रोपड़), बठिंडा, फिरोजपुर, मोगा और पटियाला समेत कई जिलों के गांवों में फिल्म 'सतलुज' के सार्वजनिक प्रदर्शन की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए हैं.
फ़िल्म की रिलीज़ क्यों टलती रही?
मार्च 2025 में बीबीसी पंजाबी ने फ़िल्म के रिलीज़ न हो पाने को लेकर निर्देशक हनी त्रेहन से बातचीत की थी.
हनी त्रेहन ने बीबीसी से कहा था कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफ़सी) ने शुरुआत में फ़िल्म में 21 कट लगाने को कहा था.
लेकिन जैसे-जैसे मामला आगे बढ़ा, कट की संख्या 120 से भी अधिक हो गई. यह मेरी समझ से परे है. कई कट ऐसे थे, जिनका कोई कारण भी नहीं बताया गया.
उस समय हनी त्रेहन ने कहा था, "यह जसवंत सिंह खालड़ा की बायोपिक है और मुझसे कहा जा रहा है कि जसवंत सिंह खालड़ा का नाम ही हटा दिया जाए. इसका मतलब तो यह हुआ कि उनका नाम लेना ही अपराध है. ऐसी सभी मांगें मंज़ूर नहीं की जा सकतीं."
उन्होंने कहा, "जिन लोगों को फ़िल्म से कोई आपत्ति है, मैं चाहता हूं कि वे आकर मुझसे बात करें. अगर उनकी कोई वाजिब आपत्ति होगी, तो मैं उसे स्वीकार करने के लिए पूरी तरह तैयार हूं. मैं एक शांति प्रिय और कानून का पालन करने वाला नागरिक हूं."
उन्होंने आगे कहा, "जिस किसी को भी आपत्ति है, उसके लिए मैं न्यायपालिका में लड़ने को तैयार हूं. लेकिन अगर आप मुझे अदालत ही नहीं जाने देंगे, तो फिर मैं क्या कर सकता हूं?"
जसवंत सिंह खालड़ा कौन थे?
जसवंत सिंह खालड़ा का 6 सितंबर 1995 को अमृतसर के कबीर पार्क स्थित उनके घर से अपहरण कर लिया गया था. इसके बाद वो कभी घर वापस नहीं लौटे.
अदालत में सीबीआई की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, जसवंत सिंह खालड़ा एक मानवाधिकार कार्यकर्ता थे और शिरोमणि अकाली दल के मानवाधिकार प्रकोष्ठ के महासचिव रह चुके थे.
सीबीआई के मुताबिक़, 1980 और 1990 के दशक में पंजाब में चरपमंथ के साथ-साथ पुलिस अत्याचार, हिरासत में मौतों और कथित फ़र्ज़ी पुलिस मुठभेड़ों की घटनाओं को लेकर लगातार चर्चा में रहा.
मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा ने जून 1984 से दिसंबर 1994 के बीच अमृतसर, मजीठा और तरनतारन के तीन श्मशान घाटों में मिले अज्ञात शवों का ब्योरा सार्वजनिक किया था.
उनका दावा था कि ये लावारिस शव पुलिस की अवैध कार्रवाइयों के गवाह हैं.
खालड़ा के इस दावे को इस तथ्य से बल मिला कि इनमें से ज़्यादातर शव पुलिस ही श्मशान घाटों तक लाई थी.
सीबीआई रिपोर्ट के मुताबिक़, जसवंत सिंह खालड़ा ने इन कथित घटनाओं के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई थी.
रिपोर्ट में कहा गया, "स्थानीय पुलिस को यह पसंद नहीं आया और उसने उनका अपहरण करने की साज़िश रची. इसी आपराधिक साज़िश के तहत स्थानीय पुलिस अधिकारियों ने 6 सितंबर 1995 को कबीर पार्क स्थित उनके घर से खालड़ा का अपहरण कर लिया."
रिपोर्ट के मुताबिक़, "उन्हें अवैध हिरासत में रखने के बाद उनकी हत्या कर दी गई और उनके शव को हरिके क्षेत्र की एक नहर में फेंक दिया गया."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.