बेंगलुरु में कोरोना से ठीक हो चुकी मरीज़ को दोबारा संक्रमण का संदेह

कोरोना वायरस
    • Author, इमरान कुरैशी
    • पदनाम, बेंगलुरु से, बीबीसी हिंदी के लिए
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 3 मिनट

बेंगलुरु के एक निजी अस्पताल ने दावा किया है कि उन्हें एक महिला में कोरोना वायरस के दोबारा संक्रमण का पहला संदिग्ध मामला मिला है.

इस निजी अस्पताल का दावा है कि 27 साल की यह महिला जुलाई महीने में कोरोना पॉज़िटिव पाई गई थी.

उस दौरान उन्हें कोई भी दूसरी बीमारी नहीं थी. टेस्ट पॉज़िटिव आने के बाद उनका इलाज हुआ और कुछ समय बाद जब दोबारा टेस्ट कराने पर उनका रिज़ल्ट नेगेटिव आया तो उन्हें छुट्टी दे दी गई.

अब पूरे एक महीने बाद, 24 अगस्त को दोबारा उनमें कोरोना संक्रमण के हल्के लक्षण जैसे शरीर में दर्द, बुखार और खांसी की शिकायत हो गई.

फोर्टिस अस्पताल के संक्रामक रोग विभाग में सलाहकार डॉ. प्रतीक पाटिल ने बीबीसी हिंदी से कहा, "हमने पहले उनका रैपिड एंटीजन टेस्ट और उसके बाद आरटी-पीसीआर टेस्ट किया. दोनों ही टेस्ट में उनकी रिपोर्ट पॉज़िटिव आयी है. उनका एंटबॉडी टेस्ट (कोविड इम्युनोग्लोब्युलिन जी) भी नेगेटिव आया है. इसके बाद ही हमें संदेह हुआ कि वो फिर से संक्रमित हो गई."

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रोग प्रतिरोधक क्षमता

डॉ. पाटिल ने कहा, " ये कोरोना से दोबारा संक्रमित होने का बेंगलुरु का यह पहला मामला हो सकता है, शायद उनके शरीर में संक्रमण के बाद भी रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित नहीं हुई हो."

उन्होंने बताया कि मरीज़ को 10 से 12 दिनों तक अस्पताल में रखने के बाद छुट्टी दे दी गई है और वो दूसरे संक्रमण से भी उबर चुकी हैं.

डॉ पाटिल बताते हैं, "आदर्श स्थिति यह होती कि हम एक आनुवांशिक विश्लेषण करते जिसमें हम यह पता करने की कोशिश करते कि यह दोनों वायरस एक-दूसरे से कितने अलग-अलग हैं. लेकिन यह दुर्भाग्य है कि हमारे पास उनके पहले टेस्ट का सैंपल नहीं है क्योंकि ऐसा कोई प्रावधान नहीं कि किसी सैंपल को बहुत लंबे समय तक सुरक्षित रखा जाए."

"तो ऐसे में एक संभावना इस बात की है कि यह एक संक्रमण है. उनके शरीर में एंटीबॉडी बने ही नहीं और हमें यह भी पता नहीं है कि कितने प्रतिशत मरीज़ों में एंटीबॉडी बनी और कितने वक़्त तक वो बनी रहती है."

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जिनोमिक सिक्वेंसिंग

डॉ. पाटिल के मुताबिक़, "इस मामले से लोगों को ये संदेश मिलता है कि अगर वो एक बार संक्रमण से उबर गए हैं तो उन्हें बहुत खुश होकर लापरवाह नहीं हो जाना चाहिए और मास्क का इस्तेमाल करते रहना चाहिए. सोशल डिस्टेसिंग के नियमों का पालन करना चाहिए और समय-समय पर अपने हाथों को साफ़ करते रहना चाहिए. एक बात और जिस पर विचार किये जाने की ज़रूरत है वो यह कि जिनोमिक सिक्वेंसिंग के लिए लंबे समय तक पॉज़िटिव मामलों के सैंपल को संग्रहित करना है."

राज्य के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के एक अधिकारी ने नाम नहीं बताने की शर्त पर बताया कि कुछ अध्ययन में स्पष्ट तौर पर पाया गया है कि बहुत से ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें मरीज़ के दो टेस्ट निगेटिव आने के बाद भी तीसरा टेस्ट जब कराया गया तो वो पॉज़िटिव आया, कभी कभी तो इन मामलों में कोई नए लक्षण भी नहीं थे.

पिछले सप्ताह मुंबई में भी एक डॉक्टर के पहली बार संक्रमण से उबरने के दो महीने बाद दोबारा संक्रमित होने का मामला सामने आया था.

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