कहां से आए ये 'शब्द'?

भाषा की ईज़ाद
    • Author, ज़ारिया गॉरवेट
    • पदनाम, बीबीसी फ्यूचर
  • प्रकाशित

दुनिया में लाखों तरह के जानवर पाए जाते हैं. इनमें से बहुत से ऐसे हैं जो आवाज़ें निकालते हैं. कोई गुर्राता है, कोई दहाड़ता है, कोई मिमियाता है, कोई फुफकारता है. मगर, सिर्फ़ इंसान ही ऐसा जीव है जो लय ताल में आवाज़ निकालता है. जिसे हम बोली या ज़बान कहते हैं.

किसी और जानवर में ये हुनर नहीं कि वो जो आवाज़ निकालता है उसे एक लड़ी में पिरोकर भाषा का रूप दे. ये सलाहियत सिर्फ़ इंसान में पायी जाती है.

कभी आपने सोचा है कि ऐसा क्यों होता है? कैसे इंसान ने अपने गले से निकलने वाली तमाम आवाज़ों को मायने दिए? कैसे शब्द गढ़े गए? फिर कैसे उन शब्दों को एक लड़ी में पिरोकर, सलीक़े से सजाकर वाक्य बनाए गए?

एपल मायने सेब कैसे तय हुआ? डॉग माने कुत्ता कैसे तय पाया गया? क्योंकि जब इंसान ने आज से हज़ारों बरस पहले बोलना शुरू किया तो उसके पास न तो कोई शब्द था, न कोई ख़ास ज़बान थी, न किसी ख़ास शब्द के ख़ास मानी तय थे.

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शुरुआत में जब इंसान ने बोलना शुरू किया होगा तो आज जैसे शब्द नहीं निकले होंगे. कुछ ऊटपटांग की आवाज़ें निकली हुई होंगी. बाद में कुछ ख़ास शब्दों के ख़ास मायने तय होते गए. अलग अलग इलाक़ों में इंसान ने अलग अलग भाषाएं विकसित कर लीं.

ऐसा कैसे हुआ होगा, इसकी मिसाल, ब्रिटेन के मशहूर फ्राय एंड लॉरी शो में देखने को मिलती है. जिसमें दो कॉमेडियन स्टीफ़न फ्राय और ह्यू लॉरी मिलकर ऊटपटांग के वाक्य बनाकर लोगों को हंसाते हैं. आज उनकी बातों पर हंसी आती है. मगर, ग़ौर से सोचिए, तो भाषा के विकास के शुरुआती दौर में ऐसा ही हुआ होगा.

आज बच्चे पैदा होने के कुछ सालों के भीतर न सिर्फ़ बोलना शुरू कर देते हैं. बल्कि व्याकरण के कुछ नियम भी बिना पढ़े ही उन्हें याद हो जाते हैं. जैसे पुल्लिंग का स्त्रीलिंग बनाना. या फिर एक वचन का बहुवचन बनाना. जैसे अंग्रेज़ी में एक कुत्ता है तो dog कहेंगे. कई कुत्ते होंगे तो dogs कहेंगे. सिर्फ़ s अक्षर जोड़कर उसे बहुवचन बनाने का हुनर बच्चों में तीन चार बरस की उम्र में ही आ जाता है. जबकि उस वक़्त तक उन्हें व्याकरण नहीं पढ़ाया गया होता.

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स्कॉटलैंड की एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी के साइमन किर्बी, भाषाओं की पैदाइश के बारे में लिखते पढ़ते रहते हैं. उन्होंने इस बारे में काफ़ी तजुर्बे भी किए हैं. किर्बी कहते हैं कि इंसान की ज़बान की सबसे बड़ी ख़ूबी यही है कि हम इसके ज़रिए उन बहुत सी चीज़ों के बारे में बात कर लेते हैं जिनके बारे में हमने पहले कभी सुना भी नहीं होता.

अब अंग्रेज़ी को ही ले लीजिए. अंग्रेज़ी बोलने वाले ज़्यादातर लोग तीस हज़ार शब्द ही जानते हैं. इतने छोटी दिमाग़ी डिक्शनरी की मदद से उन्हें अपनी ज़िंदगी में क़रीब दो खरब ख़्यालों को शब्दों में बयां करना होता है. और आप ये जानकर हैरान रह जाएंगे कि एक इंसान दिन भर में औसतन 20 हज़ार शब्द बोलता है.

अब उसे मालूम हैं केवल तीस हज़ार शब्द. बीस हज़ार वो रोज़ इस्तेमाल करता है. शब्दों की इसी पूंजी से उसे सारी ज़िंदगी काम चलाना होता है. इसका तरीक़ा यही होता है कि वो शब्दों को अलग अलग तरीक़े से पिरोकर रोज़ नए जुमले गढ़े. ताकि नए ख़यालों को बयां किया जा सके. हो सकता है कि जब भी आप कुछ कहने के लिए मुंह खोलें तो हर बार पुराने शब्दों की मदद से नई बात कहें. अब देखिए न, इंटरनेट पर एकदम नई तरह की भाषा बोली जा रही है. हालांकि शब्दों में नयापन नहीं. बस उन्हें पिरोने का तरीक़ा-सलीक़ा बदल गया है.

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साइमन किर्बी कहते हैं कि हर शब्द के मायने होते हैं. छोटे-छोटे मायने. इन शब्दों को एक ख़ास तरह से पिरोकर कहने पर उसके बड़े मायने निकलते हैं. तमाम ज़बानें ऐसे ही विकसित हुई हैं.

इंसान के इतिहास में हज़ारों भाषाएं विकसित हुई हैं. दुनिया के हर हिस्से में अलग भाषा और बोलियां सुनने को मिलती हैं. मगर दिलचस्प बात ये है कि इनमें से किसी को भी इंसानों ने साथ मिल बैठकर तय नहीं किया है. ये बोलियां, ये भाषाएं अपने आप ही विकसित हुई हैं. और पीढ़ी दर पीढ़ी ये सिलसिला आगे बढ़ता जा रहा है.

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साठ के दशक में यही बात समझने के लिए बोस्टन यूनिवर्सिटी की जीन ग्लीसन ने एक तजुर्बा किया था. उन्होंने बच्चों के साथ बैठकर कुछ ऊटपटांग की आकृतियां बनाईं. फिर बच्चों से उनके नाम बताने को कहा. बच्चों ने भी अजीबो-ग़रीब नाम दिए. इनमें से एक स्केच तो ऐसा मशहूर हुआ कि उसके नाम पर पूरी दुनिया में ये टेस्ट किया गया. इसे वुग के नाम से जाना गया. तीन-चार बरस के बच्चों ने जीन ग्लीसन के तजुर्बे में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. उन्होंने नीले रंग के इस स्केच को 'वुग' नाम दिया. उसकी हरकतों को भी अलग अलग क्रिया नाम बच्चों ने दिए. मगर जीन ग्लीसन ये देखकर हैरान रह गईं कि बच्चे व्याकरण के बुनियादी नियमों को अच्छे से जानते और उनका उपयोग कर रहे थे. जैसे wug का बहुवचन wugs होगा. Bod का भूतकाल odded होगा.

इस 'वुग टेस्ट' से पता चलता है कि कैसे पीढ़ी दर पीढ़ी इंसान की ज़बान हज़ारों बरस का सफ़र तय करके हमारे आपके पास पहुंची. उस दौर से जब स्कूल नहीं हुआ करते थे. पढ़ाने के लिए मास्टरजी नहीं होते थे. तो, बच्चे अपने बड़ों को बोलते बतियाते देखकर सीखते थे.

पर सवाल ये है कि आख़िर किसी भी भाषा के जो नियम हम आज जानते हैं, वो बने तो कैसे? किसने तय किए वो नियम? हर ज़बान में व्याकरण के नियम अलग-अलग होते हैं. तो वो हमे आनुवांशिक तौर पर तो मिलते नहीं. फिर बच्चे इतनी जल्दी किसी भाषा के बुनियादी नियम कैसे सीख लेते हैं?

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इसे समझने के लिए एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी के साइमन किर्बी ने कुछ छात्रों को एक नई ज़बान सीखने का प्रस्ताव दिया. उन्हें कहा गया कि इसके शब्द ऊटपटांग के होंगे. इन्हीं से नई भाषा बनानी है.

साइमन की टीम ने कुछ ऊटपटांग के स्केच बनाए. फिर, छात्रों ने उनके अजब-ग़ज़ब नाम रखे. छात्रों के एक बैच से शुरुआत करते हुए साइमन और उनकी टीम ने कुछ दिनों बाद छात्रों की दूसरी टीम बुलाई. फिर अगला बैच आया. और इस तरह हर जाने वाली टीम, नए छात्रों को कुछ नए शब्द, उनसे बनने वाले वाक्य बताते हुए जाती. साइमन ये देखकर हैरान रह गए कि कुछ ही महीनों में ऊटपटांग शब्दों की एक नई भाषा तैयार हो गई थी.

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साइमन के मुताबिक़ अगर हम कुछ ख़ास आवाज़ों को शब्दों का रूप दे दें. फिर उन शब्दों के कुछ मायने तय कर दें. तो इन शब्दों से नए वाक्य गढ़े जा सकते हैं. कई तरह के वाक्य गढ़े जा सकते हैं.

यही इंसान की आवाज़ के ज़बान में तब्दील होने का ज़रिया रहा होगा. जब हज़ारों साल पहले आदि मानव ने आवाज़ को शब्दों में ढालना शुरू किया. फिर पीढ़ी दर पीढ़ी शब्द बनते गए. उन शब्दों से तरह-तरह के वाक्य बनते गए. शुरुआत में लोगों को वो आवाज़, वो शब्द ऊटपटांग के और अटपटे लगे होंगे. मगर जब उनके मायने तय हो गए. तो हर आवाज़ शब्द में और कई शब्द मिलकर वाक्य में तब्दील हो गए. और इस तरह इंसान बाक़ी जानवरों से अलग हटकर बातें करने लगा.

तो, अब आपने समझ लिया होगा कि आपने बातें बनाना कैसे सीखा! है कि नहीं?

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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