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मध्य प्रदेश में सरपंच हाथ जोड़कर मना करती रहीं, 'एसडीएम के आदेश पर चलता रहा बुलडोज़र' - ग्राउंड रिपोर्ट
- Author, विष्णुकांत तिवारी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
"मैं बहुत डरा हुआ हूं, जो लोग स्कूल गिरा सकते हैं वह मेरा क्या हश्र करेंगे?"
यह कहना था मध्य प्रदेश के बैतूल ज़िले के धाबा गांव में रहने वाले अब्दुल नईम का.
इसी गांव में अब्दुल नईम की ज़मीन पर बनाए जा रहे एक निजी स्कूल को प्रशासन ने मदरसा बताकर ढहा दिया था जबकि ग्रामीण उसे न तोड़े जाने की गुहार लगा रहे थे.
ज़िला प्रशासन का कहना है कि पंचायत ने स्कूल की निर्माणाधीन इमारत पर बुल्डोज़र चलवाया है जबकि सरपंच और उप सरपंच इससे साफ़ इनकार कर रहे हैं.
ज़िला कलेक्टर का कहना है कि यह आदेश उन्होंने नहीं दिया था और पंचायत के आदेशों को रोकने की शक्ति कलेक्टर के पास नहीं होती है. हालाँकि वो मामले की जांच कर रहे हैं.
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बैतूल के ज़िलाधिकारी पहले यह कहते हैं कि यह कार्रवाई पूरी तरह क़ानूनी है और इसमें उनके अधिकारियों का कोई दोष नहीं है. इसके बाद वह यह भी कहते हैं कि वह मामले की जांच कर रहे हैं.
स्कूल बनाने के लिए अपनी जमा-पूंजी ही नहीं उधार का पैसा लगाने वाले अब्दुल नईम घबराए हुए हैं.
वह बात करने से कतराते रहे और कैमरे के पीछे उन्होंने दो टूक कहा, "जिन्होंने स्कूल को तोड़ दिया वह मेरे लिए आगे भी कई मुसीबतें खड़ी कर सकते हैं. मैं तो एक आम नागरिक हूं और मैं सिस्टम से नहीं लड़ सकता."
गांव की सरहद के बाहर उन्होंने बीबीसी से दो दिन बाद बात की.
क्या है पूरा मामला?
बैतूल जिले के भैंसदेही ब्लॉक की धाबा ग्राम पंचायत में रहने वाले अब्दुल नईम अब स्कूल की बात नहीं करना चाहते. लेकिन एक प्राइवेट स्कूल कैसे राजनीति की भेंट चढ़ गया, यह कहानी हम आपको बताते हैं.
धाबा गांव की आबादी करीब दो हजार है. यह आदिवासी बाहुल्य गांव है और यहां केवल तीन मुस्लिम परिवार रहते हैं. गांव में सरकारी स्कूल है लेकिन कई परिवार बच्चों को बेहतर पढ़ाई के लिए गांव से 10-15 किलोमीटर दूर तक प्राइवेट स्कूल में पढ़ने के लिए भेजते हैं.
गांव में खेती के अलावा कोई स्थाई रोज़गार का साधन न होने से यहां ज़्यादातर परिवारों के लिए स्कूल पहुंचने का किराया और फ़ीस दोनों बड़ी समस्या हैं. इसी वजह से अब्दुल नईम ने तय किया कि वह गांव में ही एक छोटा निजी स्कूल खोलेंगे.
अब्दुल कहते हैं, "मैं अपने बच्चों को पढ़ने के लिए काफ़ी दूर भेजता हूं. उनको रोज़ लाना ले जाना मेरे लिए भी कठिन था. और छोटे बच्चों को बस या ऑटो के हवाले भेजने में भी डर लगता है. इसलिए मैंने सोचा कि एक स्कूल खोला जाए ताकि यहां आस-पास के सभी गांव के बच्चों के लिए सहूलियत हो जाए".
इसके लिए उन्होंने अपनी जमा पूंजी और उधार के पैसों से करीब बीस लाख रुपये लगाए.
नईम ने 2023 में अपने भाई से ज़मीन खरीदी. उसका डायवर्जन कराया और निर्माण शुरू किया.
30 दिसंबर 2025 को उन्होंने नर्सरी से आठवीं तक स्कूल चलाने के लिए प्रदेश के शिक्षा विभाग और बोर्ड में आवेदन किया. निर्माण तेजी से चल रहा था. दो तरफ फेंसिंग लग चुकी थी.
दो दिन के अंदर बुलडोज़र चलवा दिया
गांव के उप सरपंच संदीप उइके ने बीबीसी से कहा, "शनिवार 10 जनवरी को गांव में एसडीएम अजीत मरावी, पंचायत सचिव पवन तिवारी और अन्य अधिकारी आए. उन्होंने ही कहा कि इस भवन निर्माण को रोका जाए और इस पर कार्रवाई की जाए".
यह पूछने पर कि कार्रवाई किस कारण की जा रही थी, संदीप कहते हैं, "भवन बनाने की एनओसी पंचायत से नहीं ली गई थी."
इसके बाद 11 जनवरी की शाम 7 बजे अब्दुल नईम को एक नोटिस दिया जाता है. इसमें 16 दिसंबर को पारित किए गए एक कथित प्रस्ताव का हवाला देकर कहा गया कि निर्माण कार्य रोका जाए और भवन को ख़ुद ही गिरा दिया जाए.
इस नोटिस में पंचायत सचिव और गांव की सरपंच रामरती के हस्ताक्षर थे.
12 जनवरी को अब्दुल नईम ने एनओसी के लिए आवेदन दिया और उसी दिन सरपंच के हस्ताक्षर के साथ एनओसी दे दी गई. हालांकि इसमें पंचायत सचिव के हस्ताक्षर नहीं थे.
13 जनवरी को एसडीएम, पंचायत सचिव और अन्य अधिकारियों ने स्कूल के लिए बनाई जा रही इमारत पर बुलडोज़र चलवा दिया.
अब्दुल कहते हैं, "दो साल के सपने, लाखों रुपये का खर्च और कई लोगों की मेहनत पर आवेदन के 15 दिनों के भीतर पानी फिर गया".
'कार्रवाई लीगल थी, पर जांच कर रहा हूं'
बीबीसी ने पंचायत सचिव और एसडीएम से कई बार बात करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया.
एसडीएम और अन्य प्रशासनिक अधिकारी 10 जनवरी को धाबा गांव क्यों पहुंचे थे? किसकी शिकायत पर पहुंचे थे? सरपंच के मना करने के बाद भी बुलडोज़र कार्रवाई क्यों की गई?
इन सवालों के साथ जब हमने ज़िला कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी से बात की तो उन्होंने कहा, "प्रशासनिक अधिकारी पंचायत के नोटिस की तामील कराने गए थे. मेरे पास यह मामला 13 जनवरी को आया था जब अब्दुल कलेक्टर कार्यालय पहुंचे थे. मैंने तब भी कहा था कि मैं किसी अवैध चीज़ में आपका सहयोग नहीं करूंगा… अभी मैं इस मामले की जांच कर रहा हूं."
बीबीसी ने फिर उनसे सवाल किया कि जब शिकायतकर्ता अब्दुल नईम कार्रवाई के पहले कलेक्टर के पास पहुंचे थे और वह इसकी जांच भी कर रहे हैं, इसके बाद भी बुलडोज़र क्यों चलवाया गया?
इसके जवाब में उन्होंने कहा, "यह आदेश मैंने नहीं दिया था और पंचायत के आदेशों को रोकने की शक्ति कलेक्टर के पास नहीं होती है. इसके अलावा यह पहला नोटिस नहीं था. बल्कि इसके पहले तीन नोटिस दिए जा चुके थे और यह चौथा नोटिस दिया गया था. मेरी नज़र में कार्रवाई लीगल थी, लेकिन मैं जांच कर रहा हूं."
गांव के उपसरपंच, सरपंच के पति और अन्य ग्रामीणों का कहना है कि इसके पहले कोई नोटिस नहीं दिया गया था और यह कार्रवाई गलत है.
'अधिकारियों ने कार्रवाई के मौखिक निर्देश दिए'
ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाए कि ग्राम पंचायत को स्कूल के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने और नोटिस देने का मौखिक निर्देश एसडीएम और अन्य अधिकारियों ने दिया था.
ज़िला कलेक्टर ने इन आरोपों को नकारते हुए कहा, "यह कार्रवाई पंचायत द्वारा की गई थी".
हालांकि गांव वालों के बनाए वीडियोज़ में देखा जा सकता है कि 13 जनवरी को गांव के लोग, सरपंच और अन्य पदाधिकारियों के साथ कार्रवाई रोकने की गुहार लगा रहे थे लेकिन उनकी बात नहीं सुनी गई.
अचानक हुई कार्रवाई से गांव में गुस्सा और डर दोनों फैल गया.
बीबीसी से बात करते हुए धाबा गांव की मुख्य सड़क पर कपड़े की दुकान लगाने वाले कपिल भगत सिंह कावड़े कहते हैं, "जो कार्रवाई हुई वह गलत हुई है. हम लोग नहीं चाहते थे कि स्कूल पर बुलडोज़र चलाया जाए. हम लोग 13 जनवरी को कलेक्टर महोदय से बात करने, शिकायत करने पहुंचे थे और हमारे गांव लौटने के पहले ही स्कूल पर बुलडोज़र चला दिया गया."
कपिल सहित अन्य ग्रामीणों ने पहली बार उम्मीद की थी कि उनके बच्चे गांव में ही पढ़ पाएंगे, वे लोग मलबे के सामने खड़े होकर सवाल पूछते दिखे.
कई परिवार कहते हैं कि यह इमारत उनके बच्चों का भविष्य थी. ग्रामीणों को अब भी यह नहीं समझ आ रहा कि आख़िर स्कूल पर इतनी जल्दबाज़ी में कार्रवाई क्यों की गई?
बुलडोज़र कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा है?
हाल के वर्षों में बुलडोज़र कार्रवाइयों पर अदालतों ने बार-बार चेताया है. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि क़ानून के शासन में मनमानी प्रशासनिक कार्रवाई की कोई जगह नहीं है.
तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बीआर गवई ने कहा था कि किसी भी ढांचे को गिराने से पहले लिखित नोटिस और सुनवाई का अवसर देना जरूरी है. कार्यपालिका अदालत की भूमिका नहीं निभा सकती और दोष तय करने का अधिकार केवल न्यायालय का है.
अब्दुल नईम के मामले में नोटिस 48 घंटे से भी कम समय का था. जिस दिन वह अपनी बात रखने ज़िला मुख्यालय पहुंचे उसी दिन उनकी इमारत गिरा दी गई.
अब धाबा गांव में एक अधूरी इमारत खड़ी है. टूटी दीवारों के बीच रखी कुर्सियां और मेंज़ सवाल बनकर रह गए हैं. नईम कहते हैं कि उन्होंने बच्चों के लिए सोचा था, अब न स्कूल बचेगा न सपना.
एक ग्रामीण ने चर्चा के बीच कहा, "यहां सिर्फ एक इमारत नहीं टूटी. भरोसा भी टूटा है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.