ऑनलाइन मंगाया गया सामान एक्सपायर्ड निकले तो आपके क्या अधिकार हैं?

    • Author, शुभ राणा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 9 मिनट

ऑनलाइन ग्रॉसरी मंगाते समय ज़्यादातर लोग यह देखते हैं कि उनका ऑर्डर कितनी जल्दी पहुंचेगा. लेकिन सामान मिलने के बाद कितने लोग पैकेट पर लिखी तारीख़ भी जाँचते हैं?

हाल ही में क्विक-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म ज़ेप्टो से जुड़े एक मामले ने इसी सवाल की तरफ़ ध्यान खींचा है.

भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफ़एसएसएआई) ने एक शिकायत के बाद कंपनी को नोटिस जारी किया है. शिकायत में आरोप लगाया गया कि ग्राहक को बेसन के ऐसे पैकेट मिले, जिनकी 'यूज़-बाय' तारीख़ निकल चुकी थी.

एफ़एसएसएआई के मुताबिक़, सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर की गई शिकायत में कहा गया था कि बेसन के दो पैकेटों पर 'यूज़-बाय: 12-09-2026' लिखा था. इसके बाद एफ़एसएसएआई ने कंपनी से जवाब मांगा और मामले की जाँच करने को कहा.

इस मामले में जाँच अभी जारी है. लेकिन इस शिकायत ने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं.

अगर ऑनलाइन मंगाया गया कोई खाद्य पदार्थ एक्सपायर्ड निकल आए तो ग्राहक क्या कर सकता है? क्या वह सिर्फ़ रिफंड मांग सकता है या मुआवज़ा भी मांग सकता है? अगर खाने की चीज़ की जगह कोई एक्सपायर्ड दवा पहुंच जाए तो क्या नियम अलग होंगे? और ऐसे मामलों में क़ानून क्या कहता है?

हमने उपभोक्ता अधिकारों और खाद्य सुरक्षा से जुड़े जानकारों से बात कर यह समझने की कोशिश की कि ऐसे मामलों में ग्राहकों के पास क्या विकल्प होते हैं और कंपनियों की क्या ज़िम्मेदारी बनती है.

ऑनलाइन एक्सपायर्ड सामान मिले तो ग्राहक क्या करे?

सुप्रीम कोर्ट के वकील और उपभोक्ता कानून विशेषज्ञ सत्यम सिंह राजपूत के मुताबिक़, ''अगर किसी ग्राहक को ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म से एक्सपायर्ड खाद्य पदार्थ मिलता है, तो वह कंपनी और विक्रेता के ख़िलाफ़ शिकायत कर सकता है. ऐसे मामलों में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 और खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 के तहत कार्रवाई हो सकती है.''

उनका कहना है कि ग्राहक को पैकेट, एक्सपायरी डेट, बिल और ऑर्डर से जुड़ी जानकारी संभालकर रखनी चाहिए.

सबसे पहले कंपनी के कस्टमर केयर में शिकायत करें. अगर समस्या का समाधान नहीं होता है, तो राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन के नंबर 1915 या एफ़एसएसएआई के 'फ़ूड सेफ़्टी कनेक्ट' पोर्टल पर शिकायत की जा सकती है.

ग्राहक उपभोक्ता आयोग में भी जा सकता है. मामले के आधार पर आयोग सामान के पैसे लौटाने, मुआवज़ा देने और मुक़दमे का खर्च चुकाने का आदेश दे सकता है.

वहीं, अगर जाँच में खाद्य सुरक्षा नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो कंपनी या विक्रेता पर जुर्माना लगाया जा सकता है.

कुछ मामलों में उनका लाइसेंस भी रद्द हो सकता है.

अगर खाद्य पदार्थ को असुरक्षित पाया जाता है, तो क़ानून के तहत जेल और जुर्माने की कार्रवाई भी हो सकती है.

हालांकि, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि नियमों का उल्लंघन किस तरह का है.

एक्सपायर्ड खाना सेहत के लिए कितना ख़तरनाक है?

पब्लिक हेल्थ फ़ाउंडेशन ऑफ़ इंडिया की उपाध्यक्ष (रिसर्च और हेल्थ प्रमोशन) प्रोफ़ेसर मोनिका अरोड़ा के मुताबिक़, एक्सपायर्ड खाने का जोखिम इस बात पर निर्भर करता है कि वह किस तरह का है और उसे कैसे रखा गया है.

बेसन, आटा, अनाज और मसालों जैसी सूखी चीज़ों में नमी आने पर फफूंद लग सकती है. इससे ऐसे ज़हरीले तत्व बन सकते हैं, जो लिवर को नुकसान पहुँचा सकते हैं और लंबे समय में लिवर कैंसर का जोखिम बढ़ा सकते हैं.

वहीं, दूषित खाना खाने से उल्टी, दस्त और पेट दर्द जैसी समस्याएँ भी हो सकती हैं.

प्रोफ़ेसर अरोड़ा के मुताबिक़, खाने के पैकेट पर लिखी तारीख़ का मतलब समझना भी ज़रूरी है. जैसे, 'बेस्ट बिफोर' तारीख़ आम तौर पर खाने की गुणवत्ता बताती है, जबकि 'यूज़-बाय' या 'एक्सपायरी' तारीख़ के बाद उत्पाद खाना सुरक्षित नहीं रह सकता.

अरोड़ा कहती हैं कि ऑनलाइन खरीदारी में ग्राहक सामान को हाथ में लेकर जाँच नहीं पाते, इसलिए पैकेट पर लिखी तारीख़ और दूसरी जानकारी साफ़ होना और भी ज़रूरी है. अगर पैकेट पर तारीख़ पढ़ने में परेशानी हो या सामान की सुरक्षा को लेकर शक हो, तो उसे खाने से बचना चाहिए.

एक्सपायर्ड सामान के लिए कौन ज़िम्मेदार है?

सत्यम सिंह राजपूत के मुताबिक़, ऐसे मामलों में सामान बेचने वाले, उसे बनाने वाली कंपनी और ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म की ज़िम्मेदारी है. अगर विक्रेता एक्सपायर्ड सामान बेचता है, तो उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई हो सकती है. वहीं, अगर ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म की अपनी सेवाओं में कमी पाई जाती है, तो उसे भी जवाबदेह ठहराया जा सकता है.

उनका कहना है कि प्लेटफ़ॉर्म सिर्फ़ यह कहकर अपनी ज़िम्मेदारी से नहीं बच सकता कि सामान किसी दूसरे विक्रेता ने बेचा था. हालांकि, किसकी कितनी ज़िम्मेदारी बनती है, यह मामले के तथ्यों और कानून पर निर्भर करता है.

एफ़एसएसएआई की 2024 की एडवाइज़री के मुताबिक़, ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि डिलीवरी के समय खाने-पीने के सामान की एक्सपायरी में कम से कम 30 फ़ीसदी शेल्फ़ लाइफ़ या 45 दिन बाकी हों.

एडवाइज़री में यह भी कहा गया है कि प्लेटफ़ॉर्म पर सामान बेचने वालों का वैध एफ़एसएसएआई लाइसेंस दिखना चाहिए और प्रोडक्ट के बारे में ऑनलाइन दी गई जानकारी पैकेट पर लिखी जानकारी से मेल खानी चाहिए.

भारत में पहले भी ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां उपभोक्ता आयोगों ने ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म या विक्रेताओं को ग्राहक के पैसे लौटाने और मुआवज़ा देने का आदेश दिया है. इन मामलों में ग्राहक को हुई परेशानी और कानूनी खर्च के लिए भी राहत दी गई है. हालांकि, हर मामले में कार्रवाई इस बात पर निर्भर करती है कि शिकायत क्या है और उसके समर्थन में क्या सबूत हैं.

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक़, जून 2026 में हैदराबाद के ज़िला उपभोक्ता आयोग ने एक्सपायर्ड चिकन डिलीवर करने के मामले में स्विगी इंस्टामार्ट और केवेंटर एग्रो लिमिटेड को ग्राहक को 20,000 रुपये देने का आदेश दिया. इसमें 10,000 रुपये मुआवज़े और 10,000 रुपये मुक़दमे के खर्च के थे.

वहीं, लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक़, जुलाई 2026 में हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा ज़िला उपभोक्ता आयोग ने एक्सपायर्ड नूडल्स बेचने के मामले में रिलायंस स्मार्ट पॉइंट को ग्राहक को 15,000 रुपये मुआवज़ा और 5,000 रुपये मुक़दमे का खर्च देने का आदेश दिया.

साथ ही, मुख्यमंत्री राहत कोष में 2.5 लाख रुपये जमा करने को कहा. शिकायत के मुताबिक़, नूडल्स खाने के बाद ग्राहक का बच्चा बीमार पड़ गया था.

अगर ऑनलाइन मंगाई गई दवा एक्सपायर्ड निकले, तो क्या कर सकते हैं?

खाने-पीने का कोई सामान एक्सपायर्ड मिलना चिंता की बात है, लेकिन अगर ऑनलाइन मंगाई गई दवा की एक्सपायरी डेट निकल चुकी हो, तो मामला और गंभीर हो सकता है. ऐसे मामलों में ग्राहक के पास क्या कानूनी विकल्प हैं?

एडवोकेट सत्यम सिंह राजपूत के मुताबिक़, दवाओं की बिक्री और उनके रखरखाव के लिए खाद्य पदार्थों से अलग और सख़्त नियम हैं. ऐसे मामलों में औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 के तहत कार्रवाई हो सकती है.

उनका कहना है कि ग्राहक सबसे पहले संबंधित ई-फ़ार्मेसी या ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर शिकायत कर सकता है. अगर समस्या का समाधान नहीं होता, तो राज्य के औषधि नियंत्रक या ड्रग इंस्पेक्टर से संपर्क किया जा सकता है. ग्राहक राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन के नंबर 1915 पर भी शिकायत दर्ज करा सकता है या उपभोक्ता आयोग जा सकता है.

अगर एक्सपायर्ड दवा लेने से किसी की तबीयत बिगड़ती है, तो वह मामले के तथ्यों के आधार पर मुआवज़े की मांग भी कर सकता है.

हालांकि, ऐसी स्थिति में सबसे पहले डॉक्टर से सलाह लेना ज़रूरी है. दवा का पैकेट, बिल और ऑर्डर से जुड़ी जानकारी भी संभालकर रखनी चाहिए, ताकि शिकायत करते समय इन्हें सबूत के तौर पर इस्तेमाल किया जा सके.

गंभीर मामलों में, अगर एक्सपायर्ड दवा की बिक्री में कानून का उल्लंघन पाया जाता है, तो संबंधित विक्रेता या ज़िम्मेदार लोगों के ख़िलाफ़ स्थानीय पुलिस में एफआईआर भी दर्ज कराई जा सकती है. हालांकि, यह कार्रवाई मामले के तथ्यों और लागू कानूनी प्रावधानों पर निर्भर करेगी.

एक्सपायर्ड सामान का कंपनियाँ क्या करती हैं?

किसी प्रोडक्ट की एक्सपायरी डेट निकलने के बाद उस सामान का क्या होता है? क्या उसे नष्ट कर दिया जाता है या कहीं और बेचने की कोशिश भी हो सकती है?

सत्यम कहते हैं कि कंपनियां आम तौर पर एक्सपायर्ड सामान को दुकानों और गोदामों से वापस मंगाती हैं. इसके बाद उसे तय प्रक्रिया के तहत नष्ट किया जाता है या सुरक्षित तरीके से उसका निपटारा किया जाता है.

कंपनियां ऐसे सामान का हिसाब भी रखती हैं और कई बार निर्माता या वितरक से उसका पैसा वापस लेने के लिए क्लेम करती हैं.

लेकिन चिंता तब बढ़ती है, जब कुछ विक्रेता गलत तरीके से एक्सपायर्ड सामान को दोबारा बेचने की कोशिश करते हैं. इसके लिए पैकेट पर लिखी पुरानी तारीख़ के ऊपर नया लेबल चिपकाया जा सकता है या तारीख़ बदलकर सामान को नया दिखाया जा सकता है. इस तरह ग्राहक को पता भी नहीं चलता कि वह जो सामान खरीद रहा है, उसकी एक्सपायरी पहले ही निकल चुकी है.

सिंह के मुताबिक़, ऐसा करना कानून का उल्लंघन है. अगर जाँच में खाने-पीने के सामान की तारीख़ बदलने या गलत जानकारी देकर उसे बेचने की पुष्टि होती है, तो संबंधित विक्रेता या कंपनी के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जा सकती है.

खाद्य पदार्थों पर गलत लेबल लगाने या भ्रामक जानकारी देने पर खाद्य सुरक्षा कानून के तहत तीन लाख से दस लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है.

ऐसे मामलों में ग्राहक एफएसएसएआई या खाद्य सुरक्षा विभाग में शिकायत कर सकते हैं और उपभोक्ता आयोग का भी रुख़ कर सकते हैं.

ऐसे में सवाल सिर्फ़ यह नहीं है कि एक्सपायर्ड सामान ग्राहक तक कैसे पहुंचा, बल्कि यह भी है कि उसे बिक्री से हटाने और दोबारा बाज़ार में पहुंचने से रोकने की व्यवस्था कितनी मज़बूत है.

उपभोक्ता कहां चूक रहे हैं?

प्रोफ़ेसर मोनिका अरोड़ा के मुताबिक़, खाद्य सुरक्षा के मामले में एक बड़ी चुनौती लोगों का खाने के पैकेट पर लिखी जानकारी को ठीक से न समझ पाना है. कई लोग 'बेस्ट बिफोर' और 'यूज़-बाय' या 'एक्सपायरी' तारीख़ को एक ही समझते हैं. जबकि 'बेस्ट बिफोर' मुख्य रूप से खाने की गुणवत्ता बताता है और 'यूज़-बाय' या 'एक्सपायरी' तारीख़ के बाद उसे खाना सुरक्षित नहीं रह सकता.

प्रोफ़ेसर अरोड़ा कहती हैं, "एक और समस्या यह है कि लोग खाने की सुरक्षा का अंदाज़ा उसकी गंध, स्वाद या रंग देखकर लगाते हैं. लेकिन कई बार खाने में मौजूद हानिकारक तत्वों का पता इन तरीकों से नहीं चलता. इसी तरह, खाना गर्म करने या फफूंद वाले हिस्से को हटाने से भी वह हमेशा सुरक्षित नहीं हो जाता."

प्रोफ़ेसर अरोड़ा सलाह देती हैं, "खाने का सामान खरीदते या इस्तेमाल करते समय पैकेट की सील, उस पर लिखी तारीख़ और उसे रखने के निर्देश देखना ज़रूरी है. अगर पैकेट फूला हुआ है या उसमें से कुछ रिस रहा है, तो उसे नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए. ऑनलाइन ग्रॉसरी मंगाते समय यह और भी अहम हो जाता है, क्योंकि ग्राहक सामान ऑर्डर करने से पहले उसे हाथ में लेकर जाँच नहीं सकते."

वह यह भी कहती हैं कि लोगों को यह पता होना चाहिए कि अगर कोई सामान एक्सपायर्ड मिले या उसके लेबल पर गलत जानकारी हो, तो शिकायत कहां करनी है. जागरूकता की कमी के कारण कई बार लोग ऐसी गड़बड़ियों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं और असुरक्षित सामान इस्तेमाल कर लेते हैं.

खासकर उन घरों में, जहां किराने का सामान एक व्यक्ति ऑनलाइन मंगाता है और खाना कोई दूसरा बनाता है, वहां पैकेट की तारीख़ और दूसरी जानकारी पर ध्यान न जाने का जोखिम रहता है. इसलिए खाद्य सुरक्षा के बारे में जानकारी सिर्फ़ सामान खरीदने वाले तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि खाना बनाने और इस्तेमाल करने वाले हर व्यक्ति तक पहुंचनी चाहिए.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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