आप इस वेबसाइट का टेक्स्ट-ओनली वर्शन देख रहे हैं जो कम डेटा खर्च करता है. सभी तस्वीरों और वीडियो के साथ वेबसाइट का मुख्य वर्शन देखें.
सर्दियां शुरू होते ही हर साल दिल्ली की हवा इतनी ख़राब क्यों हो जाती है?
- Author, दुष्यंत कुमार
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
31 अक्तूबर को दिल्ली का औसत एक्यूआई 117 था. एक नवंबर को यह बढ़कर 261 और दो नवंबर को 324 पर पहुंच गया. यानी केवल दो दिनों में देश की राजधानी की हवा 'मध्यम' से 'बहुत ख़राब' हो गई.
एक्यूआई से पता चलता है कि किसी जगह की हवा कितनी साफ़ या प्रदूषित है. इसका आंकड़ा जितना बढ़ता है, हवा उतनी ही ख़राब मानी जाती है.
हवा बिगड़ने के बाद वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने पूरे दिल्ली-एनसीआर में ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (ग्रैप) का दूसरा चरण लागू कर दिया. ग्रैप वह व्यवस्था है, जिसके तहत प्रदूषण बढ़ने पर अलग-अलग स्तर की पाबंदियां लगाई जाती हैं.
तीन नवंबर की सुबह आठ बजे दिल्ली का औसत एक्यूआई बढ़कर 330 हो गया. हालात ऐसे थे कि जिन इलाक़ों में लोग अपनी छतों से दूर तक दिल्ली के स्मारक साफ़ देख पाते थे, वहां देखने की दूरी घटकर 100 मीटर से भी कम रह गई.
दिल्ली में हवा की गुणवत्ता मापने के लिए कुल 60 निगरानी केंद्र हैं. वेबसाइट पर ताज़ा अपडेट के मुताबिक 57 केंद्रों से आंकड़े मिल रहे हैं, जबकि तीन से जानकारी नहीं आ रही थी.
लेकिन सवाल है कि दिल्ली में सर्दियां शुरू होते ही हर साल हवा इतनी ख़राब क्यों हो जाती है? क्या इसकी मुख्य वजह पराली है या राजधानी के भीतर मौजूद प्रदूषण के दूसरे स्रोत? और सरकार के उठाए क़दम क्या इसे रोकने के लिए काफ़ी हैं?
सर्दियों में प्रदूषण क्यों बढ़ता है?
द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यू (टेरी) की वरिष्ठ शोधकर्ता और एसोसिएट डायरेक्टर डॉ. अंजू गोयल कहती हैं कि सर्दियों में मौसम की वजह से दिल्ली की हवा बिगड़ने का ख़तरा हर साल बना रहेगा.
गाड़ियों, कारखानों, निर्माण कार्यों और कचरा जलाने से पूरे साल धुआं और धूल हवा में पहुंचते हैं. लेकिन गर्मियों और सर्दियों में इस प्रदूषण के छंटने की रफ़्तार एक जैसी नहीं होती.
सर्दियों में कई बार ज़मीन के पास की हवा ठंडी और उसके ऊपर की हवा गर्म होती है. इस वजह से नीचे की हवा आसानी से ऊपर नहीं जा पाती.
अगर हवा की रफ़्तार भी कम हो, तो धुआं और धूल ज़मीन के पास जमा होने लगते हैं.
हवा किस दिशा से आ रही है, इससे भी फ़र्क़ पड़ता है. अगर हवा पराली जलने वाले इलाक़ों से दिल्ली की ओर आती है, तो वह अपने साथ वहां का धुआं भी ला सकती है.
डॉ. गोयल के मुताबिक़, मौसम को बदला नहीं जा सकता. इसलिए सरकारों को पूरे साल उन जगहों पर प्रदूषण कम करना होगा, जहां से धुआं और धूल निकलते हैं.
दिल्ली का प्रदूषण कहां से आता है?
डॉ. गोयल के मुताबिक़, दिल्ली का प्रदूषण केवल पराली की वजह से नहीं होता.
उनके शोध में खेती से निकलने वाली अमोनिया से जुड़े प्रदूषण का हिस्सा 27 फ़ीसदी पाया गया. गाड़ियों और दूसरे यातायात साधनों का हिस्सा 23 फ़ीसदी, कचरा और लकड़ी जैसी चीज़ें जलाने का 20 फ़ीसदी और धूल का 17 फ़ीसदी था.
कुछ बारीक कण धुएं और धूल के साथ सीधे हवा में पहुंचते हैं. वहीं, कुछ कण हवा में मौजूद अलग-अलग गैसों के मिलने से बनते हैं.
डॉ. गोयल के मुताबिक़, पूरे साल के औसत में पराली के धुएं का हिस्सा करीब चार फ़ीसदी रहता है. हालांकि कुछ ख़ास दिनों में इसका असर काफ़ी बढ़ सकता है.
सेंटर फ़ॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) के आंकड़ों के मुताबिक़, अक्तूबर और नवंबर 2025 के दौरान पराली के धुएं का औसत हिस्सा 4.2 फ़ीसदी था. नवंबर में कुछ समय के लिए यह बढ़कर 22 फ़ीसदी से ऊपर पहुंच गया.
इसके बाद दिसंबर में पराली का हिस्सा घटकर केवल 0.2 फ़ीसदी रह गया. फिर भी दिल्ली की हवा में पीएम 2.5 की औसत मात्रा 163 से बढ़कर 210 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर हो गई.
इसका मतलब है कि पराली का असर लगभग ख़त्म होने के बाद भी दिल्ली की हवा और ख़राब हो गई थी.
यानी पराली प्रदूषण की एक वजह है, लेकिन दिल्ली की ख़राब हवा की पूरी कहानी उससे नहीं समझी जा सकती. ये आंकड़े शोध के अनुमान हैं, किसी एक दिन के प्रदूषण का सीधा हिसाब नहीं.
पराली पर राजनीति, लेकिन असली सवाल क्या है?
तीन नवंबर को दिल्ली के पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने पंजाब की आम आदमी पार्टी की सरकार पर पराली जलाने को बढ़ावा देने का आरोप लगाया.
आम आदमी पार्टी की पंजाब इकाई ने इस आरोप को ख़ारिज किया.
पार्टी का कहना था कि मंत्री ने जिस तस्वीर का हवाला दिया, उसमें अधिकारी खेत में आग लगा नहीं रहे थे, बल्कि उसे बुझा रहे थे.
पार्टी ने दिल्ली की बीजेपी सरकार से पूछा कि वह राजधानी में प्रदूषण क्यों नहीं रोक पाई.
लेकिन किसी राज्य में पराली जलाने की कितनी घटनाएं हुईं और उस धुएं का कितना हिस्सा किसी ख़ास दिन दिल्ली पहुंचा, ये दो अलग सवाल हैं.
पहले सवाल का जवाब खेतों में आग लगने की घटनाओं के रिकॉर्ड से मिल सकता है.
लेकिन किसी दिन पराली का कितना धुआं दिल्ली पहुंचा, यह जानने के लिए हवा की दिशा और प्रदूषण के अलग-अलग स्रोतों की जांच करनी होगी.
दो नवंबर के अपने आदेश में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने मौसम की स्थिति का ज़िक्र किया था. लेकिन आयोग ने यह नहीं बताया कि उस दिन दिल्ली की हवा बिगड़ने में पराली के धुएं का कितना हिस्सा था.
दिल्ली सरकार क्या कर रही है?
दिल्ली सरकार ने इस सर्दी के लिए दस बिंदुओं की योजना बनाई है.
इसके तहत नंबर प्लेट पढ़ने वाले कैमरों से लैस 500 पेट्रोल पंपों पर वैध प्रदूषण जांच प्रमाणपत्र यानी पीयूसी के बिना ईंधन नहीं देने की बात कही गई है.
सरकार ने दिल्ली के बाहर पंजीकृत उन पेट्रोल और डीज़ल गाड़ियों के प्रवेश पर रोक लगाने की घोषणा भी की है, जो बीएस-6 मानक पूरा नहीं करतीं.
एक नवंबर से 28 फ़रवरी तक चलने वाली इस योजना में सड़कों की मरम्मत और सफ़ाई, निर्माण से उड़ने वाली धूल कम करने और खुले में कचरा जलाने पर निगरानी बढ़ाने जैसे क़दम भी शामिल हैं.
मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता का कहना है कि इन फ़ैसलों को ज़मीन पर लागू करने के लिए अलग-अलग एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल ज़रूरी है.
लेकिन सवाल है कि क्या ये क़दम दिल्ली में हर सर्दी बढ़ने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए काफ़ी हैं?
क्या केवल ग्रैप से हवा साफ़ हो सकती है?
दिल्ली की पर्यावरण कार्यकर्ता और वॉरियर मॉम्स की सह-संस्थापक भवरीन कंधारी कहती हैं कि प्रदूषण रोकने के लिए नियम पहले से मौजूद हैं, लेकिन कई जगह उनका ठीक से पालन नहीं होता.
उनके मुताबिक़, दशहरे के बाद भी पटाखे फोड़े जाते रहे. निर्माण कार्य चलते दिखाई दिए और बेतरतीब पार्किंग व यातायात जाम जैसी समस्याएं बनी रहीं.
कंधारी कहती हैं कि सरकार ने अलग-अलग विभागों के साथ बैठकें की हैं, लेकिन अब तक के प्रयास काफ़ी नहीं हैं.
उनके मुताबिक़, हवा बिगड़ने के बाद सड़कों पर पानी छिड़कने और ग्रैप लागू करने से पूरी समस्या हल नहीं होगी.
ग्रैप का मक़सद प्रदूषण बढ़ने के बाद उसके स्तर के हिसाब से तुरंत क़दम उठाना है. लेकिन प्रदूषण के असली स्रोतों को कम करने के लिए पूरे साल काम करना होगा.
कृत्रिम बारिश की कोशिश क्यों सफल नहीं हुई?
पिछले साल दिल्ली सरकार ने हवा में जमे प्रदूषित कणों को कम करने के लिए कृत्रिम बारिश कराने की कोशिश की थी.
बीबीसी हिंदी की 29 अक्तूबर 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक़, दिल्ली में बादलों के भीतर बारीक कण छोड़कर बारिश कराने का परीक्षण हुआ था. लेकिन बारिश नहीं हुई.
दिल्ली सरकार ने उस समय दावा किया था कि जिन इलाक़ों में परीक्षण किया गया, वहां हवा में कणों की मात्रा घटी थी.
लेकिन कणों की मात्रा कम होना अपने आप यह साबित नहीं करता कि ऐसा उसी परीक्षण की वजह से हुआ.
इसके लिए यह भी देखना होगा कि उस समय हवा की रफ़्तार और दिशा क्या थी. साथ ही, जिन इलाक़ों में परीक्षण नहीं हुआ, वहां हवा में क्या बदलाव आया.
विश्व मौसम विज्ञान संगठन के मुताबिक़, इस तकनीक में पहले से मौजूद बादलों के भीतर बारीक कण छोड़े जाते हैं. इससे पानी की बूंदें बनने की प्रक्रिया पर असर डालने की कोशिश की जाती है.
लेकिन इस तकनीक से बारिश वाले नए बादल नहीं बनाए जा सकते.
यानी आसमान में सही तरह के बादल मौजूद न हों, तो कृत्रिम बारिश नहीं कराई जा सकती. इसीलिए हर बार हवा ख़राब होने पर इस तरीक़े का इस्तेमाल संभव नहीं है.
साफ़ हवा के लिए पूरे साल क्या करना होगा?
डॉ. गोयल के मुताबिक़, दिल्ली और आसपास के इलाक़ों की हवा एक-दूसरे से जुड़ी हुई है. इसलिए दिल्ली अकेले अपनी हवा साफ़ नहीं कर सकती.
प्रदूषण कम करने के लिए दिल्ली और पड़ोसी राज्यों की सरकारों और अलग-अलग एजेंसियों को मिलकर काम करना होगा.
डॉ. गोयल कहती हैं कि गाड़ियों के लिए बीएस-6 जैसे मानक लागू करना ज़रूरी है.
इसके साथ सड़कों पर पहले से चल रहे वाहनों की प्रदूषण जांच यानी पीयूसी की व्यवस्था भी बेहतर करनी होगी.
सड़क बनाने और इमारतों के निर्माण के दौरान धूल रोकने के नियमों का पालन कराना होगा.
वह कम धुआं पैदा करने वाले चूल्हों और खाना पकाने के दूसरे साफ़ विकल्पों पर काम करने की बात भी करती हैं.
उनके मुताबिक़, हर परिवार के लिए एलपीजी अपनाना आसान नहीं है. इसलिए कोई उपाय बनाते समय यह भी देखना होगा कि लोग उसका ख़र्च उठा सकते हैं या नहीं.
भवरीन कंधारी इस समस्या का एक राजनीतिक पहलू भी देखती हैं.
उनका मानना है कि जब तक प्रदूषण चुनाव का मुद्दा नहीं बनेगा, तब तक इसे हल करने के लिए सरकारों पर पर्याप्त दबाव नहीं बनेगा.
वहीं, डॉ. गोयल का कहना है कि सरकारें क़दम उठा रही हैं, लेकिन अभी और काम करने की ज़रूरत है.
क्या दिल्ली की हवा सुधर रही है?
दिल्ली में वायु प्रदूषण की समस्या नई नहीं है. इसके आंकड़े कम से कम 1990 के दशक से मिलते हैं.
हालांकि उस समय प्रदूषण मापने के तरीक़े आज के एक्यूआई से अलग थे, इसलिए दोनों की सीधी तुलना नहीं की जा सकती. हाल के आंकड़ों में कुछ सुधार दिखाई देता है.
सीएसई के मुताबिक़, दिल्ली में पीएम 2.5 की सालाना औसत मात्रा 2024 में 105 थी, जो 2025 में घटकर 97 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर हो गई.
लेकिन क्या इसे पर्याप्त सुधार माना जा सकता है? यह आंकड़ा अब भी भारत के सालाना मानक 40 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से दोगुने से ज़्यादा है.
दिसंबर 2025 में पीएम 2.5 की औसत मात्रा दिसंबर 2024 की तुलना में 24 फ़ीसदी ज़्यादा रही.
यानी सालभर का औसत सुधरने के बावजूद सर्दियों में हवा पहले से ज़्यादा ख़राब हो सकती है. ऐसे में सवाल है कि क्या दिल्ली की हवा सच में सुधर रही है या केवल सालाना औसत कम हो रहा है?
और क्या जहांगीरपुरी, बवाना और आनंद विहार जैसे इलाक़ों में रहने वाले लोगों को भी इस सुधार का फ़ायदा मिल रहा है?
इन सवालों के जवाब किसी एक दिन के एक्यूआई से नहीं, बल्कि कई महीनों और वर्षों के आंकड़ों से मिलेंगे.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें
BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह
कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.