आप इस वेबसाइट का टेक्स्ट-ओनली वर्शन देख रहे हैं जो कम डेटा खर्च करता है. सभी तस्वीरों और वीडियो के साथ वेबसाइट का मुख्य वर्शन देखें.
पंकज उधास: कभी आँसू, कभी ख़ुशबू, कभी नग़मा बनकर हमेशा याद आएंगे
- Author, यूनुस ख़ान
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
- प्रकाशित
अस्सी का दशक था. टेलीविजन का अतिक्रमण नहीं हुआ था घरों में. तब रेडियो ही मनोरंजन की बुनियादी धारा थी और मामूली-सा टेप रिकॉर्डर घरों की शान. कैसेट्स के इस दौर में पंकज उधास घर-घर में गूंजा करते थे.
मख़मल-सी नरम आवाज़, शाइस्ता अंदाज़ और ग़ज़लों का चुनाव ऐसा कि आपके ज़ेहन पर गहरा असर करें. आपके साथ लंबे समय तक जुड़ जाएं. ज़माना ख़ूब गुनगुनाया करता था पंकज उधास को.
‘दीवारों से मिलकर रोना अच्छा लगता है/ हम भी पागल हो जायेंगे ऐसा लगता है’, ‘चाँदी जैसा रंग है तेरा सोने जैसे बाल’, ‘यहां हर शख़्स हर पल हादसा होने से डरता है’, ‘रोशन चेहरा काली ज़ुल्फें’, ‘आप जिनके क़रीब होते हैं’…. जाने कितनी ग़ज़लें थीं जो लोगों को मुंहज़बानी याद हो गयी थीं.
ग़ज़ल-गायकी की दुनिया में पंकज उधास का सफ़र आसान नहीं था. ग़ज़लों की दुनिया में उतरने से पहले उन्होंने बाक़ायदा उर्दू की तालीम ली थी. अस्सी का वो दौर जादुई तरीक़े से शक्ल ले रहा था.
जगजीत-चित्रा का पहला अलबम ‘द अनफॉरगेटेबिल्स’ 1977 में आ चुका था.
शुरुआती दो अलबमों के बाद भूपिंदर सिंह गुलज़ार के अशआर से सज़ा अपना मशहूर अलबम ‘वो जो शायर था’ लेकर आए थे. ग़ज़लें फिर महफिलों की शान बन रही थीं. पर इस बार वो अपना रूप-रंग बदलकर आयी थीं.
जगजीत और भूपिंदर ने ग़ज़ल-गायकी में गिटार, की बोर्ड और आधुनिक साज़ों की झालर सजायी थी.
क्लासिकी ग़ज़ल गायकी से इतर ये बिल्कुल नई ध्वनि थी. क्लासिकी शायरों से अलग यहां आम ज़िंदगी की बातें करने वाले शायरों को चुना जा रहा था. ऐसे दौर में पंकज उधास ने अपना पहला क़दम रखा ग़ज़लों की उर्वर दुनिया में और उनका अलबम आया ‘आहट’. इस अलबम की एक ग़ज़ल थी—शायर थे नामवर-
अब तो इंसान को इंसान बनाया जाए,
या कोई और ही भगवान बनाया जाए.
इसी अलबम में उन्होंने ये ग़ज़ल भी गायी, शायर थे शेख हसन अबूवाला--
कैसे कह दूं कि मुलाक़ात नहीं होती है
रोज़ मिलते हैं मगर बात नहीं होती है..
शायद पंकज उधास को अपना फ़लसफ़ा भी इसी अलबम में मिला था. शायद यह अनायास हो गया होगा. उन्होंने इस अलबम में ये ग़ज़ल भी गायी--
ये अलग बात है साक़ी मुझे होश नहीं
होश इतना है कि मैं तुझसे फ़रामोश नहीं..
ये अब्दुल हमीद अदम की ग़ज़ल थी. ‘आहट’ बड़ा लोकप्रिय हुआ और पंकज उधास के क़दम ग़ज़ल गायकी में जम गए. इसके बाद शुरू हुआ लगातार अलबमों का सिलसिला.
गुजराती थी मातृभाषा
पंकज उधास के लिए ग़ज़लों की नाज़ुक-ओ-नरम दुनिया में क़दम रखना किसी करिश्मे से कम नहीं था. वो हमेशा अपने इंटरव्यूज़ में बताते रहे कि उनकी मातृभाषा गुजराती थी.
गुजरात में सौराष्ट्र जेतपुर में उनका जन्म हुआ था. उनके दादा भावनगर स्टेट के महाराज के डिप्टी दीवान थे. और पिता सरकारी नौकरी में थे.
मुझे एक मुलाक़ात में पंकज जी ने बताया था कि संगीत उनके घर में किस तरह शामिल था. असल में उनके पिता केशुभाई उधास को दिलरुबा (एक तरह का वाद्य यंत्र) बजाना पसंद था. उन्होंने अब्दुल करीम ख़ां साहब से तालीम ली थी.
दफ़्तर से लौटकर हर शाम वो दिलरुबा बजाया करते थे और नन्हे पंकज हर शाम इस महफिल का इंतज़ार करते थे. वक़्त ने करवट ली और पंकज के दोनों भाई मनहर उधास और निर्मल उधास गायकी की दुनिया में चले आये.
मनहर उधास तो मुंबई आये और वो फ़िल्म-संसार में संघर्ष करने लगे. अपनी बिल्कुल अलग आवाज़ के ज़रिये उन्होंने अपने क़दम जमा भी लिये. पढ़ाई ख़त्म करने के बाद पंकज मुंबई आये और उन्होंने सेंट ज़ेवियर्स में दाख़िला लिया.
साथ में उर्दू की तालीम और संगीत की तालीम भी जारी रही. सन 1972 के ज़माने में उन्होंने संघर्ष के दिनों में अपना पहला फिल्मी गीत उषा खन्ना के संगीत निर्देशन में फ़िल्म ‘कामना’ में गाया था. पर इसके बाद की राह आसान नहीं रही.
फिल्मी गानों की दुनिया पथरीली थी और वहां उम्मीद की किरण भी मुश्किल से चमकती थी. इस दौरान उर्दू सीखकर पंकज मीर, ग़ालिब, उमर ख़ैयाम वग़ैरह को ख़ूब पढ़ चुके थे. उन्होंने ग़ज़लें गानी शुरू कर दी थीं. ‘आहट’ के बाद सफलता ने उनके क़दम चूमे और उन्हें वो धारा मिल गयी—जिसकी उन्हें तलाश थी. ग़ज़लों की दुनिया में उन्होंने अपनी आवाज़ की ख़ुशबू बिखेरी.
सोच-समझकर चुनीं ग़ज़लें
पंकज उधास ने अपने तमाम अलबमों में ग़ज़लों का चुनाव बड़ी सूझबूझ से किया. सन 1986 में आए उनके अलबम ‘आफ़़रीन’ में जहां एक तरफ़ ‘जिस दिन से जुदा वो हमसे हुए/ इस दिल ने धड़कना छोड़ दिया’ और ‘इश्क़ नचाए जिसको यार/ वो फिर नाचे बीच बाज़ार’ जैसी इश्किया ग़ज़लें थीं तो दूसरी तरफ़ ‘हुई महंगी बहुत ही शराब, के थोड़ी-थोड़ी पिया करो’ और ‘पैमाने टूट गए’ जैसी ग़ज़लें भी थीं.
ये ग़ज़लें महफिलों की जान बन गईं. देश के कोने-कोने में ये ग़ज़लें गूंजने लगीं. मैंने देखा है कि तब शादियों और जन्मदिन के उत्सवों में भी लाउड स्पीकर पर पंकज उधास की ग़ज़लें बजा करती थीं. ऐसा दूसरे ग़ज़ल गायकों के साथ नहीं हुआ.
पंकज उधास के साथ शराब, पैमाना, रिंद, मयक़दा, मैख़ाना पूरी तरह से जुड़ गए. उन्होंने भले ही दूसरी ग़ज़लें भी गायीं लेकिन शोहरत की बुलंदियों पर यही ग़ज़लें ज़्यादा पहुंचीं.
अपनी बातचीत में मैंने पंकज जी से पूछा था कि आप पर ये इल्ज़ाम है कि आपने शराब वाली ग़ज़लें ख़ासतौर पर गायीं और ग़ज़ल-गायकी के एक ख़ास मिज़ाज को बढ़ावा दिया. उन्हें हमेशा इस पर एतराज़ रहा.
उन्होंने कहा कि इसके पीछे म्यूज़िक कंपनियों का बड़ा योगदान रहा. जब उन्होंने देखा कि ये ग़ज़लें लोकप्रिय हो रही हैं तो रिकॉर्ड कंपनियों ने एक चालाकी भरा काम ये किया कि इन ग़ज़लों को एक साथ संग्रहित करके रिलीज़ करना भी शुरू कर दिया.
पंकज जी हमेशा कहा करते थे कि, ‘मेरी तमाम ग़ज़लों को सुन लीजिए, आप पाएंगे कि एक छोटा-हिस्सा ऐसा है जहां शराब से जुड़ी ग़ज़लें हैं. इनके आधार पर मेरा आकलन नहीं किया जाना चाहिए.’
ये सही बात थी. रिंद और मयक़दे वाली लोकप्रिय ग़ज़लों से इतर पंकज उधास ने और भी बहुत कुछ गाया. उनका एक अलबम है ‘ज़िक्र-ए-मीर’—जिसमें उन्होंने उर्दू के बेमिसाल शायर मीर तकी मीर के अशआर गाये हैं.
‘रजुआत’ उनका गुजराती अलबम है. भालोबाषा एक बांग्ला अलबम. गुलज़ार साहब के साथ उनका अलबम आया ‘नायाब लम्हे’. उस्ताद अमजद अली ख़ां के साथ उनका अलबम आया—‘यारा’.
चिट्ठी आई है...
पंकज ग़ज़लों की दुनिया में लोकप्रिय हुए तो सिनेमाई-संगीत ने भी उन्हें अपनी तरफ खींचा. एक दौर वो था जब उन्हें काम मांगने जाना पड़ता था और फिर वो दौर आया जब सिनेमा ने खुद उन्हें पुकारा.
सन 1986 में महेश भट्ट की फ़िल्म ‘नाम’ में उन्होंने आनंद बख़्शी का लिखा एक मार्मिक गीत गाया, ‘चिट्ठी आई है’, संगीतकार थे लक्ष्मीकांत प्यारेलाल.
हिंदी सिनेमा के लंबे गानों की फ़ेहरिस्त जब भी बनाई जाएगी तो ये उसमें करीब आठ मिनट का ये गाना ज़रूर शामिल होगा. इस गाने ने लोगों को बहुत रुलाया.
प्रवासी भारतीयों की ज़िंदगी की एक चुभन है ये गीत. और उनके दिलों में भी जज़्बात की बारिश करता है—जिनके घर वाले सात समंदर पार चले गये बेहतर ज़िंदगी की तलाश में.
सन 1988 में उन्होंने फ़िल्म ‘दयावान’ का गाना गाया ‘आज फिर तुम पे प्यार आया है’. फिर आया ‘’बहार आने तक’ का गीत ‘मोहब्बत इनायत करम देखते हैं’. नब्बे के दशक में ‘साजन’ का गाना ‘जियें तो जियें कैसे’ आज भी लोग सुनते हुए नहीं थकते.
फ़िल्म ‘बाज़ीगर’ में उनके गाये गाने ‘छुपाना भी नहीं आता’ ने लोकप्रियता की नई पायदानें चढ़ीं. फ़िल्म ‘मोहरा’ का इंदीवर का लिखा उनका गाया गाना ‘ना कजरे की धार’ भी आज तक अच्छा-ख़ासा लोकप्रिय है.
लोगों की ज़ुबान पर चढ़ने वाली धुनें
कम लोग जानते हैं कि जब जगमोहन मूंदड़ा ने विजय तेंदुलकर के नाटक पर आधारित फ़िल्म ‘कमला’ बनाई तो उसमें पंकज उधास की आवाज़ में एक गीत था—‘इंसानों को नीलाम करे दुनिया’.
उन्होंने बप्पी लहरी के निर्देशन में ये गीत गाया था. इस तरह पंकज उधास ऐसे ग़ज़ल-गायक बने जिन्होंने फिल्मों में भी खूब गाया और अच्छी खासी लोकप्रियता हासिल की.
पंकज उधास हमेशा कहा करते थे, ‘ग़ज़ल गायकी के तीन पहलू हैं, शायरी, मेलडी और गायकी.'
उन्होंने हमेशा अपनी ग़ज़लों में इस बात का ख़्याल रखा कि वो लोगों की ज़ुबां पर चढ़ें. धुनें ऐसी हों जिनमें लोकप्रियता के तत्व हों.
उनके लिए अस्सी के दशक से लेकर इक्कीसवीं सदी तक का ये लंबा सफ़र आसान नहीं था.
मुझे याद है कि 1999 में उनका एक अलबम आया था ‘महक’ जिसमें उन्होंने ‘चुपके चुपके सखियों से वो बातें करना भूल गयी/ मुझको देखा पनघट पे तो पानी भरना भूल गई’ जैसा गीत गाया था. अनुभव सिन्हा ने इसका म्यूज़िक वीडियो बनाया था और अभिनेता जॉन अब्राहम इसमें नज़र आए थे.
गुलज़ार के साथ उनका अलबम ‘नायाब लम्हे’ खासतौर पर याद आता है जिसके वीडियो में वो ख़ुद गुलज़ार साब के साथ नज़र आते हैं और गाते हैं—‘पेड़ के नीचे कौन था कल की बारिश में/ भीग रहा था हल्की-हल्की बारिश में’.
पंकज ज़िंदगी भर स्टेज पर गाते रहे. ग़ज़ल गायकी के सुनहरे दिनों से लेकर झमाझम संगीत के दौर तक उन्होंने अपने स्टेज शोज़ जारी रखे.
दुनिया भर में उनके म्यूज़िक शो होते थे और लोग उस सुनहरे दौर को याद करने उन्हें सुनने जमा होते. अदभुत नज़ारा होता था वो. उनका अचानक यूं चले जाना- एक ख़ालीपन दे गया है.
मुझे ख़ासतौर पर राजेश रेड्डी की लिखी उनकी गायी ग़ज़ल बहुत पसंद है--
‘यहां हर शख़्स हर पल हादसा होने से डरता है,
खिलौना है जो मिट्टी का फ़ना होने से डरता है.
मेरे दिल के किसी कोने में एक मासूम सा बच्चा,
बड़ों की देखकर दुनिया बड़ा होने से डरता है’.
पंकज हर मोड़ पर याद आएंगे. ज़ेहन में गूंजेगी उनकी आवाज़--
कभी आंसू, कभी ख़ुशबू , कभी नग़मा बनकर
हमसे हर शाम मिली है तेरा चेहरा बनकर..
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)