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काउंसिल हाउस से भारत के संसद भवन तक, क्या है 95 साल पुरानी इस इमारत का इतिहास
- Author, जयदीप वसंत
- पदनाम, बीबीसी गुजराती के लिए
- प्रकाशित
रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारतीय संसद के नए भवन का उद्घाटन करेंगे. हालांकि इस मौके पर विपक्ष की मौजूदगी नहीं के बराबर होगी.
कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, उद्धव ठाकरे की शिवसेना, आम आदमी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, जनता दल यूनाइटेड, वामपंथी दलों और समाजवादी पार्टी सहित लगभग 20 विपक्षी दलों ने कार्यक्रम के बहिष्कार की घोषणा की है.
इसे आगामी लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी एकता के प्रतीक के रूप में भी देखा जा रहा है.
विपक्ष का कहना है कि नए संसद भवन का उद्घाटन भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को करना चाहिए.
विपक्ष ये भी आरोप लगा रहा है कि द्रौपदी मुर्मू के आदिवासी महिला होने के चलते उन्हें यह मौका नहीं दिया जा रहा है. इसके अलावा वीर सावरकर के जन्मदिन के दिन उद्घाटन पर भी विपक्ष ने आपत्ति जताई है.
उधर, बीजेपी का कहना है कि इस मुद्दे पर राजनीति नहीं करनी चाहिए और समारोह के लिए सभी आमंत्रित हैं.
क्या संसद भवन का उद्घाटन राष्ट्रपति को ही करना होता है? देश को नए संसद भवन की आवश्यकता किन कारणों से हुई? संसद की पुरानी इमारत किसने और कब बनवाई? उससे पहले जनप्रतिनिधि कहां बैठते थे?
ये सब सवाल आम लोगों के मन में उमड़ रहे हैं. इस आलेख में इन्हीं सवालों के जवाब तलाशे गए हैं.
भारत के आज़ाद होने से पहले ब्रिटिश शासन के दौरान भी, लोगों को प्रतिनिधित्व दिलाने और क़ानून बनाने के प्रयास किए गए थे.
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संस्थाएं, सरकार और सत्ता
राज्यसभा के पूर्व महासचिव डॉ. योगेन्द्र नारायण ने 'भारत की संसद का परिचय' नामक पुस्तक में लिखा है, "भारतीय परिषद् अधिनियम-1861 में गवर्नर जनरल की कार्यकारी परिषद में अतिरिक्त गैर-सरकारी सदस्यों को शामिल करने का प्रावधान किया गया था, लेकिन इस दिशा में कोई ठोस व्यवस्था स्थापित नहीं हो सकी. सन् 1892 में इस दिशा में एक और कानूनी प्रावधान किया गया."
हालांकि, 'भारतीय परिषद अधिनियम - 1909' द्वारा लाया गया सुधार इस दिशा में पहला गंभीर प्रयास था. इसे 'मॉर्ले-मिंटो रिफॉर्म' के नाम से भी जाना जाता है.
कलकत्ता (वर्तमान में कोलकाता) 1911 तक ब्रिटिश भारत की राजधानी थी.
दिल्ली को इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और सामरिक स्थिति के कारण 1912 में तत्कालीन पंजाब से अलग कर बनाया गया था.
दिल्ली विधानसभा की वेबसाइट पर दिए गए विवरण के अनुसार विधान परिषद की पहली बैठक 27 जनवरी 1913 को दिल्ली सरकार के पुराने सचिवालय में हुई थी.
इंजीनियर मोंटेग थॉमस की डिज़ाइन की गई यह इमारत बनकर तैयार हुई थी.
डॉ. नारायण की पुस्तक के मुताबिक 1919 का 'गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट' भारत के संसदीय इतिहास में एक मील का पत्थर था. इसमें पहली बार दो सदनों की व्यवस्था लागू की गई थी जिसका उद्देश्य प्रांतों में भी सरकारें बनाना था.
हालांकि, उपरोक्त अधिनियम को प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया जा सका और लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने में विफल रहा. 1935 में पारित हुआ 'भारत सरकार अधिनियम-1935' संघीय और क्षेत्रीय स्वायत्तता प्रदान करता है.
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नई राजधानी, पुराना संसद भवन
1947 में देश की स्वतंत्रता के बाद, प्रांतीय गवर्नरों को संवैधानिक प्रमुख बनाया गया, वहीं ब्रिटिश सरकार से भारत की संसद को ज़िम्मेदारी सौंपी गई.
भारत के संविधान निर्माताओं ने संसद भवन के सेंट्रल हॉल में बैठकर संविधान बनाया. 1952 में पहला चुनाव होने के बाद से यह अस्तित्व में है.
भारतीय संविधान हमें लोकसभा और राज्यसभा की व्यवस्था मुहैया कराता है.
लोकसभा के लिए संसद सदस्य मतदाताओं द्वारा चुने जाते हैं, जबकि राज्यसभा के लिए संसद सदस्य राज्य विधानसभाओं के विधायकों द्वारा चुने जाते हैं.
लोकसभा का हर पांच साल में पुनर्गठन किया जाता है, जबकि राज्यसभा कभी भंग नहीं होती है.
इसके सदस्यों का कार्यकाल छह साल का होता है, इस सदन से हर दो साल में छह साल पूरा करने वाले सदस्य सेवानिवृत होते रहते हैं.
जब नई राजधानी को नई दिल्ली स्थानांतरित किया गया, तो कई नई इमारतों की आवश्यकता पड़ी, जैसे, गवर्नर जनरल का आवास (वर्तमान राष्ट्रपति भवन), सैन्य अधिकारियों के लिए निवास और सरकारी कार्यालयों के लिए नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक.
यह काम सर एडविन लुटियंस नामक एक अंग्रेज वास्तुकार ने किया था.
इसी कारण यह इलाका आज 'लुटियंस दिल्ली' के नाम से जाना जाता है, जहां ब्रिटिश काल के बंगले स्थित हैं, जिन्हें मंत्रियों, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों, वरिष्ठ सांसदों और उच्च सरकारी अधिकारियों को आवंटित किए गए हैं.
जब निर्माण कार्य चल रहा था, तभी प्रथम विश्व युद्ध (जुलाई-1914 से नवंबर-1918) छिड़ गया, जिससे तत्कालीन ब्रिटिश सरकार को अपने संसाधनों को दूसरी ओर मोड़ना पड़ा और काम धीमा करना पड़ा.
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लुटियंस की भूमिका
केंद्र सरकार की सेंट्रल विस्टा वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक, मौजूदा संसद भवन का डिजाइन हर्बर्ट बेकर ने तैयार किया था. इसमें सर लुटियंस का भी योगदान था.
12 फरवरी 1921 को तत्कालीन 'काउंसिल हाउस' का उद्घाटन ड्यूक ऑफ कनॉट और भारत के तत्कालीन गवर्नर ने किया था.
इसमें 64 गोल खंभे, मध्य प्रदेश के मुरैना में योगिनी मंदिर से प्रभावित हैं, हालांकि इसका कोई आधिकारिक प्रमाण नहीं है. जब निर्माण अपने चरम पर था, 2,500 मूर्तिकार और राजमिस्त्री कार्यरत थे.
लोकसभा के पूर्व महासचिव टी. के. विश्वनाथन ने भारतीय संसद भवन और उसके निर्माण का जिक्र अपनी पुस्तक में किया है.
इसका उद्घाटन 18 जनवरी 1927 को तत्कालीन गवर्नर-जनरल लॉर्ड इरविन ने किया था. इस भवन के निर्माण पर उस समय रु. 83 लाख ख़र्च किए गए.
संसद भवन का व्यास 560 फीट है. यह करीब छह एकड़ में फैला हुआ है. 27 फीट ऊंचे 144 खंभे इसे एक प्रमुख आकार देते हैं.
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इसमें भारतीय स्थापत्य शैली के तत्व भी शामिल हैं जैसे दीवारों और खिड़कियों पर छज्जा और संगमरमर में जाली.
संसद भवन परिसर में तीन मुख्य भवन हैं. संसद भवन, संसदीय ज्ञानपीठ (पुस्तकालय) और संसदीय सुधा (अनुबंध). आवश्यकतानुसार, संसद भवन में अतिरिक्त सुधार किए गए हैं.
वर्ष 1956 में आउटबिल्डिंग की अतिरिक्त दो मंजिलों का निर्माण किया गया था ताकि प्रेस, मंत्रियों के कक्ष, पार्टियों के कार्यालय, अध्यक्ष और उपाध्यक्ष सहित पदाधिकारी आदि को शामिल किया जा सके.
लोकसभा अर्धवृत्ताकार है और इसमें हरे रंग का कालीन है. इसमें 545 सांसदों के बैठने की व्यवस्था है.
राज्यसभा में 245 सांसदों के बैठने की व्यवस्था है. दोनों सदनों में, सत्तारूढ़ दल स्पीकर के दाईं ओर बैठता है और विपक्ष बाईं ओर.
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आजादी के बाद संसद
मूल भवन में लोकसभा और राज्यसभा सचिवालयों के लिए भी कोई प्रावधान नहीं था. इसकी व्यवस्था बाद में संसद भवन एनेक्सी की इमारत बनाकर पूरी की गई.
केंद्रीय लोक निर्माण विभाग के मुख्य वास्तुकार जे.एम. बेंजामिन और वरिष्ठ वास्तुकार के.आर. जानी द्वारा इसे डिज़ाइन किया गया.
अगस्त 1970 में तत्कालीन राष्ट्रपति वीवी गिरि द्वारा इसका शिलान्यास किया गया था और अक्टूबर 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने एनेक्सी भवन का उद्घाटन किया था.
वहीं 200 करोड़ रुपये की लागत से बनकर तैयार हुई संसद भवन लाइब्रेरी का शिलान्यास 1987 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने किया था.
1994 में तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष शिवराज पाटिल ने इसका भूमिपूजन किया था और मई-2002 में तत्कालीन राष्ट्रपति के.आर. नारायण ने इसका लोकार्पण किया. इसे मशहूर आर्किटेक्ट राज रेवेल ने डिजाइन किया है.
संसद में प्रवेश के लिए 12 गेट हैं, लेकिन ट्रैफिक के लिए मुख्य गेट नंबर एक है जो संसद मार्ग पर पड़ता है.
मौजूदा सरकार ने प्रधानमंत्री के आधिकारिक आवास 'रेसकोर्स रोड' का नाम बदलकर 'लोककल्याण मार्ग' और 'राजपथ' का नाम बदलकर 'कर्तव्यपथ' कर दिया है.
वर्ष 2009 में संसदीय क्षेत्र के विस्तार के लिए नए भवन के निर्माण का फ़ैसला लिया गया. उसके बाद 2012 में तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष मीरा कुमार द्वारा इस मुद्दे पर एक समिति का गठन किया गया था.
दावा किया जाता है कि नई संसद और सेंट्रल विस्टा को डिज़ाइन करते समय वर्तमान और भविष्य की ज़रूरतों को ध्यान में रखा गया है.
सेंट्रल विस्टा की आधिकारिक वेबसाइट पर एक नई संसद की आवश्यकता पर ज़ोर देते हुए कई तर्क दिए गए हैं.
इसके मुताबिक साल 2026 के बाद देश में लोकसभा और राज्यसभा की सीटों की संख्या बढ़ाने पर लगा प्रतिबंध हटा लिया जाएगा. फिर लोकसभा और राज्यसभा में अतिरिक्त सांसदों की व्यवस्था करनी होगी.
वर्तमान सेंट्रल हॉल में 440 सदस्यों के बैठने की क्षमता है. कहा जा रहा है कि इस वजह से संयुक्त संसदीय सत्रों के दौरान कठिनाई बढ़ जाती है. यह सुरक्षा के लिए ख़तरा भी पैदा करता है.
नई लोकसभा में 888 सीटें होंगी और राज्यसभा में 384 सीटें होंगी, जबकि कुल मिलाकर 1,272 सीटें होंगी.
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सेंट्रल विस्टा और विवाद
संसद के पुराने भवन के मूल डिज़ाइन में सीसीटीवी केबल, ऑडियो वीडियो सिस्टम, एयर कंडीशनिंग, अग्निशमन प्रणाली की सुविधा नहीं थी, इसलिए इसे बेहतर तरीके से नई संसद में तैयार किया गया है.
सरकार का कहना है कि पुरानी इमारत का डिजाइन अग्नि नियमों का पालन नहीं करता है. जब भवन बनाया गया था तब यह क्षेत्र सिस्मिक जोन-2 में था, जिसे अब सिस्मिक जोन-4 में तब्दील कर दिया गया है, जिससे बिल्डिंग पर ख़तरा मंडरा रहा था.
लगभग 20 राजनीतिक दलों ने सावरकर के जन्मदिन पर उद्घाटन और नए संसद भवन के उद्घाटन के मुद्दे पर प्रधानमंत्री द्वारा न कि राष्ट्रपति द्वारा इस सरकारी कार्यक्रम का बहिष्कार करने की घोषणा की है.
हालांकि, सरकार की सेंट्रल विस्टा परियोजना शुरू से ही विवादों में घिरी रही है. दिसंबर-2020 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नए संसद भवन का शिलन्यास किया तो विपक्ष ने कोरोना संकट के बीच इसे फिजूलख़र्ची बताया था.
फिर यह विवाद भी उठा कि केंद्र सरकार या राज्य सरकार के पास सेंट्रल विस्टा परियोजना के कारण निर्माण करने और पेड़ों को हटाने की मंजूरी देने का अधिकार है?
निर्माण कार्य के चलते आसपास के इलाकों में प्रदूषण जैसे मुद्दों पर विवाद हो गया था. अंत में, सुप्रीम कोर्ट ने परियोजना पर अपनी मंजूरी की मुहर लगा दी.
नए संसद भवन को डिज़ाइन करने का काम गुजरात के बिमल पटेल को सौंपा गया, जो इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए कई परियोजनाओं को पूरा कर चुके हैं. दोनों की निकटता मीडिया और विपक्ष में भी चर्चा का विषय बनी.
उसके बाद संसद भवन पर लगाए जाने वाले राष्ट्रीय चिन्ह के शेरों की मुद्रा सौम्य न होकर आक्रामक होने का मुद्दा भी उठा और इस मुद्दे पर विवाद भी हुआ.
सरकार का तर्क यह है कि यदि दिल्ली में विभिन्न स्थानों पर स्थित केंद्रीय कार्यालय और विभाग सेंट्रल विस्टा में स्थित हैं, तो बाहर से आने वाले नागरिकों के लिए सुविधा होगी.
वीआईपी या वीवीआईपी लोगों की आवाजाही और लुटियंस दिल्ली में ही राम मनोहर लोहिया अस्पताल या रेलवे स्टेशन जाने वाले लोगों को परेशानी होती है, जिसे सेंट्रल विस्टा के कारण दूर किया जाएगा.
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भारतीय संसदः गौरवशाली अतीत
सरकार का दावा है कि सरकार के हर साल लाखों-करोड़ों रुपए किराये में बर्बाद हो जाते हैं, जिसमें बचत होगी.
सेंट्रल विस्टा, जो वर्तमान संसद भवन के ठीक सामने बनाया जा रहा है, के सुचारू रूप से काम करने के बाद पुरानी संसद भवन को एक संग्रहालय में बदलने की योजना है.
यूएन के अनुमान के मुताबिक 75 साल में भारत की आबादी बढ़कर 142 करोड़ हो गई है. इस दौरान पुरानी संसद की इमारत ने कई इतिहास बनते देखा है.
15 अगस्त 1947 को इस भवन में भारतीयों ने सत्ता संभाली. यहीं से प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने आधी रात को अपना प्रसिद्ध भाषण 'ट्रिस्ट विद डेस्टिनी' दिया था.
यह भवन संविधान सभा के सदस्यों द्वारा नए संविधान के लिए किए गए मंथन का भी गवाह है. 42वें संशोधन में एक 'लघु संविधान' का कार्यान्वयन भी देखा गया.
यहां सिक्किम, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य बने. भारत में दीव, दमन, दादरानगर हवेली और पुडुचेरी (तत्कालीन पांडिचेरी) को शामिल करने की चर्चा यहीं की गई.
1962 में चीन के ख़िलाफ़ भारत की हार और 1971 में पाकिस्तान पर देश की जीत ने सरकार और विपक्ष के बीच बहस देखी है.
संसद ने पाकिस्तान और बांग्लादेश के साथ भूमि विवादों को हल करने के लिए भूमि की अदला-बदली को भी अपनी मंजूरी दे दी है.
दहेज विरोधी अधिनियम (1961), बैंकिंग आयोग अधिनियम और आतंकवाद निवारण अधिनियम (2002) जैसे क़ानूनों को पारित करने के लिए संसद के संयुक्त सत्र बुलाए गए थे.
इसके अलावा हर साल के पहले सत्र के पहले दिन राष्ट्रपति संयुक्त सत्र को संबोधित करते हैं और सरकार की रूपरेखा पेश करते हैं.
जिमी कार्टर और बराक ओबामा जैसे विदेशी गणमान्य व्यक्तियों को भारतीय संसद के संयुक्त सदनों को यहीं संबोधित करने का सम्मान मिला है.
इसी संसद भवन में देश की अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण और कमीशन का प्रावधान किया गया था.
'भारत छोड़ो आंदोलन' के 50 साल और देश की आज़ादी के 50 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में रात में संसद की बैठक हुई और आधी रात तक 'एक देश, एक कर प्रणाली' के लिए जीएसटी पर बहस हुई.
संसद ने पंचायती राज और स्थानीय स्वशासी निकायों को संवैधानिक दर्जा देकर सत्ता का विकेंद्रीकरण देखा है.
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यह इमारत 1991 में लाइसेंस के लिए कानूनों की शुरुआत से लेकर भारत की उदारीकरण नीति का भी गवाह है.
दिसंबर-2001 में भारतीय संसद पर चरमपंथी हमला हुआ था.
इसलिए फरवरी-2014 में कांग्रेस सांसद लगडपट्टी राजगोपाल ने आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के बंटवारे पर बहस के दौरान सदन में पेपर स्प्रे का इस्तेमाल कर डर का माहौल बना दिया.
संपत्ति के स्वामित्व पर प्रतिबंध, शाही परिवारों के प्रीवी पर्स को समाप्त करने, कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 और 35-ए को निरस्त करने जैसी महत्वपूर्ण घटनाएं भी इस भवन में हुई हैं.
इस संसद भवन ने अल्पसंख्यक समुदाय सिखों और मुसलमानों के राष्ट्रपतियों और उपाध्यक्षों को देखा है.
दलित और आदिवासी समुदाय के प्रतिनिधि राष्ट्रपति चुने गए हैं. इसने महिला प्रधान मंत्री के रूप में इंदिरा गांधी और राज्यसभा के उपाध्यक्ष के रूप में नजमा हेपतुल्ला के रूप में महिलाओं के सशक्तिकरण को भी देखा है.
इस संसद ने मतदान की आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दी है.
हालांकि संसद में महिलाओं को अभी तक आरक्षण और LGBTQ+ समुदाय को भी प्रतिनिधित्व भी हासिल नहीं हुआ है. ऐसा होने की उम्मीद अब संसद की नयी इमारत में ही होगी.
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