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अमेरिका-ईरान एग्रीमेंट पर लगी मुहर, जानिए समझौते में क्या-क्या है?
- Author, बर्न्ड डिबशमैन जूनियर
- पदनाम, व्हाइट हाउस संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम बढ़ाने के समझौते पर हस्ताक्षर हो चुके हैं और यह अब लागू हो गया है. इसकी पुष्टि व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने बीबीसी से की है.
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते पर आधिकारिक रूप से साइन किए. इसके तहत रणनीतिक रूप से अहम होर्मुज़ स्ट्रेट फिर से खोला जाएगा. ट्रंप ने फ्रांस के एवियन-ले-बैंस में जी-7 शिखर सम्मेलन में शामिल होने के दौरान इस पर साइन किए.
14 बिंदुओं वाले इस समझौते को मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (एमओयू) कहा गया है. इसके मुताबिक़ ईरान कभी परमाणु हथियार नहीं बनाएगा.
साथ ही, देश के "पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास" के लिए 300 अरब डॉलर का फंड बनाया जाएगा. हालांकि, अमेरिका के लिए इसमें योगदान देना अनिवार्य नहीं होगा.
यह समझौता अमेरिका और इसराइल के ईरान पर हमले शुरू होने के चार महीने बाद आया है.
ट्रंप प्रशासन ने इस समझौते को "परफॉर्मेंस बेस्ड यानी प्रदर्शन आधारित" बताया है.
इसका मतलब है कि ईरान को तभी फायदा मिलेगा, जब वह अपनी सभी प्रतिबद्धताओं का पालन करेगा.
समझौते के कई हिस्सों में अभी भी कई सवालों के जवाब नहीं हैं. कई अहम मुद्दे भी अब तक अनसुलझे हैं. फिर भी, आइए जानते हैं इसके कुछ अहम बिंदुओं के बारे में.
1: 'हर मोर्चे' पर संघर्ष का अंत
समझौते के पहले पैराग्राफ में कहा गया है कि अमेरिका, ईरान और उनके सहयोगी "हर मोर्चे" पर सैन्य अभियान तुरंत और स्थायी रूप से खत्म करने की घोषणा करेंगे. इसमें लेबनान भी शामिल है.
अमेरिका के नजरिए से देखें तो ट्रंप लगातार इस बात को लेकर चिंतित थे कि हिज़्बुल्लाह के खिलाफ इसराइल की सैन्य कार्रवाई ईरान के साथ हुए समझौते को बिगाड़ सकती है.
दूसरी ओर, ईरान कई बार कह चुका है कि युद्धविराम में लेबनान को भी शामिल किया जाना चाहिए.
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने बुधवार को कहा कि अगर इसराइल लेबनान में सैन्य अभियान जारी रखता है, तो यह "समझौते का उल्लंघन" होगा. ऐसी स्थिति में "ज़रूरी कदम उठाए जाएंगे".
समझौते में कहा गया है कि अब से कोई भी पक्ष सैन्य कार्रवाई शुरू नहीं करेगा. दोनों एक-दूसरे को धमकी भी नहीं देंगे. साथ ही, लेबनान की "क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता" का सम्मान करेंगे.
दस्तावेज़ में कहा गया है कि अंतिम समझौते से इस संघर्ष का स्थायी रूप से अंत हो जाएगा.
हालांकि, इस बिंदु पर इसराइल की प्रतिक्रिया क्या होगी, यह अभी स्पष्ट नहीं है.
2: 'आंतरिक मामलों' का सम्मान
अमेरिकी अधिकारियों ने पत्रकारों को फोन कॉल में इस दस्तावेज़ को विस्तार से पढ़कर सुनाया. उसमें कहा गया है कि अमेरिका और ईरान एक-दूसरे की "संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता" का सम्मान करेंगे. दोनों एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे.
ईरान के असंतुष्ट समूहों को यह बात शायद पसंद नहीं आएगी.
इस साल की शुरुआत में, पूरे ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शन हुए थे. उस समय ट्रंप ने प्रदर्शनकारियों से कहा था कि "मदद रास्ते में है."
3: बढ़ाई जा सकने वाली समयसीमा
दस्तावेज़ के तीसरे बिंदु के अनुसार, अमेरिका और ईरान अधिकतम 60 दिनों के भीतर अंतिम समझौते पर बातचीत पूरी करने की कोशिश करेंगे.
अगर दोनों पक्ष सहमत हों, तो इस समयसीमा को आगे बढ़ाया जा सकता है.
दोनों देशों के नेताओं के एमओयू पर आधिकारिक हस्ताक्षर होने के बाद 60 दिनों की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है.
व्हाइट हाउस ने बीबीसी को बताया कि ट्रंप ने बुधवार रात फ़्रांस के वर्साय पैलेस में जी-7 सम्मेलन के बाद आयोजित रात्रिभोज के दौरान इस दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए.
व्हाइट हाउस के अनुसार, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने भी इस पर साइन किए हैं.
इससे पहले, ट्रंप और ईरानी अधिकारियों ने संकेत दिया था कि इस सप्ताह के अंत में जिनेवा में औपचारिक हस्ताक्षर समारोह होगा. लेकिन अब यह होगा या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है.
4: अमेरिका नाकाबंदी खत्म करेगा
चौथे बिंदु के अनुसार, एमओयू पर हस्ताक्षर होते ही अमेरिका अपनी नौसैनिक नाकाबंदी हटाना शुरू करेगा. साथ ही, ईरानी बंदरगाहों पर लगाए गए "किसी भी तरह के व्यवधान या बाधाओं" को भी हटाएगा.
समझौते और ईरान के विदेश मंत्रालय के अनुसार, 30 दिनों के भीतर नाकाबंदी पूरी तरह ख़त्म हो जाएगी.
इस दौरान, अमेरिका ईरानी बंदरगाहों से गुजरने वाले जहाज़ों की संख्या उसी अनुपात में बढ़ाएगा, जिस अनुपात में ईरान होर्मुज़ स्ट्रेट में यातायात बहाल करेगा.
अंतिम समझौते पर हस्ताक्षर होने के 30 दिनों के भीतर, अमेरिका ने ईरान के "आसपास के क्षेत्रों" से अपनी सेना हटाने का वादा किया है.
व्यवहार में इसका मतलब है कि अमेरिकी सेना उसी स्थिति और संसाधनों पर लौट जाएगी, जो 28 फ़रवरी को संघर्ष शुरू होने से पहले थे.
5: होर्मुज़ स्ट्रेट
समझौते में कहा गया है कि एमओयू पर हस्ताक्षर होते ही ईरान अपनी पूरी कोशिश करेगा कि होर्मुज़ स्ट्रेट से व्यापारिक जहाज़ सुरक्षित रूप से गुजर सकें. इसके लिए कोई टैक्स नहीं लिया जाएगा.
युद्ध शुरू होने और होर्मुज़ स्ट्रेट बंद होने के बाद से यह अमेरिका का एक बड़ा लक्ष्य रहा है. इसके बंद होने से दुनिया भर में तेल की कीमतें तेज़ी से बढ़ गई थीं.
दस्तावेज़ में कहा गया है कि तकनीकी और सैन्य बाधाओं को हटाने और बारूदी सुरंगें साफ करने के काम को ध्यान में रखते हुए जहाज़ों की आवाजाही "तुरंत" शुरू होगी.
अधिकारियों ने पहले हुई ब्रीफिंग में कई बार साफ किया कि होर्मुज़ स्ट्रेट (जलडमरूमध्य) से गुजरने वाले जहाज़ों से कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा.
लंबी अवधि में, ईरान ओमान और अन्य खाड़ी देशों के साथ मिलकर होर्मुज़ स्ट्रेट के प्रबंधन के लिए एक "व्यापक" समझौता तैयार करेगा.
एक अधिकारी ने कहा कि अमेरिका का मानना है कि ईरान अपने अधिकारों को "आक्रामक तरीके" से लागू करेगा. लेकिन खाड़ी देश कभी भी ऐसा भविष्य स्वीकार नहीं करेंगे, जिसमें वहां टोल प्रणाली लागू हो.
6: ईरान के पुनर्निर्माण के लिए धन
एमओयू के छठे बिंदु में कहा गया है कि अमेरिका और उसके क्षेत्रीय साझेदार ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए कम से कम 300 अरब डॉलर (224 अरब पाउंड) की योजना तैयार करेंगे.
अंतिम व्यवस्था पर अंतिम समझौते के 60 दिनों के भीतर सहमति बनेगी. सभी लाइसेंस, छूट और अनुमति अमेरिका देगा.
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिका आर्थिक रूप से इसमें शामिल होगा.
एक अधिकारी ने कहा कि अमेरिका को ईरान को "एक पैसा भी" देने की ज़रूरत नहीं होगी. न ही उसे इस फंड में योगदान देना होगा.
उदाहरण के तौर पर अधिकारी ने कहा कि अगर ईरान "अच्छा व्यवहार" करता है, तो संयुक्त अरब अमीरात के अधिकारी अमेरिका की मंज़ूरी से ईरान में बिजली संयंत्र बना सकते हैं.
ट्रंप और अन्य अधिकारियों ने बार-बार अमेरिकी जनता को यह स्पष्ट किया है कि अमेरिका सीधे ईरान को पैसा नहीं देगा.
प्रशासन का कहना है कि यह 2015 के ईरान-ओबामा परमाणु समझौते से बिल्कुल अलग है.
7: प्रतिबंध ख़त्म होंगे
अमेरिका ईरान पर लगे सभी आर्थिक प्रतिबंध समाप्त करेगा. इसमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों के तहत लगाए गए प्रतिबंध और अमेरिका के लगाए गए एकतरफा प्रतिबंध भी शामिल हैं.
हालांकि, इसकी समयसीमा अभी स्पष्ट नहीं है.
दस्तावेज़ में कहा गया है कि अंतिम समझौते के तहत इसका कार्यक्रम तय किया जाएगा. लेकिन दोनों पक्ष मानते हैं कि अगली बातचीत में इस मुद्दे पर "तुरंत" काम शुरू किया जाएगा.
प्रतिबंधों से ईरान की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हुआ है.
अमेरिका के "ऑपरेशन इकोनॉमिक फ्यूरी" का उद्देश्य ईरान को वैश्विक वित्तीय प्रणाली से अलग करना था.
8: परमाणु हथियार नहीं
ईरान ने सहमति दी है कि वह परमाणु हथियार नहीं खरीदेगा और न ही हासिल करेगा.
दोनों पक्ष इस बात पर भी सहमत हैं कि ईरान के पास पहले से मौजूद संवर्धित यूरेनियम का समाधान किया जाएगा.
हालांकि, यह कैसे होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है.
दस्तावेज़ में कहा गया है कि इसकी व्यवस्था पर आगे की बातचीत में सहमति बनेगी.
कम से कम इतना तय है कि अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) की निगरानी में उसी जगह यूरेनियम को कम संवर्धित स्तर पर लाया जाएगा.
एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी ने इसे "न्यूनतम मानक" और अमेरिका की "बड़ी जीत" बताया.
ट्रंप ने कहा था कि इस साल की शुरुआत में "ऑपरेशन एपिक फ्यूरी" शुरू करने का उनका 99 प्रतिशत उद्देश्य यही था कि ईरान परमाणु हथियार हासिल न कर सके.
क्योंकि अमेरिका ने इस समझौते को प्रदर्शन आधारित बताया है, इसलिए बिंदु 7 में दिए गए प्रतिबंधों में राहत तभी मिलेगी, जब ईरान बिंदु 8 का पालन करेगा.
9वां और 10वां बिंदु: यथास्थिति
समझौते के अगले दो हिस्सों में कहा गया है कि संवर्धित यूरेनियम का समाधान होने तक अमेरिका और ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को मौजूदा स्थिति में बनाए रखेंगे.
व्यवहार में इसका मतलब है कि अमेरिका कोई नया प्रतिबंध नहीं लगाएगा.
इस दौरान, वह तेल, पेट्रोलियम उत्पादों और उनसे जुड़ी सेवाओं, जैसे बैंकिंग लेनदेन और परिवहन, के लिए छूट देगा.
11: ईरान के फ़्रीज़ हुए खाते
यह मुद्दा बातचीत में लंबे समय से बड़ी रुकावट बना हुआ था.
ईरान लगातार मांग करता रहा कि उसकी फ़्रीज़ की हुई संपत्तियां रिलीज़ की जाएं, ताकि उसे आर्थिक राहत मिल सके.
दस्तावेज़ के 11वें बिंदु में कहा गया है कि एमओयू पर हस्ताक्षर होने के बाद अमेरिका "फ़्रीज़ या प्रतिबंधित फंड पूरी तरह उपलब्ध कराने" का वादा करता है.
इसकी प्रक्रिया बातचीत के दौरान तय की जाएगी.
बुधवार को एक अमेरिकी अधिकारी ने पत्रकारों से कहा कि एमओयू के बाद की बातचीत जारी रहने के दौरान कुछ संपत्तियां जारी की जाएंगी.
ऐसा तब किया जाएगा, जब ईरान समझौते की शर्तों का पालन करेगा. उदाहरण के लिए, जब वह अपने अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम के मुद्दे पर काम शुरू करेगा.
निगरानी और अंतिम बातचीत
दस्तावेज़ के अंतिम बिंदुओं में बताया गया है कि यह समझौता कैसे लागू होगा.
इनमें कहा गया है कि अमेरिका और ईरान एमओयू के पालन और भविष्य के अंतिम समझौते की निगरानी के लिए एक "व्यवस्था" बनाएंगे.
हालांकि, व्यवहार में यह व्यवस्था कैसी होगी, यह अभी स्पष्ट नहीं है.
इसके बाद, एमओयू पर हस्ताक्षर होने और इसे लागू करना शुरू होने के बाद, अमेरिका और ईरान अंतिम समझौते के लिए बातचीत शुरू करेंगे.
अंत में, एमओयू में कहा गया है कि अंतिम समझौते को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के बाध्यकारी प्रस्ताव के जरिए मंजूरी दी जाएगी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित