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दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन में महिलाओं के आरक्षण से कितनी भागीदारी बढ़ेगी?
- Author, सुशीला सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
अदालत के सामने जब एक वकील जिरह कर रहा होता है तो ये मायने नहीं रखता कि काला कोट पहने यह कोई महिला है या पुरुष. अदालत के सामने अहमियत रखते हैं तो सिर्फ़ तर्क, सबूत और गवाह और इसी आधार पर इंसाफ़ की राह निकलती है.
क़ानून के जानकारों के इस पेशे में पुरुषों का दबदबा रहा है, लेकिन अब उनकी भागीदारी बढ़ने की राह निकल गई है.
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन (डीएचबीए) में प्रयोग के तौर पर महिलाओं के लिए 33 फ़ीसदी आरक्षण को मंजूरी दे दी है.
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कोर्ट ने महिला वकीलों को दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन में कोषाध्यक्ष का पद, एक वरिष्ठ कार्यकारी सदस्य और कार्यकारी कमेटी में 30 फ़ीसदी आरक्षण देने को कहा है.
अपनी मांग के लिए इन महिलाओं को एक लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी है.
दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन में महिलाओं की स्थिति
दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन की स्थापना साल 1962 हुई थी और वर्तमान में इसके 35,000 सदस्य हैं, जिसमें से तकरीबन आधा फ़ीसदी महिला वकील हैं.
लेकिन इस एसोसिएशन की गवर्निंग बॉडी में महिला नेतृत्व नदारद था.
साल 2024 में महिला वकीलों के समूह ने गवर्निंग बॉडी में आरक्षण की मांग की ताकि वह नेतृत्व की भूमिका में आ सके.
ये इसलिए ज़रूरी था क्योंकि निर्णायक भूमिकाओं में सभी पुरुष थे और इस खाई को पाटने के लिए इन महिला वकीलो के अनुसार उनका एसोसिएशन में होना अहम है .
भारत की पहली महिला चीफ़ जस्टिस लीला सेठ ने एक बार कहा था, 'जब फ़ैसला लेने वाले टेबल पर महिला होगी तो फ़ैसला समग्र और ठीक होगा.'
दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन में बराबरी का दर्जा पाने के लिए पहले महिला वकीलों ने हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया.
इन्हीं याचिकाकर्ताओं में से एक वकील मरियम फ़ौज़िया रहमान कहती हैं, "इससे पहले भी महिलाएं एसोसिएशन का चुनाव लड़ती रही हैं लेकिन निर्णायक पदों के चुनाव में हिस्सा कम लेती हैं इसलिए इसमें पुरुषों का ही वर्चस्व ज़्यादा रहा है."
सुप्रीम कोर्ट में दो महिला जजों- जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस बीवी नागरत्न की नियुक्तियों ने ग्लास सीलिंग को तो तोड़ा है, लेकिन लैंगिक समानता लाने के लिए उनका हर ढांचे में होना अहम है.
फ़ौज़िया रहमान अनुसार, "महिला वकील निर्णायक पद जैसे; अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, कोषाध्यक्ष, संयुक्त सचिव और सचिव के पद पर जीत नहीं पाती थीं. ऐसे में एसोसिएशन में फ़ैसला लेने का आधार कभी भी समान नहीं रहा है. इसलिए मैंने अपनी याचिका में कहा था कि इन पदों में से एक पद महिला वकील के लिए आरक्षित किया जाए."
वो कहती हैं याचिका को लेकर उन्हें पहले हाई कोर्ट में काफ़ी दबाव झेलना पड़ा और फिर सुप्रीम कोर्ट में याचिका ले जाने पर विरोध भी सहना पड़ा था.
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन में महिलाओं को पहले से मिला है आरक्षण
महिला वकीलों का कहना है कि ये एक पेशेवर एसोसिएशन है और इसमें चुनाव भी प्रोफ़ेशनल तरीके से होने चाहिए.
उनका कहना है कि ये कोई राजनीतिक चुनाव नहीं हैं और कोर्ट का भी यही प्रयास रहा है कि नारेबाज़ी, बैनर या पोस्टर का इस्तेमाल बंद होना चाहिए. ऐसे में ये एक सुधारात्मक मुहिम है और महिलाओं के आने से इन चीज़ों को हटाने में मदद मिलेगी.
वहीं एक अन्य याचिकाकर्ता ज़ेबा ख़ैर कहती हैं कि कोषाध्यक्ष के पद को आरक्षित करना एक अहम कदम, दो दशकों के कार्यकाल में ये देखा गया है कि अध्यक्ष या सचिव की इस पद की नियुक्ति में और फ़ैसले लेने में बड़ी भूमिका होती और चुन कर आने वाला व्यक्ति केवल हस्ताक्षर करने के लिए होता है.
उनके अनुसार, "अब महिलाओं के हाथ में पर्स होगा और जिस तरह की सुविधाएं दिल्ली बार एसोसिएशन में होनी चाहिए वो इसका फ़ैसला ले पाएंगी. सोचिए हम लोग क़रीब आठ घंटे वहीं बिताते हैं, तो हमें वर्क स्टेशन चाहिए, क्लाइंट से मिलने के लिए जगह चाहिए."
"बेहतर क्रेच, बेहतर कैंटीन की सुविधा चाहिए और ऐसे में ये अब संभव हो पाएगा. वहीं कई कमेटियां है जिसमें ज्यादातर भागीदारी मर्दों की होती है. लेकिन आरक्षण मिलने से अब उनके लिए दरवाजें खुलेंगे और वे एक नया नज़रिया रखने में मदद करेंगीं."
उनका कहना है, "अगर आप यौन उत्पीड़न के लिए इंटरनल कमेटी की बात करें तो हाई कोर्ट के एडमिन स्टाफ़ के लिए यहां कमेटी है, लेकिन महिला वकीलों के लिए यह बार काउंसिल ऑफ़ दिल्ली में है जिसका दफ़्तर शिरी फोर्ट में है और एक दिल्ली हाई कोर्ट के एक चैंबर में है."
"अगर किसी महिला वकील के साथ ऐसा कुछ होता है तो उसे गवाह जुटाने होंगे, ऐसे में उसके लिए बार एसोसिएशन में ही सहूलियत होगी क्योंकि वहीं पर मामला सुना जाएगा और उन्हें बार काउंसिल नहीं जाना पड़ेगा."
दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के गवर्निंग बॉडी की मियाद दो साल की होती है. पहले इसके लिए चुनाव सात फरवरी को होने थे लेकिन अब तारीख़ आगे बढ़ाकर 28 फ़रवरी कर दी गई है.
आरक्षण की समय सीमा बढ़ने की उम्मीद
सुप्रीम कोर्ट की बार एसोसिएशन महिला वकीलों के लिए आरक्षण पहले ही लागू कर चुकी है, पर हाई कोर्ट के लिए अभी ये प्रयोग के तौर पर ही लागू होगा, लेकिन ऐसा क्यों?
इस सवाल के जवाब में सुप्रीम कोर्ट में वकील सुनेता ओझा का कहना है कि बार कॉउसिल और एडवोकेट एक्ट के जो नियम हैं, वकील उसके तहत काम करते हैं और एसोसिएशन बनाने का प्रावधान हमारे पास है.
उनका कहना है, "परेशानी ये है कि वकील इसे अपना मामला मानते हुए उन्हीं कायदे के तहत फ़ैसला लेते हैं. वो मानते हैं कि ये कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में नहीं है. साथ ही वकीलो की आज़ादी का भी सवाल था. लेकिन इसका विरोध हुआ."
"जब ये मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा तो उसे हस्तक्षेप करना पड़ा, क्योंकि महिलाओं की मांगे न्यायसंगत थीं. कोर्ट के बार-बार अवसर देने के बावजूद दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन अपने आप ये बदलाव नहीं ला सकी और इसलिए कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा और एक ऑर्डर के तहत महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित की गईं जो फिलहाल एक कार्यकाल के लिए है."
उनका मानना है कि समय की यह सीमा आगे बढ़ जाएगी.
सुनेता कहती हैं, "इसे एक अच्छी शुरुआत कहा जा सकता है कि बेंगलुरु एडवोकेट एसोसिएशन में भी महिलाओं को आरक्षण दिया गया है और महिला वकीलों के लिए एक रास्ता खुला है. सुप्रीम कोर्ट की बार एसोसिएशन में महिलाओं के लिए आरक्षण है और ये देखा गया है कि कुल 22 सदस्यों में से आठ महिलाएं हैं, ऐसे में वो निर्णायक स्थिति में हैं."
सुप्रीम कोर्ट में वकील और याचिकाकर्ताओं की तरफ़ से इस केस को लड़ने वाली गीता लूथरा का कहना है कि ये महिलाओं को सशक्त करने का एक माध्यम है. जब महिलाओं को पंचायत में आरक्षण मिल रहा है, वो कंपनियों के बोर्ड में शामिल हो रही हैं तो यहां क्यों नहीं? सुप्रीम कोर्ट में इस बार उपाध्यक्ष पद के लिए महिला चुन कर आई हैं. इसका बदलाव देखने को मिलेगा."
वो कहती हैं, "देखा जाए तो हर क्षेत्र में पुरुषों की संख्या ज़्यादा है और उनका नेटवर्क काफ़ी मज़बूत होता है. पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की पहली महिला अध्यक्ष असमा जहांगीर थीं. महिलाएं आमतौर पर सही मूल्यों पर दमदार तरीके से खड़ी होती हैं और इससे महिला के नज़रिए को समझने में मदद मिलेगी."
महिला वकीलों का कहना है कि हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन में आरक्षण फिलहाल प्रायोगिक तौर पर दिया है, लेकिन ये जल्द ही स्थायी तौर पर लागू हो जाएगा. दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन का चुनाव पहले 7 फ़रवरी को होना था लेकिन अब यह तारीख़ आगे बढ़ाकर 28 फ़रवरी कर दी गई है.
दिल्ली में हाई कोर्ट के अलावा छह ज़िला अदालतों- कड़कड़डूमा, तीस हज़ारी, रोहिणी, द्वारका, पटियाला हाउस और साकेत में ये फ़ैसला लागू होगा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित