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एशियन गेम्स हॉकी में भारत को गोल्ड, मिला पेरिस ओलंपिक का टिकट
- Author, मनोज चतुर्वेदी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
- प्रकाशित
भारत ने एशियाई खेलों की पुरुष हॉकी में अपने दबदबे के सिलसिले को बनाए रखकर चौथी बार ख़िताब जीतने का गौरव हासिल कर लिया. भारत ने फ़ाइनल में जापान को 5-1 हराया.
भारत इससे पहले 1966, 1998 और 2014 में भी एशियन गेम्स का स्वर्ण पदक जीता था.
भारत की इस ख़िताबी जीत के ख़ास मायने यह रहे कि उसने इस सफलता के साथ ही अगले साल पेरिस में होने वाले ओलंपिक खेलों में भाग लेने का अधिकार हासिल कर लिया. भारत यदि स्वर्ण पदक नहीं जीत पाता तो उसे क्वालिफ़ाइंग दौर से गुज़रना पड़ता और यह राह आसान नहीं होती है.
भारत को अब इस सफलता के बाद पेरिस ओलंपिक की तैयारी के लिए पर्याप्त समय मिल गया है. अब वह क्रेग फुलटोन की देख रेख में टोक्यो ओलंपिक में जीते तमगे का रंग बदलने के लिए जुट सकता है.
ग्राहम रीड के समय से ही भारतीय टीम में यह बदलाव दिखने लगा था कि हमारे खिलाड़ी गोल अपने नाम दर्ज कराने के बजाय सर्किल में बेहतर पोजिशन में खड़े खिलाड़ी को गोल जमाने का मौका देने लगे हैं. क्रेग फुलटोन के आने के बजाय इस क्षेत्र में और बेहतरी आई है.
भारतीय टीम के लिए इस टूर्नामेंट में मनदीप को 12 गोल जमाने का मौक़ा टीम की इस खूबी की वजह से ही मिला है. अब भारतीय खिलाड़ी व्यक्तिगत हित के बजाय टीम हित को ज्यादा महत्व देने लगे हैं.
इसकी वजह से बेहतर परिणाम सामने आने लगे हैं. मनदीप से ज़्यादा यहां गोल जमाने वाले सिर्फ़ हरमनप्रीत सिंह हैं. उन्होंने 13 गोल जमाए हैं.
फ़ाइनल के दबाव से निकलने में लगा समय
भारतीय टीम प्रतिद्वंद्वी जापान की क्षमता को देखते हुए सतर्कता के साथ खेली. भारत और जापान ने पहले क्वार्टर और दूसरे क्वार्टर के आधे समय तक हमले तो बनाए पर जोखिम उठाने से बचने की वजह से हमलों में पैनेपन की कमी साफ़ नज़र आई.
जापान जकार्ता में पहली बार जीते स्वर्ण की रक्षा के लिए खेल रही थी. इस कारण उसने पिछड़ने से बचने के लिए डिफेंस पर ज़ोर दिया. इस कारण भी भारत को दरारें बनाने में दिक्कत हो रही थी.
भारतीय टीम खेल के 25वें मिनट में शानदार गोल से आख़िरकार बढ़त बनाने में सफल हो गई. दाहिने फ़्लैंक से बने हमले में अभिषेक के प्रयास पर गोलकीपर ने पैड से गेंद क्लियर करने का प्रयास किया.
सर्किल के टॉप पर खड़े मनप्रीत सिंह ने रिवर्स स्टिक से शानदार शॉट लेकर गोल भेद दिया.
भारतीय टीम के बढ़त बनाने के बाद हमलों में तेज़ी आने लगी. दूसरी तरफ़ जापान ने भी पिछड़ने के बाद हमलों का जोर बांधना शुरू किया.
इससे खेल खुलने लगा और दोनों टीमों के हमलों में पैनापन आने लगा. पर हाफ़ टाइम तक भारत अपनी एक गोल की बढ़त को बनाए रखने में सफल रहा.
बढ़त के बाद दिखने लगी रंगत
भारतीय टीम इस रणनीति के साथ खेली कि उसने पहले अपने घर को बचाने का प्रयास किया. यह कोच क्रेग फुलटोन की सोच को दर्शाती है. वह डिफेंस के साथ जीतने में विश्वास रखते हैं. भारत इसी रणनीति के साथ खेलती दिखी.
भारत ने पहले हाफ़ में पहले अपने घर को सुरक्षित रखने की रणनीति के साथ खेला. इस दौरान उन्होंने मौक़ा मिलने पर ही हमले बोले. पर एक गोल की बढ़त मिल जाने के बाद भारत ने तीसरे क्वार्टर में आक्रामक हॉकी खेली.
भारत को आक्रामक हॉकी खेलने का फ़ायदा मिला. भारत इस समय तक पूरी तरह से हमले बोलने पर ज़ोर दे रहा था.
इसकी वजह से भारत इस क्वार्टर में दो गोल जमाकर मैच पर अपनी पकड़ मजबूत करने में सफल रहा. यह दोनों गोल भारत ने पेनल्टी कॉर्नर पर जमाए. पहला गोल हरमनप्रीत सिंह ने और दूसरा अमित रोहिदास ने जमाया.
भारतीय डिफेंस की अहम भूमिका
क्रेग फुलटोन के आने के बाद से भारतीय टीम स्ट्रक्चर बनाकर खेलने लगी है. फ़ाइनल के दौरान भारत का डिफेंस का स्ट्रक्चर बहुत दमदार रहा. भारत ने तीसरे क्वार्टर तक जापान को पेनल्टी कॉर्नर लेने से रोके रखा और जापान के खेल में वापसी नहीं कर पाने में इसकी भी अहम भूमिका रही.
जापान ने 10 मिनट खेल बाकी रहने पर लगातार दो पेनल्टी कॉर्नर मिले जिसमें से एक को एस तनाका गोल करके स्कोर को 1-4 करने में सफल हो गए.
भारत के मजबूत डिफेंस का ही परिणाम था कि जापान के हमलावरों को दरार बनाने में लगातार दिक्कत होती रही. इसका ही परिणाम था कि जापान भारतीय गोल पर कोई गंभीर प्रयास तक नहीं कर सकी.
गोल जमाने की क्षमता वाले अधिक खिलाड़ी
पहले भारतीय हॉकी टीम में गोल जमाने की क्षमता वाले कम खिलाड़ी हुआ करते थे. लेकिन मौजूदा टीम की सबसे बड़ी खूबी गोल जमाने की क्षमता वाले ज़्यादा खिलाड़ी होना है.
दक्षिण कोरिया के ख़िलाफ़ सेमीफ़ाइनल में पांच खिलाड़ियों ने गोल जमाए थे. इस फ़ाइनल मैच में भी भारत के पांच गोल चार खिलाड़ियों ने जमाए.
भारत के लिए फ़ाइनल में गोल जमाने वाले मनप्रीत सिंह, हरमनप्रीत सिंह, अमित रोहिदास और अभिषेक हैं. इसके अलावा कम से चार और खिलाड़ी गोल जमाने की क्षमता रखते हैं.
ये ख़िताब बदले माहौल का परिचायक
ये जीत भारतीय हॉकी में पिछले एक डेढ़ दशक में आए बदलाव का यह परिचायक है. हमें याद है कि भारत 1998 के एशियाई खेलों में 32 साल बाद स्वर्ण पदक जीता था और टीम के लौटने पर उसके सात प्रमुख खिलाड़ियों को टीम से बाहर की राह दिखा दी गई थी. यह सही है कि इनमें से ज़्यादातर खिलाड़ियों की देर सबेर टीम में वापसी हो गई.
अब माहौल बदल चुका है. टीम के कोच हों या खिलाड़ी अपनी जगह को लेकर आश्वस्त रहते हैं और उन्हें तैयार करने के लिए हर तरह की सुविधा भी मुहैया कराई जाती है.
इसका ही परिणाम है कि भारत 2020 के टोक्यो ओलंपिक में 41 साल बाद पदक जीतने के बाद अब एशियाई खेलों की हॉकी में भी अपना परचम फहराने में सफल रहा है.
भारत ने दिला दी पुराने दिनों की याद
भारत ने जब शुरुआती दिनों में ओलंपिक में खेलना शुरू किया था, तब वह कई टीमों पर दो अंकों में जीत दर्ज किया करती थी.
हमें याद है कि 1932 के ओलंपिक में अमेरिका पर हासिल की 24-1 की जीत की अक्सर चर्चा होती रही है.
भारत ने इन एशियाई खेलों में पूल मुक़ाबलों में पाकिस्तान सहित चार टीमों पर दो अंकों वाली जीत पाकर पुराने दिनों की याद ताज़ा कर दी. उसने उज्बेकिस्तान और सिंगापुर तो 16 गोल जमाकर विजय हासिल की.
वहीं परंपरागत प्रतिद्वंद्वी मानी जाने वाली पाकिस्तान पर 10-2 से जीत हासिल करना टीम का मनोबल बढ़ाने वाला रहा.
एशियन गेम्स 2023 में भारतीय हॉकी टीम ने कुल 68 गोल दागे हैं और उसके ख़िलाफ़ केवल 9 गोल ही हुए.
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