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सोफ़िया फ़िरदौस: ओडिशा की पहली मुस्लिम महिला विधायक जो जीत के बाद पहुँचीं दुर्गा मंदिर
- Author, संपद पटनायक
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
- प्रकाशित
कुछ लोगों के लिए ओडिशा के लोकसभा और विधानसभा के चुनावी नतीजे चौंकाने वाले रहे हैं. ओडिशा के विधानसभा चुनाव में 24 साल से सत्ता में बने रहे नवीन पटनायक की करारी हार हुई.
उनकी पार्टी बीजू जनता दल लोकसभा की 21 सीटों में खाता नहीं खोल पायी जबकि 147 विधानसभा सीटों में से महज 51 पर जीत हासिल कर सकी.
भारतीय जनता पार्टी ने 20 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल करने के साथ 78 विधानसभा सीटों पर जीत हासिल करके पहली बार राज्य में सरकार बना रही है.
लेकिन राज्य में एक कांटे की टक्कर के बाद पहली बार एक मुस्लिम महिला को विधायक चुना है.
सोफ़िया फ़िरदौस ओडिशा की पहली मुस्लिम महिला विधायक, अपनी पार्टी कांग्रेस के लिए उम्मीद जगाती दिख रही हैं.
बीजू जनता दल और भारतीय जनता पार्टी की टक्कर वाले इस चुनाव में कांग्रेस पार्टी रेस में भी नहीं थी. लेकिन बारबाटी-कटक सीट से कांग्रेस उम्मीदवार की जीत लगातार सुर्ख़ियों में है.
32 साल की सोफ़िया फ़िरदौस युवा और पढ़ी लिखी महिला हैं. राज्य में बीजेपी की लहर के बावजूद सोफ़िया आठ हज़ार से अधिक मत से विधानसभा का चुनाव जीतने में कामयाब हुईं.
कांग्रेस पार्टी को इस बार राज्य विधानसभा चुनाव में 14 सीटें मिली हैं, जो पिछले चुनाव की तुलना में पांच अधिक हैं.
शायद यही वजह है कि सोफ़िया फ़िरदौस भी पार्टी के प्रदर्शन को उम्मीद की नज़रों से देख रही हैं.
बीते एक दशक में यह पहला मौका है जब कांग्रेस पार्टी का प्रदर्शन पिछले चुनाव की तुलना में थोड़ा बेहतर हुआ है.
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जीत को सामाजिक चश्मे से देखना ज़रूरी
सोफ़िया फ़िरदौस चुनावी जीत के बाद बातचीत में बताती हैं, "पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व 2029 के चुनाव में वापसी को लेकर चर्चा का दौर शुरू कर चुकी है. हमारे कार्यकर्ताओं में इंडिया गठबंधन के प्रदर्शन को देखकर उत्साह की लहर है."
"ओडिशा विधानसभा चुनाव में हमलोग 14 सीट जीतने में कामयाब रहे. हम 15 सीटों पर दूसरे नंबर पर रहे हैं, जहां हार जीत का अंतर 800 से 1100 वोट के बीच में है. यानी कम से कम 30 सीटों पर हमारा मज़बूत आधार है. अगर हम मेहनत करें तो अगले चुनाव में बहुमत हासिल कर सकते हैं."
सोफ़िया की जीत को केवल राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए. इसे सामाजिक नज़रिए से भी देखे जाने की ज़रूरत है.
दरअसल बराबाटी-कटक विधानसभा की सीट काफी विविधता वाले समाज का क्षेत्र है. कटक में हिंदू, मुसलमान, ईसाई और सिख- यानी चारों धर्म के लोगों की बराबरी की भागीदारी थी. यही वजह है कि यहां की संस्कृति समावेशी है.
धर्म ही नहीं भाषाई आधार पर भी कटक का इलाक़ा विविधता से भरा हुआ है. ओडिया भाषी लोगों के अलावा यहां मारवाड़ी, बंगाली और तेलुगू बोलने वाले लोग रहते हैं.
इतना ही नहीं यहां चीनी और आंग्लो इंडियन मूल की आबादी भी रहती है, हालांकि धीरे धीरे इस विविधता में कमी आयी है. विभिन्न समुदाय के लोगों के पलायन के चलते विविधता में कमी देखने को मिल रही है.
वैसे कटक का इतिहास एक हज़ार साल से भी पुराना है. 989 ईस्वी में यहां राजा निरूपा केसरी का शासन था. महानदी और काठाजोरी नदियों के बाढ़ से शहर को बचाने के लिए 1006 ईस्वी में राजा मरकत केसरी ने पत्थरों की दीवार बनवाई थी. पुराने दौर में भी कटक की अहमियत थी.
जीत के बाद गईं दुर्गा मंदिर
हिंदू शासकों के बाद कटक पर मुस्लिमों ने शासन किया. इसके बाद मुगलों का शासन आया. फिर कटक पर मराठाओं ने कब्ज़ा किया और उसके बाद अंग्रेज आए.
आज़ादी के बाद प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 1948 में राज्य की राजधानी के तौर पर भुवनेश्वर में शिलान्यास किया लेकिन साठ के दशक तक कटक की अहमियत ओडिशा की राजधानी जैसी ही थी.
सोफ़िया फ़िरदौस कटक के बारे में बताती हैं, "कटक को 52 बाज़ार और 53 लेन का शहर माना जाता है, जहां लोग शांति और भाईचारा के साथ रहते हैं. प्रत्येक साही (लोगों के स्थानीय आस पड़ोस) के अपने मूरबी यानी अभिभावक हैं."
"जब हम लोग कोई काम करते हैं या दुर्गा पूजा, गणेश पूजा या फिर ईद जैसे त्योहार मनाते हैं, तो विभिन्न समुदाय के लोग अपने अपने मूरबी से संपर्क करके योजना के मुताबिक काम करते हैं."
सोफ़िया फ़िरदौस ये भी बताती हैं कि चुनाव में जीत हासिल करने के बाद सबसे पहले उन्होंने दुर्गा मंदिर में आशीर्वाद लिया.
उन्होंने कहा, "मैं एक क्रिश्चियन स्कूल से पढ़ी लिखी हूं और चर्च जाती रही हूं. कटक के लोग बेहद इमोशनल हैं. मैंने खुद को कभी अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्य के तौर पर नहीं देखा. मेरा चुनावी नारा ही था- कटक की बेटी, कटक की बहू."
पहले से तय किए लक्ष्य
सोफ़िया अपनी बातचीत में कटक की राजनीति और सामाजिक उत्थान में महिलाओं की ऐतिहासिक भूमिका को रेखांकित करना नहीं भूलतीं.
आज़ादी की लड़ाई में कटक की रमा देवी, मालती देवी की गिनती आज़ादी के नायकों में होती है. उसके बाद सैलबाला देवी और सरला देवी ने राजनीति और समाजिक विकास के कामों को आगे बढ़ाया. ओडिशा की इकलौती महिला मुख्यमंत्री नंदिनी देवी सतपथी भी कटक में जन्मीं और पली बढ़ीं.
सोफ़िया के सामने इस परंपरा को आगे बढ़ाने की चुनौती हैं. सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री और रियल एस्टेट डेवलपमेंट के कामकाजी अनुभव के आधार पर सोफ़िया कटक को ग्रीन स्मार्ट सिटी बनाना चाहती हैं.
वह कहती हैं, "मेरी समझ के मुताबिक़ ग्रीन का मतलब ही हिंदू मान्यता में पंचभूत का संरक्षण है. हिंदू मान्यताओं के मुताबिक ब्रह्मांड का आधार पृथ्वी, जल, अग्रि, वायु और आकाश से मिलकर बना है. हमें इन पंच भूतों के संरक्षण करने की ज़रूरत है."
सोफ़िया ने अपने लक्ष्य भी तय कर लिए हैं.
वो कहती हैं, "सड़क के किनारे की नालियों के ज़रिए बरसात के पानी का संरक्षण हो सकता है. कटक की सभी स्ट्रीट लाइट की व्यवस्था सोलर एनर्जी से हो सकती है. लोगों को बरसात के पानी के संरक्षण के लिए कुछ इंसेंटिव दिया जा सकता है."
"कटक नदियों से घिरा शहर है. शहर को नदियों से जोड़ने वाले नाले से ना केवल पानी संचयन में मदद मिलेगी बल्कि यह शहर को भी ठंडा रखेगा. लेकिन मैं अपने कार्यकाल की शुरुआत शहर के कचरा प्रबंधन से करना चाहूंगी."
सोफ़िया को चुनावी जीत में अपने पिता और पूर्व विधायक मोहम्मद मोकिम की बेटी होने का फ़ायदा मिला है.
मोकिम इसी सीट से विधायक थे, लेकिन भ्रष्टाचार के एक मामले में दोषी ठहराए जाने के चलते वे चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य ठहरा दिए गए थे.
ऐसे में कांग्रेस पार्टी ने उनकी बेटी को उम्मीदवार बनाया. सोफ़िया की बातों से साफ़ ज़ाहिर है कि वो ना केवल अपने पिता की विरासत बल्कि कटक की समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए तैयार है.
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