सोनम वांगचुक के स्कूल पर प्रशासन का शिकंजा, क्या है ज़मीन से लेकर लीज़ तक का पूरा विवाद?

    • Author, जहांगीर अली
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर से
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 6 मिनट

लद्दाख़ के पर्यावरण कार्यकर्ता और शिक्षाविद सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंगमो ने आरोप लगाया है कि लद्दाख़ प्रशासन उन्हें और उनके पति को सामाजिक और पर्यावरण से जुड़े कामों के लिए निशाना बना रहा है.

वहीं, सोनम वांगचुक ने आरोप लगाया है कि लद्दाख़ के उपराज्यपाल (एलजी) उनका स्कूल बंद करना चाहते हैं.

ये आरोप ऐसे समय में आए हैं, जब लद्दाख़ प्रशासन के राजस्व विभाग ने 1 नवंबर को गीतांजलि आंगमो को एक नोटिस जारी किया. इसमें लेह के ऊंचाई वाले इलाक़े फ्यांग में स्थित 'डेज़र्ट फ्लावर' स्कूल में गतिविधियां शुरू करने पर रोक लगाने को कहा गया है.

नोटिस में कहा गया है कि संबंधित अधिकारियों से ज़रूरी मंज़ूरी और सहमति लिए बिना स्कूल में गतिविधियां शुरू की गई हैं.

स्कूल की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक़, गीतांजलि आंगमो इसकी संस्थापक निदेशक और प्रमुख हैं, जबकि सोनम वांगचुक इसके चार निदेशकों में से एक हैं.

आंगमो ने बताया कि सोमवार को पहली बार स्कूल में कक्षाएं शुरू हुई थीं.

उन्होंने दावा किया कि स्कूल से जुड़े सभी ज़रूरी दस्तावेज़ पूरे हैं.

उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "इस नोटिस के ज़रिए हम पर दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है, ताकि हम उन मुद्दों पर आवाज़ न उठाएं जिन्हें हम सही मानते हैं. हमने नोटिस का जवाब दे दिया है. हम इसका विरोध करेंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि हमें न्याय मिले."

उन्होंने आरोप लगाया कि आदिवासियों और पर्यावरण से जुड़े मुद्दे उठाने के कारण सरकार उन्हें और उनके पति सोनम वांगचुक को निशाना बना रही है.

सोनम वांगचुक लेह एपेक्स बॉडी के सदस्य हैं. यह संगठन कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस के साथ मिलकर लद्दाख़ में "लोकतंत्र और संवैधानिक सुरक्षा की मांग" को लेकर आंदोलन चला रहा है.

दोनों संगठन लद्दाख़ को पूर्ण राज्य का दर्जा देने और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग कर रहे हैं. साल 2023 में केंद्र सरकार ने इस सीमावर्ती इलाक़े में जारी गतिरोध को ख़त्म करने के लिए एक हाई पावर्ड कमिटी बनाई थी. इसके बाद से दोनों संगठनों और केंद्रीय गृह मंत्रालय के बीच कई दौर की बातचीत हो चुकी है.

वांगचुक ने हाल ही में नरेंद्र मोदी सरकार पर लद्दाख़ के लोगों का भरोसा तोड़ने का आरोप भी लगाया था. उन्होंने अरुणाचल प्रदेश में कथित तनाव की तुलना पिछले साल लद्दाख़ में हुई हिंसा से की थी. उस हिंसा में सुरक्षा बलों की गोलीबारी में कम से कम चार प्रदर्शनकारियों की मौत हुई थी.

गीतांजलि आंगमो ने बीबीसी से कहा, "यह सरकार लोगों की चिंताओं के प्रति पूरी तरह बहरी, गूंगी और संवेदनहीन हो चुकी है. वे नहीं चाहते कि सोचने-समझने वाले और अपने विवेक से काम करने वाले लोग उनकी योजनाओं में दखल दें. उनके लिए औद्योगीकरण और मुनाफ़े के नाम पर बिना सोचे-समझे विकास करना बाकी हर चीज़ से ज़्यादा ज़रूरी है."

क्या है ताज़ा विवाद?

'डेज़र्ट फ्लावर' स्कूल लेह ज़िले के फ्यांग थांग इलाक़े में स्थित हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव्स लद्दाख़ (एचआईएएल) के परिसर में चलता है. यह संस्थान शिक्षा के नए और वैकल्पिक तरीक़ों पर काम करता है. यह एक ट्रस्ट के रूप में पंजीकृत है.

सोनम वांगचुक एचआईएएल के संस्थापक निदेशक हैं, जबकि गीतांजलि आंगमो इसकी सह-संस्थापक हैं.

दस्तावेज़ों के मुताबिक़, साल 2018 में जब लद्दाख़ तत्कालीन जम्मू-कश्मीर राज्य का हिस्सा था, तब लेह के डिप्टी कमिश्नर ने एचआईएएल को 1,076 कनाल ज़मीन 40 साल की लीज़ पर देने की मंज़ूरी दी थी. हालांकि, इसके लिए लीज़ समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हुए थे.

साल 2019 में जम्मू-कश्मीर से अलग होने के बाद लद्दाख़ में राजनीतिक तनाव बढ़ने लगा. इस दौरान सोनम वांगचुक केंद्र सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ लोगों की आवाज़ उठाने वाले प्रमुख चेहरों में शामिल हो गए.

इसके बाद पिछले साल 21 अगस्त को प्रशासन ने एचआईएएल को ज़मीन देने का आदेश रद्द कर दिया.

सोनम वांगचुक और गीतांजलि आंगमो ने इस फ़ैसले को 'राजनीतिक बदले की कार्रवाई' बताया और इसके ख़िलाफ़ जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट में याचिका दाख़िल की. यह मामला अभी अदालत में है.

इस साल 11 सितंबर को दिए गए आदेश में अदालत ने लद्दाख़ प्रशासन से कहा कि एचआईएएल प्रबंधन की याचिका में शामिल ज़मीन पर किसी तीसरे पक्ष को कोई अधिकार न दिया जाए.

3 नवंबर को लेह के तहसीलदार के नोटिस का जवाब देते हुए गीतांजलि आंगमो ने प्रशासन पर अदालत के आदेश की ग़लत व्याख्या करने का आरोप लगाया.

अपने जवाब में उन्होंने कहा, "अदालत ने सरकार और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे एचआईएएल को आवंटित ज़मीन पर किसी तीसरे पक्ष का अधिकार न बनने दें. अदालत ने कहीं भी एचआईएएल के कामकाज और गतिविधियों पर रोक लगाने या उन्हें रोककर यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश नहीं दिया है."

बीबीसी ने इस मामले पर लेह के डिप्टी कमिश्नर रोमिल सिंह डोंक और लेह के राजस्व विभाग के तहसीलदार मोहम्मद शब्बीर से भी प्रतिक्रिया मांगी है. उनका जवाब मिलने पर इस ख़बर को अपडेट किया जाएगा.

अदालत में इस मामले की क्या स्थिति है?

लद्दाख़ प्रशासन ने हाई कोर्ट में कहा था कि सोनम वांगचुक को कुछ शर्तों के साथ ज़मीन लीज़ पर दी गई थी, लेकिन उन्होंने इन शर्तों का पालन नहीं किया. इनमें ज़मीन का किराया देना भी शामिल था.

प्रशासन ने आरोप लगाया कि एचआईएएल को जिस काम के लिए ज़मीन दी गई थी, उसका इस्तेमाल उस काम के लिए नहीं हुआ. प्रशासन का यह भी कहना था कि वहां विश्वविद्यालय शुरू किए जाने का कोई सबूत नहीं है. इसी वजह से लीज़ समझौता ख़त्म कर दिया गया.

प्रशासन ने वांगचुक पर यह आरोप भी लगाया कि जब भी उनसे किसी मामले में जवाब मांगा जाता है, तो वह प्रशासन के ख़िलाफ़ ग़लत और भड़काऊ प्रचार करते हैं. उन पर निर्वाचित परिषद और अधिकारियों को धमकाने का भी आरोप लगाया गया. प्रशासन का कहना था कि वांगचुक ने कर्मचारियों और छात्रों को आंदोलन के लिए भी उकसाया, जिनमें हिंसक आंदोलन भी शामिल थे.

अपने बचाव में गीतांजलि आंगमो ने अदालत को बताया कि एचआईएएल ने 20 मई 2018 को ज़मीन का लीज़ समझौता करने के लिए आवेदन दिया था. इसके बाद मार्च 2020 में उन्होंने प्रशासन को इस बारे में फिर से याद दिलाया था.

उन्होंने प्रशासन के एक पत्र की फोटोकॉपी दिखाते हुए कहा, "प्रशासन ने हमें लिखकर बताया था कि नई लीज़ नीति को अंतिम रूप नहीं दिए जाने के कारण ज़मीन का लीज़ समझौता नहीं किया जा सकता."

साल 2019 में जम्मू-कश्मीर से अलग होने के बाद लद्दाख़ को बिना विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया था. इसके बाद वहां नए क़ानून और नियम लागू किए गए.

गीतांजलि आंगमो ने 14 मार्च 2020 को लेह के सहायक आयुक्त की ओर से भेजे गए एक आधिकारिक पत्र का हवाला दिया. उन्होंने कहा कि नई लीज़ नीति नहीं होने के कारण एचआईएएल के साथ ज़मीन का समझौता नहीं हो सका था.

दस्तावेज़ों से यह भी पता चलता है कि लीज़ समझौते पर हस्ताक्षर नहीं होने के बावजूद लद्दाख़ प्रशासन ने एचआईएएल प्रबंधन को उस जगह पर निर्माण कार्य जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया था.

लेह एपेक्स बॉडी के सह-अध्यक्ष चेरिंग दोरजे लकरुक ने बीबीसी से बातचीत में आरोप लगाया कि सोनम वांगचुक को लोगों के लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने की सज़ा दी जा रही है.

उन्होंने कहा, "उन्हें अपने रुख़ की वजह से निशाना बनाया जा रहा है. वरना सरकार को ऐसे स्कूल के खुलने पर आपत्ति क्यों होगी, जहां ग़रीब और वंचित बच्चों को शिक्षा मिलती है?"

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें

BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह

कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.