धीरेंद्र शास्त्री और संगीत रागी की विवादित टिप्पणी, क्या यूपी चुनाव में इसका असर पड़ेगा?

    • Author, प्रेरणा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
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बीते कुछ दिनों में सोशल मीडिया पर वायरल हुई दो टिप्पणियों को लेकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में हलचल है.

समाजवादी पार्टी इन दोनों मुद्दों पर आक्रामक दिखाई दे रही है, जबकि भारतीय जनता पार्टी थोड़ी असहज नज़र आ रही है.

पहली टिप्पणी हिंदू धर्मगुरु धीरेंद्र शास्त्री की है, जिन्हें उनके अनुयायी बागेश्वर बाबा के नाम से जानते हैं. दूसरी टिप्पणी दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर और आरएसएस से जुड़े संगीत रागी की है.

धीरेंद्र शास्त्री ने भगवान राम और कृष्ण की तुलना करते हुए विवादित टिप्पणी की थी. वहीं, संगीत रागी ने एक टीवी चैनल पर लाइव डिबेट के दौरान समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता मनोज यादव काका के लिए आपत्तिजनक और जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया था.

हालांकि, संगीत रागी ने बाद में सफ़ाई देते हुए माफ़ी मांगी और कहा कि उनकी टिप्पणी किसी ख़ास समुदाय के लिए नहीं थी. वहीं, धीरेंद्र शास्त्री ने भी अपनी टिप्पणी के लिए माफ़ी मांगी है.

लेकिन समाजवादी पार्टी लगातार दोनों पर हमलावर है.

यूपी के कुंडा में 17 नवंबर से धीरेंद्र शास्त्री का कथा कार्यक्रम प्रस्तावित है. अखिलेश यादव इन कार्यक्रमों को रद्द करवाने की मांग कर रहे हैं.

इससे पहले, समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने बुधवार को लखनऊ के हजरतगंज थाने में धीरेंद्र शास्त्री के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करने के लिए तहरीर दी थी.

वहीं, सपा प्रवक्ता मनोज यादव 'काका' के समर्थन में प्रदर्शन किया और संगीत रागी का पुतला फूंकने की कोशिश की.

विपक्षी दलों के कई नेता भी इन बयानों पर प्रतिक्रिया दे चुके हैं. इनमें समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव, आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह, आरजेडी नेता तेजस्वी यादव और पूर्णिया से सांसद पप्पू यादव शामिल हैं.

इन दोनों बयानों और शास्त्री के प्रस्तावित कार्यक्रमों को लेकर बीजेपी के सामने एक राजनीतिक चुनौती भी है. ख़ासकर इसलिए कि उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं और समाजवादी पार्टी इन मुद्दों को चुनावी बहस का हिस्सा बनाने की कोशिश कर सकती है.

समाजवादी पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बीबीसी से कहा कि दोनों टिप्पणियां बिल्कुल ग़लत हैं. उन्होंने कहा कि पार्टी चुनाव के दौरान भी इन मुद्दों को लगातार उठाती रहेगी.

वहीं, बीजेपी के प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी का कहना है कि ऐसे बयानों से बचने की ज़रूरत है. उनके मुताबिक़, "ये कहीं से भी शोभा नहीं देते. लेकिन समाजवादी पार्टी के नेताओं ने क्या ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों पर टिप्पणियां नहीं कीं? उन्हें अपमानित नहीं किया? आए दिन क्षेत्रीय लोगों का अपमान किया जाता है. समाजवादी पार्टी हिंदुओं को बांटने की कोशिश कर रही है. लेकिन हमें भरोसा है कि हिंदू नहीं बंटेंगे और बीजेपी के साथ रहेंगे."

लेकिन क्या इन दोनों टिप्पणियों का उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति पर कोई असर पड़ सकता है? क्या समाजवादी पार्टी इन्हें बीजेपी के ख़िलाफ़ बड़े राजनीतिक मुद्दे में बदल पाएगी? या फिर इन बयानों का चुनावी असर उतना नहीं होगा, जितना अभी दिखाई दे रहा है?

वरिष्ठ पत्रकार सुनीता ऐरन का मानना है कि धीरेंद्र शास्त्री की टिप्पणी को सिर्फ़ समाजवादी पार्टी को होने वाले राजनीतिक फ़ायदे या नुक़सान के नज़रिए से नहीं देखना चाहिए.

वह कहती हैं, "क्या धीरेंद्र शास्त्री भगवान को भी जाति के आधार पर बांटने की कोशिश कर रहे हैं? यह सवाल समाजवादी पार्टी को राजनीतिक फ़ायदा होने का नहीं है, बल्कि इससे कृष्ण भक्तों को ठेस पहुंचती है. कृष्ण के भक्त सिर्फ़ यदुवंशी नहीं हैं. बड़ी संख्या में लोग गुजरात और दिल्ली से भी मथुरा आते हैं."

सुनीता ऐरन के मुताबिक़, "बीजेपी इस टिप्पणी से ज़ाहिर तौर पर असहज होगी, क्योंकि पार्टी के कुछ नेता धीरेंद्र शास्त्री को बढ़ावा देते रहे हैं या उनसे जुड़े रहे हैं. बीजेपी और आरएसएस को खुलकर ऐसे बयानों की निंदा करनी चाहिए. उनकी चुप्पी से मामला और बिगड़ सकता है. समाजवादी पार्टी को इसका राजनीतिक फ़ायदा मिल सकता है."

वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा भी इस बात से इत्तेफ़ाक रखते हैं. उनका कहना है कि बीजेपी लंबे समय से उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के पारंपरिक यादव वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश करती रही है.

इसके लिए पार्टी ने यादव समुदाय के नेताओं को आगे बढ़ाने के साथ-साथ भगवान कृष्ण से जुड़ी धार्मिक पहचान को भी अपनी राजनीति में जगह दी है. मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि के मुद्दे के ज़रिए भी व्यापक हिंदू मतदाताओं तक पहुंचने की कोशिश की है.

ऐसे में भगवान कृष्ण को लेकर धीरेंद्र शास्त्री की टिप्पणी बीजेपी की इस रणनीति के सामने भी चुनौती खड़ी कर सकती है.

धीरेंद्र शास्त्री ने हालांकि इस मामले में माफ़ी मांगी है और कहा है कि उनकी बातों का ग़लत मतलब निकाला गया. लेकिन विनोद शर्मा का मानना है कि इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा. उनके मुताबिक़, जो नुक़सान होना था, वह हो चुका है.

वहीं, संगीत रागी की टिप्पणी को लेकर भी आरजेडी और समाजवादी पार्टी आक्रामक हैं.

विनोद शर्मा कहते हैं, "यादव बीजेपी के कोर वोटर नहीं रहे हैं. यह बात सच है, लेकिन बीजेपी लंबे समय से उस वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है. मोहन यादव को मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाना, मार्च 2024 में लखनऊ में आयोजित यादव महाकुंभ में मोहन यादव का पहुंचना और लोगों से अपनी यदुवंशी पहचान पर गर्व करने की अपील करना, मुलायम सिंह यादव और उनके भाइयों के बीच फूट डालना, ये सब उसी दिशा में की जा रही कोशिशों के उदाहरण हैं."

उत्तर प्रदेश में यादव समुदाय तक पहुंच बनाने की बीजेपी की कोशिश कोई नई नहीं है.

2017 में यूपी की सत्ता में आने के बाद तत्कालीन उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने कहा था कि पार्टी अब तक गैर-यादव ओबीसी पर ध्यान दे रही थी, लेकिन अब यादवों पर भी ज़ोर देगी.

इसके बाद पार्टी ने यादव समुदाय के प्रभावशाली लोगों को सम्मानित करने, यादव कार्यकर्ताओं के घर जाकर भोजन करने और समुदाय के नेताओं को संगठन में जगह देने जैसे प्रयोग किए.

2022 के विधानसभा चुनाव से पहले मुलायम सिंह यादव की बहू अपर्णा यादव को पार्टी में शामिल करना और बाद में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव को उत्तर प्रदेश में आगे करना भी इसी व्यापक राजनीतिक कोशिश का हिस्सा रहा है.

2022 में ही इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट में बीजेपी के एक पदाधिकारी के हवाले से बताया गया था कि पार्टी यादव समुदाय के उन युवाओं पर ख़ास ध्यान दे रही है, जो अखिलेश यादव के राजनीतिक प्रभाव से ज़्यादा प्रभावित नहीं हैं.

पार्टी की कोशिश थी कि ऐसे युवाओं को स्थानीय स्तर पर संगठन और चुनावी गतिविधियों से जोड़ा जाए.

इसी रिपोर्ट में बीजेपी के एक नेता ने दावा किया था कि पार्टी को बदायूं, आज़मगढ़, इटावा और कन्नौज जैसे यादव बहुल इलाक़ों में भी यादवों के वोट मिले थे.

हालांकि, इन बयानों के बाद बीजेपी पूरी तरह बैकफुट पर है, ऐसा कहना भी ग़लत होगा. बीजेपी की राजनीति को समझने वाले एक शख़्स ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि भगवान राम और कृष्ण के बीच बहस जितनी बढ़ेगी, बीजेपी को उतना ही फ़ायदा होगा.

इंडियन एक्सप्रेस में इसी मुद्दे पर प्रकाशित एक लेख में भी इसका ज़िक्र है. लेख के मुताबिक़, बीजेपी इस मुद्दे पर समाजवादी पार्टी और आरजेडी पर पलटवार कर रही है.

अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव पर निशाना साधते हुए बीजेपी प्रवक्ता नवीन श्रीवास्तव ने कहा, "अब जबकि चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव को अचानक भगवान कृष्ण की याद आने लगी है. लेकिन जो अखिलेश यादव राम मंदिर नहीं गए और भगवान राम के अस्तित्व पर सवाल उठा चुके हैं, वे बताएंगे कि मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि कब जाएंगे? क्या वे कृष्ण जन्मभूमि मंदिर आंदोलन का समर्थन करते हैं या नहीं?"

यानी बीजेपी इस पूरे विवाद को समाजवादी पार्टी के सामने राम मंदिर और कृष्ण जन्मभूमि पर उसका रुख़ स्पष्ट करने के सवाल में बदलने की कोशिश कर रही है.

लेकिन वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी बीजेपी की इस रणनीति पर सवाल उठाती हैं.

वह कहती हैं कि अभी कृष्ण जन्मभूमि का मुद्दा चुनावी बहस के केंद्र में नहीं है. अगर इसे मुद्दा बनाया भी जाता है, तो बीजेपी के सामने सवाल खड़े होंगे. एक तरफ़ मंदिर बनाने की बात हो रही है और दूसरी तरफ़ भगवान कृष्ण को लेकर ऐसी टिप्पणियां की जा रही हैं. ऐसे में सवाल उठेगा कि बीजेपी इन टिप्पणियों की खुलकर आलोचना क्यों नहीं कर रही.

वह यह आशंका भी जताती हैं कि धीरेंद्र शास्त्री और संगीत रागी के बयान ग़लती से दिए गए बयान नहीं लगते, बल्कि ऐसा लगता है कि इन्हें जानबूझकर दिया गया है.

नीरजा चौधरी यह सवाल भी उठाती हैं कि क्या उत्तर प्रदेश में कुछ ऐसे लोग हैं, जो नहीं चाहते कि योगी आदित्यनाथ सत्ता में बने रहें.

उनका मानना है कि इन बयानों से यादव वोट बैंक और ज़्यादा एकजुट हो सकता है. उनका कहना है कि कांग्रेस में मौजूद ऐसे यादव नेता और उम्मीदवार, जो समाजवादी पार्टी में नहीं जाना चाहते थे, वे भी बीजेपी में शामिल होने से हिचक सकते हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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