1977 में रिलायंस ने कैसे बदली थी भारतीय शेयर बाज़ार की तस्वीर?

    • Author, अजीत गढ़वी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

रिलायंस समूह की दूरसंचार कंपनी 'जियो प्लेटफ़ॉर्म्स' का मेगा आईपीओ इन दिनों देश और विदेश में ख़ूब सुर्ख़ियाँ बटोर रहा है.

कंपनी ने 30,213 करोड़ रुपये का आईपीओ जारी किया है.

इस बीच, जियो प्लेटफ़ॉर्म्स का आईपीओ एक के बाद एक नए रिकॉर्ड बना रहा है. शुक्रवार, 23 अक्तूबर को आईपीओ में आवेदन के लिए भुगतान की अंतिम तारीख़ थी और 'मनीकंट्रोल डॉट कॉम' के अनुसार, यह इश्यू लगभग 22.19 गुना सब्सक्राइब हुआ है.

न्यूज़ एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, जियो प्लेटफ़ॉर्म्स का मेगा आईपीओ दुनिया का पहला ऐसा आईपीओ है, जिसे एक करोड़ से अधिक आवेदन मिले हैं.

रिलायंस ग्रुप का पहला आईपीओ

रिलायंस जियो के आईपीओ को लेकर हो रही इतनी चर्चा के बीच यह जानना दिलचस्प होगा कि 49 साल पहले, जब रिलायंस समूह ने अपना पहला आईपीओ लॉन्च किया था, तब माहौल कैसा था और निवेशकों ने इससे कितना मुनाफ़ा कमाया था.

उद्योगपति धीरूभाई अंबानी ने रिलायंस समूह की स्थापना की थी. समूह का पहला आईपीओ 1977 में आया था और उस समय कंपनी का नाम 'रिलायंस टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज़' था.

रिकॉर्ड बताते हैं कि 15 से 17 नवंबर 1977 के बीच कंपनी ने आईपीओ के ज़रिए 2.80 करोड़ रुपये जुटाए और 23 जनवरी 1978 को रिलायंस टेक्सटाइल के शेयर बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) और अहमदाबाद स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध हुए.

'फ़ॉर्च्यून इंडिया' पत्रिका की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, रिलायंस टेक्सटाइल्स इंडस्ट्रीज़ ने 10 रुपये प्रति शेयर के भाव पर 28.2 लाख शेयर जारी किए थे. इसके लिए 7.19 गुना आवेदन मिले थे.

इससे कंपनी को लगभग 58 हज़ार शेयरधारक मिले. कारोबार के पहले दिन शेयर 17 से 18 रुपये प्रति शेयर के भाव पर बिके. इसका मतलब है कि निवेशकों को लिस्टिंग के दिन ही 70 से 80 प्रतिशत का मुनाफ़ा हुआ.

यह कोई फ़्रेश इश्यू नहीं था, बल्कि कंपनी के प्रमोटर धीरूभाई अंबानी और उनके भाई नटवरलाल अंबानी ने अपनी हिस्सेदारी बेची थी. आगे चलकर 1985 में रिलायंस टेक्सटाइल्स का नाम बदलकर 'रिलायंस इंडस्ट्रीज़' कर दिया गया.

कंपनी की 1976-1977 की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक, आईपीओ के बाद 57,949 शेयरधारक पंजीकृत हुए थे. इनमें से 56,129 शेयरधारकों के पास 200 तक शेयर, 1,647 शेयरधारकों के पास 225 से 1,000 शेयर और 125 शेयरधारकों के पास 1,050 से 5,000 शेयर थे. वहीं, 48 शेयरधारकों के पास 5,000 से अधिक शेयर थे.

10 रुपये के अंकित मूल्य के मुक़ाबले 17 से 18 रुपये की क़ीमत पर लिस्ट होने के बाद शेयर की क़ीमत उसी साल बढ़कर 50 रुपये हो गई. इसके दो साल बाद यह 104 रुपये और चार साल में 186 रुपये पर पहुँच गई.

निवेशकों ने कितना मुनाफा कमाया?

'फ़ॉर्च्यून इंडिया' की एक रिपोर्ट के अनुसार, अगर आपने 1977 में रिलायंस के आईपीओ के दौरान 1,000 रुपये का निवेश करके 100 शेयर ख़रीदे होते, तो बोनस शेयरों और शेयर की क़ीमत में हुई वृद्धि को मिलाकर आपके निवेश का मूल्य लगभग 50 लाख रुपये होता. इसके अलावा, कंपनी ने इन वर्षों में जो लाभांश (डिविडेंड) दिया, उसकी रक़म अलग होती.

हाल ही में, कोटक महिंद्रा बैंक के संस्थापक उदय कोटक ने जियो के एक कार्यक्रम में रिलायंस टेक्सटाइल्स के आईपीओ को याद करते हुए कहा, "1977 में जब मैं 18 साल का था, तब मुंबई की चौपाटी और मरीन ड्राइव को रिलायंस टेक्सटाइल्स के मार्केटिंग अभियान के लिए सजाया गया था. वह मेरे लिए एक जादुई पल था."

एसएमसी ग्लोबल सिक्योरिटीज़ के निदेशक और सीईओ अजय गर्ग ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा कि रिलायंस टेक्सटाइल्स इंडस्ट्रीज़ के आईपीओ के दौरान पहली बार छोटे शहरों के लोगों ने भी शेयर बाज़ार में निवेश करना शुरू किया था.

1977 में भारत का मध्यम वर्ग मुख्य रूप से सोने, ज़मीन या बैंक की एफ़डी में निवेश करना पसंद करता था. शेयर बाज़ार कुछ बड़े दलालों और मुंबई के धनी लोगों तक ही सीमित था, लेकिन धीरूभाई ने अपने एजेंटों को गुजरात समेत देश भर के छोटे शहरों में भेजा.

जब धीरूभाई निवेशकों के 'सितारे' बन गए

ऑस्ट्रेलियाई पत्रकार और लेखक हैमिश मैकडोनाल्ड ने धीरूभाई अंबानी के जीवन पर आधारित एक जीवनी लिखी, जिसका नाम "द पॉलिएस्टर प्रिंस: द राइज़ ऑफ़ धीरूभाई अंबानी" है.

यह पुस्तक 1998 में प्रकाशित हुई थी. इसमें उन्होंने 'गुरु ऑफ़ द इक्विटी कल्ट' नामक चैप्टर में रिलायंस टेक्सटाइल्स के 1977 के आईपीओ के बारे में चर्चा की है.

वह लिखते हैं, "प्रधानमंत्री के रूप में इंदिरा गांधी का दूसरा कार्यकाल धीरूभाई अंबानी के लिए स्वर्णिम समय था. वार्षिक बिक्री के लिहाज़ से, उनकी कंपनी 1979 में भारत की शीर्ष 50 कंपनियों में भी शामिल नहीं थी, लेकिन 1984 तक रिलायंस भारत की शीर्ष पाँच कंपनियों में से एक बन गई थी. धीरूभाई स्वयं भारत में इतने प्रसिद्ध व्यक्ति बन गए थे कि उनके प्रशंसक उन्हें किसी व्यवसायी की तरह नहीं, बल्कि किसी क्रिकेटर या फ़िल्म स्टार की तरह मानते थे."

पुस्तक में आगे बताया गया है, "धीरूभाई ने 1970 के दशक में अपनी विस्तार क्षमता बढ़ा ली थी और अब वे पूँजी जुटाने की तैयारी कर रहे थे. धीरूभाई ने कर्नाटक में 'मायनायलॉन लिमिटेड' नामक एक कंपनी शुरू की. 1975 में, उन्होंने कर्नाटक और बॉम्बे उच्च न्यायालयों की मंज़ूरी लेकर रिलायंस और मायनायलॉन का विलय कर दिया. इसमें, मात्र 11,000 रुपये की चुकता पूँजी वाली मायनायलॉन ने 6 करोड़ रुपये की संपत्ति वाली रिलायंस की सभी संपत्तियों और देनदारियों को अपने अधीन ले लिया."

मार्च 1977 में, कंपनी बैंगलोर (वर्तमान बेंगलुरु) से वापस बॉम्बे (मुंबई) आ गई और इसका नाम बदलकर 'रिलायंस टेक्सटाइल्स इंडस्ट्रीज़' कर दिया गया.

अक्तूबर-नवंबर 1977 में, रिलायंस ने अपना पहला आईपीओ लॉन्च किया, जिसमें धीरूभाई और उनके छोटे भाई नथुभाई (नटवरलाल) की हिस्सेदारी से शेयर बेचे गए. इसके बाद, रिलायंस ने नियमित अंतराल पर राइट्स और बोनस इश्यू के माध्यम से अपने इक्विटी बेस को बढ़ाया. सितंबर 1979 में वित्तीय संस्थानों ने अपने ऋणों का 20 प्रतिशत हिस्सा इक्विटी में परिवर्तित कर दिया.

इस पुस्तक के अनुसार, "साल 1980 में भारत में शेयरधारकों की संख्या 10 लाख से कम थी, लेकिन 1985 तक यह बढ़कर 40 लाख हो गई थी. इनमें से अकेले रिलायंस के ही 10 लाख से अधिक शेयरधारक थे. भारत में हर चार शेयरधारकों में से एक के पास रिलायंस के शेयर थे. विशेष रूप से गुजरात में, धीरूभाई को 'हीरो' का दर्जा प्राप्त हो गया था."

मध्यम वर्ग शेयरों में निवेश करते हुए बड़ा हुआ है?

ऐसा माना जाता है कि भारत में छोटे निवेशक शेयर बाज़ार की ओर इसलिए आकर्षित हुए, क्योंकि धीरूभाई अंबानी ने छोटे पैमाने से शुरुआत की और एक बड़ा व्यापारिक साम्राज्य खड़ा किया.

रिलायंस समूह की वेबसाइट का दावा है कि जब धीरूभाई ने अपना कारोबार शुरू किया था, तब उनके पास मात्र 14 हज़ार रुपये थे. उसके बाद, साढ़े तीन दशकों में रिलायंस का आकार बढ़कर 60 हज़ार करोड़ रुपये हो गया और यह 'फ़ॉर्च्यून 500' सूची में शामिल होने वाली पहली भारतीय निजी कंपनी बन गई.

रिलायंस की कोशिशों से आम लोगों में शेयर बाज़ार के प्रति दिलचस्पी बढ़ने से पहले, आर्थिक रूप से मज़बूत लोगों का एक बहुत छोटा वर्ग ही भारतीय बाज़ार में निवेश करता था.

रिलायंस समूह की वेबसाइट पर धीरूभाई अंबानी की प्रोफ़ाइल के अनुसार, उनका जन्म 1932 में गुजरात के जूनागढ़ ज़िले के चोरवाड़ गाँव में हुआ था.

1949 में, 17 वर्ष की आयु में वे रोज़गार की तलाश में अदन (वर्तमान यमन) गए और वहाँ एक कंपनी में डिस्पैच क्लर्क के रूप में काम किया. बाद में उन्हें अदन बंदरगाह पर एक पेट्रोल पंप के प्रबंधन की ज़िम्मेदारी मिली.

1958 में वे भारत में अपना व्यवसाय शुरू करने के सपने के साथ घर लौटे और मसालों के व्यापार के लिए 'रिलायंस कमर्शियल कॉर्पोरेशन' नामक कंपनी की स्थापना की. 1962 में उन्होंने धागे के व्यवसाय में एक अवसर देखा. इसके बाद, 1965 में उन्होंने कंपनी का नाम बदलकर 'रिलायंस टेक्सटाइल्स इंडस्ट्रीज़' कर दिया.

1966 में उन्होंने अहमदाबाद के पास नरोडा में एक ज़मीन ख़रीदी और वहाँ एक कपड़ा मिल शुरू की. 1975 में विश्व बैंक की एक तकनीकी टीम ने नरोडा मिल को भारत की सर्वश्रेष्ठ कंपोज़िट कपड़ा मिल के रूप में प्रमाणित किया.

फिर 1977 में रिलायंस टेक्सटाइल्स का आईपीओ आया और उसके बाद जो हुआ, वह इतिहास है.

उस समय ज़्यादातर लोग शेयर बाज़ार से दूर रहते थे और इसे जुआ मानते थे. पूँजी जुटाने के लिए बैंक से ऋण लेने के बजाय आईपीओ लाने का धीरूभाई का फ़ैसला एक बहुत ही साहसिक क़दम माना जाता है.

रिलायंस टेक्सटाइल्स के आईपीओ के दौरान धीरूभाई मध्यम वर्ग के निवेशकों को अपने आईपीओ में निवेश करने के लिए राज़ी करने में सफल रहे. इसके बाद उन्होंने रिलायंस की वार्षिक आम बैठकें (एजीएम) आम लोगों की भागीदारी के साथ आयोजित करना शुरू किया, जिनमें हज़ारों निवेशक व्यक्तिगत रूप से भाग लेते थे.

रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के एक सोशल मीडिया पोस्ट में दावा किया गया है कि जब 1986 में मुंबई के क्रॉस मैदान में रिलायंस की वार्षिक आम बैठक (एजीएम) हुई थी, तब वहाँ लगभग 35,000 शेयरधारक मौजूद थे.

धीरूभाई का निधन 6 जुलाई 2002 को मुंबई में 69 वर्ष की आयु में हुआ.

इससे पहले, 1999 में रिलायंस ने जामनगर में अपनी तेल रिफ़ाइनरी शुरू की थी. यह भारत की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में से एक है. हाल ही में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इसका दौरा किया था.

रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के बाद, 'रिलायंस पावर' ने 2008 में और 'रिलायंस निप्पॉन लाइफ़ एसेट मैनेजमेंट' ने 2017 में अपना आईपीओ जारी किया. हालांकि, ये दोनों कंपनियाँ मुकेश अंबानी के छोटे भाई अनिल अंबानी के स्वामित्व में थीं.

धीरूभाई के नेतृत्व में 49 साल पहले शेयर बाज़ार में क़दम रखने वाले रिलायंस समूह में आज बहुत बदलाव आ चुका है. कभी एक कपड़ा कंपनी के रूप में शुरू हुई रिलायंस इंडस्ट्रीज़ आज पेट्रोकेमिकल्स, रिफ़ाइनिंग, ऊर्जा, दूरसंचार, ख़ुदरा, डिजिटल सेवाओं और मीडिया समेत कई क्षेत्रों में मौजूद है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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