कश्मीर में बच्चे को सीने से बांधकर हाफ़ मैराथन दौड़ीं कुलसुम, बताई ये वजह

34 साल की कुलसुम बानो ने बच्चे को शरीर पर बांधकर हाफ़ मैराथन में हिस्सा लिया था
इमेज कैप्शन, 34 साल की कुलसुम बानो ने बच्चे को शरीर पर बांधकर हाफ़ मैराथन में हिस्सा लिया था
    • Author, जहांगीर अली
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर में अपने बच्चे को शरीर से बांधकर जब एक महिला ने हाफ़ मैराथन में दौड़ना शुरू किया, तो कई लोगों की नज़रें उन पर टिक गईं.

मैराथन में दौड़ने की उनकी तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हैं. लेकिन 34 साल की कुलसुम बानो ने यह फ़ैसला किन परिस्थितियों में किया, वह कहानी मज़बूत इरादे और हौसले की है.

वह कहती हैं कि ऐसा करने के पीछे उनका एक मक़सद भी था और शायद इस दौड़ के साथ उन्होंने उसे पूरा भी किया.

25 अक्तूबर को श्रीनगर में आयोजित इस मैराथन में दो इवेंट हुए. फुल मैराथन यानी 42.195 किलोमीटर और हाफ़ मैराथन यानी 21 किलोमीटर.

इनमें 2,000 से ज़्यादा लोगों ने हिस्सा लिया. श्रीनगर के पोलो ग्राउंड से मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने हरी झंडी दिखाकर एथलीटों को रवाना किया.

कुलसुम के पति रिज़र्व पुलिस बल यानी सीआरपीएफ़ में काम करते हैं और फ़िलहाल अरुणाचल प्रदेश में तैनात हैं
इमेज कैप्शन, कुलसुम के पति सीआरपीएफ़ में हैं और फ़िलहाल अरुणाचल प्रदेश में तैनात हैं

श्रीनगर में किराये के अपार्टमेंट में रहने वाली कुलसुम बानो के मैराथन में इस तरह दौड़ने पर लोगों की मिली-जुली प्रतिक्रियाएं हैं. कुलसुम का ताल्लुक गुजरात के सूरत ज़िले से है. साल 2012 में उनकी शादी बांदीपोरा ज़िले के गुरेज़ के रहने वाले इम्तियाज़ लोन से हुई थी.

सीआरपीएफ़ में काम करने वाले लोन इस वक़्त अरुणाचल प्रदेश में तैनात हैं. कुलसुम कहती हैं कि पिछले तीन सालों से वह काफ़ी तनाव में जी रही हैं क्योंकि उन्हें अकेले ही अपने तीन बच्चों की परवरिश करनी पड़ रही है.

उनका सबसे छोटा बच्चा एक साल का है, बेटी दो साल की है और सबसे बड़ा बेटा 12 साल का है. कुलसुम कहती हैं कि बच्चों की परवरिश के बीच उनकी अपनी इच्छाएं कहीं गुम-सी हो गईं.

उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, "मेरे दो बच्चों का जन्म तब हुआ, जब मैं बिल्कुल अकेली थी क्योंकि मेरे पति ड्यूटी पर थे. कई बार मुझे ख़ुद से ही घिन आने लगती थी. मेरी भी अपनी इच्छाएं और सपने थे, लेकिन मुझे अपने बच्चों के लिए उनका त्याग करना पड़ा."

कुलसुम श्रीनगर के एक क्लब में पार्ट-टाइम फ़िटनेस ट्रेनर के तौर पर काम करती हैं. इसी क्लब में उनका सबसे बड़ा बेटा अब्दुल्ला इम्तियाज़ स्केटबोर्डिंग सीख रहा है. वह आठवीं कक्षा का छात्र है.

कुलसुम ने बताया कि वह रोज़ाना सुबह क़रीब तीन बजे जाग जाती हैं.

सबसे पहले वह अपने छोटे बेटे को दूध पिलाती हैं. इसके बाद नमाज़ पढ़ती हैं.

वह कहती हैं, "इसके बाद मेरी बेटी उठ जाती है. जब मैं उसे दूध पिला लेती हूं, तब मेरा बेटा उठता है, जिसे मैं स्कूल के लिए तैयार करती हूं. जब एक बच्चा सो रहा होता है, तो दूसरे के खेलने का समय हो जाता है और तीसरे के स्कूल जाने का. इस बीच कुछ पल ऐसे भी आते हैं, जो मैं अपने लिए जीती हूं."

कुलसुम कहती हैं कि एक सैनिक की पत्नी का जीवन संघर्षों और बलिदानों से भरा होता है. लोग केवल बाहर की दुनिया देखते हैं और यह समझ नहीं पाते कि कौन किन परिस्थितियों से गुज़र रहा है.

वह बताती हैं, "जो लोग बाहर से देखते हैं, वे इसे समझ नहीं पाते. अगर वे एक योद्धा हैं, तो मैं भी एक योद्धा हूं. मैं दुनिया से, समाज से और ख़ुद से लड़ती हूं. एक पत्नी, एक मां और एक महिला के रूप में मैं सब कुछ अकेले ही करती हूं, जो बहुत मुश्किल है. इन सभी चीज़ों के बीच मैराथन में हिस्सा लेने के लिए बहुत हिम्मत चाहिए थी."

कुलसुम की पहली मैराथन

कुलसुम ने मैराथन की ट्रेनिंग नहीं ली थी और न ही इसमें हिस्सा लेने की योजना बनाई थी, हालांकि वह नियमित एक्सरसाइज़ करती थीं.
इमेज कैप्शन, कुलसुम ने मैराथन की ट्रेनिंग नहीं ली थी और न ही इसमें हिस्सा लेने की योजना बनाई थी, हालांकि वह नियमित एक्सरसाइज़ करती थीं.
छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
दिनभर
Dinbhar: आवाज़ वही, अंदाज़ नया

देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां.

एपिसोड

समाप्त

कुलसुम ने मैराथन के लिए कोई ट्रेनिंग नहीं ली थी और न ही इसमें हिस्सा लेने के बारे में बहुत विचार किया था. हालांकि, वह नियमित रूप से एक्सरसाइज़ करती रही हैं.

उन्होंने मैराथन में दौड़ने का फ़ैसला कैसे किया, इस बारे में वह बताती हैं, "मैंने अपने दोस्त अब्दुल्ला और कोच सज्जाद के कहने पर इवेंट से एक दिन पहले हाफ़ मैराथन के लिए रजिस्ट्रेशन कराया था. मैंने इस बारे में अपने पति को नहीं बताया. मैं उन्हें सरप्राइज़ देना चाहती थी. मुझे उम्मीद थी कि मेरी तस्वीरें या वीडियो उन तक पहुंच जाएंगी."

कुलसुम के कोच सज्जाद अहमद ख़ान एक क्लब चलाते हैं.

वह कहते हैं कि उनकी मुलाक़ात कुलसुम से तब हुई, जब उनका बेटा स्केटबोर्डिंग की उनकी क्लास में आता था.

वह बताते हैं, "जब भी हमारा कोई इवेंट होता, तो वह अपने छोटे बच्चे को साथ लेकर आती थीं क्योंकि उनके पास बच्चों की देखभाल करने वाला कोई और नहीं है. मुझे उनकी क्षमताओं का पता था और मुझे लगा कि उन्हें मैराथन में हिस्सा लेना चाहिए."

हालांकि, इवेंट की सुबह कुलसुम ने उन्हें बताया कि बेटी की तबीयत ठीक नहीं होने की वजह से इस इवेंट में हिस्सा लेना मुश्किल लग रहा है.

कुलसुम बताती हैं, "मुझे लगा कि मैं इसे पूरा नहीं कर पाऊंगी, लेकिन अब्दुल्ला ने मुझसे कहा कि वह यहीं रुक जाएगा और अपनी बहन का ख़याल रखेगा. उसने मुझसे कहा कि उसके लिए मैं मैराथन से ज़्यादा ज़रूरी हूं."

'मैराथन से ज़्यादा ज़रूरी था बच्चा'

कुलसुम ने बताया कि इसके बाद उन्होंने अपने छोटे बेटे को गर्म कपड़ों में लपेटा और बेबी कैरियर की मदद से अपने शरीर से बांध लिया और इवेंट के लिए पहुंच गईं.

वह कहती हैं कि मैराथन में दौड़ते समय उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई क्योंकि उनका बेटा शांत रहा. इस दौरान मैराथन देखने आए लोगों ने भी उनका हौसला बढ़ाया और आगे बढ़ते रहने के लिए कहा.

वह बताती हैं, "मुझे बस तब बुरा लगा, जब वह भूख के कारण रोने लगा. इसलिए मैं श्रीनगर के लाल चौक पर क्लॉक टावर के पास रुकी और उसे दूध पिलाया. इसकी वजह से मैं पीछे रह गई. मुझे लगा कि मैं पिछड़ रही हूं और शायद रेस पूरी न कर पाऊं. लेकिन मेरी प्राथमिकता मेरा बच्चा था. बाक़ी सब बाद में आता है. अगर वह शांत न रहता, तो शायद मैं रेस छोड़ देती. मैं उसे कोई तकलीफ़ नहीं पहुंचाना चाहती थी."

"मैं रेस पूरी कर पाई, तो इसमें 99 प्रतिशत योगदान उसके शांत रहने का था, जबकि मेरी कोशिश सिर्फ़ एक प्रतिशत थी."

आलोचना का सामना

कुलसुम को मैराथन में हिस्सा लेने के लिए उनके कोच ने प्रेरित किया
इमेज कैप्शन, कुलसुम को मैराथन में हिस्सा लेने के लिए उनके कोच ने प्रेरित किया

लगभग तीन घंटे में रेस पूरी करने के बाद कुलसुम की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए. इस पर लोगों की मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आईं.

जहां कुछ लोगों ने उनकी तारीफ़ की, वहीं कुछ का कहना था कि ऐसा करके उन्होंने बच्चे को ख़तरे में डाला.

कुलसुम इस पर कहती हैं, "मैं अपनी आलोचना करने वालों से कहना चाहती हूं कि मैं किसी मजबूरी में ऐसा नहीं कर रही थी. यह कुछ करने का जुनून था. मैं सबसे पहले एक माँ हूँ और किसी को यह बताने का हक़ नहीं है कि मुझे क्या करना चाहिए या क्या नहीं."

कुलसुम के कोच ख़ान कहते हैं, "लोगों ने उनकी आलोचना करते हुए कहा कि यह सिर्फ़ पब्लिसिटी स्टंट था, जबकि अपने बेटे को साथ रखना उनकी मजबूरी थी. लोग आसानी से टिप्पणी कर देते हैं. मैं पूरे समय उनके साथ चल रहा था, ताकि यह सुनिश्चित कर सकूं कि वह ठीक हैं."

"हर कहानी के दो पहलू होते हैं. किसी भी बात पर टिप्पणी करने से पहले हमें दोनों पक्षों को जानने की कोशिश करनी चाहिए."

कुलसुम कहती हैं इस मैरातन को उनके बच्चे जीवनभर याद रखेंगे, "मैं नहीं चाहती कि मेरे बच्चे कमज़ोर बनें. मैं उन्हें इस तरह तैयार कर रही हूं कि वे मुश्किल हालात में भी ढलना सीखें. भविष्य में क्या होगा, यह तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन मेरे बच्चे पूरी तरह मज़बूत होने चाहिए."

'मक़सद महिलाओं को संदेश देना भी था'

कुलसुम ने बताया कि मैराथन में हिस्सा लेने के पीछे उनका एक मक़सद महिलाओं को यह संदेश देना भी था कि अगर वह तीन बच्चों की मां होने के बाद भी मैराथन में हिस्सा ले सकती हैं, तो दूसरी महिलाएं भी ऐसा कर सकती हैं.

कुलसुम कहती हैं, "कुछ महिलाओं को लगता है कि बच्चों के जन्म के बाद उनकी ज़िंदगी ख़त्म हो गई है. भले ही हम और कुछ न कर सकें, लेकिन कम से कम हम अपने बच्चों, परिवार या समाज के लिए इतना तो कर ही सकते हैं कि बच्चों के साथ खेलों या दूसरी गतिविधियों में हिस्सा लेकर अपना तनाव कम करें."

"हम उनमें अपना बचपन देख सकते हैं. जो चीज़ें हम अपने बचपन में नहीं कर पाए, उन्हें हम उनके ज़रिए देख और जी सकते हैं."

इस इवेंट में जम्मू-कश्मीर के 1,221 एथलीट, भारत के दूसरे राज्यों के 513 एथलीट और 12 देशों के 73 अंतरराष्ट्रीय एथलीट शामिल थे.

इमैनुएल सिकुकु नदिवा ने पुरुष और शीला जेपकोसगेई चेसांग ने महिला वर्ग में फुल मैराथन का ख़िताब जीता. ये दोनों एथलीट कीनिया से हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें

BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह

कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.