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ईरान से बातचीत के सवाल पर बोले ट्रंप, 'हम फिर इस्लामाबाद जाना चाहते हैं'
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया है कि ईरान में युद्ध खत्म कराने के लिए बातचीत इस हफ़्ते फिर शुरू हो सकती है.
पिछले शनिवार को इस्लामाबाद में ये बातचीत बिना किसी नतीजे के ख़त्म हो गई थी, जिसके बाद अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी कर दी थी.
ट्रंप ने न्यूयॉर्क पोस्ट को दिए एक इंटरव्यू में कहा, "आपको वहीं (इस्लामाबाद) रुकना चाहिए, क्योंकि अगले दो दिनों में कुछ हो सकता है, और हमारा झुकाव भी वहीं जाने का ज़्यादा है."
उनकी यह टिप्पणी उस समय आई जब अमेरिकी सेना ने दावा किया कि उसके होर्मुज़ स्ट्रेट की नाकाबंदी करने के पहले 24 घंटों के दौरान कोई भी जहाज़ वहां से नहीं गुज़रा.
इस गतिरोध ने अगले सप्ताह खत्म होने जा रहे दो हफ़्ते के युद्धविराम पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं.
ईरान की ओर से अभी तक ट्रंप की टिप्पणी पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने कहा कि बातचीत दोबारा शुरू होने की 'काफी ज़्यादा संभावना' है.
तेल बाज़ार को थोड़ी राहत
खाड़ी क्षेत्र, पाकिस्तान और ईरान के अधिकारियों ने भी कहा है कि अमेरिका और ईरान की टीमें इस हफ़्ते के आख़िर में फिर पाकिस्तान लौट सकती हैं, हालांकि अभी तक कोई तारीख़ तय नहीं हुई है. न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स ने यह जानकारी दी है.
दोनों पक्षों के बीच बातचीत की संभावना से तेल बाज़ार को भी कुछ राहत मिली, जिसके बाद मंगलवार को बेंचमार्क तेल कीमतें 100 डॉलर से नीचे आ गईं.
28 फ़रवरी को अमेरिकी और इसराइली हवाई हमलों के बाद से ईरान ने दुनिया के लिए बेहद अहम तेल और गैस परिवहन मार्ग होर्मुज़ स्ट्रेट (जलडमरूमध्य) को प्रभावी रूप से बंद कर दिया है.
अब एक दर्जन से ज़्यादा अमेरिकी युद्धपोत और करीब 10,000 अमेरिकी सैन्यकर्मी किसी भी देश के उन जहाज़ों पर नाकेबंदी लागू कर रहे हैं, जो ईरानी बंदरगाहों में प्रवेश कर रहे हैं या वहां से निकल रहे हैं. इससे ईरान की अर्थव्यवस्था पर चोट पहुंची है.
क्या अमेरिकी नाकेबंदी साबित हो रही है कारगर?
इस क़दम का मक़सद ईरान पर दबाव बनाना है. इसके लिए ईरान की कमाई के दो बड़े स्रोतों को निशाना बनाया गया है.
- तेल से होने वाली आय
- इस अहम जलमार्ग से गुजरने वाले जहाज़ों से वसूला जाने वाला भारी टोल
मध्य पूर्व और मध्य एशिया के कुछ हिस्सों में अमेरिकी सैन्य गतिविधियों की ज़िम्मेदारी संभालने वाले अमेरिकी सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) ने कहा कि नाकेबंदी के पहले 24 घंटों में छह व्यापारी जहाज़ों ने अमेरिकी बलों के निर्देशों का पालन करते हुए वापस मुड़कर ईरानी बंदरगाहों की ओर लौटना स्वीकार किया.
लेकिन बीबीसी वेरीफ़ाई ने शिप-ट्रैकिंग डेटा का विश्लेषण किया जिससे पता चला है कि नाकेबंदी के बावजूद ईरान से जुड़े कम-से-कम चार मालवाहक जहाज़ होर्मुज़ स्ट्रेट पार कर चुके हैं. इनमें से कम-से-कम दो जहाज़ पहले ईरानी बंदरगाहों पर मौजूद थे.
बीबीसी वेरीफ़ाई के मुताबिक, तीन दूसरे जहाज़, जिनका ईरान से कोई सीधा संबंध नहीं था, वो भी सोमवार को नाकेबंदी शुरू होने के बाद भी इस स्ट्रेट को पार करते देखे गए.
पिछले शनिवार-रविवार पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में हुई शुरुआती उच्च-स्तरीय बातचीत से भी कोई समझौता नहीं निकल सका. अमेरिका का कहना है कि ईरान उसकी शर्तों पर सहमत नहीं हुआ.
ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाएं बातचीत में सबसे बड़ा अड़ंगा बनी रहीं.
एक अमेरिकी अधिकारी ने बीबीसी के अमेरिकी साझेदार सीबीएस न्यूज़ को बताया कि अमेरिका ने ईरान से 20 साल तक यूरेनियम संवर्धन (एनरिचमेंट) पूरी तरह निलंबित रखने को कहा.
वहीं, अन्य अमेरिकी मीडिया सूत्रों के मुताबिक ईरान ने सिर्फ़ पांच साल तक ही यूरेनियम संवर्धन (एनरिचमेंट) रोकने का प्रस्ताव दिया.
मंदी का ख़तरा?
इस बीच, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) ने चेतावनी दी कि यह युद्ध वैश्विक अर्थव्यवस्था को मंदी में धकेल सकता है. इस पर अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने बीबीसी से कहा कि दुनिया भर में लंबे समय तक शांति और सुरक्षा बनाए रखने के एवज़ में 'थोड़ा-सा आर्थिक दर्द' स्वीकार्य है.
हालांकि मंगलवार को चीन ने इस नाकेबंदी को 'ख़तरनाक और ग़ैर-ज़िम्मेदाराना' बताया और चेतावनी दी कि इससे तनाव और बढ़ेगा. चीन ने कहा कि पहले से नाज़ुक युद्धविराम समझौता होर्मुज़ की अमेरिकी नाकेबंदी से और कमज़ोर होगा.
उधर इसराइल और लेबनान ने मंगलवार को वॉशिंगटन में हुई बातचीत के बाद सीधी बातचीत शुरू करने पर सहमति जताई है. यह पहल इसराइल के लेबनान पर किए गए उन हवाई हमलों के बाद हुई, जिनका निशाना ईरान समर्थित उग्रवादी संगठन हिज़्बुल्लाह था.
अमेरिकी विदेश विभाग में हुई यह बैठक 1993 के बाद दोनों देशों के अधिकारियों के बीच पहली सीधी बातचीत थी. लेबनानी राजदूत ने इसे 'सकारात्मक' बताया, जबकि इसराइली राजदूत ने कहा कि इससे 'शांति के नए दौर' का रास्ता खुल सकता है.
एक अमेरिकी अधिकारी ने बीबीसी से ज़ोर देकर कहा कि इस्लामाबाद में अमेरिका-ईरान बातचीत और वॉशिंगटन में इसराइल-लेबनान बातचीत के बीच कोई संबंध नहीं है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.