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ईरान-अमेरिका के बीच समझौते के बाद खाड़ी देशों को किस बात की चिंता सता रही
- Author, सैली नबील
- पदनाम, बीबीसी अरबी
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
अमेरिका और ईरान के बीच पिछले हफ़्ते हुए समझौते के टिके रहने को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं, क्योंकि इसराइल और हिज़्बुल्लाह के बीच संघर्ष थमता नहीं दिख रहा है.
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव में फंसे खाड़ी के अरब देश, हालात पर चिंता के साथ नज़र बनाए हुए हैं.
अगर तनाव फिर बढ़ता है, तो सबसे ज़्यादा नुक़सान इन्हीं देशों को हो सकता है.
फ़रवरी में अमेरिका और इसराइल के हवाई हमलों के बाद, ईरान ने भी उन खाड़ी देशों को निशाना बनाया जहां अमेरिकी सैन्य अड्डे मौजूद हैं.
ईरानी मिसाइलों और ड्रोन हमलों ने इन तेल-समृद्ध देशों की शांति और स्थिरता की छवि को काफ़ी नुक़सान पहुंचाया है.
जॉर्डन के अंतरराष्ट्रीय कानून के प्रोफे़सर हजा मजाली का कहना है, "अमेरिका इस युद्ध में इसराइल की वजह से आया. यह समझौता कितना टिकेगा, यह समझने के लिए हमें इसराइल की प्रतिक्रिया का इंतज़ार करना होगा."
डील के बाद भी लेबनान पर इसराइली हमला
लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, समझौते पर हस्ताक्षर होने के 48 घंटे के भीतर इसराइल के हवाई हमलों में वहां कई लोग मारे गए और घायल हुए.
वहीं, इसमें इसराइली सेना ने अपने चार सैनिकों के मारे जाने की जानकारी दी.
जबकि ईरान और अमेरिका के बीच हुए समझौते के मुताबिक़, लेबनान सहित सभी मोर्चों पर लड़ाई फौरन बंग होनी चाहिए थी.
लेबनान स्थित हिज़्बुल्लाह को लंबे समय से ईरान का प्रमुख सहयोगी माना जाता है. अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि लेबनान में एक नया युद्धविराम तय हुआ है, लेकिन ऐसे समझौते अक्सर कमज़ोर और अस्थायी साबित होते हैं.
कनाडा के ओटावा विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर थॉमस जूनो कहते हैं, "ऐसी कोई वास्तविक स्थिति नहीं थी कि लेबनान और ईरान दोनों जगह संघर्ष पूरी तरह रुक जाता. लेबनान में कुछ समय के लिए हिंसा बढ़ना लगभग तय था और खाड़ी क्षेत्र में भी ऐसा हो सकता है."
इस बीच खाड़ी क्षेत्र के कई शहरों में लोगों से बातचीत में उम्मीद और संदेह दोनों दिखाई देते हैं.
कुछ लोगों को लगता है कि यह समझौता लंबे समय की शांति की शुरुआत हो सकता है, जबकि कुछ को इसकी सफलता पर भरोसा नहीं है.
कुवैत के एक बुज़ुर्ग व्यक्ति ने कहा, "कोई भी युद्ध नहीं चाहता. हम सिर्फ़ शांतिपूर्ण जीवन चाहते हैं. मुझे याद है कि ईरानी मिसाइलों की आवाज़ से डरे हुए बच्चों को कैसे समझाना पड़ता था. उन्होंने पहले कभी ऐसा अनुभव नहीं किया था."
एक अन्य व्यक्ति ने इस समझौते को "बहुत नाज़ुक" बताया और कहा कि वह इसे ज़्यादा गंभीरता से नहीं लेते, हालांकि वह उम्मीद करते हैं कि हालात पहले की तरह सामान्य हो जाएं.
खाड़ी देश समझौते की सफलता क्यों चाहते हैं
खाड़ी देश चाहते हैं कि अमेरिका-ईरान समझौता सफल हो, क्योंकि वह अपने तेल का निर्यात बिना रुकावट दुनिया भर में करना चाहते हैं और इसके लिए होर्मुज़ स्ट्रेट बहुत अहम है.
इसी रास्ते से उनका तेल मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों तक पहुंचता है.
युद्ध शुरू होने के बाद से ईरान ने इस रास्ते को लगभग बंद कर दिया था.
समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद जहाज़ों की आवाजाही धीरे-धीरे फिर शुरू हुई और सऊदी अरब के तेल टैंकर भी इस मार्ग से गुज़रे हैं.
साथ ही अमेरिकी नौसेना ने ईरान के बंदरगाहों से अपनी नाकेबंदी हटाने की प्रक्रिया शुरू की.
लेकिन लेबनान में इसराइली हमले जारी रहने के बाद, ईरान के ख़ातम-अल-अंबिया मुख्यालय ने घोषणा की कि अमेरिका समझौते की पहली शर्त का पालन नहीं कर रहा, इस वजह से होर्मुज़ स्ट्रेट को फिर से बंद किया जा रहा है.
जब स्ट्रेट के खुलने की ख़बर आई थी, तब तेल की क़ीमत 80 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गई थी. अगर इसमें फिर से रुकावट आती है, तो क्षेत्र के देशों को और आर्थिक नुक़सान हो सकता है.
प्रोफ़ेसर हज़ा मजाली का कहना है कि होर्मुज़ स्ट्रेट पर नियंत्रण ईरान के लिए परमाणु कार्यक्रम से भी बड़ा दबाव का साधन बन गया है.
उनके मुताबिक़, "अगर यह समुद्री रास्ता बंद नहीं होता, तो शायद युद्ध और लंबा चलता."
ईरान को कौन देगा 300 अरब डॉलर?
दोनों देशों के बीच 14 बिंदुओं वाले इस समझौते में ईरान को कई आर्थिक लाभ देने का वादा किया गया है, जैसे प्रतिबंधों में ढील, विदेशों में फ़्रीज़ ईरानी संपत्तियों को मुक्त करना और 300 अरब डॉलर का एक फ़ंड तैयार करना.
लेकिन थॉमस जूनो का कहना है कि इन वादों की जानकारी अभी बहुत अस्पष्ट है.
उन्होंने कहा, "यह स्पष्ट नहीं है कि आर्थिक मदद कब शुरू होगी, कितनी संपत्तियां जारी की जाएंगी और 300 अरब डॉलर का फ़ंड कहां से आएगा."
अमेरिका के उप राष्ट्रपति जेडी वेंस ने हाल ही में कहा कि इस फ़ंड का ख़र्च खाड़ी देशों का गठबंधन उठाएगा, लेकिन उन्होंने कोई विस्तृत जानकारी नहीं दी.
दूसरी ओर, किसी भी खाड़ी देश ने अभी तक ईरान को पैसा देने की बात स्वीकार नहीं की है.
कुछ लोगों का मानना है कि इसका मतलब होगा कि उन्हें ऐसे युद्ध की क़ीमत चुकानी पड़ेगी, जिसे उन्होंने शुरू नहीं किया.
राजनीतिक विश्लेषक अली अल-हैल कहते हैं, "मैं नहीं चाहता कि हमारे देश ईरान को एक भी पैसा दें. उल्टा, ईरान को हमें मुआवज़ा देना चाहिए क्योंकि हम उसके मिसाइल और ड्रोन हमलों से प्रभावित हुए हैं. इस युद्ध की क़ीमत इसराइल और उसके सहयोगियों को चुकानी चाहिए."
अभी यह स्पष्ट नहीं है कि अमेरिका खाड़ी देशों को इस योजना में आर्थिक योगदान देने के लिए राज़ी कर पाएगा या नहीं.
थॉमस जूनो का मानना है कि खाड़ी देश 300 अरब डॉलर जैसी बड़ी राशि देने के लिए आसानी से तैयार नहीं होंगे, खासकर तब तक जब तक उन्हें भविष्य की स्थिरता का भरोसा न हो.
उनका कहना है कि ईरान और उसके अरब पड़ोसियों के बीच वास्तविक मेल-मिलाप अभी बहुत दूर है.
हालांकि, भविष्य में निवेश के ज़रिए संबंध बेहतर बनाने की कोशिश हो सकती है, लेकिन इसके लिए खाड़ी देशों को मज़बूत सुरक्षा गारंटी चाहिए होगी.
कुल मिलाकर समझौते का भविष्य अभी भी अनिश्चित दिखाई देता है. लेकिन आम लोगों के लिए सबसे ज़रूरी बात है- एक शांत जीवन, जहां उन्हें बम शेल्टर की ओर भागना न पड़े और युद्ध के सायरनों की आवाज़ से नींद न टूटे.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.