आप इस वेबसाइट का टेक्स्ट-ओनली वर्शन देख रहे हैं जो कम डेटा खर्च करता है. सभी तस्वीरों और वीडियो के साथ वेबसाइट का मुख्य वर्शन देखें.
अनुच्छेद 370 हटाने पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर के मायने क्या हैं?
- Author, उमंग पोद्दार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अनुच्छेद 370 को हटाने और जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बाँटने के फ़ैसले को बरकरार रखा.
इससे पिछले चार सालों से अदालत में लंबित सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक पर विराम लग गया है.
अदालत से सरकार को जम्मू-कश्मीर में अगले साल सितंबर तक चुनाव कराने और राज्य का दर्जा बहाल करने के लिए कहा है.
यहां यह बताया गया है कि इसमें महत्वपूर्ण मुद्दे क्या थे और अदालत ने उन पर क्या कहा है.
1. क्या अनुच्छेद 370 अस्थायी या स्थायी प्रकृति का था?
संविधान के तहत अनुच्छेद 370 में संशोधन के लिए राष्ट्रपति और जम्मू-कश्मीर संविधान सभा की सहमति ज़रूरी थी.
हालांकि, यह संविधान सभा 1956 में ही भंग कर दी गई थी. याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि इस अनुच्छेद में संशोधन नहीं किया जा सकता है, क्योंकि संविधान सभा का अस्तित्व ही नहीं है.
हालाँकि, अदालत ने माना कि संविधान सभा की अनुपस्थिति में, राष्ट्रपति के पास अनुच्छेद में संशोधन करने की एकतरफ़ा शक्ति थी.
2. क्या जम्मू-कश्मीर की आंतरिक संप्रभुता थी?
संविधान के मुताबिक़ संघ जम्मू-कश्मीर में केवल तीन मामलों में क़ानून बना सकता है- विदेशी मामले, संचार और रक्षा.
इस पर याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि इसका मतलब यह है कि जम्मू-कश्मीर ने अपनी आंतरिक संप्रभुता नहीं छोड़ी है, बल्कि केवल कुछ शक्तियां छोड़ी हैं.
अदालत ने इस दलील को नहीं माना. अदालत ने माना कि राज्य के संविधान में संप्रभुता का कोई उल्लेख नहीं था. संप्रभुता शब्द भारतीय संविधान में आया था. जम्मू-कश्मीर के राजा की घोषणा और विलय पत्र को देखते हुए अदालत ने माना कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग बन गया है.
हालाँकि, एक न्यायाधीश, जस्टिस संजय किशन कौल ने कहा कि जम्मू और कश्मीर ने कुछ आंतरिक संप्रभुता बरकरार रखी है. हालाँकि, उन्होंने कहा कि केंद्र के पास इसकी मान्यता रद्द करने और संविधान को पूरी तरह से लागू करने की शक्ति थी. जिसका इस्तेमाल उसने अनुच्छेद 370 को हटाते समय किया था.
3. राष्ट्रपति शासन के तहत किन कामों को चुनौती दी जा सकती है?
अनुच्छेद 370 को निरस्त किए जाते समय जम्मू-कश्मीर राष्ट्रपति शासन के अधीन था, इसलिए अदालत ने यह भी देखा कि राष्ट्रपति शासन के दौरान किन कार्यों को अदालत में चुनौती दी जा सकती है.
कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रपति शासन की सभी कार्यों को चुनौती नहीं दी जा सकती है. इसमें कहा गया है कि राष्ट्रपति शासन के दौरान शक्तियों के प्रयोग के साथ एक उचित संबंध होना चाहिए. इस कारण से राष्ट्रपति शासन को पहले स्थान पर रखा गया था.
राष्ट्रपति शासन के दौरान के किसी काम को चुनौती देने वाले व्यक्ति को पहले यह साबित करना होगा कि वह काम दुर्भावनापूर्ण था या ग़लत इरादे से किया गया था. इसके बाद, यह साबित करने की ज़िम्मेदारी संघ पर आती है कि वह साबित करे कि काम दुर्भावनापूर्ण नहीं था.
इसके अलावा, याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि राष्ट्रपति शासन के दौरान, संसद केवल राज्य के क़ानून बनाने की शक्तियां अपने हाथ में ले सकती है. कोर्ट ने कहा कि संसद की शक्ति पर ऐसी कोई सीमा नहीं है. इससे राज्य का प्रशासन ठप हो जाएगा.
4-क्या राष्ट्रपति की ओर से दिए गए आदेश वैध थे?
राष्ट्रपति के दो आदेश, सीओ-272 और 273 का इस्तेमाल अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के लिए किया गया. सी.ओ-272 से एक अन्य संवैधानिक प्रावधान, अनुच्छेद 367 में संशोधन किया गया. इसमें कहा गया कि जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा के संदर्भ का अर्थ विधानसभा था.
न्यायालय ने माना कि संविधान में संशोधन करने वाला यह आदेश अमान्य था, क्योंकि यह राष्ट्रपति के आदेश के ज़रिए एक संवैधानिक संशोधन किया गया.
हालाँकि, इससे परिणाम नहीं बदलता है. अदालत ने माना कि राष्ट्रपति के पास अनुच्छेद 370 में संशोधन करने की एकतरफ़ा शक्ति थी. राष्ट्रपति भारत का पूरा संविधान जम्मू-कश्मीर में लागू कर सकते थे. इसके परिणामस्वरूप, जम्मू-कश्मीर का संविधान अब निष्क्रिय हो गया है.
अदालत ने कहा कि राष्ट्रपति के आदेश एकीकरण की प्रक्रिया की परिणति और शक्ति का वैध प्रयोग थे.
5. क्या किसी राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बाँटा जा सकता है?
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि केंद्र किसी राज्य को केंद्र शासित प्रदेश में नहीं बदल सकता, क्योंकि इससे संघवाद प्रभावित होगा.
हालांकि, अदालत ने इस मुद्दे पर विचार नहीं किया. सरकार ने अदालत को आश्वासन दिया था कि वह जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा बहाल करेगी, जबकि लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बना दिया जाएगा.
कोर्ट ने केवल इतना निर्देश दिया है कि सितंबर 2024 तक जम्मू-कश्मीर में चुनाव करा लिए जाएं. और जल्द ही उसका राज्य का दर्जा बहाल किया जाना चाहिए.
6. क्या अदालत का कोई और आब्ज़र्वेशन था?
एक न्यायाधीश, जस्टिस संजय किशन कौल ने कहा कि सरकार को एक सत्य और सुलह आयोग का गठन करना चाहिए, जैसा कि रंगभेद खत्म होने के बाद दक्षिण अफ्रीका में गठित किया गया था.
इस समिति को 1980 के दशक से सरकार और ग़ैर सरकारी दोनों तत्वों द्वारा की गई हिंसा की जांच करनी चाहिए. उसे समझौते के उपायों की सिफ़ारिश करनी चाहिए. यह कोई आपराधिक मामलों की अदालत नहीं होगी, बल्कि यह समझने और लोगों को सांत्वना देने का एक माध्यम होगी कि लोग किस दौर से गुजर रहे हैं.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)