आप इस वेबसाइट का टेक्स्ट-ओनली वर्शन देख रहे हैं जो कम डेटा खर्च करता है. सभी तस्वीरों और वीडियो के साथ वेबसाइट का मुख्य वर्शन देखें.
'लग जा गले कि फिर मुलाकात हो, न हो...'
- Author, यतींद्र मिश्र
- पदनाम, संगीत और कला समीक्षक, बीबीसी हिंदी के लिए
- प्रकाशित
फ़िल्मिस्तान जैसे प्रतिष्ठित बैनर के सर्वेसर्वा राय बहादुर चुन्नीलाल की संतान के रूप में मदन मोहन को अपने जीवन में जितनी सुविधाएं मिलीं, उससे अधिक सम्मान और प्रतिष्ठा का संसार स्वयं मदन मोहन ने एक गंभीर संगीतकार के रूप में अर्जित किया था.
सैनिक जो बन गया संगीतकार
अपने पिता की गरिमा के अनुरूप उन्होंने अंग्रेज़ी तबीयत की शिक्षा ली थी और सेना में नौकरी के लिए भी गए थे.
1945 में दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के साथ मदन मोहन ने अपनी सेना की नौकरी से त्याग-पत्र दिया और लखनऊ आकाशवाणी में कार्यक्रम सहायक के तौर पर नौकरी कर ली.
'आकाशवाणी' जहां मिले दो बेमिसाल दोस्त
आकाशवाणी लखनऊ में रहने के दौरान सबसे महत्वपूर्ण बात मदन मदन मोहन के जीवन में यह हुई कि उनकी मित्रता ग़ज़ल गायिका बेगम अख़्तर और रेशमी मुलायम आवाज़ के धनी तलत महमूद से हुई.
यह दोनों दोस्तियां इस मायने में इस संगीतकार के लिए बेहतर रहीं कि आगे भविष्य में आने वाली बहुतेरी फ़िल्मों में, जिन्हें मदन मोहन ने संगीतबद्ध किया था, तलत महमूद की अप्रतिम गायिकी अपने उरूज पर हमें देखने को मिलती है.
इस बात का सौभाग्य भी कि फ़िल्मों के लिए बनाई जाने वाली बेशुमार धुनों को सबसे पहले सुनने का मौक़ा बेगम अख़्तर को मिलता था.
आसान नहीं था मदन मोहन का संगीत
आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो लगता है कि मदन मोहन का संगीत भी उतना आसान या सहज संगीत नहीं था.
उनका संगीत, दरअसल एक ऐसी अंतरंग महफ़िल के गलीचों पर रचा गया निहायत व्यक्तिगत क़िस्म का संगीत था, जिसकी कलात्मक श्रेष्ठता की चुनौती भी स्वयं मदन मोहन के भीतर से निकलकर ही आकार लेती थी.
एक हद तक हम यह कह सकते हैं कि मदन मोहन का संगीत उनका स्वयं को सम्बोधित संगीत है, जिसमे किसी भी रसिक या दीवाने को साथ बैठकर सुनने का आमंत्रण मौजूद है.
विशेष वर्ग के संगीतकार?
कई बार मदन मोहन के संगीत को लेकर यह आरोप भी लगाया जाता रहा कि वे एक ख़ास क़िस्म के वर्ग के लिए ही अपना संगीत रचते थे. या कि उनका संगीत घर में मेहमानों के बैठक कक्ष के लिए रचा जाने वाला संगीत है. या कि मदन मोहन का संगीत एक हद तक अभिजात वर्ग के लिए रचा गया है.
लेकिन इस तरह के सारे आक्षेप न तो पूरी तरह मदन मोहन के ऊपर चस्पा ही होते हैं और ना ही यह सारी स्थापनाएं पूरी तरह से ख़ारिज़ की जा सकती हैं.
मदन मोहन जैसे विलक्षण संगीतकार के सम्पूर्ण रचनात्मक अवदान को ध्यान में रखते हुए यह मानना पड़ेगा कि उनका संगीत बाकी के प्रचलित लोकप्रिय संगीत की धारा से थोड़ी दूरी बरतता हुआ संगीत था.
बौद्धिक था मदन मोहन का संगीत
वे एक ऐसे मुकाम पर खड़े होकर अपना संगीत तैयार करते थे, जहाँ से फ़िल्मी दुनिया की आकांक्षाओं पर रचे जाने वाले रोचक संगीत से उनका बनाया हुआ संगीत, एक समानांतर अन्तराल बनाए रखता था.
यहीं एक ऐसी बारीक़ सी पेचीदगी है, जो मदन मोहन के संगीत को तमाम अन्य समकालीन संगीत से पृथक करते हुए उसे थोड़ा जटिल, थोड़ा गंभीर और थोड़ा एक्सपेरीमेंटल बनाती है.
यह कहना उचित होगा कि साठ-सत्तर के दशक में मिलने वाली तमाम सारी विविधवर्णी सांगीतिक दुनिया में मदन मोहन का संगीत एक बौद्धिक ढंग का सांगीतिक स्पर्श लेकर हमारे सामने आता है.
ठीक उसी तरह जिस तरह शास्त्रीय गायन की दुनिया में थोड़े परिष्कृत और बौद्धिक भाव से उस्ताद अमीर ख़ां या पण्डित कुमार गन्धर्व का संगीत दिखाई देता है.
मदन मोहन की संश्लिष्ट शैली और गंभीर ढंग की स्वर-संगति को व्याख्यायित करने के लिए हम उनकी आठ-दस फ़िल्मों को चुन सकते हैं, जो उनके सम्पूर्ण कृतित्व की सबसे मुखर अभिव्यक्तियां हैं.
यह फ़िल्में हैं- 'बागी', 'रेलवे-प्लेटफार्म', 'ग़ज़ल', 'आप की परछाईयाँ', 'एक कली मुस्कायी', 'रिश्ते-नाते', 'अदालत', 'वो कौन थी', 'दुल्हन एक रात की', 'संजोग', 'अनपढ़', 'देख कबीरा रोया', 'बहाना', 'पूजा के फूल', 'जेलर', 'जहाँआरा', 'मेरा साया', 'दस्तक', 'हीर-राँझा' और 'हँसते जख़्म'. यह सारी फ़िल्में मिलकर समवेत ढंग से एक ऐसा अनोखा मदन मोहन टाईप बनाती हैं, जो शोर और हड़बड़ी के दौर में राहत का संगीत रचता हुआ नज़र आता है.
(यतीन्द्र मिश्र लता मंगेशकर पर 'लता: सुरगाथा' नाम से किताब लिख चुके हैं)
(फिल्मी दुनिया के महान संगीतकारों के बारे में बीबीसी हिंदी की 'संग संग गुनगुनाओगे' सिरीज़ की सातवीं कड़ी मदन मोहन को समर्पित है.)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)