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गाय के बहाने दलितों को निशाना बनाने का आरोप
- Author, प्रमोद मल्लिक
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
- प्रकाशित
गुजरात में दलितों के नेता के तौर पर उभरे जिग्नेश मेवानी ने आरोप लगाया है कि राज्य की भारतीय जनता पार्टी सरकार गाय के बहाने दलितों को निशाना बनाना चाहती है.
गुजरात विधानसभा में शुक्रवार को पारित विधेयक में यह व्यवस्था की गई है कि गाय काटने, गाय की तस्करी करने या बीफ़ रखने पर उम्र क़ैद की सज़ा हो सकती है.
मेघानी इसके पीछे सियासी मंशा देखते हैं. उनका तर्क है कि दलितों-मुसलमानों को निशाना बना कर भाजपा हिंदुओं-सवर्णों का ध्रुवीकरण करना चाहती है.
गुजरात में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र यह रणनीति अभी से तैयार की जा रही है.
मेघाणी सवाल उठाते हैं, "गुजरात में बूचड़खाना नहीं है. फिर गाय काटने या बीफ़ रखने या गाय की तस्करी का सवाल ही कहां पैदा होता है?."
उन्होंने बीबीसी से कहा, "अब कोई दलित यदि चमड़ा के अपने पुश्तैनी काम के लिए खाल बाज़ार से भी ख़रीद कर ले आए तो उस पर गाय मारने का आरोप लगा कर पूरी ज़िंदगी जेल में डालने का बहाना मिल जाएगा."
सरकार की सफ़ाई
गुजरात के गृह मंत्री और सदन में यह विधेयक पेश करने वाले प्रदीपसिंह भगवतसिंह जडेजा इन आरोपों को सिरे से ख़ारिज कर देते हैं.
उन्होंने कहा, "गाय हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक आस्था का प्रतीक तो है ही, इसकी रक्षा से राज्य की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी. इसके दूध के कारोबार और गोबर से बने खाद को बेच कर ग़रीब इतना पैसा कमा सकेंगे कि उनके परिवार का खर्च निकल आएगा."
रोज़ी रोटी छिनेगी
गुजरात में फलता-फूलता चमड़ा उद्योग है और वे ईकाइयां घरेलू मांग पूरी करने के अलावा उत्पाद निर्यात भी करती हैं. यह उद्योग में दलितों की बड़ी भागेदारी है.
चमड़े पर शोध करने वाले मेरठ विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर सतीश प्रकाश कहते हैं, "गुजरात के चमड़ा उद्योग में 90 फ़ीसद कर्मचारी दलित हैं. खाल निकालने से लेकर चमड़ा के अंतिम उत्पाद बनाने तक सारा काम वे ही करते हैं."
जिग्नेश मेघाणी कहते हैं, "अब दलित डर कर गाय की खाल निकालने का या चमड़े का कोई काम नहीं करेंगे. बीते साल हुई ऊना की घटना सबको याद है. उनकी रोज़ी रोटी छिनेगी. उनमें बेरोज़गारी और परेशानी बढ़ेगी."
'बेबुनियाद आशंका'
गृह मंत्री जडेजा इस आशंका को भी बेबुनियाद क़रार देते हैं. उन्होंने कहा, "ऊना की वारदात से इसका कुछ लेना देना नहीं है. ऊना की वारदात में जिंदा गाय का मामला था ही नहीं. दलितों को निशाना बनाने का सवाल ही नहीं उठता है."
वे इस विधेयक की मंशा बताते हुए कहते हैं, "राज्य में ग़ैरक़ानूनी ढंग से चोरी छिपे गाय काटने की कुछ घटनाएं हुई हैं. लोग गाय चुरा कर ले जाते हैं और उसे काट देते हैं. गायों की तस्करी और उनके ग़ैरक़ानूनी क़त्ल को रोकने के लिए यह विधेयक लाया गया है."
लेकिन जिग्नेश की चिंता दूसरी वजहों से ज़्यादा है.
वे कहते हैं कि दरअसल भाजपा इस साल के अंत में होने वाले गुजरात विधानसभा चुनावों की रणनीति पर काम कर रही है.
सियासत की बिसात
वे कहते हैं, "भाजपा दलितों और मुसलमानों के ख़िलाफ़ माहौल बनाना चाहती है ताकि सवर्ण हिंदू उसके पीछे खड़े हो जाएं. इस तरह के ध्रुवीकरण से भाजपा को सियासी फ़ायदा है."
वे आशंका जताते हैं कि इससे इन दोनों ही समुदायों पर अत्याचार बढ़ेगा.
गृह मंत्री जडेजा इस विधेयक के पीछे किसी तरह की सियासी वजह से इनकार करते हैं.
'सियासी वजह नहीं'
उन्होंने कहा, "चुनाव का इससे कोई लेनादेना नहीं है. उसमें अभी देरी है. हमने राज्य की अर्थव्यवस्था मजबूत करने और ग़रीबों की कमाई बढ़ाने के मक़सद से यह विधेयक पेश किया था. हम किसी को निशाना बनाने की बात सोचते ही नहीं हैं."
दलित आंदोलन से जुड़े कौशिक परमार का मानना है कि यह विधेयक सरकार को दलित आंदोलन कुचलने का आसान और कारगर हथियार दे देगा.
वे कहते हैं, "अपने अधिकारों के प्रति थोड़ी भी जागरुकता दिखाने पर सरकार इसका उपयोग कर दलित को फंसा देगी."
निशाने पर आंदोलन
वे इसकी वजह बताते हुए आगे जोड़ते हैं, "दलितों को यह डर हमेशा रहेगा कि वे मुखर होने वालों का समर्थन करेंगे तो पुलिस उन्हें इस अधिनियम के तहत गिरफ़्तार कर लेगी और उनके सामने उम्र क़ैद का ख़तरा मंडराने लगेगा."
गुजरात सरकार ने दलितों की सुरक्षा के नाम पर एक कार्ड बनाने की योजना तैयार की है.
परमार के मुताबिक़, अब होगा यह कि इस कार्ड के आधार पर दलितों की पहचान कर उन्हें चुन चुन कर अधिनियम में फंसाया जाएगा या ऐसा करने की धमकी दी जाएगी.
उद्योग पर असर
इस अधिनयम के लागू होने पर चमड़ा उद्योग पर बुरा असर पड़ने की पूरी आशंका है. कच्चा माल नहीं मिला तो चमड़ा उद्योग कैसे काम करेगा, यह सवाल लाज़िमी है.
चमड़े के जूते चप्पल और दूसरे उत्पाद बनाने वाली वडोदरा स्थित कंपनी अनुज इंटरप्राइज़ेज के महाप्रबंधक विजय आचार्य यह मानते हैं कि इसका असर चमड़ा उद्योग पर पड़ेगा.
उन्होंने कहा, "कच्चा माल नहीं मिला या महंगा हुआ तो हमें दिक़्क़त होगी."
वे यह तो कहते हैं कि गाय की स्वाभाविक मौत से खाल मिलती रहेगी और इससे काम चलता रहेगा. पर यह भी कहते हैं कि इस तरह से मिलने वाली गाय की खाल पूरे उद्योग के लिए नाकाफ़ी होगी.